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एक आह्वान

शिक्षा अधिकार विधेयक एक छलावा है,

शिक्षा का बाजारीकरण एक विकृति है,

देश के सारे बच्चों को मुफ्त, समतापूर्ण, गुणवत्तापू्र्ण शिक्षा के संघर्ष

के लिए आगे आएं

लोकसभा चुनाव में दुबारा जीतकर आने के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के नए मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने कई घोषणाएं की हैं। अपने मंत्रालय का 100 दिन का कार्यक्रम जारी करते हुए उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में अनेक प्रकार के सुधारों व बदलावों की मंशा जाहिर की है। उनकी घोषणाओं में प्रमुख हैं :-
शिक्षा में निजी-सार्वजनिक भागीदारी को बढ़ावा देना, देश में विदेशी विश्वविद्यालयों को इजाजत देना, कक्षा 10वीं की बोर्ड परीक्षा समाप्त करना, अंकों के स्थान पर ग्रेड देना, देश भर के कॉलेजों में दाखिला के लिए एक अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा लेना, व्यावसायिक शिक्षा के लिए बैंक ऋण में गरीब छात्रों को ब्याज अनुदान देना आदि। यशपाल समिति की सिफारिश को भी स्वीकार किया जा सकता है, जिसमें विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्, भारतीय चिकित्सा परिषद् आदि को समाप्त कर चुनाव आयोग की तर्ज पर ‘राष्ट्रीय उच्च शिक्षा एवं शोध आयोग’ बनाने का सुझाव दिया गया है। अचरज की बात है कि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में है, किन्तु श्री सिब्बल ने इन घोषणाओं के पहले राज्य सरकारों से परामर्श की जरुरत भी नहीं समझी।
इनमें से कुछ प्रावधान अच्छे हो सकते हैं, किन्तु कई कदम खतरनाक हैं और उन पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस की जरुरत है। इन घोषणाओं से प्रतीत होता है कि भारत सरकार और श्री कपिल सिब्बल भारत की शिक्षा की दुरावस्था से चिंतित हैं और उसको सुधारना चाहते हैं। लेकिन वास्तव में वे शिक्षा का निजीकरण एवं व्यवसायीकरण, शिक्षा में मुनाफाखोरी के नए अवसर खोलने, विदेशी शिक्षण संस्थाओं की घुसपैठ कराने, सरकारी शिक्षा व्यवस्था को और ज्यादा बिगाड़ने, साधारण बच्चों को शिक्षा से वंचित करने और देश के सारे बच्चों को शिक्षति करने की सरकार की जिम्मेदारी से भागने की तैयारी कर रहे हैं। इन कदमों का पूरी ताकत से विरोध होना चाहिए। साथ ही अब समय आ गया है कि देश के सारे बच्चों को अच्छी शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए सरकारी संसाधनों से समान स्कूल प्रणाली पर आधारित मुफ्त, अनिवार्य व समता्पूर्ण शिक्षा के लिएश संघर्षको तेज किया जाए।

शिक्षा अधिकार विधेयक का पाखंड

‘बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा अधिकार विधेयक’ संसद में काफी समय से लंबित है और इसका काफी विरोध हुआ है। वर्तमान स्वरुप में यह देश के बच्चों को शिक्षा का अधिकार देने के बजाय छीनने का काम करता है। इस विधेयक में शिक्षा के बढ़ते निजीकरण, व्यवसायीकरण और बाजारीकरण पर रोक लगाने की कोई बात नहीं है। आज देश में शिक्षा की कई परतें बन गई हैं। जिसकी जैसी आर्थिक हैसियत है, उसके हिसाब से वह अपने बच्चों को उस स्तर के स्कूलों मे पढ़ा रहा है। सरकारी स्कूलों की हालत जानबूझकर इतनी खराब बना दी गई है कि उनमें सबसे गरीब साधनहीन परिवारों के बच्चे ही जा रहे हैं। ऐसी हालत में उनकी उपेक्षा और बदहाली और ज्यादा बढ़ गई है। इस दुष्चक्र और भेदभाव को तोड़ने के बजाय यह विधेयक और मजबूत करता है।
विश्वबैंक के निर्देशों के तहत, शिक्षा के बाजार को बढ़ावा देने के मकसद से, पिछले कुछ वर्षों से केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों ने जानबूझकर सरकारी शिक्षा व्यवस्था बिगाड़ने का काम किया है। पहले तो देश के सारे बच्चों को स्कूली शिक्षा प्रदान करने के संवैधानिक निर्देश को पूरा करने के बजाय साक्षरता अभियान, औपचारिकेतर शिक्षा व शिक्षा गारंटी शालाओं के नाम पर सरकार ने अपनी जिम्मेदारी टालने की कोशिश की। फिर स्कूलों व कॉलेजों में स्थायी-प्रशिक्षित शिक्षकों के  स्थान पर पैरा-शिक्षकों की नियुक्तियां शुरु कर दी,जो अस्थायी व अप्रशिक्षित होते हैं और जिन्हें बहुत कम वेतन दिया जाता है। इसी के साथ प्राथमिक शालाओं में दो या तीन शिक्षकों की कामचलाऊ नियुक्ति को भी वैधानिक स्वीकृति दे दी गई, जिसका मतलब है कि एक शिक्षक दो, तीन, चार या पांच कक्षाएं एक साथ पढ़ाएगा। देश के साधारण गरीब बच्चों को इस लायक भी सरकार ने नहीं समझा कि एक कक्षा के लिए कम से कम एक शिक्षक मुहैया कराया जाए। सरकारी शिक्षकों को तमाम तरह के गैर-शैक्षणिक कामों में लगाने पर भी रोक इस विधेयक में नहीं लगाई गई है, जिसका मतलब है सरकारी स्कूलों में शिक्षकों का और ज्यादा अभाव एवं ज्यादा गैरहाजिरी। चूंकि निजी स्कूलों के शिक्षकों को इस तरह की कोई ड्यूटी नहीं करनी पड़ती है, सरकारी स्कूलों में जाने वाले साधारण गरीब बच्चों के प्रति भेदभाव इससे और मजबूत होता है। निजी स्कूलों के साधन-संपन्न बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा में इससे वे और कमजोर पड़ते जाते हैं।
निजी स्कूल कभी भी देश के सारे बच्चों को शिक्षा देने का काम नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उनकी फीस चुकाने की क्षमता सारे लोगों में नहीं होती है। शिक्षा का निजीकरण देश में पहले से मौजूद अमीर-गरीब की खाई को और ज्यादा मजबूत करेगा तथा करोड़ों बच्चों को शिक्षा से वंचित करने का काम करेगा। देश के सारे बच्चों को शिक्षति करने के लिए सरकार को ही आगे आना पड़ेगा व जिम्मेदारी लेनी होगी। लेकिन सरकार ने अपनी शिक्षा व्यवस्था को इस चुनौती के अनुरुप फैलाने, मजबूत करने और बेहतर बनाने के बजाय लगातार उल्टे बिगाड़ा है व उपेक्षति-वंचित किया है। सरकारी स्कूलों की संख्या में जरुर वृद्धि हुई है, स्कूलों में नाम दर्ज बच्चों की संख्या भी 90-95 प्रतिशत तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है, किन्तु इस कुव्यवस्था, घटिया शिक्षा, अनुपयुक्त व अरुचिपू्र्ण शिक्षा पद्धति, खराब व्यवहार एवं गरीबी की परिस्थितियों के कारण आधे से भी कम बच्चे 8 वीं कक्षा तक पहुंच पाते हैं। इसलिए शिक्षा के अधिकार की कोई भी बात करने के पहले देश की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को सार्थक, संपूर्ण, सुव्यवस्थित व सर्वसुविधायुक्त बनाना जरुरी है। जो सरकार उल्टी दिशा में काम कर रही है, और जानबूझकर सरकारी स्कूल व्यवस्था को नष्ट करने का काम कर रही हैं, उसके द्वारा शिक्षा अधिकार विधेयक संसद में पास कराने की बात करना एक पाखंड है और आंखों में धूल झोंकने के समान है।

समान स्कूल प्रणाली एकमात्र विकल्प

देश के सारे बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके, इसके लिए यह भी जरुरी है कि देश में कानून बनाकर पड़ोसी स्कूल पर आधारित समान स्कूल प्रणाली लागू की जाए। इसका मतलब यह है कि एक गांव या एक मोहल्ले के सारे बच्चे (अमीर या गरीब, लड़के या लड़की, किसी भी जाति या धर्म के) एक ही स्कूल में पढ़ेंगे। इस स्कूल में कोई फीस नहीं ली जाएगी और सारी सुविधाएं मुहैया कराई जाएगी। यह जिम्मेदारी सरकार की होगी और शिक्षा के सारे खर्च सरकार द्वारा वहन किए जाएंगे। सामान्यत: स्कूल सरकारी होगें, किन्तु फीस न लेने वाले परोपकारी उद्देश्य से (न कि मुनाफा कमाने के उद्देश्य से) चलने वाले कुछ निजी स्कूल भी इसका हिस्सा हो सकते हैं। जब बिना भेदभाव के बड़े-छोटे, अमीर-गरीब परिवारों के बच्चे एक ही स्कूल में पढ़ेगें तो अपने आप उन स्कूलों की उपेक्षा दूर होगी, उन पर सबका ध्यान होगा और उनका स्तर ऊपर उठेगा। भारत के सारे बच्चों को शिक्षित करने का कोई दूसरा उपाय नहीं है। दुनिया के मौजूदा विकसित देशों में कमोबेश इसी तरह की स्कूल व्यवस्था रही है और इसी तरह से वे सबको शिक्षति बनाने का लक्ष्य हासिल कर पाए हैं। समान स्कूल प्रणाली का प्रावधान किए बगैर शिक्षा अधिकार विधेयक महज एक छलावा है।
इस विधेयक में और कई कमियां हैं। यह सिर्फ 6 से 14 वर्ष की उम्र तक (कक्षा 1 से 8 तक) की शिक्षा का अधिकार देने की बात करता है। इसका मतलब है कि बहुसंख्यक बच्चे कक्षा 8 के बाद शिक्षा से वंचित रह जाएंगे। कक्षा 1 से पहले पू्र्व प्राथमिक शिक्षा भी महत्वपू्र्ण है। उसे अधिकार के दायरे से बाहर रखने का मतलब है सिर्फ साधन संपन्न बच्चों को ही केजी-1, केजी-2  आदि की शिक्षा पाने का अधिकार रहेगा। शुरुआत से ही भेदभाव की नींव इस विधेयक द्वारा डाली जा रही है।
शिक्षा अधिकार विधेयक में निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटों का आरक्षण गरीब बच्चों के लिए करने का प्रावधान किया गया है और उनकी ट्यूशन फीस का भुगतान सरकार करेगी। किन्तु महंगे निजी स्कूलों में ट्यूशन फीस के अलावा कई तरह के अन्य शुल्क लिए जाते हैं, क्या उनका भुगतान गरीब परिवार कर सकेगें ? क्या ड्रेस, कापी-किताबों  आदि का भारी खर्च वे उठा पाएंगे ? क्या यह एक ढकोसला नहीं होगा ? फिर क्या इस प्रावधान से गरीब बच्चों की शिक्षा का सवाल हल हो जाएगा ? वर्तमान में देश में स्कूल आयु वर्ग के 19 करोड़ बच्चे हैं। इनमें से लगभग 4 करोड़ निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। मान लिया जाए कि इस विधेयक के पास होने के बाद निजी स्कूलों में और 25 प्रतिशत यानि 1 करोड़ गरीब बच्चों का दाखिला हो जाएगा, तो भी बाकी 14 करोड़ बच्चों का क्या होगा ? इसी प्रकार जब सरकार गरीब प्रतिभाशाली बच्चों के लिए नवोदय विद्यालय, कस्तूरबा कन्या विद्यालय, उत्कृष्ट विद्यालय और अब प्रस्तावित मॉडल स्कूल खोलती है, तो बाकी विशाल संख्या में बच्चे और ज्यादा उपेक्षति हो जाते है। ऐसी हालत में, देश के हर बच्चे को शिक्षा का अधिकार देने की बात महज एक लफ्फाजी बनकर रह जाती है।

शिक्षा का मुक्त बाजार ?

वास्तव में नवउदारवादी रास्ते पर चल रही भारत सरकार देश में शिक्षा का मुक्त बाजार बनाने को प्रतिबद्ध है और उसी दिशा में आगे बढ़ रही है। शिक्षा में सरकारी-निजी भागीदारी का मतलब व्यवहार में यह होगा कि या तो नगरों व महानगरों की पुरानी सरकारी शिक्षण संस्थाओं के पास उपलब्ध कीमती जमीन निजी हाथों के कब्जे में चली जाएगी या फिर प्रस्तावित मॉडल स्कूलों में पैसा सरकार का होगा, मुनाफा निजी हाथों में जाएगा। निजीकरण के इस माहौल में छात्रों और अभिभावकों का शोषण बढ़ता जा रहा है। बहुत सारी घटिया, गैरमान्यताप्राप्त और फर्जी शिक्षण संस्थाओं की बाढ़ आ गई है। दो-तीन कमरों में चलने वाले कई निजी विश्वविद्यालय आ गए हैं और कई निजी संस्थानों को डीम्ड विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया गया है। कोचिंग और ट्यूशन का भी बहुत बड़ा बाजार बन गया है। बड़े कोचिंग संस्थान तो करोड़ों की कमाई कर रहे है। अभिभावकों के लिए अपने बच्चों को पढ़ाना व प्रतिस्पर्धामें उतारना दिन-प्रतिदिन महंगा व मुश्किल होता जा रहा है। गरीब और साधारण हैसियत के बच्चों के लिए दरवाजे बंद हो रहे है।
यदि कपिल सिब्बल की चलेगी तो अब कॉलेज में दाखिले के लिए भी अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा होगी। इससे कोचिंग का बाजार और बढ़ेगा तथा साधारण हैसियत के युवाओं के लिए कॉलेज शिक्षा के दरवाजे भी बंद होने लगेगें। आत्महत्याओं व कुंठा में और बढ़ोत्तरी होगी। विडंबना यह है कि बच्चों का परीक्षा का तनाव कम करने की बात करने वाले सिब्बल साहब को गलाकाट प्रतिस्पर्धाओं और कोचिंग कारोबार के दोष नहीं दिखाई देते। महंगी निजी शिक्षा के लिए उनका फार्मूला है शिक्षा ऋण तथा गरीब विद्यार्थियों के लिए इस ऋणमें ब्याज अनुदान। लेकिन बहुसंख्यक युवाओं की कुंठा, वंचना और हताशा बढ़ती जाएगी।
यदि देश के दरवाजे विदेशी शिक्षण संस्थाओं और विदेशी विश्वविद्यालय के लिए खोल दिए गए, तो बाजार की यह लूट व धोखाधड़ी और बढ़ जाएगी। यह उम्मीद करना बहुत गलत एवं भ्रामक है कि दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय भारत में आने को तत्पर है और इससे देश में शिक्षा का स्तर बढ़ेगा। वास्तव में घटिया, चालू और मुनाफे व कमाई की खोज में बैचेन विश्वविद्यालय व शिक्षण संस्थान ही आएंगे। देश के जनजीवन के लगभग हर क्षेत्र को विदेशी कंपनियों के मुनाफे के लिए खोलने के बाद अब शिक्षा, स्वास्थ्य, मीडिया आदि के बाकी क्षेत्रों को भी विदेशी कंपनियों के लूट व मुनाफाखोरी के हवाले करने की यह साजिश है। यह सिर्फ आर्थिक लूट ही नहीं होगी। इससे देश के ज्ञान-विज्ञान, शोध, चिन्तन, मूल्यों और संस्कृति पर भी गहरा विपरीत असर पड़ेगा। इसका पूरी ताकत से प्रतिरोध करना जरुरी है।

स्वतंत्र आयोग या निजीकरण का वैधानीकरण ?

यशपाल समिति की पूरी रिपोर्ट का ब्यौरा सामने नहीं आया है। उच्च शिक्षा की बिगड़ती दशा के बारे में उसकी चिंता जायज है। डीम्ड विश्वविद्यालयों की बाढ़ के बारे में भी उसने सही चेतावनी दी है। किन्तु यू.जी.सी., अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद्, भारतीय चिकित्सा परिषद् आदि समाप्त करके उनके स्थान पर चुनाव आयोग जैसा स्वतंत्र एवं स्वायत्त ‘उच्च शिक्षा एवं शोध आयोग’ बनाने के सुझाव पर सावधानी की जरुरत है। पिछले कुछ समय में, विश्व बैंक के सुझाव पर अनेक प्रांतो में विद्युत नियामक आयोग एवं जल नियामक आयोग बनाए गए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर दूरसंचार व बीमा के लिए भी इस तरह के आयोग बने हैं। दरअसल ये सारे आयोग निजीकरण के साथ आए हैं। जब तक सब कुछ सरकार के हाथ में था, आयोग की जरुरत नहीं थी। यह कहा जाता है कि ये आयोग सरकार से स्वतंत्र एवं स्वायत्त होते हैं और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त होते हैं। लेकिन विश्वबैंक और देशी-विदेशी कंपनियों का प्रभाव उन पर काम करता रहता है। कम से कम बिजली और पानी के बारे में इन आयोगों की भूमिका निजीकरण की राह प्रशस्त करना, उसे वैधता देने और बिजली-पानी की दरों को बढ़ाने की रही है। उन्हें राजनीति से अलग रखने के पीछे मंशा यह भी है कि जन असंतोष और जनमत का दबाब उन पर न पड़ जाए। उच्च शिक्षा और स्कूली शिक्षा के बारे में इस तरह के आयोगों की भूमिका भी निजीकरण को वैधता प्रदान करने की हो सकती है, जबकि जरुरत शिक्षा के निजीकरण को रोकने व समाप्त करने की है। अफसोस की बात है कि यशपाल समिति ने उच्च शिक्षा के निजीकरण और विदेशी संस्थानों के घुसपैठ का स्पष्ट विरोध नहीं किया है।

आइए, आठ सूत्री देशव्यापी मुहिम छेड़ें

शिक्षा का बाजार एक विकृति है। बच्चों में शिक्षा, स्वास्थ्य व पोषण में भेदभाव करना
आधुनिक सभ्य समाज पर कलंक के समान है। देश के सारे बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना हमारा संवैधानिक दायित्व है। भारतीय संविधान में इस काम को 10 वषZ में पूरा करने के निर्देश दिए गए थे। लेकिन छ: दशक में भी इसे पूरा न करके भारत की सरकारों ने भारत की जनता, देश और संविधान के प्रति अक्षम्य अपराध किया है। अब सरकार जो कदम उठा रही हैं,उससे यह लक्ष्य और दूर हो जाएगा। समय आ गया है कि इस मामले में देश भर में मुहिम चलाकर भारत सरकार पर दबाब बनाया जाए कि -
1.    शिक्षा के निजीकरण, व्यवसायीकरण और मुनाफाखोरी को तत्काल रोका जाए और इस दिशा में उठाए गए सारे कदम वापस लिए जाएं।
2.    शिक्षा में विदेशी शिक्षण संस्थानों के प्रवेश पर रोक लगे।
3.    शिक्षा में सभी तरह के भेदभाव और गैरबराबरी खतम की जाए। समान स्कूल प्रणाली पर आधारित मुफ्त, अनिवार्य एवं समतामूलक शिक्षा की व्यवस्था देश के सारे बच्चों के लिए अविलंब की जाए।
4.    सरकारी स्कूलों में पर्याप्त संख्या में स्थायी व प्रशिक्षति शिक्षक नियुक्त किए जाएं और उन्हें सम्मानजनक वेतन दिए जाएं। स्कूलों में भवन, पाठ्य-पुस्तकों, पाठ्य सामग्री, खेल सामग्री, खेल मैदान, प्रयोगशाला, पुस्तकालय, शिल्प-शिक्षण, छात्रवृत्तियों, छात्रावास आदि की पर्याप्त एवं समुचित व्यवस्था हो। सुविधाओं व स्तर की दृष्टि से प्रत्येक स्कूल को केन्द्रीय विद्यालय या नवोदय विद्यालय के समकक्ष लाया जाए।
5.    ‘शिक्षा का अधिकार विधेयक’ के मौजूदा प्रारुप को तत्काल वापस लेकर उक्त शर्तोंको पूरा करने वाला नया विधेयक लाया जाए। विधेयक के मसौदे पर पूरे देश में जनसुनवाई की जाए एवं चर्चा-बहस चलाई जाए।
6.    शिक्षा की जिम्मेदारी से भागना बंद करके सरकार शिक्षा के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए। कोठारी आयोग एवं तपस सेनगुप्ता समिति की सिफारिश के मुताबिक कम से कम राष्ट्रीय आय के छ: प्रतिशत के बराबर व्यय सरकार द्वारा शिक्षा पर किया जाए।
7.    शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो। शिक्षा, प्रशासन एवं सार्वजनिक जीवन में अंग्रेजी का वर्चस्व गुलामी की विरासत है। इसे तत्काल समाप्त किया जाए।
8.    मैकाले द्वारा बनाया शिक्षा का मौजूदा किताबी, तोतारटन्त, श्रम के तिरस्कार वाला, जीवन से कटा, विदेशी प्रभाव एवं अंग्रेजी के वर्चस्व वाला स्वरुप बदला जाए। इसे आम लोगों की जरुरतों के अनुसार ढाला जाए एवं संविधान के लक्ष्यों के मुताबिक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रकि एवं प्रगतिशील भारत के निर्माण के हिसाब से बनाया जाए। हर बच्चे के अंदर छुपी क्षमताओं व प्रतिभाओं के विकास का मौका इससे मिले।
लगभग इसी तरह के मुद्दों व मांगो को लेकर 21-22 जून को एक राष्ट्रीय सेमिनार में अखिल भारतीय शिक्षा अधिकार मंच का गठन हुआ है, जिसकी ओर से जुलाई में संसद पर प्रदर्शन की तैयारी की जा रही है। अखिल भारतीय समाजवादी अध्यापक सभा द्वारा भी काफी समय से इन मुद्दों पर मुहिम चलाई जा रही है जिसका समापन  25 अक्टूबर 2009 को दिल्ली मे राजघाट पर होगा।
कृपया आप भी अपने क्षेत्र में व अपनी इकाइयों में इन मुद्दों व मांगो पर तत्काल कार्यक्रम लें। आप गोष्ठी, धरने, प्रदर्शन, ज्ञापन, परचे वितरण, पोस्टर प्रदर्शनी आदि का आयोजन कर सकते हैं। स्थानीय स्तर पर शिक्षकों, अभिभावकों, विद्या्र्थियों, जागरुक नागरिकों व अन्य जनसंगठनों के साथ मिलकर ‘शिक्षा अधिकार मंच’ का गठन भी कर सकते हैं।
उल्लेखनीय है कि यह वर्ष प्रखर समाजवादी नेता डॉ० राममनोहर लोहिया का जन्मशताब्दी वर्ष है। उनके नेतृत्व में पचास साल पहले ही समाजवादी आंदोलन ने मुफ्त और समान शिक्षा का आंदोलन छेड़ा था तथा अंग्रेजी के वर्चस्व का विरोध किया था। ‘चपरासी हो या अफसर की संतान, सबकी शिक्षा एक समान’ तथा ‘चले देश में देशी भाषा, गांधी-लोहिया की यह अभिलाषा’ के नारे देते हुए शिक्षा में भेदभाव समाप्त करने का आह्वान किया था। डॉ. लोहिया की जन्मशताब्दी पर उनके प्रति सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि इस आवाज को हम फिर से पूरी ताकत से बुलंद करें।

सुनील
राष्ट्रीय अध्यक्ष
समाजवादी जन परिषद्
ग्राम/पोस्ट – केसला
जिला होशंगाबाद
फोन 09425040452

म.प्र. का बैतूल जिला पुलिस द्वारा महिलाओं पर अत्याचार के लिए प्रसिद्ध होता जा रहा है। बीते दिनों बैतूल जिले में एक सप्ताह के अंदर दो घटनाएं घटी। पहले 27 मई को सारणी में निजी सुरक्षा गार्डों द्वारा महिलाओं के साथ छेड़खानी का विरोध होने पर गोली चलाकर एक आदिवासी युवक की जान ले ली गई तथा छ: युवकों को घायल कर दिया गया।
पुलिस ने महिलाओं एवं गरीब बस्ती के पक्ष में खड़े होने के बजाय मामूली धाराओं का प्रकरण बनाकर हत्यारों को बचा लिया। दूसरी घटना में पुलिस ने 2 जून की रात्रि को आमला थाने में एक दलित महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया।
आमला की घटना इस प्रकार है। पास के गांव जंबाड़ा की 48 वर्षीय दलित महिला जानकीबाई को उनके पति व बेटे के साथ आमला पुलिस ने दहेज प्रताड़ना के केस में 2 जून को गिरफ्तार किया। मुलताई न्यायालय द्वारा जानकीबाई को इस केस में जमानत नहीं दी गई व उन्हें बैतूल जेल ले जाने का आदेश दिया गया। आमला पुलिस उन्हें बैतूल जेल न ले जाकर आमला थाने ले कर गई। जहां रात में शराब के नशे में थाना प्रभारी सहित चार पुलिस वालों ने उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया। अगले दिन दोपहर में जानकीबाई को बैतूल जेल ले जाया गया। जहां शाम को जानकीबाई ने कम्पाउंडर व महिला प्रहरी के माध्यम से जेलर को बलात्कार की घटना के बारे में बताया। जेलर ने तुरंत बैतूल पुलिस अधीक्षक को फोन किया व अगले दिन 4 जून को लिखित आवेदन महिला के बयान के साथ एस.पी., कलेक्टर आदि को भेजा। इसी दिन पीड़ित महिला का मेडिकल परीक्षण व अजाक (अनुसूचित जाति, जनजाति एवं महिला कल्याण) थाना में प्रथम सूचना रपट दर्ज की गयी। अगले दिन 5 जून को महिला को जमानत मिली और 6 जून को वो जेल से बाहर आई ।
सारणी की घटना इस प्रकार है। यहां पर म०प्र० के बड़ा ताप विद्युतगृह है। मध्यप्रदेश बिजली बोर्ड के प्राइवेट सुरक्षा गा्र्ड यहां कि शक्तिपुरा बस्ती की आदिवासी व दलित महिलाओं के साथ छेड़खानी करते रहते थे। 27 मई को जब सावित्री बाई व कुछ अन्य महिलाएं बस्ती के पास नाले में कपड़े धोने गई और वहां से गुजरते हुए म.प्र. बिजली बोर्ड के निजी सुरक्षा गा्र्ड छेड़खानी करने लगे। तो कुछ महिलाएं बस्ती से कुछ लड़कों को बुला लाई । जब इन लड़को ने इन सुरक्षा गार्डों का प्रतिरोध किया तो निजी सुरक्षा गार्डों ने इन लड़कों पर गोलियां चला दी।
पुलिस ने इन घायल व मरने वाले लड़को पर कोयला चोरी व पत्थर मारने का झूठा आरोप दर्ज किया है। साथ ही निजी सुरक्षा गार्डों पर आत्मरक्षा में गोली चलाने का केस बनाकर मामले को हल्का बना दिया। सभी गार्डों की जमानत हो चुकी है व वे खुल्ले घूम रहे हैं ।
समाजवादी जन परिषद् ने इन दोनों घटनाओं में पुलिस की मनमानी व अत्याचार के खिलाफ 11 जून को बैतूल में धरना प्रदर्शन व आमसभा का आयोजन किया। बाद में भोपाल से म०प्र० महिला मंच का एक जांच दल, जिसमें स.ज.प. से भी दो महिला साथी शामिल थी, इन दोनों जगह पर गया। जो जांच पड़ताल उन्होनें की, उसके आधार पर एक रिपोर्ट उन्होनें तैयार की हैं। इस रिपो्र्ट में निम्न तथ्य सामने आए।
आमला की घटना में :-
(1)    पुलिस ने जानबूझकर पीड़ित महिला का बयान दर्ज करने व मेडिकल परीक्षण करवाने में देरी की।
(2)    सामान्यत: बलात्कार के मामले में महिला के बयान व मेडिकल परीक्षण के बाद आरोपियों को तत्काल गिरफ्तार किया जाता है। किन्तु इस घटना के 25 दिन बाद तक आरोपी पुलिसक्र्मियों को गिरफ्तार नहीं किया गया है। ये कहकर बात टाली जा रही है कि इस मामले की जांच चल रही है। हालांकि आम लोगों पर जब बलात्कार का आरोप लगता है, उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाता है।
(3)    पीड़ित महिला के साड़ी ब्लाउज तो साक्ष्य के रुप में जब्त कर लिए गए हैं। किन्तु सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य वो गमछा था जिससे बलात्कारियों ने महिला के हाथ बलात्कार के समय बांधा था। इसी गमछे से जानकी्बाई ने बलात्कार के बाद अपने शरीर को पोंछा था। पीड़ित महिला के हर बयान में उस गमछे का जिक्र है फिर भी इस गमछे को जब्त क्यों नहीं किया गया?
(4)    अभी तक कोई पहचान परेड नहीं कराई गई। इस घटना की जांच शुरु होने से पहले आरोपियों के पास 2 से 3 दिन का समय था जिसमें वो आराम से घटनास्थल से सारे साक्ष्य गायब कर सकते थे।
(5)    दो पुलिसकर्मियों का स्थानांतरण दूसरे जिलों में किया गया है जबकि बाकी दो अभी भी उसी थाने में कार्यरत हैं। इतना गंभीर अपराध पुलिस द्वारा पुलिस हिरासत में जानकीबाई के साथ हुआ है, लेकिन न तो पुलिस वालों की गिरफ्तारी हुई, न ही उनका निलंबन हुआ।
(6)    जिला कलेक्टर ने इस मामले की न्यायिक जांच जिला जज को सौंपी है, जिन्होनें इस मामले को आमला के अतिरिक्त जज को सौंप दिया है। वे स्थानीय व्यक्ति हैं व आसानी से प्रभावित किए जा सकते हैं।
(7)    म०प्र० महिला आयोग की टीम 05 जून को पीड़ित महिला से मिली थी। उस टीम मे एक महिला डॉक्टर भी थीं और उन्होनें महिला का परीक्षण करने पर स्पष्ट कहा कि बलात्कार होने के संकेत हैं। दूसरी ओर महिला चिकित्सक डॉ. वंदना घोघरे जिन्होंने प्रशासन की ओर से जानकीबाई का मेडिकल परीक्षण किया है उन्होंने अपनी रिपोर्ट में – हाल में संभोग के बारे में कोई स्पष्ट राय नहीं- कहकर मामले को कमजोर बनाने की कोशिश की हैं।

सारणी की घटना में :-
(1)    सावित्री बाई (जिनके साथ छेड़खानी हुई) छेड़खानी की घटना की रिपोर्ट कराने 27 मई से दो-तीन बार पहले भी सारणी थाने गई थी। पर थानेदार ने उनकी रिपोर्ट दर्ज करें बगैर ही उन्हें वापस लौटा दिया।
(2)    निजी सुरक्षा गार्डों की तरफ से जो एफ.आई.आर. बस्ती के युवकों पर दर्ज किए गए हैं वे काफी मनमाने हैं। उसमें कोयला चोरी की बात कही गई है पर इस बाबत पुलिस के पास कोई साक्ष्य नहीं हैं। पुलिस ने कोयला चोरी का कोई अलग प्रकरण भी नहीं बनाया है।
(3)    सावित्री बाई के साथ छेड़खानी का रिपोर्ट में कहीं कोई उल्लेख भी नहीं है और न ही उसका कोई प्रकरण पुलिस ने बनाया है।
(4)    गार्डों ने जो गोलियां चलाईं, यदि वे आत्मरक्षा में चलाई हैं तो गोली के सारे छर्रे युवकों को कमर के ऊपर क्यों लगे हैं ? घायल लोगों में से किसी किसी को 27-30 छर्रे लगे हैं क्या इतनी गोलियां चलाना आत्मरक्षा में वाजिब माना जा सकता है ?
(5)    घटना का स्थल भी विवादास्पद हैं। पुलिस ने जिस स्थान को अपराध स्थल बतायाहै वो म०प्र० बिजली बोर्ड के परिसर के पास और बस्ती से दूर हैं। बस्ती के लोग जिस स्थान को अपराध स्थल बता रहे हैं वो बस्ती के पास और म०प्र० बिजली बो्र्ड के परिसर से 2-3 किमी दूर है।
(6)    पीड़ित महिला व बस्ती के अन्य लोग जब अ.जा.क. थाने, बैतूल में रिपोर्ट दर्ज कराने गए तो इनकी रिपो्र्ट ही नहीं दर्ज की गई।
इन दोनों घटनाओं से यह स्पष्ट हैं कि पुलिस का जो ढांचा हमारे देश में हैं वो बहुत ही भ्रष्ट है। पुलिस को अपने अधिकारों का मनमाना उपयोग करने की बहुत ज्यादा आजादी है। पुलिस चाहे तो कोई रिपोर्ट दर्ज करे, चाहे तो रिपो्र्ट ही न दर्ज करे, जो मन मे आए वो प्रकरण बनाए, चाहे तो किसी पर भी झूठा केस बना दे और चाहे तो पैसा लेकर केस रफा-दफा कर दे।
आमला वाले मामले में यह विडंबना भी दिखाई देती है कि महिलाओं के हित में दहेज के खिलाफ जो कानून बना है उसे पुलिस ने एक महिला को ही प्रताड़ित करने के लिए इस्तेमाल किया। अत: जब तक  इस भ्रष्ट पुलिस और प्रशासन का ढांचा नहीं बदला जाता तब तक सिर्फ़ महिलाओं की रक्षा के कानून बना देने से कुछ नहीं होने वाला।
म०प्र० में जहां एक ओर मुख्यमंत्री प्रदेश में सुशासन, महिलाओं का सम्मान व भारतीय संस्कृति के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर महिलाओं पर खुलेआम अत्याचार हो रहे हैं और अत्याचारियों को बचाया जा रहा है।
पिछले दिनों म०प्र० में और भी कई महिलाओं पर पुलिस द्वारा अत्याचार की घटनाएं हुई हैं। उनमें से कुछ का विवरण इस प्रकार है -
(1)    पन्ना जिले के सिमरिया पुलिस थाना में एक नाबालिग लड़की बलात्कार की रिपोर्ट दर्ज करने आई थी। ये 2 मार्च 2009 की घटना है। उसकी रि्पोर्ट दर्ज करने के बजाय सब इंस्पेक्टर नरेन्द्र सिंह ठाकुर व अन्य दो पुलिसवालों ने उस लड़की के साथ थाने में ही सामूहिक बलात्कार किया।
(2)    30 अप्रैल को रायसेन जिले में गूगलवाड़ा ग्राम की नौ साल की बालिका के साथ बलात्कार हुआ। मगर पुलिस ने मामूली छेड़छाड़ का मामला दजZ किया और केस को हल्का बना दिया।

लेखिका :शिउली वनजा
केसला, जिला – होशंगाबाद
(म०प्र०)

[ शिउली वनजा नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की अर्थशास्त्र की छात्रा है तथा विद्यार्थी युवजन सभा की सदस्य है । उपर्युक्त जांच दल में वह शामिल थी । ]

जब बुनियादी सवालों पर प्रमुख दलों में वैचारिक अन्तर न रह गया हो तब हार – जीत के नकली कारण प्रकट होने लगते हैं । उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की आशा से अधिक सफलता से प्रफुल्लित मनमोहन सिंह से लगायत छुटभैय्ये कांग्रेसी और उनकी मस्केबाजी करने वाले टेवि चर्चाकार बेशर्मी से क्या-क्या कह रहे हैं ?
१. इसका श्रेय राहुल गांधी के प्रचार अभियान को जाता है ।
२. किसानों की कर्ज माफी का लाभ हमें मिला ।

कांग्रेस ने राहुल गांधी को प्रधान मन्त्री का उम्मीदवार न बना कर यह चुनाव लड़ा इसलिए वंशवाद के जायज आरोप से बची रही ।
चौधरी देवीलाल द्वारा १० हजार रुपये तक के किसानों के कर्ज जब माफ किए गए थे तब अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने उस कदम को गलत ठहराया था और कहा था कि इससे अर्थव्यवस्था का नुकसान हुआ है ।
मौजूदा चुनाव का सबसे बड़ा सबक होगा कि जब प्रमुख दलों में मुख्य नीतियों में फरक न रह जाए तब एक संघर्षशील प्रतिपक्ष को खड़ा करने के लिए सक्रिय हुआ जाए ।

इस लेख का – भाग एक , भाग दो

    ईसाई कानूनों की स्थिति दिलचस्प है । ईसाई विवाह अधिनियम ( 1872 ) व ईसाई तलाक अधिनियम ( 1869 ) अंग्रेजों द्वारा बनाये गये हैं । ये एक सदी से ज्यादा पुराने हो चुके हैं । इस सदी में हमारा पूरा समाज बदल चुका है , जो कि विशेष विवाह अधिनियम व तलाक अधिनियम ( 1974 ) में ( एक हद तक ) परिलक्षित है । जो निजी कानून ईसाई धर्मावलम्बियों के लिए है उसमें पुरुष को तलाक देने के लिए पत्नी को व्याभिचारिणी सिद्ध करना काफी है , परंतु स्त्री को पति के व्यभिचार के साथ शारीरिक यातना , बलात्कार , परित्याग जैसे एक से अधिक आधार सिद्ध करने पड़ते हैं । जाहिर है कि इसके साक्ष्य जुटाना कठिन हैं । मतलब कि गैर बराबर आधार है एक ही स्थिति से निजात के लिए । गोद लेने का अधिकार भी नहीं है ईसाई माता या पिता को ।

      उत्तराधिकार अलग – अलग ईसाई पंथ में अलग है । केरल के प्रसिद्ध मेरी रॉय बनाम केरल राज्य मामले में वादी ने सीरियन ईसाईयों की प्रथा को चुनौती दी थी जिसमें पुत्रियों का हिस्सा अपने भाइयों के हिस्से से (1/4 ) आँका जाता है । अंतत: उनकी जीत उच्चतम न्यायालय से हुई । समानता मूलक कानून बनाने का भी निर्देश इस निर्णय में था । 1994 में लगभग एक दशक की चर्चा व चिंतन के बाद विभिन्न ईसाई पंथ के पादरियों की परिषद , महिला संगठनों व कानूनविदों ने ईसाई धर्मावलम्बियों के लिए एक निजी कानून प्रस्तावित किया है जो वक्त की जरूरत पर आधारित है। उस प्रस्ताव  भारत सरकार द्वारा सुनवाई होना बाकी है । ईसाई विवाह अधिनियम ( 1872 ) का चरित्र प्रशासनिक ज्यादा , सामाजिक कम है । इसमें विवाह की शर्तें स्पष्ट भी नहीं हैं , व हर पंथ के लिए समान भी नहीं । इसकी उपधारा ( 79 – 71 )  में बाल – विवाह की अनुमति भी है । ईसाई तलाक अधिनियम (1869 ) के विडंबनापूर्ण व विषमतामूलक रूप को हमने रेखांकित किया है । ज्यादातर धर्मगुरु भी अब परस्पर रजामंदी से तलाक ( विशेष विवाह अधिनियम 1974  की तरह ) सुविधा समाज को मिले , यह चाहते हैं । इससे समाज में विकृतियाँ कम होंगी ऐसा उन्हें लगता है । केरल के उच्च न्यायालय ने इस तलाक अधिनियम (1869 ) को असंवैधानिक बताया है । भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम ( 1925 )  ईसाईयों पर लागू होता है जिसमें ईसाई विधवा को पति की आधी संपत्ति ही मिल सकती है । अगर गलती से या अज्ञानतावश पत्नी ने शादी के पूर्व किए करार में संपत्ति में अपना हिस्सा छोड़ दिया हो तो बाद में यह गलती नहीं सुधारी जा सकती । 1994 के प्रस्तावित विधेयक में विवाह व तलाक नियमों को विशेष विवाह अधिनियम (1954 ) के अनुरूप बना दिया गया है । उत्तराधिकार में समान हिस्सा मिले यह प्रस्तावित है और गोद लेने का हक भी स्त्री – पुरुष दोनों को है ।

    इन मुख्य धर्मों के निजी कानूनों से अलग गोवा राज्य में पुर्तगाली सिविल कोड ( कोडिगो सिविल पोर्चगीज़ – 1870 ) हर धर्म के नागरिक पर लागू होता है । इसके कारण वहाँ हर विवाह , जन्म व मृत्यु को पंजीकृत करना अनिवार्य है । कुछ अपवाद छोड़कर वहाँ सभी इसी नियम का पालन करते हैं । परस्पर रजामंदी से तलाक पहले 1910 में मिला , फिर 1946 में  कैथोलिक मत से प्रभावित पुर्तगाली राज्यसत्ता ने तलाक का प्रावधान हटाया , अब 1974 से फिर मिला है ।शादी के पहले की संपत्ति पति या पत्नी की निजी व विवाहोपरान्त साझी होती है । तलाक के बाद इसका आधे में बँटवारा होता है । पति अगर किसी व्यक्ति या संस्था से ऋण लेकर नहीं चुकाता है तो उसके हिस्से की संपत्ति जब्त होती है , पत्नी की नहीं । शादी के पहले किए गये करार को सार्वजनिक माना जाता है व परिवर्तनीय होता है । दरअसल वहाँ के कर के नियमों से भी ” अर्धांगिनी को आधा हक़” मिला हुआ है । साझी संपत्ति रखने पर उस पर कर भी आधा लगता है । व्यक्तिगत व साझी संपत्ति का मूल्यांकन भी अलग – अलग होता है । हाँ , इससे भी छुटकारा पाने के लिए तलाक के वक्त कभी – कभी पुरुष अपनी संपत्ति को पहले ही बहन या भाई को लिख देते हैं ताकि पत्नी को हिस्सा न देना पड़े । शून्य का आधा भी तो शून्य ही होगा । उत्तराधिकार नियम है कि यदि पति – पत्नी में से एक की मृत्यु हो जाए तो दूसरे को आधा हिस्सा मिलेगा व आधा संतानों में बराबर हिस्सों में बँटेगा । नि:संतान दंपत्ति के मामले में यह संतान का हिस्सा मृतक के माता – पिता को मिलेगा । अगर वो भी जीवित नहीं हों तो भाई या बहन को मिलेगा । संतान को पूरी संपत्ति से वंचित करना असंभव है क्योंकि कोई व्यक्ति अपने हिस्से से आधे से ज्यादा संपत्ति की वसीयत नहीं लिख सकता । गौरतलब है कि जो मुसलमान पुरुष इस कोड के तहत शादी करते हैं वे बहुपत्नी प्रथा व तलाक – ए- बिद्दत से महरूम हो जाते हैं । पहले गोवा में दहेज विरोधी अधिनियम लागू नहीं था । संपत्ति व दहेज के लिए हत्याएँ बढ़ने से महिला संगठनों ने विधि मंत्रालय के माध्यम से अपनी कोशिशों से 1990 से लागू कराया है । इस पुर्तगाली कानून की भी खामियाँ हैं ही व इसके कड़े नियमों से बचने के उपाय भी लोगों ने खोज लिए हैं ।

     प्रश्न है कि क्या आज के पारिवारिक कानून समता आधारित हैं ? उत्तर होगा – नहीं । धार्मिक परंपराओ व रीतियों को न छोड़ते हुए भी कतिपय न्यूनतम परिवर्तन हर धर्म के कानून में हो सकते हैं । ये हैं :

1.  पिता – माता की   संपत्ति में अधिकार पुत्र-पुत्रियों का समान हो ।

1 अ. वसीयत द्वारा इस नियम को नकारा न जा सके ।

2.   विवाहोपरान्त पति या पत्नी द्वारा अर्जित संपत्ति साझी मानी जाए । दोनों का हिस्सा आधा गिना जाए । गृहस्थ जीवन में पत्नी के श्रम की प्रतिष्ठा हो व परित्यक्ता बनने की परिस्थिति में , उसको व उसके बच्चों को जीवन यापन के लिए आधी संपत्ति अवश्य मिले । जहाँ पत्नी ज्यादा अर्जन करती हो , तलाक के समय पति को हिस्सा मिले ।

2 अ.  साझी संपत्ति की वसीयत किसी भी स्थिति में न हो । एक की मृत्यु होने पर ,संतान को मिले । नि:संतान हों तो माता – पिता को मिले ।

3. विवाह अवश्य पंजीकृत हो । पंजीकरण न्यायालय के अलावा चर्च या काजी भी कर सकते हों ।

4.  गोद लेने का हक हर उपयुक्त स्त्री व पुरुष को चाहे वे विवाहित हो या अविवाहित मिले । ( उपयुक्त होने के लिए सर्वमान्य उम्र, आय , सामाजिक स्थिति आदि है । )

5. एक से अधिक संतान गोद लेने की छूट हो ।

6. तलाक के आधार पति या पत्नी के एक हों , इसका कानून एक रूप हो तो बेहतर है ।

7.   15 साल की उम्र तक संतान माता के अभिभावकत्व में रहे । तदुपरान्त या 15 साल से ज्यादा वय की संतान स्वत: निर्णय ले ।

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लेखिका समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की सदस्य है तथा काशी विश्वविद्यालय में भौतिकी की व्याख्याता है  ।

 

  

पिछला भाग – एक

हिंदु विवाह अधिनियम (1955 ) सतही तौर पर ’समता’ पर आधारित है । वह अदालत से तलाक मांगने का अधिकार स्त्री-पुरुष दोनों को देता है । 1976 के अधिनियम में तलाक के साधारण स्थापित कारकों के अलावा , क्रूरता (मानसिक/शारीरिक ), परित्याग करना व परस्पर रजामंदी भी तलाक के लिए पर्याप्त कारण माने गए हैं । भरण – पोषण का भत्ता माँगने का हक पति अथवा पत्नी दोनों को है । परंतु अदालती कार्रवाई के बाद ही यह गुजारा भत्ता मिलता है व उसे पति की आय का (1/5 से लेकर 1/3 ) हिस्सा निर्धारित किया जाता है । इतनी कम राशि ( वह भी न्यायालय व वकील के खर्च के बाद ) से परित्यक्ता या तलाकशुदा पत्नी व बच्चों का गुजारा चलता नहीं है व उसे अपने मायके वालों की शरण में जाना पड़ता है । बहुपत्नी प्रथा कहने को तो हिंदुओं में , जैन धर्मावलंबियों में समाप्त है , परंतु वास्तविकता विपरीत साक्ष्य प्रस्तुत करती है । कई संस्थाओं व स्वतंत्र अन्वेषण के दौरान पाया गया कि दो विवाह करने का रिवाज मुसलमानों से ज्यादा हिंदुओं में है और हिंदुओं से ज्यादा जैनों में। इनमें से कुछ तो पहली पत्नी का परित्याग करते हैं तो कुछ दोहरी गृहस्थियाँ चलाते हैं । अगर कोई स्त्री अदालत में वाद स्थापित करती है कि उसके पति ने दूसरी शादी की है व उसको न्याय व उसका अधिकार दिलाया जाये तो वादी को सिद्ध करना होता है कि उसके प्रतिवादी ने दूसरी शादी की है । ये पेचीदगी और भी बढ़ जाती है जब हिन्दू विवाह अधिनियम (1955 ) द्वारा विवाह को हिन्दू उच्च वर्ण की रीतियों ( मसलन पाणिग्रहण , सप्तपदी ) द्वारा संपादित किए जाने पर ही विवाह को मान्यता मिलती है । अन्य किसी इतर सामाजिक प्रथा को कानून मान्यता नहीं मिली है । तिरुपति मन्दिर में अपने समाज के सामने गांधर्व पद्धति से माला बदलने से विवाह मान्य नहीं होगा , इस प्रक्रिया से दूसरा विवाह करने वाला पुरुष ने “विवाह” नहीं किया इसलिए दंडित नहीं होगा । उल्टे अगर माननीय न्यायाधीशों ने पहली पत्नी से उसके विवाह के सबूत माँगे और वह सप्तपदी इत्यादि सिद्ध नहीं कर पायी तो उसका विवाह न्यायालय समाप्त कर सकता है । ( देखें वनजाक्षम्मा बनाम गोपालकृष्णन,ए.आई.आर १९७०,मैसूर 305) कई बार ऐसा हुआ है कि निचली अदालतें (सत्र व उच्च न्यायालय) में पति को सजा हुई है मगर उच्चतम न्यायालय ने अपने (कु)प्रसिद्ध भाऊराव लोखंडे बनाम महाराष्ट्र राज्य (1956) मामले का हवाला देते हुए सभी ऐसे मामलों में पति को बरी कर दिया है । एक तरह से उच्चतम न्यायालय ने पुरुषों को दूसरे/ तीसरे विवाह की अघोषित छूट दी हुई है । ’सरला मुदगल आदि बनाम भारत’ नाम के चर्चित मामले में पुरुष ने इस्लाम धर्म कबूल किया था सिर्फ़ वैधानिक रूप से शादी करने के लिए । 1995 में उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों (श्री कुलदीप सिंह व श्री सहाय ) ने भारत सरकार को इस बिंदु पर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से चुकने के लिए आड़े हाथों लिया कि वह “समान नागरिक संहिता” क्यों नहीं ला रही जिससे मुस्लिम पर्सनल लॉ में दी गई बहुपत्नी प्रथा की छूट समाप्त हो । इसके लिए मुस्लिम धर्मान्धता को भी कोसा गया। जो व्यक्ति सिर्फ इसलिए इस्लाम धर्म कबूलते हैं ताकि दूसरी शादी की छूट हो ,वो तो गलत हैं हीं,मगर जो अन्य धर्मावलम्बी ऐसा ही कार्य करते हैं उनके बारे में न्याय की दृष्टि इतनी धुंधली क्यों है ?
इन समस्याओं को कम करने का एक तरीका विवाहों को कानूनी रूप से पंजीकृत करना अनिवार्य कर दिया जाये ताकि दूसरे विवाह के साक्ष्य जुटाना पहले पक्ष(पति या पत्नी) के लिए दुष्कर न हो व दूसरे विवाह पर कुछ रोक लग सके । अगर साक्ष्य अधिनियमों (एविडेन्स एक्ट )में परिवर्तन कर, दूसरी बार विवाहित न होने का सबूत प्रतिवादी (पति या पत्नी जो भी हो) को देना हो तो भी एक रोक लग सकती है । इस पर गहन विचार करना होगा ।
अभिभावकत्व का अधिकार भी पिता को मिला है। पांच साल से कम का बच्चा ही माँ को मिलता है । स्त्री के संपत्ति के अधिकार अनुपालन तो समाज ने करने से इंकार कर दिया ठीक जैसे दहेज या बाल विवाह संबंधी कानूनों की भांति। सामाजिक स्वाभाविक अभिभावक माँ है इसे भी नकारा गया है ।

अंतिम तथ्य गैर बराबरी का

विशेष विवाह अधिनियम के तहत कोई स्त्री किसी भी जाति के पुरुष से शादी कर सकती है मगर हमारा जातिवादी पुरुषसत्तात्मक समाज अक्सर ऐसे युवक-युवतियों को सजाए मौत देता है(कानून अपने हाथ में ले कर ) । जाहिर है कि हिन्दू निजी अधिनियमों में कई खामियाँ हैं व इन्हें दूर करने के लिए पूरे समाज में , विधिवेत्ताओं में, न्यायाधीशों में व कानून बनाने वालों में समतामूलक दृष्टि की जरूरत है ।

इस्लाम ने बेटियों को संपत्ति का अधिकार तब दिया , जब अरब में बच्चियाँ पैदा होते ही रेत में दबा दी जाती थीं। भले बेटियों का हिस्सा बेटों से (1/3) का हो- जन्म से है । पैगम्बर रसूल की नजर औरतों के हकूक पर निश्चित थी क्योंकि उन्हें औरतों के साथ किए गए व्यवहार के बारे में चिंता थी । उन दिनों अरब में लगातार कबिलाई युद्ध होते थे । बंदी की गयी दुश्मन कबीलों की औरतों , बच्चियों के साथ विजेता अक्सर बदसलूकी करते थे। अनिश्चित संख्या में विवाह करने की सामाजिक छूट थी क्योंकि औरतों की संख्या ज्यादा थी । औरतों के साथ बदसलूकी न हो व सामाजिक प्रतिष्ठा मिले इसलिए एक ही पुरुष को चार विवाह करने की छूट इस्लाम में दी गई । कुरान की आयतों में स्पष्ट निर्देश है कि अगर सभी पत्नियों से समान रूप ( आर्थिक ,सामाजिक,भावनात्मक) से व्यवहार करने में समर्थ पुरुष ही ,दूसरी/तीसरी/चौथी शादी कर सकता है। इसी तरह जबानी तलाक के बारे में स्पष्ट निर्देश है कि अगर पति काजी या समाज के जिम्मेदार व्यक्तियों के सामने पहली बार तलाक कहेगा ।उसके बाद पति-पत्नी एक महीने की अवधि के लिए साथ-साथ रहेंगे-समझौते की संभावना तलाशने के लिए। नहीं कर पाए तो तो महीने अंत में पुन: काजी या जिम्मेदार व्यक्तियों के सामने “तलाक” कहेगा पति। फिर एक महीना साथ रहना व जब संबंध निभाने में किन्हीं कारणों से अक्षम हो तो सार्वजनिक रूप से तीसरी बार “तलाक” कहने से विवाह विच्छेद माना जाएगा ।हिदायत है कि पूर्व पत्नी को विदा करते समय पूरे सम्मान व उसकी मेहर की रकम , निजी सामान इत्यादि देना होगा तथा इद्दत की मुद्दत का उसका व बच्चों का खर्च भी पति को देना होगा । ( तलाक ए रजई) इस प्रथा को एक ही बार में “तीन तलाक” जबानी से बदल देना,कुरान के नियमों का गलत अर्थ लगाना है । इस कुप्रथा को निश्चित ही खत्म करना चाहिए । हजरत मुहम्मद साहब ने सिर्फ अंतिम विकल्प के रूप में तलाक को समझाया है ।समाज जैसे-जैसे बदलता है,उसके नियम भी बदलते हैं ।लड़कियों को पढ़ाना , रोजगार करना मान्य हुआ है , हो रहा है । १५ वीं सदी के अरब समाज से आज के मुस्लिम देशों के समाज में जो परिवर्तन आया है उससे कई देशों ने मसलन मिश्र, तुर्की , इरान ,ईराक ,मलेशिया आदि देशों ने  बहुपत्नी प्रथा कानून खत्म की है अथवा उसमें सुधार किया है । पाकिस्तान में काजी के समक्ष पहली पत्नी सहमति देती है तब ही दूसरी शादी पति कर सकता है अन्यथा शादी गैर कानूनी होगी । इस्लाम में जो मानव -मात्र के प्रति विचार है(हजरत मुहम्मद साहब ने नस्ल का फर्क करने से मना किया “सभी खुदा के बन्दे हैं”) उसे अगर नर-नारी समता के लिए फैलाने का आग्रह मुस्लिम समाज अगर खुद करे तो बहुत बड़ा कदम होगा । उसे खोना तो विशेष नहीं होगा , उसी समाज के आधे हिस्से को न्याय मिलेगा साथ ही धर्मान्धता का आरोप भी खत्म हो जाएगा । यह पूरे भारतीय समाज व देश के लिए शुभ संकेत होगा और तब एक समतामूलक न्यायसंगत पारिवारिक कानून बन सकेगा ।
जारी

[ वरिष्ट अधिवक्ता एवं लोकप्रिय चिट्ठेकार दिनेशराय द्विवेदी ने कल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक नि:संतान हिन्दू विधवा द्वारा अर्जित सम्पत्ति पर विवाह के तीन माह बाद गुजर गये पति के वारिसों का हक मुकर्रर करने के फैसले का विवरण अपने चिट्ठे पर दिया था । दिनेशजी ने उक्त पोस्ट में फैसले की बारीकियों को अत्यन्त सरल ढंग से हिन्दी ब्लॉगजगत के पाठकों के समक्ष रखा , जिसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं । हमारे देश में प्रचलित विभिन्न धर्मों के निजी कानूनों में स्त्री को अशक्त बनाये रखने के लिए नाना प्रकार के प्रावधान किए गए हैं । देश के संविधान निर्माताओं की मंशा के अनुरूप समान नागरिक संहिता लागू करने की हर ईमानदार कोशिश को निजी कानूनों के स्त्री विरोधी स्वरूप को बदल कर सफल बनाया जा सकता है । समाजवादी जनपरिषद द्वारा १६ नवम्बर १९९६ को दिल्ली में इस विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई थी । दल की तत्कालीन राष्ट्रीय सचिव तथा उक्त संगोष्ठी की संयोजक डॉ. स्वाति ने उक्त विषय पर यह परचा प्रस्तुत किया था । विषय के विभिन्न पहलुओं पर गहराई से विचार करने में यह लेख सहायक होगा। - अफ़लातून ]

किसी भी देश के कानून उसके समाज के नियमों का सार या निचोड़ होते हैं । कानून परंपरा व सांस्कृतिक धारावाहिकता का व्यावहारिक रूप धर लेते हैं । इसीलिए आज बाल – विवाह व सती प्रथा के खिलाफ कानून है । यह जरूर गौरतलब है कि बाल विवाह ग्रामीण समाजों में अबाध रूप से होते रहे हैं , हो रहे हैं । दहेज विरोधी कानून होने के बावजूद धन , उपभोक्ता सामान , उपयोगी – अनुपयोगी वस्तुओं से वधु को लैस कर ससुराल भेजा जाता है ताकि उसे सहज स्वीकारा जाए । दहेज प्रथा को सामाजिक कलंक की जगह सामाजिक प्रतिष्ठा का मनदण्ड बना लिया गया है । राजाओं से उपजा यह विवाह का विधान हिंदू ही नहीं , मुसलमान व ईसाई समाज को प्रभावित कर रहा है । मुस्लिम समाज में भी दहेज के कारण बहुएँ जलाई तक जाने लगी हैं । कुप्रथाओं को जड़ जमाने में देर नहीं लगती ।

अँग्रेजों ने अपने राज के समय विभिन्न धर्मों के कानूनों को न छेड़ना ही लाभप्रद समझा था ताकि इनको हटाने से उपजे विद्रोह को झेलना न पड़े । अपराधों के खिलाफ़ तो एक सर्वमान्य भारतीय दंड संहिता थी और आज भी है । परंतु व्यक्तिगत मामलों में विभिन्न धर्मों के भिन्न निजी कानून (पर्सनल कोड ) थे । आज भी भिन्न भिन्न निजी कनून हैं । जीवन के जिन क्षेत्रों को वे प्रभावित करते हैं , वे हैं :

  1. संपत्ति का उत्तराधिकार , विरासत का हक़
  2. विवाह तथा विवाह-विच्छेद (तलाक )
  3. गोद लेने का हक़
  4. पुत्र व पुत्री के अभिवावकत्व (गार्जियनशिप ) का अधिकार
  5. परित्यक्ता व तलाकशुदा को गुजारा मिलने का हक़

कुछ हिंदूवादी लोगों व संस्थाओं के लगातार प्रचार से भारतीय समाज में यह धारणा आम है कि सिर्फ इस्लाम से जुड़े निजी कानून औरत के हक़ के खिलाफ़ हैं । इस धारणा को बल देने के लिए वे मुसलमानों में बहुपत्नी प्रथा ( पुरुष को चार शादियाँ करने का हक़ ) व जबानी तलाक़ या तलाके बिद्दत को उदाहरणार्थ पेश करते हैं । यह प्रचार भी होता है कि स्वाधीनता के बाद सभी धर्मों ने अपने – अपने धार्मिक कानून छोड़ दिए , विशेषत: हिंदुओं ने ने , जो उदारवादी हैं परंतु मुसलमान अपने कठमुल्लापन के कारण अपने निजी कानून को नहीं बदलने देते ।

वस्तुस्थिति कुछ और है

भारत के तीन प्रमुख धर्मों के निजी कानून हैं । इनके अलावा पारसी व पुर्तगाली सिविल कोड है । सिख , जैन , बौद्ध व आदिवासी अपने विवाह , विवाह-विच्छेद (छुटकारा) अपनी अपनी सामाजिक रीतियों के अनुसार करते हैं – मगर कानून इन्हें हिंदू ही माना गया है ।

सर्वप्रथम हिंदू धार्मिक कानूनों के बारे में चर्चा करें । संपत्ति के उत्तराधिकार के नियम हिंदू कोड में पुरुष सत्तात्मक समाज की प्रथा से बँधे हुए हैं । कहने को तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में पुत्र – पुत्रियों को समान अधिकार प्राप्त है परंतु जिस प्रवर समिति ने यह अधिनियम बनाया था उसने पुराने कानून “मिताक्षर” को समाप्त करने की राय दी थी । परंतु तत्कालीन भारत सरकार भी शायद अँग्रेजों की तरह झंझटों से बचना चाहती थी इसलिए मिताक्षर सह-उत्तराधिकार प्रणाली को नहीं हटाया और अभी भी वह कानून में है । हिंदु संयुक्त परिवार प्रणाली की व्यवस्था है कि उत्तराधिकार का हक़ प्रत्यावर्तन द्वारा हो न कि महज संतान होने के हक़ से । और संयुक्त परिवार के सदस्य केवल पुरुष ही होंगे । इस प्रणाली में पुत्र जन्म से ही पिता की संपत्ति का वारिस बनता है व पुत्री पिता की मृत्यु के बाद ही । पुत्र-पुत्री में सही माने में बराबरी का हिस्सा नहीं बनता ।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम ( 1956 ) की धारा 4(2) के मुताबिक जोत की जमीन का विभाजन रोकने के लिए अथवा जमीन की अधिकतम सीमा निर्धारण के लिए , पुत्री को जमीन की विरासत का अधिकार नहीं दिया गया । महिलाओं को काश्तकारी से वंचित किया गया । वे खेत में काम कर सकती हैं मगर उसकी मालिक नहीं बन सकती ।

विवाहोपरान्त पति की व्यक्तिगत संपत्ति का आधा हिस्सा अधिकारस्वरूप माँगने पर तर्क दिया जाता है कि पैतृक व पति की , दोनों संपत्ति का हक़ औरत को क्यों मिले ? सच्चाई यह है कि विशेष विवाह अधिनियम ( स्पेशल मैरेज एक्ट 1954 ) के अंतर्गत विवाह करने के बाद भी पुरुष उत्तराधिकार संबंधी नियमों में पुरानी धार्मिक प्रथाओंद्वारा बनी प्रणाली से उत्तराधिकार तय कर सकता है । उत्तराधिकार अधिनियम की धारा – 30 के अंतर्गत वह वसीयत द्वारा अपनी संपत्ति किसी के भी नाम लिख सकता है ।

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा – 23 के अधीन यदि किसी स्त्री को एक मकान विरासत में मिला है और उसमें उसके पैतृक परिवार के सदस्य रह रहे हैं तो उसे उस मकान का बँटवारा करने का कोई अधिकार नहीं है । और कि वह स्वयं उसमें तब ही रह सकती है जब वह अविवाहित हो या तलाकशुदा । अगर कोई निस्संतान विधवा हिंदू स्त्री वसीयत किए बिना मरती है तो उसकी संपत्ति उसके पति के वारिसों को सौंप दी जाएगी । अपवाद स्वरूप अगर उसे कोई संपत्ति माता – पिता से मिली हो तो उपर्युक्त परिस्थिति में वह उसके पिता के वारिसों को मिलेगी । यह यदि पितृसत्तात्मक व्यवस्था का न्याय नहीं है तो और क्या है ? हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956 ) के अलावा हिंदू विवाह अधिनियम (1955 ) , हिंदू दत्तक व भरण पोषण अधिनियम (1956) जैसे कानून महिलाओं के प्रति विषम दृष्टिकोण के ज्वलंत उदाहरणों से भरे हैं ।

( जारी )

पिछले हिस्से से आगे

ए. काकबर्न नामक विद्वान ने दुनिया के मांस-इतिहास पर एक पेपर लिखा है, जिसमें संयुक्त राज्य अमरीका के एक प्रमुख सूअर-मांस उत्पादक राज्य उत्तरी केरोलीना के बारे में बताया है-
“बदबूदार खाडियों के चारों और सूअरों के अंधेरे गोदाम बने हुए है, जिनमें उन्हें धातु के कटघरों में रखा जाता है जो उनके शरीर के ही आकार के होते हैं। उनकी पूंछें काट दी जाती है। उन्हे मक्का, सोयाबीन और रसायनो का आहार ठूंस-ठूंस कर खिलाया जाता है, ताकि वे छ: महीनो में 240 पॉन्ड (लगभग एक क्विंटल) के हो जाएं । तब उन्हें बूचड़खानों में कत्ल करने के लिए जहाजों से भेज दिया जाता है।”

मेक्सिको में मेक्सिको नगर के पास ला गोरिया नामक जिस कस्बे से मार्च महीने में सुअर-ज्वर का यह प्रकोप शुरु हुआ है, वहां स्मिथफील्ड फूड्स नामक कंपनी का काफी बड़ा सुअर फार्म है। यह सुअर मांस का व्यापार करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी है। ला गोरिया में यह लगभग दस लाख सुअरों को प्रतिवर्ष बड़ा करती है। दुनिया के स्तर पर इसने 2006 में 2.6 करोड़ सुअरों का मांस बेचा था, इसकी कुल बिक्री 1140 करोड़ डॉलर की हुई और इसे 42.1 करोड़ डालर का मुनाफा हुआ। संयुक्त राज्य अमेरिका के सुअर मांस व्यापार का एक-चौथाई इसके नियंत्रण में है। इसके ऊपर पर्यावरण को दूषित करने के 5000 से ज्यादा प्रकरण वहां दर्ज हुए हैं।एक दशक पहले सं०रा० अमरीका सरकार की पर्यावरण संरक्षण एजेन्सी ने इस पर वर्जीनिया प्रांत की एक नदी को प्रदूषित करने के लिए 1260 लाख डॉलर का जुर्माना लगाया था, जो अमरीका का अभी तक का सबसे बड़ा पर्यावरण जुर्माना है।
सं०रा०अमरीका के रोग नियंत्रण केन्द्र की जांच के ताजा नतीजों से पता चला है कि इस सुअर-ज्वर का वायरस 90 के दशक के अंत में उत्तरी केरोलीना प्रांत की औद्योगिक सुअर इकाईयों में पाई गई वायरस प्रजाति से निकला है। यह अमरीका का सबसे बड़ा और सबसे घना सुअर-पालन वाला प्रांत है। फेलिसिटी लारेन्स नामक विद्वान ने सुअर-ज्वर से पैदा हुये इस वैश्विक संकट की तुलना दुनिया के मौजूदा वित्तीय संकट से की है। वित्तीय क्षेत्र की तरह ही इसमें भी कुछ बड़ी कंपनियों का वर्चस्व है, जिन्होंने अपने मुनाफों के लिए पूरी दुनिया को संकट में डाल दिया है। आधुनिक वित्तीय क्षेत्र की तरह आधुनिक खाद्य व्यवस्था भी काफी अस्थिर है। दोनों में बुलबुले की तरह काफी तेजी से विस्तार हुआ है।दोनों में अमरीका-यूरोप के अमीर उपभोक्ता आसानी से मिलने वाली भोग-सुविधाओं के नशे में डूबे रहे। उन्होंने यह जानने की जरुरत नहीं समझी कि आखिर यह उपभोग किस कीमत पर आ रहा है तथा कितने दिन चलेगा ? फेलेसिटी लारेन्स ने मानव जाति की इस नई बीमारी को आज के औद्योगिक पशुपालन का विषैला कर्ज निरुपित किया है।
सूअर-ज्वर, पक्षी-ज्वर या पागल गाय रोग दरअसल एक बड़ी गहरी बीमारी के ऊपरी लक्षण हैं। वह बीमारी है भोग, लालच व गैरबराबरी पर आधारित पूंजीवादी सभ्यता की, जिसमे शीर्ष पर बैठे थोड़े से लोगों ने अपने मुनाफों एवं विलास के लिए बाकी सब लोगों, बाकी प्राणियों तथा प्रकृति पर अत्याचार करने को अपना जन्म-सिद्ध अधिकार मान लिया है।
आप यह भी कह सकते है कि ये नयी महामारियां उन निरीह प्राणियों या प्रकृति के प्रतिशोध का एक तरीका है। आखिर हर आतंकवाद लंबे, गहरे एवं व्यापक अन्याय व अत्याचार की प्रतिक्रिया में ही पैदा होता है। यह इस नए आतंकवाद के बारे मे भी सही है।

पशुजन्य बिमारियो का नया आतंकवाद

औद्योगिक पशुपालन से पैदा होती महामारियां

दुनिया में अचानक एक नया आतंकवाद पैदा हो गया है। स्वाईन फ्लू या सुअर-ज्वर नामक एक नयी संक्रामक बीमारी से पूरा विश्व बुरी तरह आतंकित दिखाई दे रहा है। कई देशो में हाई-अलर्ट कर दिया गया है। हवाई अड्डो पर विशेष जांच की जा रही है। यह बीमारी मेक्सिको से शुरू हुई, जहां 200 के लगभग मौते हो चुकी है। वहां के रा’ट्रपति ने पूरे देश में 5 दिन के लिये आर्थिक बंद घोषित कर दिया है और लोगों को घर में रहने की सलाह दी है। स्कूल-कॉलेज, सिनेमाघर, नाईट क्लब बद कर दिए गए है और फुटबाल मैच रद्द कर दिए गए है। बगल में संयुक्त राज्य अमरीका में भी दहशत छाई है और ओबामा ने स्थिति से निपटने के लिए संसद से 150 करोड़ डालर मांगे है। स.रा. अमरीका के अलावा कनाडा, स्पेन, बि्रटेन, जर्मनी, न्यूजीलेण्ड, इजरायल, आिस्ट्रया, स्विटजरलैण्उ, नीदरलैण्ड आदि में भी इसका संक्रमण फैल चुका है। बाकी दुनिया में भी खलबली मची है। मिस्त्र ने तो सावधानी बतौर 3 लाख सूअरो को मारने के आदेश जारी कर दिए है। भारत के सारे हवाई-अड्डो पर बाहर से आने वाले यात्रियों की सघन जांच की जा रही है और उन पर निगरानी रखी जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि सुअर-ज्वर एक महामारी बन सकता है।
पहले यह बीमारी सिर्फ सूअरो में होती थी, अब इंसानो मे फैल रही है। सूअरों, पक्षियों व इंसानों को होने वाले फ्लू के रोगाणुओ को मिलकर एच 1 एन 1 नामक नया वायरस बन गया है, जिसकी प्रतिरोधक शक्ति इंसानो के शरीर मे नहीं है। इसलिए मौते हो रही है और घबराहट छाई है। मेक्सिको में इसके शुरूआती मामले सामने आने के तीन-चार हफ्तो में ही इंसानो की बडी संख्या में मौते होने लगी है। इसका कोई टीका भी नहीं है और टेमीफ्लू नाम की एक ही दवाई है।
पिछले कुछ दशको में पालतू पशुओं के जरिये इंसानो में बीमारी फैलने का यह चौथा-पांचवा मामला है। इसके पहले एन्थ्रेक्स, सार्स, बर्ड फ्लू, मेड काऊ डिजीज आदि से अफरा-तफरी मची थी। इंसान इन बीमारियो से इतना आतंकित है कि इनकी जरा- भी आशंका होने पर हजारों-लाखो मुर्गियों, गायो, सूअरों को मार दिया जाता है। बर्ड फ्लू या पक्षी-ज्वर के डर से भारत मे असम, बंगाल, महाराष्ट्र आदि में पिछले कुछ वर्षों में लाखे मुर्गियो को मौत के घाट उतारा गया है। मेड काऊ डिजीज या पागल गाय रोग के चक्कर में बि्रटेन व अन्य देशों में लाखो गायों-बछडो का कत्ल किया गया है। आखिर ऐसी हालाते पैदा कैसे हुई ?
दरअसल इनका सीधा संबंध आधुनिक ढंग के औद्योगिक पशुपालन से है, जिसमें बड़े-बड़े फार्मों में छोटे व संकरे दडबों या पिंजरों में हजारों-लाखों पशु-पक्षियों को एक जगह बडा किया जाता है। उनके घूमने-फिरने की कोई जगह नहीं होती है। अक्सर काफी गंदगी होती है। काफी रासायनयुक्त आहार ठूंस-ठूंस कर खिलाकर दवाईयां एवं हारमोन देकर, कम से कम समय मे उनका ज्यादा से ज्यादा बढाने की कोशिश होती है। इन्हे फार्म के बजाय फेक्टरी कहना ज्यादा उचित होगा, क्योंकि जमीन, खेती या कुदरत से इनका रिश्ता बहुत कम रह जाता है।
पालतू मुर्गियो व बतखों में बर्ड फ्लू की बीमारी काफी समय से चली आ रही हें किंतु नई हालातों में इसका रोगाणु एच 5 एन 1 नामक नए घातक रूप में बदल गया हे, जो प्रजाति की बाधा लांघकर इंसानो को प्रभावित करने में सक्षम हैं । विश्व खाद्य संगठन ने इसकी उत्पत्ति को चीन और दक्षिण पूर्वएशिया में मुर्गी पालन के तेजी से विस्तार, संकेन्द्रण और औद्योगीकरण से जोडा है। पिछले पन्द्रह वर्षों मे चीन में मुर्गी उत्पादन दुगना हो गया है। थाईलेण्ड, वियतनाम और इण्डोनेशिया मे मुर्गी उत्पादन अस्सी के दशक की तुलना मे तीन गुना हो गया है। वैज्ञानिक और चिकित्सक यह मानकर चल रहे है कि बर्ड फ्लू का नये रूप वाला यह रोगाणु आगे चलकर इंसान से इंसान को संक्रमित होने लगेगा। तब यह एक महामारी का रूप धारण कर सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी है कि यह कभी भी हो सकता है और इससे निपटने की व्यापक एवं भारी तैयारी करना चाहिए।
मेड काऊ डिजीज का हिस्सा तो और भयानक है तथा आधुनिक मनुष्य के लालच की इन्तहा को बताता है। बी एस ई नामक गायों की इस बीमारी में मस्तिष्क को काफी क्षति पहुचती है, इसलिये इसे पागल गाय रोग कहा गया है । यह इसलिए फैल रहा है क्योकि शाकाहारी प्रजाति की गायो को उन्हीं की हडि्डयों, खून और अन्य अवयवों का बना हुआ आहार खिलाया जा रहा है। दरअसल पश्चिमी देशों  के आधुनिक बूचड़खानों में गायों आदि को काटने के बाद मांस को तो पैक करके बेच दिया जाता है, किन्तु बडे पैमाने पर हडि्डयां, अंतड़ियां,  खून आदि का कचरा निकलता है, जिसको ठिकाने लगाना एक समस्या होता है। इस समस्या से निपटने का एक तरीका यह निकाला गया कि इस कचरे को चूरा करके काफी ऊंचे तापमान पर इसका प्रसंस्करण किया जाता है। इसमें पौश्टिक तत्व भी होते है, अतएव इसे पुन: गायों के आहार में मिला दिया जाता है। मनुष्य की लाश को मनुष्य खाए, इसे अनैतिक, अकल्पनीय और अस्वीकार्य माना जाता है। लेकिन मुनाफों के लालच में मनुष्य द्वारा यह ’स्वजातिभक्षण’ गायों पर जबरदस्ती थोपा जा रहा है। ’पागल गाय रोग’ के व्यापक प्रकोप के बाद ब्रिटेन ने इस पर पाबंदी लगाई है। किन्तु उत्तरी अमरीका में और कुछ अन्य स्थानो पर यह प्रथा अभी भी चालू है।
इस तरह के रोग से ग्रसित गाय का मांस खाने वाले इंसानों को भी यह रोग हो सकता है। इसी तरह भोजन से फैलने वाले कुछ अन्य संक्रामक रोगो का भी संबंध आधुनिक फेक्टरीनुमा पशुपालन से जोड़ा जा रहा है।
मांसाहार शुरू से मनुष्य के भोजन का हिस्सा रहा है और भोजन के लिए पशुपालन कई हजार सालों से चला आ रहा है। किंतु आधुनिक औद्योगिक पशुपालन एक बिल्कुल ही अलग चीज है, जो काफी अप्राकृतिक, बरबादीयुक्त, प्रदूषणकारी और पूंजी प्रधान है तथा जिसने लालच व क्रूरता की सारी मर्यादाएं तोड दी है। अब इसमें खुले चरागाहों या खेतों मे पशुओं को नहीं चराया जाता और वे कुदरती भोजन भी नहीं करते है। ये परिवर्तन खास तौर पर पिछली शताब्दी के उत्तरार्ध में हुए है। इस अवधि में दुनिया मे मांस का उत्पादन और अंतररा’ट्रीय व्यापार भी तेजी से बढा है। फेक्टरीनुमा पशुपालन सबसे पहले मुर्गियों का शुरू हुआ, उसके बाद सूअरों का नंबर आया। मिडकिफ नामक एक अमरीकी लेखक ने कंपनियांे के आधुनिक मांस कारखानों पर एक किताब लिखी है जिसमें इसे ’पीडा और गंदगी का निरंतर फैलता हुआ दायरा’’ कहा है। एम.जे. वाट्स ने इनकी तुलना ’उच्च तकनीकी यातना कक्षो’ से की है। वैश्विक खाद्य अर्थव्यवस्था पर अपनी ताजी पुस्तक मे टोनी वैस ने सूअरो के फेक्टरी फार्मों का वर्णन इस प्रकार किया है-
“इन फेक्टरी फार्मों मे जनने वाली मादा सूअर अपना पूरा जीवन धातु या कंकरीट के फर्श पर बने छोट-छोटे खांचों में गर्भ धारण करते हुए या शिशु सूअरों को पोसते हुए बिता देती है। ये खांचे 2 वर्ग मीटर से भी कम होते है, जिनमें वे मुड़ भी नहीं सकती हैं। सूअर शिशुओं को तीन-चार सप्ताह में मां से अलग कर मादा सूअरों को फिर से गर्भ धारण कराया जाता है तथा शिशुओं को अलग कोठरियो में रखकर अभूतपूर्व गति से मोटा किया जाता है। उन्हें एन्टी-बायोटिक दवाईयों और हारमोनों से युक्त जीन-परिवर्तित गरिष्ठ आहार दिया जाता है, जिससे जल्दी से जल्दी उनका वजन बढ़ता जाए। इस कैद के नतीजन होने वाले रोगों एवं अस्वभविक व्यवहारों को नियंत्रति करने के लिए काफी दवाईयां दी जाती है। उनकी पूंछें काट दी जाती है और इससे होने वाले गंदगी व दूषित कचरे को नदियों या समुद्री खाडियों में बहा दिया जाता है।”
( अगली किश्त में समाप्य )

(लेखक समाजवादी जन परषिद का राष्ट्रीय अध्यक्ष है)
सुनील, ग्राम@पोस्ट – केसला, वाया इटारसी, जिला- होशंगाबाद (म.प्र.) 46 ।।।
फोन 09425040452 ई-मेल sjpsunilATgmailDOTcom

   ( जून , २००४ )। भारत में चुनाव आता है तो धनतंत्र की स्थिति देखकर मन में एक प्रकार की मायूसी आती है । क्या इस चक्रव्यूह का भेदन किया जा सकता है ? कभी भेद लेंगे तो सही सलामत लौट भी पायेंगे ? मूलभूत परिवर्तन के विचारों की उड़ान कुछ क्षण के लिए थम जाती है ।

    दूसरी भावना यह भी आती है कि पाकिस्तान में हमारी जैसी प्रजातांत्रिक व्यवस्था होती तो वहीं के लोगों को अच्छा लगता । प्रजातंत्र के न रहने से बेहतर है एक लूला – लँगड़ा प्रजातंत्र । प्रजातंत्र में विश्वास न रखनेवालों के लिए भी वहाँ जगह होगी ।

    इस भावना को हम ज्यादा नहीं खींच सकते हैं । कोई पूछ सकता है कि अगर क्यूबा में साम्यवादी व्यवस्था के स्थान पर भारत जैसी पूँजीवादी-प्रजातांत्रिक व्यवस्था आ जाएगी , तो क्या वह स्वागत योग्य है ? हमारा उत्तर सकारात्मक नहीं होगा । हम कहेंगे कि क्यूबा के लोग अपने आर्थिक समाज में विषमताओं को बढ़ाए बगैर प्रजातंत्र का नया ढाँचा सृजित करें।

    इस नए ढाँचे को तलाशने के लिए बीसवीं सदी के मध्य में काफ़ी गहमा – गहमी थी । न सिर्फ़ राजनीति में , बल्कि विश्वविद्यालयों के विद्वानों में भी अच्छी खासी चर्चा हो जाती थी । चालीस के दशक में ब्रिटेन का प्रो. हेराल्ड जे. लास्की राजनीतिशास्त्र का मूर्धन्य विद्वान था । व्यक्ति स्वातंत्र्य और आर्थिक समानता के बीच के द्वन्द्व  को लास्की ने ’ अपने समय का सबसे बड़ा विरोधाभास’ के रूप में देखा । इस विरोधाभास का विवेचन करने के लिए उसने एक ग्रंथ लिखा । लास्की खुद ब्रिटेन के श्रमिक दल का सक्रिय सदस्य था , तब श्रमिक दल का वैचारिक आधार समाजवाद था ।

    भारत के समाजवादी दल (सोशलिस्ट पार्टी) ने भी भारत के लिए एक समतामूलक प्रजातांत्रिक संविधान लिखने की कोशिश की थी । उन्हीं दिनों भारत की संविधान सभा की बहस में डॉ. अम्बेडकर ने ’ आर्थिक लोकतंत्र ’ की अवधारणा के बारे में एक महत्वपूर्ण वक्तव्य रखा था ।

    बाद के समय में यूरोप तथा भारत में धनतंत्र की मजबूती इतनी बढ़ी है कि उपरोक्त बहस को न राजनीति में , न विश्वविद्यालयों में कोई महत्व दिया जा रहा है । मानो इस विषय की प्रासंगिकता खत्म कर दी गई । यूरोप में लास्की के समकक्ष जो विद्वान हैं और समाज विज्ञान की महान हस्तियाँ माने जाते हैं , वे सब ’ विचारधारा की समाप्ति ’ के पक्षधर लगते हैं । उनके विचारों में इतनी उड़ान नहीं है कि अमरीकी आधिपत्यवाली विश्वव्यवस्था का कोई विकल्प तलाश करें । भारत के विद्वानों ने तो जैसे कसम खा ली है कि मूलभूत और व्यापक सिद्धान्तों को ईजाद करना उनका काम नहीं महाशक्तियों का है । जिसके पास आधुनिकतम हथियार होंगे और सबसे अधिक धन होगा , ज्ञान का वितरण वही करेगा । हमारे चिन्तन का एक औपनिवेशिक दायरा होगा ।

    यानी , प्रजातंत्र की संरचना और स्वरूप में बुनियादी बदलाव का सपना इस समय के राजनीतिक समूहों और समाज वैज्ञानिकों में नहीं है । भारतीय विद्वान ज्यादा से ज्यादा चुनाव सुधार की बात कर लेते हैं , या कभी – कभी राष्ट्रपति प्रणाली बनाम प्रधानमंत्री प्रणाली की बचकानी बहस करते हैं । संवैधानिक उपाय से धनतंत्र को नियंत्रित किए बगैर , राजनीतिक प्रणाली में परिवर्तन लाये बगैर चुनाव सुधार का भी कोई परिणाम नहीं निकलने वाला है । अन्यथा अपनी सामर्थ्य की भीतर चुनाव आयोग ने चुनाव सुधार की कई कोशिशें की हैं । भारत के संविधान में धनतंत्र को मर्यादित करने का जो भी हल्का प्रावधान था , ग्लोबीकरण और उदारीकरण के दर्शन को अपनाकर उसको अप्रभावी कर दिया गया है । इससे भारतीय प्रजातंत्र और राजनीति पर गहरा नकारात्मक असर हुआ है ।

( जारी )

स्विट्जरलैण्ड के सबसे बड़े बैंक यूबीएस ने एक अमेरिकी अदालत से कहा है कि वह स्विस बैंकों में खाता रखने वाले ५०,००० ग्राहकों पर चल रहे मुकदमे को आगे न बढ़ाये ।
यूबीएस ने फ़्लोरिड़ा की एक संघीय अदालत को बता दिया है कि यदि वह अपने ग्राहकों के बारे में सूचनाएं प्रदान करेगा तो वह बैंकिंग गोपनीयता के स्विस कानून का उल्लंघन होगा । अमेरिका को शक है कि ५२,००० अमेरिकी यूबीएस खातों द्वारा १५ अरब डॉलर की परिसम्पत्तियाँ तथा टैक्स छुपा रहे हैं ।
स्विट्जरलैंड ने हाल ही में बैंकों के आँकड़ों को साझा करने की बाबत एक अन्तर्राष्ट्रीय सन्धि पर हस्ताक्षर किए थे । मार्च महीने में ही उसने स्वीकृत टैक्स मानकों को अपनाने की घोषणा की थी । उसने जापान और अमेरिका से टैक्स के मामलों में सहयोग हेतु वार्ता करने का फैसला भी किया था ।
यूबीएस के खिलाफ़ मुकदमा अमेरिका द्वारा टैक्स चोरी के विरुद्ध अभियान को तेज करने का द्योतक माना जा रहा है । फिलहाल स्विस सरकार ने इसे अपनी प्रभुसत्ता और अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ़ बताया है ।
वर्ष की शुरुआत में तीन सौ ग्राहकों के मामले में यूबीएस ने अदालत के बाहर हुए समझौते में अमेरिका को ७० करोड़ डॉलर अदा किए थे । बहरहाल अमेरिकी सरकार स्विट्जरलैण्ड से एक नई कर सम्बन्धी सन्धि पर बातचीत शुरु की है जिससे उसे (अमेरिका को ) टैक्स चुराने वालों को धर दबोचने की उम्मीद है । स्विस अधिकारियों की यूरोपियन यूनियन से भी वार्ता चल रही है । इस अधिकारियों के अनुसार साल के आखिर तक किसी नतीजे पर बात पहुँचने की आशा की जा सकती है ।
( स्रोत : बीबीसी )
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