Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

सहयोग की अपील

पिछले कुछ वर्षों से आप मेरी नेट गतिविधियों के जरिए समाजवादी जनपरिषद ,उसके विचार और आन्दोलन से कुछ हद तक परिचित हैं । नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए हम उन स्थानों पर चुनाव लड़ते हैं जहां हमने शांतिमय संघर्ष किए हैं और रचनात्मक कार्यक्रम हाथ में लिए है। सीमित स्थानों पर चुनावी हस्तक्षेप एक shortcoming मानी जा सकती है। हमारे कुछ प्रमुख साथी थोक में लड़ने की मान्यता के साथ आआपा से स्थापना से ही जुड़ गए। अपनी इस मान्यता को पूरा करने के लिए उन्होंने वै्चारिक आग्रहों को ठण्डे बस्ते में डालने की रणनीति अपनाई है। स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रति हमारा जो सुचिन्तित रवैया था उससे विपरीत वे सोचते हैं। उनका आग्रह था कि अन्य समूह उनमें विलय कर जांए। हमारी मान्यता है ः

  1. नदी-नाले समुद्र में मिलकर उसके पानी को मीठा कर लेने की उम्मीद न रखें।
  2. जब खेती वर्षा पर आधारित थी तब सूखा पड़ने पर कुछ अनाज अगले साल बारिश की उम्मीद में बीज के रूप में बचा कर रख लिए जाते थे। समतावादी मूल्यों का आग्रह रखने वाले विलुप्त न हों यह हमारा संकल्प है।
     इन आम चुनावों में हम बेतूल और अलीपुरद्वार लोक सभा सुरक्षित सीट(दोनों अनुसूचित जन जाति) तथा ओड़ीशा विधान सभा की भवानी पटना सुरक्षित सीट (अनुसूचित जाति) पर चुनाव लड़ रहे हैं।
आप  से चुनाव के लिए आर्थिक सहयोग की अपील कर रहा हूं।
विनीत,

आपका,
अफलातून.

aflatoonATgmailDOTcom

बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम

बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम


क्योंकि

भ्रष्ट नेता और अफसरों कि आँख कि किरकिरी बना- कई बार जेल गया; कई झूठे केसो का सामना किया!
· आदिवासी होकर नई राजनीति की बात करता है; भाजप, कांग्रेस, यहाँ तक आम-आदमी और जैसी स्थापित पार्टी से नहीं जुड़ा है!
· आदिवासी, दलित, मुस्लिमों और गरीबों को स्थापित पार्टी के बड़े नेताओं का पिठ्ठू बने बिना राजनीति में आने का हक़ नहीं है!
· असली आम-आदमी है: मजदूर; सातवी पास; कच्चे मकान में रहता है; दो एकड़ जमीन पर पेट पलने वाला!
· १९९५ में समय समाजवादी जन परिषद के साथ आम-आदमी कि बदलाव की राजनीति का सपना देखा; जिसे, कल-तक जनसंगठनो के अधिकांश कार्यकर्ता अछूत मानते थे!
· बिना किसी बड़े नेता के पिठ्ठू बने: १९९४ में २२ साल में अपने गाँव का पंच बना; उसके बाद जनपद सदस्य (ब्लाक) फिर अगले पांच साल में जनपद उपाध्यक्ष, और वर्तमान में होशंगाबाद जिला पंचायत सदस्य और जिला योजना समीति सदस्य बना !
· चार-बार सामान्य सीट से विधानसभा-सभा चुनाव लड़ १० हजार तक मत पा चुका है!

जिन्हें लगता है- फागराम का साथ देना है: वो प्रचार में आ सकते है; उसके और पार्टी के बारे में लिख सकते है; चंदा भेज सकते है, सजप रजिस्टर्ड पार्टी है, इसलिए चंदे में आयकर पर झूठ मिलेगी. बैतूल, म. प्र. में २४ अप्रैल को चुनाव है. सम्पर्क: फागराम- 7869717160 राजेन्द्र गढ़वाल- 9424471101, सुनील 9425040452, अनुराग 9425041624 Visit us at https://samatavadi.wordpress.com

समाजवादी जन परिषद, श्रमिक आदिवासी जनसंगठन, किसान आदिवासी जनसंगठन

नारी जागृति मंच, जिला होशंगाबाद, मध्य प्रदेश

विज्ञप्ति

होशंगाबाद, 5 मार्च, 2014

शराब दुकान के खिलाफ महिलाओं का गाँधीवादी सत्याग्रह

           आज, 5 मार्च 2014 को, सुबह 11 बजे से महिलाओं ने मालाखेड़ी शराब दुकान के सामने उसे बंद करने की मांग को लेकर दिन-रात का अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है. वे वहां बैठ कर भजन कर रही हैं, जो शराब खरीदने आ रहा है, उसे फूल देकर, हाथ जोड़ कर, शराब खरीदने और पीने से मना कर रही हैं. उनके बैनर पर महात्मा गाँधी का चित्र लगा है. आज़ादी के आन्दोलन में शराब दुकानों पर महिलाओं की पिकेटिंग होती थी, उससे प्रेरणा लेकर शुरू किया गया यह गाँधीवादी सत्याग्रह दिन-रात तब तक चलता रहेगा जब तक दुकान स्थाई रूप से बंद करने का फैसला नहीं हो जाता. आज धरना स्थल पर भारी मात्रा में पुलिस पहुँच गई, शुरू में उन्होंने गालियां देकर और चिल्ला कर भीड़ को तितर-बितर करना चाहा, लेकिन महिलाओं ने कड़ा विरोध किया। बाद में आबकारी और राजस्व विभाग के अधिकारीयों से चर्चा हुई. उन्होंने बताया कि यदि पचास प्रतिशत महिलाएं लिख कर देंगी तो शराब दुकान बंद करने का प्रावधान है। नारी जाग्रति मंच ने मांग की कि वे इसे लिख कर दे और यह भी कि महिलाओं के हस्ताक्षरों की जाँच मंच के प्रतिनिधियों के सामने की जायेगी और दस दिन के अंदर यह काम पूरा करके दुकान बंद करने की सिफारिश कर दी जायेगी तो अधिकारी पहले तो सहमत हो गए और कहा कि वे लिख कर भिजवा रहे हैं, लेकिन फिर वे लौट कर नहीं आये।

        होशंगाबाद के बगल में मालाखेड़ी गांव (जो अब होशंगाबाद नगरपालिका का हिस्सा है) की महिलाएं पिछले छह महीने से ज्यादा समय से वहां की शराब दुकान को बंद करने की मांग कर रही है और इसके लिए आन्दोलन कर रही हैं. शराब के कारण उनके परिवार बरबाद हो रहे हैं, घरों की शांति खतम हो गई है, महिलाओं पर अत्याचार बढते जा रहे हैं. गांव में शराब दुकान होने से बच्चे भी शराब पीने लगे हैं.

     वे कई बार इस दुकान को बंद करने की मांग को लेकर होशंगाबाद कलेक्टर और मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेज चुकी हैं. जब उनका सब्र टूट गया और वे ज्यादा परेशान हो गई, तो अक्तूबर 2013 में उन्होंने शराब दुकान में तोड़-फोड भी की और 6 दिन तक दुकान खुलने नहीं दी. 7 फरवरी 2014 को उन्होंने और जिले की अन्य महिलाओं ने शराब के खिलाफ पूरे शहर में जुलूस निकाला. जिला प्रशासन ने इस जुलूस की अनुमति नहीं दी और भारी पुलिस लगा कर जुलूस रोकने की कोशिश की, गिरफ्तार करने की धमकी भी दी, लेकिन महिलाओं ने पुलिस को धका कर, एक तरफ कर, जुलूस आगे बढाया. उस दिन भी उन्होंने जिला कलेक्टर को चेतावनी दी कि शराब दुकान बंद नहीं की गई तो वे खुद इसे बंद कर देगी.

     नारी जागृति मंच भी पिछले एक साल से शराब बिक्री के खिलाफ और पूरे मध्य प्रदेश में शराब बिक्री बंद करने की मांग को लेकर हस्ताक्षर अभियान चला रहा है. 2 अक्तूबर 2013 को गाँधी जयंती पर इटारसी में जयस्तंभ चौक पर महिलाओं ने शराब और नशे के खिलाफ दिन भर का धरना और उपवास भी रखा.

     होशंगाबाद के नजदीक डोंगरवाडा गांव की महिलाएं भी दो-तीन बार वहां बिकने आ रही अवैध शराब को जब्त कर चुकी हैं और शराब की अवैध बिक्री बंद करने की मांग प्रशासन से कर चुकी हैं.

      होशंगाबाद जिले से तीन महिलाओं और एक नवयुवक ने छत्तीसगढ़ में बिलासपुर के पास गनियारी स्थित ‘जन स्वास्थ्य सहयोग’ द्वारा आयोजित नशामुक्ति पर दो दिवसीय प्रशिक्षण (28 फरवरी-1 मार्च) में भी भाग लिया है.

       नारी जागृति मंच ने अपील की है कि मालाखेड़ी की महिलाओं ने अपना जीवन, अपना परिवार, समाज और देश को बचाने के लिए जो संघर्ष शुरू किया है, उसे समाज और नागरिक पूरा समर्थन और सहयोग दें. मंच ने अपील की है कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में मालाखेड़ी पहुँच कर इस सत्याग्रह में शरीक हों, इसके समर्थन में बयान दें, जगह-जगह धरना दे, ज्ञापन दें, मुख्यमंत्री को फेक्स और ईमेल करें.

 

ममता सोनी (07869530451), बिस्तोरी (08435445476), सुनील (09425040452), शम्भुनाथ गुप्ता (09425642273)    

6 फरवरी,11 बजे चलो दि‍ल्‍ली सचि‍वालय!

 

साथियो!

पिछले लगभग एक माह से पूरी दिल्‍ली की मज़दूर बस्तियों और औद्योगिक क्षेत्रों में दिल्‍ली मज़दूर यूनियन, उत्‍तर-पश्चिमी दिल्‍ली मज़दूर यूनियन और स्‍त्री मज़दूर संगठन की ओर से माँगपत्रक आन्‍दोलन चलाया जा रहा है। मज़दूरों की माँगें एकदम स्‍पष्‍ट हैं। उनका महज इतना कहना है कि दिल्‍ली के मज़दूरों से किये गये अपने वायदों को पूरा करें।

 

आखिर इतनी बौखलाहट क्‍यों?

 

फिर आखिर इस आन्‍दोलन से आम आदमी पार्टी को इतनी बौखलाहट क्‍यों है कि आन्‍दोलन की अभियान टोलियों के साथ जगह-जगह उनके कार्यकर्ता उलझ रहे हैं, गाली-गलौज कर रहे हैं और पर्चे जला रहे हैं। पिछले एक हफ्ते से उत्‍तर-पश्चिमी दिल्‍ली क्षेत्र में लगभग हर रोज़ ‘आप’ के कार्यकर्ताओं ने अभियान टोली के साथ बदसलूकी की, प्रचार सभाओं में बाधा पैदा करके मज़दूरों को तितर-बितर करने की कोशिश की। एक दिन एक प्रचार टोली से पर्चे छीन कर जलाये। यहाँ तक कि शाहाबाद डेयरी स्थित जिस शहीद भगतसिंह पुस्‍तकालय में स्‍त्री और पुरुष मज़दूरों की मीटिंगें और विविध सांस्‍कृतिक कार्यक्रम हुआ करते हैं, रात में उसका बोर्ड कुछ लोग उतार ले गये। फिर वहाँ पत्‍थरबाजी भी की गयी। कल शाम को गाड़ी में सवार पीकर धुत्‍त ‘आप’ पार्टी के कुछ लोगों ने बादली में प्रचार टोली की स्‍त्री सदस्‍यों के साथ गाली-गलौज की और धमकियाँ दीं, फिर मज़दूरों के इकट्ठा होने पर वे वहाँ से चले गये!पहली बात, यही वह लोकतांत्रिक संस्‍कृति है, जिसकी केजरीवाल, सिसोदिया और योगेन्‍द्र यादव दुहाई देते नहीं थकते? मज़दूरों के नितान्‍त शान्तिपूर्ण आन्‍दोलन से इतनी बौखलाहट क्‍यों? आखिर मज़दूर माँग ही क्‍या रहे हैं? उनका मात्र इतना कहना है कि केजरीवाल ने मज़दूरों से जो वायदे किये थे, उन्‍हें पूरा करने के बारे में कुछ तो बोलें! वे तो सत्‍तासीन होने के बाद साँस-डकार ही नहीं ले रहे हैं।

 

मज़दूरों से किये गये एक भी वायदे की चर्चा भी नहीं की!

 

केजरीवाल ने पूरी दिल्‍ली से ठेका प्रथा को खत्‍म करने का वायदा किया था। अब उन्‍होंने इसकी तकनीकि जाँच के लिए एक समिति बना दी है, जिसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। उन्‍हें करना सिर्फ इतना था कि सिर्फ एक दिन का विधान सभा सत्र बुलाकर इस आशय का विधेयक पारित करवा लेना था कि दिल्‍ली में कोई भी निजी या सरकारी नियोक्‍ता नियमित प्रकृति के काम के लिए ठेका मज़दूर नहीं रह सकता। इसके बजाये एक समिति बनाकर केजरीवाल ने मामले को टाल दिया है। समिति रिपोर्ट देगी और उसपर सरकार विचार करेगी, तबतक लोकसभा चुनावों की आचार संहिता लागू हो जायेगी।केजरीवाल ने कहा था कि निजी झुग्‍गीवासियों को पक्‍के मकान दिये जायेंगे और तबतक कोई झुग्‍गी उजाड़ी नहीं जायेगी। अब इस काम के लिए समय-सीमा बताना तो दूर, केजरीवाल कुछ बोल ही नहीं रहे हैं। यही नहीं, कांग्रेस सरकार के समय जिन झुग्‍गी बस्तियों का नियमतिकरण हुआ था, अब उनमें भ्रष्‍टाचार बताकर उस फैसले को पलटने की बात की जा रही है। यानी लाखों मज़दूरों को पुनर्वास की व्‍यवस्‍था के बिना उजाड़ने की भूमिका तैयार की जा रही है।केजरीवाल ने दिल्‍ली के सभी पटरी दुकानदारों और रेहड़ीवालों को लाइसेंस और स्‍थाई स्‍थान देने का वायदा किया था, उसके बारे में भी वे अब साँस-डकार नहीं ले रहे हैं।चुनाव प्रचार के दौरान मज़दूर बस्तियों में उनके उम्‍मीदवार सौ अतिरिक्‍त सरकारी स्‍कूल खोलने और वर्तमान स्‍कूलों के स्‍तर को ठीक करने का वायदा कर रहे थे। इस वायदें को भी ठण्‍डे बस्‍ते में डाल दिया गया।

 

केजरीवाल का भ्रष्‍टाचार-विरोध मज़दूरों के लिए नहीं है!

 

केजरीवाल की राजनीति की पूरी बुनियाद भ्रष्‍टाचार-विरोध पर टिकी है। फिलहाल हम इस बुनियादी प्रश्‍न पर नहीं जाते कि पूँजीवाद को पूरी तरह भ्रष्‍टाचार-मुक्‍त किया ही नहीं जा सकता, कि पूँजीवाद स्‍वयं में ही भ्रष्‍टाचार है और यह कि जनता को भ्रष्‍टाचार-मुक्‍त पूँजीवाद नहीं, बल्कि पूँजीवाद-मुक्‍त राज और समाज चाहिए। भष्‍टाचार कितनी अधिक धनराशि का है, इससे अधिक अहम बात यह है कि किस भ्रष्‍टाचार से व्‍यापक आम आबादी का जीना मुहाल है! दिल्‍ली की साठ लाख मज़दूर आबादी का जीना मुहाल करने वाला भ्रष्‍टाचार है — श्रम विभाग का भ्रष्‍टाचार। किसी भी फैक्‍ट्री या व्‍यावसायिक प्रतिष्‍ठान में मज़दूरों को न्‍यूनतम मज़दूरी नहीं मिलती, काम के तय घण्‍टों से अधिक काम करना पड़ता है, ओवरटाइम तय से आधी दर पर मिलता है, कैजुअल मज़दूरों का मस्‍टर रोल नहीं मिंटेन होना, सैलरी स्लिप नहीं मिलती, पी.एफ. इ.एस.आई. की सुविधा नहीं मिलती, फैक्‍ट्री इंस्‍पेक्‍टर, लेबर इंस्‍पेक्‍टर आदि दौरा नहीं करते, कारखाने स्‍वास्‍थ्‍य, सुरक्षा और पर्यावरण के निर्धारित मानकों का पालन नहीं करते! तात्‍पर्य यह कि किसी भी श्रम कानूनों का पालन नहीं होता। यदि केजरीवाल वास्‍तव में भ्रष्‍टाचार से आम लोगों को होने वाली परेशानी से परेशान हैं, तो सबसे पहले उन्‍हें श्रम विभाग के भ्रष्‍टाचार को दूर करना चाहिए। मज़दूरों की यही माँग है।लेकिन मज़दूरों के प्रति केजरीवाल की सरकार का रवैया क्‍या है? डी.टी.सी. के 20हजार ठेका कर्मचारियों और 10हजार अस्‍थाई शिक्षकों के धरने और अनशन को हवाई आश्‍वासन की आड़ में नौकरी छीन लेने और दमन की धमकी से समाप्‍त कर दिया गया। वजीरपुर कारखाना यूनियन के मज़दूर जब अपनी माँगों को लेकर सचिवालय पहुँचे तो बैरिकेडिंग करके पुलिस खड़ी करके उन्‍हें मंत्री से मिलने से रोक दिया गया और दफ्तर में केवल उनका माँगपत्रक रिसीव कर लिया गया। केजरीवाल का जनता दरबार तो हवा हो ही गया, अब उनके मंत्री जनता से मिलते तक नहीं।

 

‘आप’ के आम आदमी

ये ‘आप’ के आम आदमी हैं कौन? यूँ तो ऊपर भी विचित्र खिचड़ी है! केजरीवाल का एन.जी.ओ. गिरोह, किशन पटनायक धारा के समाजवादी योगेन्‍द्र यादव, राज नारायण धारा के समाजवादी आनंद कुमार, मंचीय नुक्‍कड़ कवि, घोर दखिणपंथी विचारों वाला कुमार विश्‍वास, ए.बी.वी.पी. से एन.एस.यू.आई. से भा.क.पा.(मा-ले) होते हुए यहाँ तक आये गोपाल राय तथा कमल मित्र शेनॉय, परिमल माया सुधाकर, बली सिंह चीमा, आतिशी मारलेना आदि-आदि भाँति-भाँति के, रंग-बिरंगे ”वामपंथियों” के साथ कैप्‍टन गोपी नाथ, नारायण मूर्ति और वी. बालाकृष्‍णन जैसे कारपोरेट शहंशाह…। ऐसी लोकरंजक राजनीतिक खिंचड़ी का असली रंग और स्‍वाद तो ग्रासरूट स्‍तर पर पता चलता है। केजरीवाल को मध्‍यवर्गीय इलाकों में आर.डब्‍ल्‍यू.ए. खुशहाल मध्‍य वर्गीय जमातों, कारोबारियों और आई.टी. – व्‍यापार प्रबंधन आदि पेशों में लगे उन युवाओं का समर्थन प्राप्‍त है, जो पारम्‍परिक तौर पर दक्षिणपंथी विचारों के और प्राय: भाजपा के वोट बैंक होते रहे हैं। लेकिन सबसे दिलचस्‍प दिल्‍ली की मज़दूर बस्तियों में देखने को मिलता है। वहाँ सारे छोटे कारखानेदारों, दुकानदारों, लेबर-कांट्रेक्‍टर के अतिरिक्‍त मज़दूरों को सूद पर पर पैसे देने वाले, कमेटी डालने वाले, मज़दूरों के रिहाइश वाले लॉजों-खोलियों और घरों के मालिक तथा प्रापर्टी डीलर और उनके चम्‍पुओं के गिरोह — यही आम आदमी की टोपी पहनकर मज़दूर बस्‍तियों में घूम रहे हैं। पिछले एक माह के अभियान के दौरान हमलोगों ने इस नंगी-कुरूप सच्‍चाई को बहुत गहराई से महसूस किया और झेला। सिर्फ एक उदाहरण ही काफी होगा। ‘बवाना चैम्‍बर ऑफ इण्‍डस्‍ट्रीज’ के चेयरमैन प्रकाशचंद जैन उत्‍तर-पश्चिमी दिल्‍ली में आम आदमी पार्टी के एक अग्रणी नेता हैं। इनके साथ और भी कई फैक्‍ट्री मालिक, प्रॉपर्टी डीलर और ठेकदार हैं। कोई प्रकाश चन्‍द जैन से ही पूछे क्‍या उनके कारखानों में मज़दूरों को न्‍यूनतम वेतन, पी.एफ., ई.एस.आई. आदि दिया जाता है, क्‍या वहाँ श्रम कानूनों का पालन होता है? कमोबेश यही स्थिति दिल्‍ली के सभी औद्योगिक इलाकों और मज़दूर बस्तियों की है। इसके बावजूद, एन.जी.ओ.-सुधारवादियों और भाँति-भाँति के सामाजिक जनवादियों को तो छोड़ ही दें, आम आदमी पार्टी की झोली में यूँ ही जा टपकने वाले भावुकतावादी कम्‍युनिस्‍टों को अभी भी केजरीवाल की राजनीति का असली रंग नहीं दिख रहा है, तो निश्‍चय ही राजनीतिक काला मोतिया के चपेट में वे अंधे हो चुके हैं। या हो सकता है, वे पहले से ही अंधे रहे हों।आम जनता स्‍वराज और सड़क से सत्‍ता चलाने की रट लगाने वाले लोकरंजकातावादी मदारी अब सरकारी धोखाधड़ी और धमकी, पुलिसिया धौंसपट्टी और पार्टी कार्यकर्ताओं की दादागीरी का खुलकर सहारा ले रहे हैं। मज़दूरों की वर्ग दृष्टि एकदम साफ है। वह केजरीवाल के लोकरंजकतावाद की असलियत को अभी से समझने लगा है। वह कुछ कुलीनतावादी दिवालिये किताबी वामपंथियों की तरह मतिभ्रम-संभ्रम-दिग्‍भ्रम का शिकार नहीं है।कल 6 फरवरी को सचिवालय पहुँचकर दिल्‍ली के मज़दूर केजरीवाल की दहलीज पर याददिहानी की पहली दस्‍तक देंगे। यह अंत नहीं, महज एक नयी शुरुआत है।जो भी साथी दिल्‍ली के मेहनतकशों की इस आवाज के साथ है, वे भी कल उनके समर्थन में ज़रूर पहुँचें। कल ग्‍यारह बजे हम सभी राजघाट पर एकत्र होंगे और वहाँ से सचिवालय की ओर मार्च करेंगे।

 

इस अभियान के बारे में विस्‍तार से जानने के लिए देखें हमारी वेबसाइट 

 

http://www.workerscharter.in/

मैं आप में क्यों नहीं?

दिल्ली में आप की अभूतपूर्व सफलता के बाद सामाजिक कार्यों से जुड़े कुछ मित्र तो मुझे सलाह दे रहे हैं कि मैं भी आप में शामिल हो जाऊं तो कई ये पूछ रहे हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए? कुछ तो यह मान कर चल रहे हैं कि आप से मेरा निकट का सम्बंध हैं और चाह रहे हैं कि मैं उनके इलाके से लोकसभा चुनाव हेतु आप के उम्मीदवार के रूप में उनके नामों की संस्तुति कर दूं तो कुछ विषेषज्ञ अपना ज्ञान आप की सेवा में प्रस्तुत करने का प्रस्ताव रख रहे हैं। एक महिला पुलिसकर्मी ने तो फोन करके कहा कि अपनी जिन्दगी में राजनेताओं को करीब से देखने के बाद वह इस निर्णय पर पहुंची है कि इन पर भरोसा नहीं किया जा सकता और अरविंद केजरीवाल को सुरक्षा स्वीकार कर लेनी चाहिए।
मेरे आप में न होने की एक वजह यह है कि न्यायमूर्ति राजिन्दर सच्चर ने 2011 में सोषलिस्ट पार्टी को पुनर्जीवित किया तो उनके कहने पर मै उसमें शामिल हो गया। यह पार्टी डाॅ. राम मनोहर लोहिया, जय प्रकाश नारायण, आचार्य नरेन्द्र देव, अच्युत पटवर्द्धन, आदि, द्वारा बनाई गई पार्टी है जिसका 1977 में जनता पार्टी में विलय हो गया था। इसके पूर्व पिछले लोक सभा चुनाव से पहले जब कुलदीप नैयर ने लोक राजनीति मंच बनाया था तो मैं उसमें भी शामिल हुआ था। फिलहाल मैं सोषलिस्ट पार्टी और लोक राजनीति मंच, जिसमें कई अन्य छोटे-छोटे दल भी शामिल हैं, को मजबूत करने में लगा हुआ हूं। मुझे नहीं लगता कि सिर्फ इसलिए कि आज आप को सफलता मिल रही है तो हमें अपने दल छोड़ कर उसमें शामिल हो जाना चाहिए। याद रहे कि इस देष को जिन राजनीतिक बुराइयों से मुक्त कराना है उसमें से एक दल बदलने वाली अवसरवादिता भी है। दल बदलने के खिलाफ इसीलिए एक कानून भी बना है। हां, यदि विचार और कार्यशैली मिलते हों तो, गठबंधन के बारे में जरूर सोचा जा सकता है।
किंतु आप में न जाने का प्रमुख कारण यह है कि आप के लिए केन्द्रीय मुद्दा है भ्रष्टाचार। जबकि मुझे लगता है कि हमारे देष ही नहीं मनुष्य समाज का केन्द्रीय मुद्दा है गैर-बराबरी। जब तक हम एक ऐसा समाज नहीं बना लेते जिसमें हरेक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का इतना सम्मान करने लगे जितना कि वह दूसरों से अपने लिए चाहता है तब तक हम एक मानवीय व्यवस्था कायम नहीं कर सकते। यह सिर्फ भ्रष्टाचार खत्म होने से या स्वाराज्य आ जाने से नहीं होगा।
मान लीजिए कि कल अरविंद केजरीवाल के शासन में भ्रष्टाचार एकदम समाप्त हो जाए। कहीं भी एक पैसा न तो कोई घूस लेने वाला हो न ही कोई देने वाला। यह भी मान लीजिए कि सारे निर्णय जनता की सीधी भागीदारी से होने लगे, यानी स्वराज्य आ गया। तो क्या हम संतुष्ट हो जाएंगे?
क्या जाति के आधार पर ऊंच-नीच की भावना खत्म हो जाएगी? क्या हरेक अमीर गरीब को अपने साथ बैठाने लगेगा? क्या महिलाओं के प्रति हिंसा या पितृसत्तात्मक समाज व्यवस्था समाप्त हो जाएगी और महिला अपने को सुरक्षित महसूस करने लगेगी? क्या आधे बच्चे, जो कुपोषण का शिकार हैं और इस वजह से विद्यालय स्तर की भी शिक्षा पूरी नहीं कर पाते, को पर्याप्त पौष्टिक भोजन मिलने लगेगा और वे भी उतने ही गुणवत्तापूर्ण विद्यालयों में जाने लगेंगे जिनमें अमीरों के बच्चे पढ़ते हैं? क्या हरेक गरीब को मुफ्त उतना गुणवत्तापूर्ण इलाज मिलेगा जितना अमीर लोग निजी अस्पतालों में खरीदने की क्षमता रखते हैं?
आप ने बिजली के दामों को आधा करने कर वायदा किया है किंतु उन लोगों का क्या जिनके पास अभी बिजली पहंुची ही नहीं है और न कभी पहुंचेगी? जितने लोग इस देष में हैं उन सबको बिजली उपलब्ध करा पाने लायक उत्पादन ही हम नहीं करते क्योंकि उतने संसाधन ही हमारे पास नहीं हैं। इसलिए प्रभावशाली या पैसे वाले तो बिजली का सपना देख सकते हैं लेकिन हरेक गरीब नहीं। खत्म होते कोयले के संसाधन से बिजली पैदा करने का यदि हमने कोई विकल्प नहीं ढूंढा तो निकट भविष्य में यह स्थिति बदलने वाली नहीं।
पानी तो प्राकृतिक संपदा है और सभी मनुष्यों को उपलब्ध है। उसपर सरकार या किसी निजी कम्पनी को पैसा कमाने की छूट नहीं होनी चाहिए। सरकार की यह जिम्मेदारी है कि जिस मनुष्य को जरूरी आवष्यकताओं जैसे पीने, सिंचाई, स्नान, कपड़ा धोने, आदि के लिए जितना चाहिए उतना उसे मिलना चाहिए। किंतु मनोरंजन, जैसे स्वीमिंग पूल, वाॅटर पार्क, गोल्फ के मैदान और बड़े-बड़े लाॅन हेतु उसका दुरुपयोग बंद होना चाहिए। सिंचाई को छोड़कर जमीन के नीचे से निजी पम्प द्वारा पानी निकालने पर प्रतिबंध होना चाहिए। यदि ऐसा हो जाए तो पानी के उपभोग पर कोई सीमा नहीं तय करनी पड़ेगी। बिना रासायनिक खाद व कीटनाषक के खेती होने लगी तो पानी की आवष्यकता भी कम हो जाएगी।
चूंकि हमारा लक्ष्य एक मानवीय व्यवस्था को कायम करना है जिसमें हिंसा के लिए कोई जगह नहीं होगी इसलिए हम एक हथियार मुक्त दुनिया की कल्पना करते हैं – व्यक्तिगत स्तर पर भी और राष्ट्रों के स्तर पर भी। इसलिए सोषलिस्ट पार्टी ने तय किया है कि हमारे सदस्य मनुष्यों में कोई भेदभाव न मानने वाले व भ्रष्टचार के खिलाफ तो होने ही चाहिए वे हथियारों के आधार पर सुरक्षा की अवधारणा को न मानने वाले भी होने चाहिए। असल में देखा जाए तो बहादुर व्यक्तियों, जैसे अरविंद केजरीवाल, को अपनी सुरक्षा के लिए हथियारों की जरूरत ही नहीं महसूस होती।
आप पार्टी के निर्माण में राष्ट्रवाद की भावना उसकी नींव में है। उसके प्रमुख नारे हैं भारतामाता की जय और वंदे मात्राम जबकि हमारा मानना है कि राष्ट्रवाद की अवधारणा तो मनुष्यों को वैसे की बांटती है जैसे कि जाति और धर्म की। राष्ट्र की सुरक्षा पड़ोसियों के साथ विष्वास पर आधारित सम्बंधों से होती है न कि परमाणु बम बनाने से।
उपर्युक्त कुछ वैचारिक मतभेदों और आप की काॅरपोरेट कार्यषैली, जिसमें व्यक्तियों को उनकी उपयोगिता के हिसाब से जोड़ा जा रहा है न कि मानवीय सम्बंधों के आधार पर, के कारण हमारे जैसे लोग आप में सहज महसूस नहीं कर सकते। हां, चूंकि आप का प्रयोग इस देष में सड़ी-गली राजनीतिक व्यवस्था की बदलने के लिए एक ताजी बयार लेकर आया है हम इसका स्वागत करते हैं और हम इसके सफलता की कामना करते हैं ताकि यह देष की राजनीति को भ्रष्टाचार और अपराधीकरण से मुक्त कराए।

लेखकः संदीप
पताः ए-893, इंदिरा नगर, लखनऊ-226016
फोनः 0522 2347365, मोबाइलः 9415022772

जब खबरें टुकडों में मिलती है तो उनका पूरा अर्थ पता नहीं चलता है। उनको आपस में जोड़ने से पूरा रहस्य खुलता है। वैश्वीकरण के इस जमाने में कारपोरेट बन चुका मीडिया भी कोशिश करता है कि खबरें सनसनी के रूप में ही मिले, समग्रता में नहीं और सच परदे में ही रहे।
ऐसी ही एक खबर दिसंबर में आई। एक प्रवासी भारतीय पूंजीपति ने अपनी बेटी की शादी स्पेन के बार्सीलोना शहर में इतने धूमधाम से की कि यह दुनिया की दूसरी सबसे महंगी शादी बन गई। प्रमोद मित्तल की बेटी सृष्टि की शादी में 505 करोड़ रूपये खर्च हुए। प्रमोद मित्तल दुनिया के सबसे बड़े अमीरों में शामिल लक्ष्मी निवास मित्तल का छोटा भाई है। लक्ष्मी मित्तल की बेटी वनिषा की शादी 2004 में फ्रांस में हुई, वह भी कोई कमजोर नहीं थी। उसमें भी करीब 400 करोड़ रूपये खर्च हुए। प्रमोद की पहली बेटी वर्तिका की शादी 2011 में तुर्की के इस्तंबुल शहर में हुई, वह भी दुनिया की महंगी शादियों में एक है।
ऐसा लगता है कि भाईयों में बेटियों की शादियों में खर्च करने की होड़ चल रही है। लक्ष्मी मित्तल 2004 में तब भी चर्चा में आया जब उसने लंदन में करीब 600 करोड़ रूपये की कोठी खरीदी, जिसे दुनिया के सबसे महंगे घर की पदवी मिली। चार साल बाद उसने अपनी बेटी वनिषा को इससे भी महंगा घर खरीदकर दिया। वह दुनिया की इस्पात की सबसे बड़ी कंपनी ‘‘आर्सलर मिततल’’ का मालिक है।
इतनी खबर मिलने पर कई लोग इसे भारत की बढ़ती समृद्धि, भारतीयों की बढ़ती सफलता, भारतीयों की उद्यमिता आदि का प्रतीक मान सकते हैं और इसे भारत के लिए गौरव का विषय मान सकते हंै। लेकिन एक सहज सवाल उठता है कि यह अनाप-शनाप पैसा आया कहां से ? इसका स्त्रोत क्या है ?
कर्ज लो और अय्याशी करो
एक दूसरी जानकारी जो इस खबर के साथ नहीं आई, से रहस्य की परतें खुलती है। वह यह कि प्रमोद मित्तल और उनकी कंपनी इस देश के बड़े डिफाल्टर कर्जदारों में से एक रहे हैं। अपने भाई विनोद मित्तल के साथ वे 2010 तक इस्पात इंडस्ट्रीज नामक भारत की प्रमुख इस्पात कंपनी के मालिक रहे है। इस कंपनी को भारत के बैंकों और वित्तीय संस्थाओं ने बार-बार विशाल कर्जे दिए, न चुकाने पर माफ किए या उनका नवीनीकरण किया। यह भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अनुमोदित ‘कंपनी कर्ज पुनर्गठन’ (कारपोरेट डेब्ट रिस्ट्रक्चरिंग) योजना के तहत किया गया। इसके तहत कोई कंपनी मुसीबत में है और कर्जों को नहीं चुका पा रही है, तो उसको कुछ रियायतें देकर, कुछ माफ करके, कुछ और वक्त देकर, नए कर्जे दे दिए जाते हैं तथा पुराने कर्जो का समायोजन कर दिया जाता है। कुछ कर्जों के बदले शेयर भी बैंकों को दे दिए जाते हैं। उस कंपनी को जितने बैंकों व संस्थाओं ने कर्जा दिया है सब मिलकर यह फैसला करते हैं। रिजर्व बैंक ने यह योजना 2001 में शुरू की थी और इसके लिए एक प्रकोष्ठ बनाया है।
इस्पात इंडस्ट्रीज के कर्जों का पुनगर्ठन 2003 और 2009 में किया गया था। फिर भी हालत नहीं सुधरी, तब दिसंबर 2010 में जिंदल स्टील वक्र्स के साथ इसका विलय कर दिया गया। उस वक्त इस्पात इंडस्ट्रीज 323 करोड़ रूपये के घाटे में थी। उसके ऊपर 15 कर्जदाता संस्थाओं का 7156 करोड़ रूपये का कर्जा था। इसमें 400 करोड़ का कर्जा डूबत खाते में था। लेकिन इस पूरे दौर में मित्तल बंधुओं के माथे पर शिकन भी नहीं आई और वे बेहिसाब पैसा उड़ाते रहे। 2006 में प्रमोद मित्तल ने करीब 100 करोड़ रूपये में बलगारिया का एक फुटबाल क्लब खरीद लिया। मजदूरांे-कर्मचारियों को वेतन देने के लिए कंपनी के पास पैसा नहीं था। बिजली-पानी का बिल भरने और कच्चा माल खरीदने के लिए भी पैसा नहीं था। लेकिन पूरे वक्त मित्तल बंधु विदेशों में घर, गरम पानी की स्विमिंग पुल, छत पर हेलीपेड और महंगी कारों पर अरबों रूपया लुटाते रहे।
इसी के साथ हाल ही में हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्रसिंह को इस्पात इन्डस्ट्रीज द्वारा 2.8 करोड़ रूपये के भुगतान की सीबीआई जांच की खबरों को भी जोड़ लीजिए। ये भुगतान ‘‘वीबीएस’ के नाम से 2009 और 2010 में किए गए थे। वीरभद्र सिंह उस समय केन्द्रीय इस्पात मंत्री थे।
किंगफिशर एयरलाईन्स और उसके मालिक शराब किंग विजय माल्या का मामला खबरों में ज्यादा रहा है। 2005 में स्थापित माल्या की इस कंपनी ने कभी मुनाफा नहीं कमाया। 2010 में कर्जों का पुनर्गठन भी इसका संकट दूर नहीं कर पाया। सितंबर 2012 तक इसका सचित घाटा 8016 करोड़ हो चला था। कंपनी पर तब 13 बैंकों का 13750 करोड़ रूपये कर्जा था। इसके कर्जों के पुनर्गठन की कारवाई फिर चल रही है। अक्तूबर 2012 में सात महीनों से वेतन नहीं मिलने के कारण एक कर्मचारी की पत्नी ने आत्महत्या कर ली। उसी वक्त माल्या के छोटे बेटे ने ट्विटर पर लिखा, ‘‘मैं बिकनी-पहनी माॅडलों के साथ बाॅलीबाॅल खेल रहा हूं।’’ उसके बाद 18 दिसंबर 2012 को अपने जन्मदिन पर विजय माल्या ने तिरूपति जाकर 3 किलो सोना चढ़ाया, जिसकी कीमत करीब एक करोड़ रूपये होती है। गौरतलब यह भी है कि विजय माल्या 2002 से भारत की संसद में राज्यसभा का सदस्य है।
यदि अंबानी की चर्चा नहीं करेंगे तो किस्सा अधूरा रहेगा। मुंबई में 5000 करोड़ रूपये का दुनिया का सबसे महंगा घर ‘‘एंटीलिया’’ बनाने वाले मुकेश अंबानी ने पिछले दिनों अपनी पत्नी नीता का जन्मदिन वहां न मनाकर राजस्थान के राजमहलों में मनाया। मेहमान 32 चार्टर्ड विमानों से आए जिनमें केंद्रीय भारी उद्योग मंत्री, क्रिकेट खिलाडी सचिन तेंदुलकर, फिल्मी हीरो आमिर खान, रणबीर कपूर आदि शामिल थे। इसी अंबानी की रिलायंस कंपनी को भारत सरकार ने पिछले एक साल से प्राकृतिक गैस के दाम बढ़ाकर तगड़ी कमाई का मौका दिया।
बैंको की लूट
एक और खबर पूरे तिलिस्म को समझने में सहायक होती है। यह महत्वपूर्ण खबर कुछ आर्थिक अखबारों व पत्रिकाओं में सिमट कर रह गई। 5 दिसंबर 2013 को चेन्नई में अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ ने एक पत्रकार वार्ता करके पूंजीपतियों द्वारा भारतीय बैंकों की इस विशाल लूट पर सवाल उठाए। संघ ने भारतीय बैंकों (भारतीय स्टेट बैंक, आईडीबीआई और विदेशी बैंक छोड़कर) के सबसे बड़े 50 डिफाल्टरों की सूची जारी की, जिन पर 40,528 करोड़ रूपये का कर्जा फंसा हुआ है। इस सूची में ज्यादातर बड़ी कंपनियां है। केवल चार सबसे बड़ी डिफाल्टर कंपनियों (जिनमें किंगफिशर एयरलाईन्स एक है) पर 22,666 करोड़ रूपये का डूबता हुआ कर्जा है।
संघ ने यह भी बताया कि भारत के सरकारी बैंकों के खराब कर्जों (जिनका समय पर भुगतान नहीं हो रहा है) का आकार बहुत तेजी से बढ़ रहा है। मार्च 2008 में 39,000 करोड़ रूपये से बढ़कर मार्च 2013 में यह 1,64,000 करोड़ रूपये हो चुका है। (हाल ही में जारी रिजर्व बैंक की रपट के मुताबिक अब यह राशि 2,29,000 करोड़ पर पहुंच चुकी है।) इनके अलावा इस अवधि में 3,25,000 करोड़ रूपये के खराब कर्जों का पुनर्गठन करके उन्हें अच्छे कर्जो में बदला गया है। इनमें 83 फीसदी कर्जे बड़ी कंपनियों के हैं। इसका बैंकों के मुनाफों पर भी भारी असर पड़ा है। इन पांच सालों में खराब कर्जों के कारण बैंकों के मुनाफे कुल मिलाकर 1,40,266 करोड़ रूपये कम हो गए। उनमें करीब 40 फीसदी की कमी हो गई। लेकिन यह केवल बैंकों के मुनाफे का सवाल नहीं है, इससे करोड़ों जमाकर्ताओं के हितों का भी सवाल जुड़ा है। ज्यादातर बैंक सरकारी है और यह देश की जनता के पैसे की लूट है। दूसरा खतरा यह है कि चंद कंपनियों पर ये विशाल कर्जे डूबने पर पूरे बैंकिंग उद्योग के लिए संकट पैदा कर सकते है। 2007-08 की वैश्विक मंदी में तो भारतीय बैंक बच गए, लेकिन अब ध्वस्त हो सकते है।
बीमार उद्योग, मस्त उद्योगपति
संघ ने इस प्रचलित कहावत को उद्धृत किया है कि ‘भारत में बीमार उद्योग तो हैं, लेकिन कोई बीमार उद्योगपति नहीं है।’ दरअसल कर्जो के पुनर्गठन के कारण कंपनियों का संकट टलता जाता है और उनके काम को दुरूस्त करने तथा खर्चे कम करने का कोई दबाव नहीं बनता है। बैंकों के प्रबंधन के लिए भी यह आसान रास्ता होता है, क्योंकि इससे उनकी बैलेंस शीट में खराब कर्जों या डूबत कर्जों (नाॅन-परफाॅर्मिंग एसेट या एनपीए) की मात्रा कम हो जाती है। ‘‘कंपनी कर्ज पुनर्गठन’’ के मामले बहुत तेजी से बढ़े हैं। मार्च 2009 में खतम होने वाले वित्तीय वर्ष में 184 मामले थे जिनमें 86,536 करोड़ रूपये की राशि स्वीकृत की गई। 2012-13 में ढ़ाई गुना बढ़कर यह संख्या 401 और राशि 2,29,013 करोड़ रूपये हो गई। चालू वित्तीय वर्ष के केवल प्रथम तिमाही में कर्ज पुनर्गठन के 415 मामले और 2,50,279 करोड़ रूपये स्वीकृत किए गए। दूसरी तिमाही में यह राशि 4,00,000 करोड़ हो गई। स्वयं रिजर्व बैंक के अधिकारियों को इस पर चिंता जाहिर करना पड़ा। उप-गवर्नर के सी चक्रवर्ती को यह कहना पड़ा कि 2008 में चुनाव के पहले करोड़ों किसानों के 50,000 करोड़ रूपये के कर्जे माफ किए गए थे, उसके मुकाबले चंद कंपनियों की यह कर्ज-माफी काफी ज्यादा है।
यहां पर हमारी पूंजीवादी व्यवस्था का दोहरा चरित्र नंगे रूप में सामने आता है। किसान किसी मजबूरी से अपना छोटा सा पच्चीस-पचास हजार का कर्जा नहीं चुका पाता है, तो जलील किया जाता है और खुदकुशी कर लेता है। ये पूंजीपति अरबों रूपये के कर्ज डकारकर अय्याशी की सारी हदें तोड़ते जाते हंै।
इस पूरे खेल में पूंजीपतियों, बैंक अफसरों, नौकरशाहों और राजनेताओं की गहरी सांठगांठ से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसके पीछे भारत सरकार की वह नीति और इच्छा भी रही है कि येन-केन-प्रकारेण कंपनियों को बचाया जाए व बढ़ाया जाए और इस तरह से राष्ट्रीय आय की ऊंची वृद्धि दर और तेज विकास का भ्रम बनाकर रखा जाए।
भारत के कर्मचारी संगठन अक्सर केवल अपने वेतन-भत्तों की लड़ाई लड़ते रहते हैं। अखिल भारतीय बैंक कर्मचारी संघ ने भारतीय जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे की इस लूट को उजागर करके देश का भला किया है। ऐसा ही काम उन्हांेने करीब 15 साल पहले किया था। तब भारतीय पूंजीपतियों के एक संगठन ने सरकारी बैंकों के विशाल बकाया कर्जे का हवाला देते हुए तीन बैंकों के निजीकरण की मांग करते हुए मुहिम शुरू की थी। कर्मचारी संघ ने बड़े बकायादारों की सूची निकाल दी और बताया कि इनमें शीर्ष पर उन्हीं पूंजीपतियों की कंपनियां है, जो इस मुहिम को चला रहे है। तब ये पूंजीपति शांत हो गए।
करों में विशाल छूट के तोहफे
दो और जानकारी या खबरें जोड देने से इक्कीसवीं सदी में भारत की पूंजीवादी-नवउदारवादी लूट की तस्वीर पूरी होती है। एक तो वह जिसे पत्रकार पी सांईनाथ बार-बार हमारे ध्यान में लाते हैं। कंपनियों को संकट से राहत देने के नाम पर केन्द्र सरकार साल-दर-साल केन्द्रीय करों में विशाल छूट देती जा रही है। पिछले आठ सालों में मिलाकर केवल चार केन्द्रीय करों में उन्हें 31,88,757 करोड़ रूपये की टेक्स-माफी-छूट के उपहार दिए जा चुके हैं। अन्य तरह के उपहार (जैसे सस्ती जमीन) और राज्य सरकारों द्वारा दी जाने वाली कर-रियायतें इसके अतिरिक्त है।
दूसरी खबर ‘ग्लोबल फाईनेंशियल इंटिग्रिटी’ के स्त्रोत से आई है। दुनिया में धन के अवैध प्रवाह पर नजर रखने वाली यह संस्था है। यह बताती है कि भारत से बाहर जाने वाले दो नंबरी धन का प्रवाह बढ़ता जा रहा है और 2011 में 4,00,000 करोड़ रूपये देश से बाहर गया। यदि 2002 से 2011 के बीच पूरे दशक का मीजान लगाएं तो 15,70,000 करोड़ रूपये अवैध रूप से देश के बाहर गया। 2011 में धन के गैर कानूनी प्रवाह में रूस और चीन के बाद भारत का स्थान दुनिया में तीसरा रहा।
इन सब खबरों और जानकारियों को मिला देने से काफी बातें साफ होती है। पिछले दो दशकों में जिसे भारत की प्रगति, समृद्धि और उभरती हुई आर्थिक ताकत बताया जा रहा था, और भारत की राष्ट्रीय आय की ऊंची वृद्धि दर का जो गुणगान गाया जा रहा था, वह दरअसल कर्जांे और लूट पर खड़ा ताश का महल है। यह ऐसा भ्रष्टाचार है जो वैश्वीकरण और उदारवाद की नीतियों में छिपा है। इसे शायद कोई लोकपाल नहीं पकड़ पाएगा। भारतीय जनता के लगातार बढ़ते कष्टों अभावों और गरीबी के कारण भी इस लूट व डकैती में देखे जा सकते है।
उन्नीसवीं सदी में दादाभाई नोरोजी ने अंग्रेजों द्वारा भारत की लूट पर किताब लिखी थी और वह आजादी के आंदोलन का मुख्या आधार बनी थी। इक्कीसवी सदी में हमारे अपनों द्वारा कई गुना बड़ी इस लूट को कौन रोकेगा, यह चुनौती हमारे सामने है।
लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय महामंत्री एवं सामयिक वार्ता का संपादक है।
पता – ग्राम पोस्ट केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.) 461111
मोबाईल नं. 09425040452

जब देश की राजनीति बहुत नीचे गिरने लगी और उसमें भ्रष्टाचार , स्वार्थ , मौकापरस्ती और सिद्धांतहीनता का बोलबाला होने लगा तब देश को बचाने के लिए १९९५ महाराष्ट्र के ठाणे में समाजवादी जनपरिषद नामक एक नई राजनैतिक पार्टी का गठन किया गया । उसका उद्देश्य अन्याय, अत्याचार, गैर-बराबरी,ऊंच-नीच,शोषण और पर्यावरण नाश करनेवाली मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था को जड़ से मिटाना है – एक नया भारत और एक नयी दुनिया बनाना है । इसके लिए नीचे से लोगों की समस्याओं के लिए संघर्ष करते हुए जनशक्ति का निर्माण , जनजागृति और रचनात्मक कार्यों का रास्ता इसने चुना है । देश के नौ राज्यों – बंगाल,बिहार,झारखंड,ओड़िशा,उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश,म्महाराष्त्र,केरल और दिल्ली में इसकी इकाइयां हैं । महात्मा गाम्धी,राममनोहर लोहिया,बाबा साहब अम्बेडकर ,बिरसा मुंडा और किशन पटनायक इसके प्रेरणा स्रोत हैं। लेकिन यह किसी एक व्यक्ति का अंधानुकरन भी नहीं करती है । देश को बदलना है तो राजनीति को बदलना होगा। बेईमानों, मौकापरस्तों और देश के दुश्मनों के हाथ में राजनीति कैद है। उनके कब्जे से छुड़ाकर राजनीति को किसानों , मजदूरों , छोटे दुकानदारों, नौजवानों,पिछड़ों,दलितों,आदिवासियों और महिलाओं के हक में संघर्ष का औजार बनेगी समाजवादी जनपरिषद। आप भी इस मुहिम में शामिल हों।
सुनील जोशी जेकब
महामंत्री अध्यक्ष
समाजवादी जनपरिषद समाजवादी जनपरिषद

कोक विरोधी प्रदर्शन

मेहदीगंज,कोक विरोधी प्रदर्शन

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 4,651 other followers

%d bloggers like this: