कोपेनहैगन : राष्ट्राध्यक्ष इतिहास न बना सके लेकिन जनता ने बनाया

रात भर चली वार्ताओं में विश्व के राष्ट्राध्यक्ष कोपेनहेगन एक लचर सहमती पर पहुँचे जिसमें पृथ्वी के गरम होने की प्रक्रिया पर रोक लगाने के लिए उद्योगों के उत्सर्जन पर नकेल कसने के लिए कोई लक्ष्य तय नहीं किए गये हैं । यह समझौता फन्डिंग के मामले में मजबूत था परन्तु मौसम परिवर्तन की बाबत बाध्यकारी नहीं है तथा किसी वास्तविक मौसम सम्बन्धी समझौते पर पर पहुंचने के लिए इसमें किसी निश्चित तिथि की घोषणा भी नहीं की गई है । अमेरिका तथा चीन जैसे सबसे बड़े प्रदूषक मुल्क कमजओर समझौता ही चाहते थे तथा यूरोप , ब्राजील तथा दक्षिण अफ़्रीका जैसे भविष्य के प्रदू्षण चैम्पियन इन दोनों की मंशा को विफल करने के लिए कुछ खास नहीं किया ।

दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष इतिहास न बना सके लेकिन विश्व भर की जनता ने इतिहास बनाया । मुख्यधारा की मीडिया ने जानबूझकर इनकी ढंग से चर्चा नहीं की । ऐसे मौके कई बार आते हैं । बांग्लादेश को दुनिया के किसी देश ने मान्यता जब नहीं दी थी तब लोकनायक जयप्रकाश नारायण की विश्व यात्रा में बांग्लादेश को मान्यता दिए जाने की मांग को हर जगह जनता का समर्थन मिला था । विश्व व्यापार संगठन की बैठकों का भी जगह जनता द्वारा विरोध हुआ था और वैश्वीकरण का यह प्रमुख औजार आज ठप-सा पड़ गया है । कोपेनहेगन के सम्मेलन के विरोध में जनता का पक्ष रखने के लिए दुनिया भर में हजारों रैलियाँ और प्रदर्शन हुए । समझौते पर टिप्पणी करते हुए एक अफ़्रीकी आन्दोलनकारी ने कहा , “किसी हाथी को चलवाने में बहुत बड़े प्रयास की जरूरत होती है लेकिन एक बार यदि आप सफल हो गये तो उसे रोकना आसान भी नहीं होता । हाथी डोलने लगा है । “

प्रदर्शनकारियों के समक्ष इंग्लैण्ड के प्रधान मन्त्री को कहना पड़ा , ’ आप लोगों ने दुनिया के लिए आदर्श स्थिति को प्रस्तुत किया है …..राष्ट्राध्यक्षों पर इसका जो असर हुआ है उसे कम कर न आँकिएगा । “

नोबेल पुरस्कार विजेता डेस्मन्ड टुटु ने आन्दोलनकारियों को कहा ,” इस बड़े  मकसद की मशाल आप लोग जलाए रखिएगा । “

पृथ्वी को बचाने की मुहिम एक सम्मेलन से पूरी नहं होने वाली । जनता को मौजूदा औद्योगिक व्यवस्था के विकल्प तैयार करने होंगे ।

कोपेनहेगन सम्मेलन की विफलता के जश्न मिटाने वाले भी मौजूद थी- प्रदूषणकारी उद्योगों की लॉबी की पार्टियों में जश्न मना और शैम्पेन की बोतलें खुलीं । जिन लॉबियों ने दुनिया की जम्हूरी निजाम पर कब्जा जमा रखा है तथा हमारे नेताओं को खरीद रखा है उन्होंने अपनी जीत का जश्न मनाया । जश्न का जाम हाथों में लिए उन्हें भी थोड़ी चिन्ता जनता की ताकत के आधार पर खड़े हो रहे आन्दोलन की हुई होगी । जनता की इस आवाज को खामोश करने की कोशिश भी इस लॉबी के द्वारा शुरु हो चुकी है ।



पत्रकार / चिट्ठेकार बाबा मायाराम की पुस्तक का लोकार्पण

बाबा मायाराम द्वारा लिखी गयीं सशक्त रिपोर्टों से चिट्ठा जगत परिचित है । ’सतपुड़ा के बाशिन्दे’ नामक उनकी किताब का लोकार्पण कल इटारसी में हुआ ।
इस अवसर पर प्रबुद्ध नागरिकों के अलावा उन क्षेत्रों के ग्रामीण भी शामिल थे, जिनके बारे में इस पुस्तक में विवरण है।

इटारसी स्थित पत्रकार भवन में पर्यावरण बचाओ, धरती बचाओ विषय पर आयोजित संगोष्ठी में इस पुस्तक का लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार और प्राचार्य श्री कश्मीर उप्पल और समाजवादी जन परिषद के उपाध्यक्ष श्री सुनील ने किया। इस संगोष्ठी में पर्यावरण के कई पहलुओं पर चर्चा की गई। वनों का विनाश, नदियों का सूखना, रासायनिक खेती के दुष्प्रभाव आदि ऐसे मानव जीवन से जुड़े कई मुद्दों पर विचार-विमर्श किया गया।

बाबा मायाराम ने पिछले एक शवर्ष में उन्हें प्रदत्त दो फैलोशिप के तहत हो्शंगाबाद जिले के वनांचलों में घूम-घूमकर यह पुस्तक तैयार की है जिसमें यहां रहने वाले आदिवासियों की जिंदगी में चल रही उथल-पुथल, आकांक्षाओं और विस्थापन की त्रासदियों का जीवंत चित्रण किया गया है। इस पुस्तक की प्रस्तावना देश के जाने-माने प्रसिद्ध पत्रकार भारत डोगरा ने लिखी है और संपादन डॉ. सुशील जोशीने किया है। उल्लेखनीय है कि बाबा मायाराम पिछले दो दशकों से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। पूर्व में वे कई समाचार पत्र-पत्रिकाओं से संबद्ध रह चुके हैं। विभिन्न मुद्दों पर उनके लेख, रिपोर्टस व टिप्पणियां देश के प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में छपती रही हैं।

सतपुड़ा के बाशिन्दे

पुस्तक से कुछ विचारणीय मुद्दे :

  • आजादी के बाद अब तक जितनी विकास परियोजनायें बनी हैं उनमें सबसे ज्यादा विस्थापन का शिकार आदिवासियों को होना पड़ा है । आंकड़ों में सिर्फ प्रत्यक्ष विस्थापन ही शामिल है । काफ़ी विस्थापन अप्रत्यक्ष होता है ।
  • एक बार विस्थापित होने के बाद लोगों की जिन्दगी फिर व्यवस्थित नहीं हो पाती । उलटे लोगों की हालत बदतर हो जाती है । विस्थापन का समाधान पुनर्वास से नहीं होता ।
  • वन्य प्राणी संरक्षण के सन्दर्भ में ऐसा कोई अध्ययन नहीं हुआ है कि मानवविहीन करके ही वन तथा वन्य जीवों को बचाया जा सकता है । बल्कि बोरी अभ्यारण्य के अनुभव से तो लगता है कि वन , वन्य जीव तथा वनवासियों  का सहअस्तित्व संभव है ।
  • वन्य जीवों के संरक्षण से जुड़ा है वन संरक्षण । जंगली जानवर जंगल में ही रहते हैं । यह विडंबना ही है कि वन्य प्राणी संरक्षण योजना की शुरुआत वनों को काट कर की जाए ।
  • वन्य संरक्षण की योजनायें व नीतियां विरोधाभासी हैं । एक तरफ़ तो शेरों को बसाने के लिए लोगों को उजाड़ा जा रहा है वहीं दूसरी तरफ़ पर्यटकों के लिए सैर सपाटे के इंजाम किए जा रहे हैं ।
  • एक दलील यह दी जाती है कि जंगलों में बसे आदिवासियों का विकास नहीं हो रहा है । तथ्य यह है कि जो गाँव विस्थापित किए गए हैं उनमें हर दृष्टि से लोगों की जिन्दगी पहले से बदतर हुई है ।

प्रकाशक व उपलब्धि केन्द्र -  किसान आदिवासी संगठन , ग्रा/पो केसला , जिला – होशंगाबाद , मध्य प्रदेश,४६११११

मूल्य – पच्चीस रुपये ।

इरोम शर्मिला को बचायें ,’आफ़्स्पा’ हटायें :ऑनलाईन प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर करें

मित्रों ,

इस ब्लॉग पर आप मणिपुर की जुझारू महिला सत्याग्रही इरोम शर्मिला के ऐतिहासिक अहिंसक प्रतिकार के बारे में पढ़ चुके हैं । इरोम शर्मिला की मांगों के प्रति नैतिक एकजुटता प्रकट करने के लिए समाजवादी जनपरिषद की इकाइयों ने कार्यक्रम भी लिए

इरोम शर्मिला चानू द्वारा अन्न-जल छोड़े हुए नौ साल पूरे हो चुके हैं । इस मौके पर तहलका की शोमा चौधरी ने उनके बारे में एक अच्छा आलेख लिखा है ।

इस बाबत हिन्दी चिट्ठों के पाठकों का समर्थन उनकी टिप्पणियों के द्वारा प्रकट हुआ है ।

आप सब से सादर अनुरोध है कि इस जुझारू महिला के प्राण रक्षा के लिए तथा ’आफ़्स्पा’ हटाने की उनकी मांग के सन्दर्भ में राष्ट्रपति को सम्बोधित ऑनलाईन प्रतिवेदन में हस्ताक्षर करें , समर्थन जतायें ।

प्रतिवेदन पर साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता हिन्दी लेखिका अलका सरावगी ने कहा है ,

” अपने ही देश के नागरिकों के अहिंसक सत्याग्रह और अति-मानवीय साहस को अनदेखा कर दमन की संस्कृति फैलाने वाली सरकार की भर्त्सना करती हूँ । “

ऑनलाईन प्रतिवेदन में हिन्दी में नाम ,टिप्पणी तथा संगठन का नाम दिया जा सकता है ।

सविनय ,

अफ़लातून ,

सदस्य राष्ट्रीय कार्यकारिणी , समाजवादी जनपरिषद .

आफ़्स्पा ( AFSPA ) के खिलाफ़ धरना और सभा

अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस के अवसर पर समाजवादी जनपरिषद ने लंका , वाराणसी में आफ़्स्पा (Armed Forces Special Power Act, AFSPA,1958 ) के खिलाफ़ धरना एवं सभा का आयोजन किया ।

धरना कवियित्री एवं जुझारू कार्यकर्ता ईरोम शर्मिला चानू के साहसिक संघर्ष के दसवें साल में प्रवेश के मौके पर उनके समर्थन में रखा गया था । सभा में केन्द्र सरकार से मांग की गयी कि आम नागरिकों के मानवाधिकारों का हनन करने वाले और सैन्य बलों को अगाध छूट देने वाले आफ़्स्पा कानून को तत्काल रद्द किया जाए । इस कानून की आड़ में पिछले 50 सालों से पूर्वोत्तर राज्यों में सेना ने अपना बर्बर राज चला रखा है । लूट , बलात्कार , मार-पीट , हत्या आदि का इस्तेमाल आम जनता के खिलाफ़ तथाकथित रूप से उग्रवाद को दबाने के लिए किया जाता है परन्तु सच तो यह है कि इन 50 सालों इस इलाके में राज्य के दमन और मुख्यधारा से काटे रखने की राजनीति के फलस्वरूप उग्रवाद बढ़ा ही है । इस कानून का असर सबसे ज्यादा महिलाओं को ही झेलना पड़ता है । सभा में उन सभी जुझारू महिलाओं को नमन किया गया जिनके संघर्ष फलस्वरूप इस कानून की नारकीय सच्चाई शेष भारत और विश्व के सामने आई ।

’आफ़्स्पा’ जम्मू और काश्मीर में भी लगाया गया है और वहां भी पिछले 25 सालों में सेना के अत्याचार तथा केन्द्र सरकार द्वारा लोकतंत्र की प्रक्रियाओं से खिलवाड़ के फलस्वरूप उग्रवाद और आतंकवाद बढ़ा है । शोपियान काण्ड में भी राज्य सरकार ने आरोपियों को बचाने का काम ही किया है ।

सभा में जमीन के हक और शराब माफ़िया , खनन एवं महाजनों की लॉबी के खिलाफ़ लड़ रहे आदिवासियों पर नारायणपटना में हुए गोली-काण्ड का विरोध किया गया । गोली काण्ड की जांच करने जा रही महिला कार्यकर्ताओं की टीम पर कम्पनियों के गुण्डों तथा सादी वर्दी में पुलिस द्वारा हमले की तीव्र आलोचना की गई ।

सभा में यह बात उभर कर आइ जब जनता जल , जंगल , जमीन और जीने के अपने अधिकारों के लिये लड़ती है तो उसे दबाने के लिए राजनैतिक सत्ता पुलिस , सेना एवं कानून का सहारा लेती है । इसलिए देश की जनता को लूट कर निजी कम्पनियों के हाथों में प्राकृतिक संसाधन सौंपने की नीतियों का विरोध करना ही होगा ।

सभा में मांग रखी गयी कि आफ़्स्पा को तकाल रद्द किया जाये , इरोम शर्मिला को रिहा किया जाये एवं जनान्दोलनों पर दमन रोका जाए ।

क्रान्तिकारी कवि गोरख पाण्डे के प्रसिद्ध गीत ’ गुलमिया अब हम नाहि बजईबो , अजदिया हमरा के भावेले ’ के गायन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ ।

- रपटकर्ता : प्योली स्वातिजा

राजनीति का धंधा और धंधे की राजनीति : ले. सुनील

अखबार की वह खबर हैरान करने वाली थी। मैंने सोचा कि शायद छपाई की कोई गलती है या दशमलव बिन्दु इधर-उधर हो गया है। लेकिन दूसरे अखबार में भी देखा। वह सच थी। यह खबर चालू वित्त वर्ष की प्रथम छ:माही में अग्रिम आयकर जमा करने वाले शीर्षस्थ लोगों के बारे में थी। इनमें दूसरे नंबर पर आंध्रप्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री के बेटे जगनमोहन रेड्डी का नाम था। सबसे ज्यादा आयकर जमा करने वाले सौ लोगों की सूची में वह एकमात्र नेता है, बाकी लोग फिल्मी सितारे, क्रिकेट खिलाड़ी और उद्योगपति-व्यवसायी है। लेकिन ज्यादा हैरत-भरी बात जगनमोहन रेड्डी द्वारा अदा किए गए कर की राशि में वृ्द्धि है। पिछले वर्ष उसने मात्र 2.9 लाख रु. का टैक्स जमा किया था, किन्तु इस वर्ष मात्र छ: महीने के अग्रिम टैक्स के बतौर 6.6 करोड़ रु. अदा किए है। अनुमान है कि पूरे वर्ष के लिए वह 22 करोड़ रु. का टैक्स चुकाएगा। सिर्फ एक साल में इतनी जबरदस्त वृद्धि कैसे हुई ? कर राशि से आमदनी का अंदाजा लगाएं जो पिछले वर्ष जगनमोहन रेड्डी की सालाना आमदनी 10 लाख रु. रही होगी और इस वर्ष करीब 70 करोड़ रु रहेगी। यानी उसकी व्यक्तिगत आमदनी में 700 गुना वृद्धि हुई । प्रतिशत में देखें तो यह 69,900 प्रतिशत की वृद्धि है। जरुर जगनमोहन के पास कोई जादू की छड़ी या मंत्र है, जिसने उसे रातो-रात बेइंतहा दौलत और आमदनी का मालिक बना दिया है।
यही जादू की छड़ी झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा को भी मिल गई प्रतीत होती है। लेकिन जहां मधु कोड़ा को लेकर रोज छापे पड़ रहे हैं और हल्ला मचा है, जगनमोहन रेड्डी की बेहिसाब कमाई को लेकर कोई बवेला नहीं मचा है, कोई जांच भी शुरु नहीं हुई  है। यह कहा जा सकता है कि जगनमोहन रेड्डी की कमाई एक नंबर की है और उसने पूरा टैक्स अदा करना उचित समझा है। किन्तु आमदनी के कोई भी वैध तरीके एक वर्ष में 700 गुना वृ्द्धि नहीं कर सकते। जगमोहन रेड्डी ने उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का स्थान लिया है, जो पिछले वर्ष की सबसे ज्यादा आयकर देने वाली नेता थी। मायावती के समर्थकों ने भी यही दलील दी थी। यह हो सकता है कि दूसरे नेताओं ने अपनी कमाई ज्यादा छिपाई होगी। लेकिन यह सवाल रह जाता है कि जब उत्तर प्रदेश के दलितों सहित करोड़ों लोग नितांत कंगाली एवं अभावों में दिन काट रहे हों, बुंदेलखंड में लगातार कई सालों से सूखा पड़ा हो, तब उनकी नेता द्वारा अरबों रुपए की संपत्ति इकट्ठी करना कहां तक उचित है ?
यह जादू की छड़ी है राजनीति जिसे चालाक और स्वार्थी लोगों ने वैध-अवैध तरीके से बेहिसाब कमाई का जरिया बना लिया है। अब राजनीति जनसेवा या देशसेवा का माध्यम नहीं रह गई है। राजनीति में त्याग , तपस्या , सादगी , ईमानदारी आदि की बातें अब अप्रासंगिक हो चली हैं। ये सब आजादी के आंदोलन के वक्त की दकियानूसी बातें हैं, जिनसे हम बहुत आगे बढ़ गए है। जगनमोहन रेड्डी या मधु कोड़ा कोई अपवाद नहीं है। कमोबेश मात्रा में देश की सभी प्रमुख पार्टियों के नेता इसी काम में लगे हैं। राजनीति और व्यापार का फर्क मिटता जा रहा है। नेशनल इलेक्शन वाच ने लोकसभा चुनाव तथा महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव में उम्मीदवारों की संपत्ति घोषणाओं का विश्लेषण किया है।
महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान केन्द्रीय मंत्री विलासराव देशमुख की संपत्ति 5 वर्ष में 2.7 करोड़ रु. बढ़ गई है। अर्थात उन्होंने प्रतिवर्ष औसतन 55 लाख रु. अपनी संपत्ति में जोड़े। महाराष्ट्र के पूर्व मंत्री सुरेश जैन की संपत्ति 2004 में 26 करोड़ रु. से बढ़कर 2009 में 79 करोड़ रु. हो गई। यानी सुरेश दादा की संपत्ति में हर साल 10 करोड़ रु. या हर माह 80 लाख रु. से ज्यादा का इजाफा हुआ। अन्ना हजारे ने जिन मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच को लेकर अनशन किया था, उनमें एक सुरेश जैन थे। महाराष्ट्र के जो विधायक दुबारा निर्वाचित हुए, उनकी संपत्ति में औसतन साढ़े तीन करोड़ रु. की बढ़ोत्तरी पांच साल में हुई। हरियाणा के पुन: निर्वाचित विधायकों की संपत्ति औसतन 600 प्रतिशत पांच वर्ष में बढ़ी।
राजनीति और व्यापार के इस घालमेल में एक और रेड्डी बंधु चर्चा में है। ‘बेल्लारी बंधु’ के नाम से मशहूर इन रेडि्डयों ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा की कुर्सी अस्थिर कर दी और भाजपा हाईकमान भी उनके सामने असहाय नजर आई। भाजपा विधायक भी उनकी मुठ्ठी में थे और कर्नाटक में आई बाढ़ की त्रासदी से बेखबर सैरगाहों में आराम फरमा रहे थे। कारण बहुत साफ है कर्नाटक और आन्ध्रप्रदेश की लोहा खदानों के बेताज बादशाह बनकर उभरे इन रेड्डी बंधुओं के पास बेतहाशा पैसा है, जो उन्होंने भाजपा के चुनाव में लगाया था। कहा जाता है कि जब सुषमा स्वराज बेल्लारी से सोनिया गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ी थी, तब भी इन्हीं बंधुओं ने मदद की थी। जिसका पैसा होगा, राजनीति में उसी की चलेगी। जब बेल्लारी बंधुओं के हित प्रभावित होने लगे और येदिउरप्पा ने उनके पर करतने की कोशिश की, तो उन्होंने बगावत करवा दी। वे सोचने लगे कि वे स्वयं क्यों न मुख्यमंत्री बन जाए ? ठीक वैसे ही, जैसे दूसरो को वोट दिलाते-दिलाते अपराधियों-रंगदारों ने सोचा कि वे स्वयं क्यों न विधायक और सांसद बन जाएं।
मधु कोड़ा, मायावती, अमरसिंह, सुखराम, जगमोहन रेड्डी, बेल्लारी के रेड्डी बंधु – ये सब भारतीय राजनीति की तेजी से उभरती नई तस्वीर के चेहरे हैं। राजनीति धंधा बन गई है और धंधेबाज राजनीति में आ गए हैं। राजनीति और व्यवसाय के इस संकरन से नेता-व्यवसायी के नए क्लोन तैयार हो रहे हैं। कोई नेता से व्यवसायी बन रहा है तो कोई ठेकेदार-उद्योगपति से नेता बन रहा है। इसी के कारण अब चुनावों में बेतहाशा पैसा पानी की तरह बहाया जाता है और साधारण लोग या सिद्धांत की राजनीति करने वाले लोग दौड़ से बाहर होते जा रहे हैं। राजनीति तेजी से करोड़पतियों -अरबपतियों की मुठ्ठी में कैद होती जो रही है। धनकुबेरों ने चुनाव और राजनीति को पूंजी निवेश का एक और क्षेत्र बना लिया है। पहले वे चुनाव में वे काफी पैसा खर्च करके चुनाव जीतते या जितवाते हैं, फिर उससे कई गुना कमाते हैं और फिर अगले चुनाव में और ज्यादा खर्च करते हैं। भारतीय राजनीति का यह दुष्चक्र अपराध-राजनीति के गठजोड़ से ज्यादा बड़ा और खतरनाक है। राजनीति में अपराधियों को ज्यादा जन मान्यता नहीं मिलती। लोग डर के मारे ही वोट देते हैं। लेकिन पैसे वालों के राजनीति में वर्चस्व को जन-मान्यता भी मिलती जा रही है। नई लोकसभा में 300 से ज्यादा सांसद करोड़पति हैं। संसद में विश्वास मत में अंबानी की भूमिका बड़ी हो जाती है। नवीन जिन्दल, विजय माल्या जैसे पूंजीपति अब रिमोट कंट्रोल के बजाय सीधे राजनीति में उतर रहे हैं। पैसे के इस खेल में जन-समस्याएं और देशहित के मुद्दे गौण होते जाते हैं। भारतीय लोकतंत्र का ढांचा खोखला होता जाता है।
पहले राष्ट्रीयकरण, सरकारी हस्तक्षेप और लाईसेन्स राज को भ्रष्टाचार तथा राजनीति-व्यवसाय के घालमेल के लिए दोष दिया जाता था। किन्तु पिछले डेढ़-दो दशक का अनुभव उल्टा है। निजीकरण और कथित ‘निजी-सार्वजनिक भागीदारी’(पीपीपी) ने कई क्षेत्रों में निजी हाथों में वैध-अवैध कमाई की बाढ़ ला दी है। एक बड़ा कमाई का क्षेत्र खनिज व खदानें उभर कर आया है, जो दुनिया के स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों की बढ़ती मांग और मुक्त व्यापार के कारण काफी महत्वपूर्ण बन गया है। अभी तक शराब माफिया, शिक्षा माफिया, चीनी लाबी राजनीति को प्रभावित नियंत्रित करते थे। अब इसमें खनिज माफिया भी जुड़ गया है। कर्नाटक, आंध्र, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा आदि कई राज्यों में अब खनिज की कमाई से राजनीति चलाई जा रही है।
उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियों ने एक और तरीके से राजनीति में पैसे का दखल बढ़ाया है। इन नीतियों के तहत निजी आय और संपत्ति पर नियंत्रण पूरी तरह हटा दिए गए हैं। जैसे कंपनी डायरेक्टरों के वेतन पर या बड़े घरानों के साम्राज्य विस्तार पर पहले जो पाबंदियां थी, वे हटा दी गई। देश में गैरबराबरी जबरदस्त ढंग से बढ़ी है। कुछ लोगों के हाथ में आय व संपत्ति का केन्द्रीकरण भी काफी बढ़ा है। नव-धनाढ्यों में इस कमाई का उपयोग राजनीति में करके अपनी कमाई को और बढ़ाने की लालसा स्वाभाविक है। जब धन-आय की इतनी विषमता होगी, तो लोकतंत्र कैसे स्वस्थ ढंग से काम कर सकता है ? इसीलिए लोहिया-जयप्रकाश की धारा के भारतीय समाजवादी पहले से कहते आए हैं कि लोकतंत्र और समाजवाद दोनों अभिन्न हैं और एक-दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरा अधूरा है। भारतीय लोकतंत्र को बचाना है तो घोर पूंजीवादी व्यवस्था को त्यजकर मौजूदा दिशा को उलटकर, बराबरी एवं न्यायपूर्ण समाज की दिशा में बढ़ना ही पड़ेगा।

———-00———–

(लेखक समाजवादी जनपरिषद् का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष है।)
सम्पर्क पता :
सुनील, ग्राम पोस्ट -केसला, वाया इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.) 461 111
फोन नं० – 09425040452,

भोपाल गैस काण्ड : पच्चीस वर्ष : कवितायेँ : राजेन्द्र राजन

भोपाल गैस काण्ड के २५ वर्ष पूरे होने जा रहे हैं | दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी से जुड़े  सवाल ज्यों के त्यों खड़े हैं | हाल ही में इस बाबत मनमोहन सिंह से जब प्रश्न किए गए तो उन्होंने इन सवालों को भूल जाने की हिदायत दी | राजेन्द्र राजन की ये कविताएं भी पिछले  २५ वर्षों से आस्तीन के इन साँपों को बेनकाब करने की कोशिश में हैं |

 

मुनाफ़ा उनका है

श्मशान अपना है

जहर उनका है

जहरीला आसमान अपना है

अन्धे यमदूत उनके हैं

यमदूतों को नेत्रदान अपना है

हमारी आँखों में जिस विकास का अँधेरा है

उनकी आँखों में उसी विकास का सपना है

जितना जहर है मिथाइल आइसो साइनेट में

हाइड्रोजन साइनाइड में

फास्जीन में

उससे ज्यादा जहर है

सरकार की आस्तीन में

जिसमें हजार- हजार देशी

हजार – हजार विदेशी सांप पलते हैं ।

यह कैसा विकास है जहरीला आकाश है

सांप की फुफकार सी चल रही बतास है

आदमी की बात क्या पेड़ तक उदास है

आह सुन , कराह सुन , राह उनकी छोड़ तू

विकास की मत भीख ले

भोपाल से तू सीख ले

भोपाल एक सवाल है

सवाल का जवाब दो .

आलाकमान का ऐलान है

कि हमें पूरे देश को नए सिरे से बनाना है

और इसके लिए हमने जो योजनायें

विदेशों से मँगवाकर मैदानों में लागू की हैं

उन्हें हमें पहाड़ों पर भी लागू करना है

क्योंकि हमें मैदानों की तरह

पहाड़ों को भी ऊँचा उठाना है

अब मुल्क की हर दीवार पर लिखो

कोई बाजार नहीं है हमारा देश

कोई कारागार नहीं है हमारा देश

हमारे जवान दिलों की पुकार है हमारा देश

मुक्ति का ऊँचा गान है हमारा देश

जो गूँजता है जमीन से आसमान तक

सारे बन्धन तोड़ .

- राजेन्द्र राजन

आर.एस.एस , भाजपा को कुम्हला देने वाले आरोप , लेकिन कार्यवाही की सिफारिश – सिफ़र ! – सिद्धार्थ वरदराजन , डेप्युटी एडिटर – द हिन्दू द्वारा समाचार विश्लेषण

हिन्दुस्तानी में कहावत है – खोदा पहाड़ निकली चुहिया – लम्बे तथा कठिन रियाज के बाद जब नतीजा अपेक्षतया बहुत कम निकलता है – उन हालात में इस मुहावरे का इस्तेमाल किया जाता है ।
न्यायमूर्ती एम.एस. लिबर्हान ने १७ साल परिश्रम किया जिस दरमियान शुरुआती तीन माह की नियुक्ति के उनके कार्यकाल को ४० बार बढ़ाया गया , उन्होंने १०२९ पृष्टों की एक रिपोर्ट तैयार की जो उन तमाम हकीकतों और हालात का तफ़सील से ब्यौरा देती है जिनके के कारण १९९२ में बाबरी मस्जिद को ढहाया गया । उनके निष्कर्ष चौंकाने वाले नहीं है बल्कि स्पष्ट तथा बुलन्द हैं  : यह विध्वंस एक सोची समझी साजिश का नतीजा था – ” यह एक संयुक्त उद्यम था “- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ , विश्व हिन्दू परिषद ,शिव सेना तथा भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा यह षड़यन्त्र रचा गया था , इनमें से अन्त में उल्लिखित संगठन को रिपोर्ट ने सही ही आर.एस.एस का मोहरा बताया है ।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इन निर्भीक तथ्यान्वेषणों के बावजूद जो सिफारिशें दी गई हुई हैं वे फुस्स अथवा कायराना हैं तथा उनका इन निष्कपट निष्कर्षों से कोई मेल नहीं बैठता । देश को साम्प्रदायिक महाविपदा के मुहाने पर ढकलने के लिए ६८ व्यक्तियों को दोषी पाए जाने के बावजूद  श्री लिब्रहान अब तक विध्वंस-मामले में आरोपित होने से बच रहे लोगों के खिलाफ़ आरोप दाखिल करने की संस्तुति नहीं करते हैं न ही वे आपराधिक कार्रवाई को तेजी से निपटाने की बात करते हैं ।
षड़यंत्र की बाबत  ’ संयुक्त उद्यम ’का जुमला बार – बार दोहराने की वजह से यह चौंकाने वाली बात लगती है । १९९९ में तत्कालीन युगोस्लाविया की बाबत टैडिक फैसले के बाद से सीधी भागीदारी न होने के बावजूद जिन लोगों ने जानबूझकर इन कृत्यों को बढ़ावा दिया हो तथा जो लोग इन कृत्यों में लिप्त संगठनों के शीर्ष पर होते हैं उन पर दायित्व डालने की अन्तर्राष्ट्रीय फौजदारी कानून में सामूहिक अपराधों के ऐसे मामलों की बाबत बाद के वर्षों में एक धारणा  विकसित हुई है ।
यदि श्री लिब्रहान ने अपनी सिफारिशों में इस विचार को लागू किया होता तथा इस बात पर जोर दिया होता कि राजनेता , पुलिस अफ़सर, और नौकरशाह जिस व्यापक दण्डाभाव का लाभ लेते आए हैं उस का अन्त हो तो यह मुल्क उनका एहसान मानता । परन्तु उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है । धर्म तथा राजनीति को अलग रखने तथा अन्य कुछ अन्य ढीले ढाले सुझाव देने के उपरान्त , यह रिपोर्ट विध्वंस मामले में तात्कालिक न्याय सुनिश्चित करने अथवा देश को इस त्रासदी की पुनरावृत्ति से बचाने के लिए संस्तुति देने से खुद को बचा ले गई है ।
शायद  श्री लिब्रहान अथवा उनके कमीशन की यह इतनी कमी नहीं है जितना हमारी पुलिस तथा न्याय प्रदान करने वाली व्यवस्था द्वारा उन्हीं नतीजों पर पहुंच कर फिर त्वरित एवं निष्पक्ष कार्रवाई करने की अक्षमता का दोष है ।
दसवें अध्याय में न्यायमूर्ति लिब्रहान सदोषता की बाबत एक निश्चयात्मक वक्तव्य देते हैं : ” किसी औचित्यपूर्ण सन्देह से परे यह स्थापित है कि यह ’संयुक्त-सामान्य-उद्यम’ विध्वंस की पूर्व नियोजित कार्रवाई थी जिसकी तात्कालिक रहनुमाई विनय कटियार , परमहंस रामचन्द्र दास , अशोक सिंघल , चम्पत राय , श्रीषचन्द दीक्षित , बी. पी. सिंघल तथा आचार्य गिरिराज कर रहे थे । यह सब मौके पर मौजूद नेता थे जिन्हें आर.एस.एस.एस द्वारा बनाई गई योजना को क्रियान्वित करना था । लालकृष्ण अडवाणी मुरली मनोहर जोशी तथा अन्य उनके स्थानापन्न दायित्व के कारण दोषमुक्त नहीं हैं वे भी आर.एस.एस. द्वारा निर्देशित भूमिका को स्वेच्छा से कबूले हुए सह-षड़यन्त्रकारी हैं । अयोध्या अभियान को उनका निश्चित समर्थन तथा दीर्घकाल तक चले  अभियान के निर्णायक चरण में उनकी सशरीर मौजूदगी से यह अकाट्य रूप से स्थापित हो चुका है ।
मेरा यह निष्कर्ष है कि आर.एस.एस. , भाजपा , विहिप , शिव सेना तथा उनके वे पदाधिकारी जिनका इस रिपोर्ट में नाम दिया गया है  ने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मन्त्री कल्याण सिंह के साथ आपराधिक गठजोड़ स्थापित कर विवादित जगह पर मन्दिर निर्माण के लिए एक ’संयुक्त-समान-उद्यम’(Joint Common Enterprise) स्थापित कर लिया था । उन्होंने धर्म और राजनीति के घालमेल करने का काम किया तथा लोकतंत्र को नष्ट करने की सोची समझी कार्रवाई में लिप्त रहे । “
मस्जिद गिराया जाना , “धार्मिक , राजनैतिक , तथा भीड़-तंत्र के सर्वमन्दिरों को एक साथ समेटने वाले संगठित व सुनियोजित षड़यन्त्र का चरम बिन्दु था ” । न्यायमूर्ति लिबर्हान यह सही ही नोट किया कि, ” कुछ नेताओं को सीधी कार्रवाई के क्षेत्र से जान बूझकर दूर रखा गया था ताकि उन्हें सुरक्षित रखा जा सके एवं आगे के राजनैतिक इस्तेमाल के लिए उनकी सेक्युलर विश्वसनीयता को बचाये रखा जा सके । “इस प्रकार श्री अडवाणी और श्री जोशी इस दूसरे दर्जे के भाग रहे हों परन्तु वे भी राजनैतिक तथा कानूनी दायित्व से नहीं बच सकते , बावजूद इसके कि वे संघ परिवार द्वारा प्रदत्त ’मुमकिन इन्कार’ की ढाल से लैस हों ।
आज ,सत्रह साल बीत जाने के बाद , इस संयुक्त उद्यम में लिप्त कई अपराधी मर चुके हैं । परन्तु कई इस बिना पर फले फूले हैं कि वे कानून के ऊपर हैं । इस मुल्क के द्वारा न्यायमूर्ति लिबर्हान की इन सिफ़ारिशों के माध्यम से ’इस चूहे को निकालने के लिए ’ चाहे जितनी भी झूठी निन्दा हो , इस रपट में वह खजाना है जिसकी मदद से कोई ख्यातिनाम जाँच एजेन्सी ठोस षड़यन्त्र का मामला बना सकती है । ऐसे कई किरदार जिनकी स्मृति इस आयोग के समक्ष धूमिल हो गयी थी , नार्को विश्लेषण समेत पुलिस की पारंगत पूछताछ , के समक्ष ज्यादा देर न टिक पायें । उत्तर प्रदेश सरकार यदि गंभीर हो तो पूरक आरोप पत्र दाखिल कर सकती है तथा बाबरी मस्जिद ध्वंस किए जाने के मामले को त्वरित-ट्रैक न्यायालय में ले जा सकती है ताकि आखिरकार न्याय हो सके ।

( मूल अंग्रेजी लेख )

कुमारेन्द्र सेंगर चाहते क्या हैं?महान स्त्रियों के बारे में बताना या स्त्रियों को नीचा दिखाना?

कभी कभी हम कोई अच्छा काम करना भी चाहते हैं तब भी यदि हमारी नीयत साफ न हो तो वह प्रयत्न व्यर्थ जाता है। यही सेंगर जी के प्रयास के साथ हुआ। वैसे यह भी मुमकिन है कि वे अच्छा नहीं करना चाहते थे  इसीलिए अच्छे उपाय अपना कर उसमें उलझ गये हैं ।
मैं महिला नहीं हूँ लेकिन नारीवादी होने के नाते इस पोस्ट पर अपनी राय देना चाहता हूँ ।
सेंगरजी ने इस पोस्ट को लिखने के लिए यह सूची जुटाई है । उनके स्रोत अंग्रेजी के रहे हैं क्योंकि Chaudhary या Chaudhury को देवनागरी में वे दो नामों के साथ चैधरी लिख रहे हैं । इन दो नामों के साथ उन्होंने ’चैधरी ’ ट्रान्सलिटरेशन द्वारा जोड़ लिया है ।
कुमारेन्द्र सेंगर के बुझौव्वल प्रस्तुत करने के इस दम्भपूर्ण और फूहड़ तरीके के कारण ही कुछ महिला साथी प्रतिक्रिया में इन महान स्वतंत्रता सेनानियों और बड़ी सामाजिक हस्तियों को ’राजकुमारियाँ’ कह कर खारिज करने की हद तक चली गयी हैं, जो अच्छी बात नहीं है।    स्वप्नदर्शीजी, राजे ,रानियाँ और राजकुमारियाँ ज्यादातर अंग्रेजों के साथ हुआ करते थे , जनता के आन्दोलनों के साथ नहीं । मुझे लगता है कि ये महिला नेता यदि आज जीवित होतीं तो स्त्री-मुक्ति आन्दोलन का समर्थन करतीं । अपने जीवन काल में इनके कर्म से स्त्री-पुरुष समता के लिए आन्दोलन को बल मिला।  इस प्रकार सेंगर न सिर्फ़ सामयिक नारीवादी लेखिकाओं -   कार्यकर्ताओं के प्रति विद्वेषपूर्ण दिखते हैं अपितु इन महान स्त्रीवादी सामाजिक परिवर्तन की पुरोधाओं के प्रति भी अपमानजनक प्रतीत होते हैं। चूंकि मौजूदा पीढ़ी में इनकी बाबत सूचना न होने के पीछे भी पुरुष सत्ता्त्मक समाज का योगदान कहा जा सकता है ।

हमारे राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान ही सामाजिक परिवर्तन के प्रयास भी जारी थे जिनमें लाजमी तौर पर स्त्री मुक्ति एक अहम मसला था। अहिन्सक संघर्ष की शक्ति रचनात्मक कार्यों से पैदा होती थी । इसलिए सत्याग्रह जब भी तीव्र होता इन रचनात्मक कार्यों के केन्द्रों पर भी अंग्रेज सरकार का दमन होता। मैं अपने चिट्ठे पर इन महिलाओं के संघर्ष की कहानियाँ दूँगा। इनमें ऐसी शक्सीयते भी हैं जिन्होंने अपनी बेटियों के कान नहीं छिदवाये । कौन से मूल्य दे रही थीं, अपनी संतानों को ये ? कितनों ने राष्ट्रीय आन्दोलन के संचालन के लिए गहने दे दिए ।

इनमें कोई अपने शहर की पहली महिला साईकिल चलाने वाली थीं । बरसों रा्ष्ट्रीय आन्दोलन में जेल काटते हुएअथवा भूमिगत आन्दोलन का नेतृत्व करते वक्त उन्हें अपने बच्चों के बारे में भी सोचना पड़ता होगा ? एक नाम ऐसा है जिनकी बेटी १९४२ में १४ बरस की उमर में अपनी माँ , बड़ी बहन , ताई के साथ जेल गयी और करीब पौने सत्रह बरस की उमर में निकली । पढ़ाई – लिखाई जेल में !

लाठियों से सिर फोड़कर समुद्र के पानी में सत्याग्रहियों को छोड़ दिया जाता उसका नेतृत्व करने वाली भी थीं। (सेंगर बतायेंगे कौन थीं ये महिलायें ,आपके द्वारा दिए हुए नामों में से ?जवाब विकी में नहीं मिलेगा ! )

स्वप्नदर्शीजी, राजे ,रानियाँ और राजकुमारियाँ ज्यादातर अंग्रेजों के साथ हुआ करते थे , जनता के आन्दोलनों के साथ नहीं । मुझे लगता है कि ये महिला नेता यदि आज जीवित होतीं तो स्त्री-मुक्ति आन्दोलन का समर्थन करतीं ।
मेरा प्रयास होगा कि ऐसी महिला नेताओं के बारे में कुछ लिखूँ ।  मौजूदा स्त्री विमर्श करने वाली साथियों को नीचा दिखाने की यह कोशिश नहीं होगी । स्त्री पुरुष समता की लड़ाई को मजबूत करने के लिए होगी।

इरोम शर्मिला का सत्याग्रह:सैन्य दमन के खिलाफ़ बहादुराना प्रतिरोध

यह मणिपुरी कवियत्री और कार्यकर्ता ईरोम शर्मिला चनू की भूख हड़ताल का दसवां साल है । शर्मिला अपने राज्य में पिछले ५१ सालों से लागू आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट , १९५८ ( सैन्य बल विशेष शक्तियाँ कानून , १९५८ ) या ” आफ़्स्पा ” के खिलाफ़ सत्याग्रह कर रही हैं। इस राक्षसी कानून के अन्तर्गत सैन्य बलों को –

  • बिना वॉरण्ट के गिरफ़्तारी और तलाशी की छूट
  • सिर्फ शक के बिना पर गोली चलाकर जान से मारने की छूट
  • आम कानूनी कार्रवाई से छूट (दण्ड मुक्ति) मिली हुई है ।

१९४२ में भारत छोड़ो आन्दोलन को दबाने के लिए जो अधिनियम बना था लगभग हूबहू वही ’आफ़्स्पा ’ के रूप में आजाद भारत की सरकार ने अपने देश के कुछ हिस्सों पर लगाया । इस कानून की आड़ में पिछले ५० साल से सेना ने अपना बर्बर राज मणिपुर व अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में चला रखा है । लूट , बलात्कार , मार-पीट , हत्या आदि का इस्तेमाल आम जनता के खिलाफ़ तथाकथित रूप से उग्रवाद को दबाने के लिए किया जाता है परन्तु सच यह है कि पिछले ५० सालों में इस क्षेत्र में  राज्य के दमन और मुख्य धारा से काटे रखने की प्रतिक्रियास्वरूप उग्रवाद बढ़ा ही है । मालोम गाँव के बस स्टॉप पर बस के इन्तेज़ार में खडे़ १० निहत्थे नागरिकों को उग्रवादी होने के सन्देह पर मार दिया गया  – इस घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप २ नवम्बर २००० को शर्मीला ने आफ़्स्पा हटाये जाने के लिए आमरण अनशन शुरु किया । ६ नवम्बर को उन्हें “आत्महत्या करने के प्रयास” के जुर्म में गिरफ़्तार किया गया । २० नवम्बर २०० को जबरन उनकी नाक में तरल पदार्थ डालने की कष्टदायक नली डाली गयी । पिछले ९ सालों से इसी हालत में उन्हें कैद रखा गया है ।

शासकीय दमन के खिलाफ़ शर्मिला अकेली आवाज नहीं हैं । २००४ में असम राईफल के जवानों ने मनोरमा नाम की महिला का बलात्कार कर उसकी नृशंस हत्या कर दी । इस घटना के विरोध स्वरूप अधेड़ मणिपुरी महिलाओं ने सी आर पी एफ़ के मुख्यालय के सामने निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया । इंसान से उसकी गरिमा और लोकतांत्रिक अधिकार छीन लेने वाले प्रशासन के प्रति यह इन महिलाओं के गुस्से का इजहार था और आधुनिक भारतीय राष्ट्र के लिए के शर्मनाक घटना । दूसरी तरफ शर्मिला के इस संघर्ष में कई और जांबाज साथिनें भी 10 दिसंबर 2008 से जुड़ गई हैं- मणिपुर के कई महिला संगठन पिछले साल से ही रिले भूख हड़ताल पर प्रतिदिन बैठ रहे हैं. सैन्य दमन की सभी घटनाओं में सरकार द्वारा दोषियों के खिलाफ़ सन्तोषजनक कार्रवाई नहीं की गई है ।

” आफ़्स्पा ” कानून जम्मू और कश्मीर में भी लगाया गया है और पिचले २५ सालों में सेना के बढ़ते अत्याचार और केन्द्र सरकार द्वारा राज्य की लोकतांत्रिक पेक्रियाओं से खिलवाड़ की प्रतिक्रिया स्वरूप यहाँ भी उग्रवाद और आतंकवाद बढ़ता ही जा रहा है । कश्मीर पिछले कई महीनों से शोपियां काण्ड को लेकर उबलता रहा है और इस आन्दोलन में  भी काफ़ी लोगों की जानें गई हैं । सेना के जवनों द्वारा दो लड़कियों के  बलात्कार और हत्या की इस घटना में राज्य सरकार ने आरोपियों को बचाने का ही काम किया है ।

अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे लोगों को राज्य सत्ता द्वारा हमेशा ही दबाया जाता रहा है । नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के तहत प्राकृतिक संसाधनों की लूट देश के सभी राज्यों की सरकारों ने चला रखी है । कृषि भूमि को छीन कर एस.ई.ज़ेड (विशेष आर्थिक क्षेत्र) में बदला जा रहा है और जंगलों से आदिवासियों को खदेड़ कर खनिजों को औने-पौने दामों में निजी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले किया जा रहा है । जल – जंगल – जमीन के हक के लिए लोग आन्दोलन कर रहे हैं और इन जनान्दोलनों को दबाने के लिए सरकारी दमन बढ़ता ही जा रहा है । काशीपुर , कलिंगनगर , सिंगूर , नन्दीग्राम आदि में राज्य सरकारों द्वारा आंदोलनकारियों की हत्या , प्रताड़ना , बलात्कार , लूट आदि की घटनायें सामने आई हैं । इसके अलावा भी देश भर में प्रदर्शनकारियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को झूठे आरोपों में बन्द करना और हिरासत में प्रताड़ित करना भी सरकारी रणनीति के तहत होता रहता है । इस प्रकार सरकार लोकतांत्रिक विरोध के सभी तरीके बन्द करती जा रही है ।

समाजवादी जनपरिषद यह माँग करती है कि जम्मू और कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों से तत्काल ’आफ़्स्पा’हटाया जाए और जैसा कि एक लोकतांत्रिक सरकार से अपेक्षा की जाती है , इन क्षेत्रों के लोगों की मूलभूत समस्याओं का राजनैतिक समाधान किया जाए । इसके अलावा जनान्दोलनों के कार्यकर्ताओं पर पुलिसिया दमन बन्द किया जाए ।

इरोम शर्मिला को रिहा करो !          आफ़्स्पा कानून रद्द करो !!         जनान्दोलनों का सरकारी दमन बन्द करो !!!

- ले. प्योली

.

 

शिवराज सरकार का दमनकारी चेहरा

नर्मदा बचाओ आन्दोलन का २८ अक्टूबर का ज्ञापन

प्रति,
श्री शिवराजसिंह चौहान,
मुख्यमंत्री,
मध्य प्रदेश शासन,
भोपाल म.प्र.
विषय : इंदिरा सागर परियोजना व औंकारेश्वर बाँध प्रभावितों के पुनर्वास बाबत्
द्वारा : जिला कलेक्टर, खण्डवा, म.प्र.
माननीय,
नर्मदा घाटी में बन रहे इंदिरा सागर और औंकारेश्वर बाँध के हजारों प्रभावित आज
खण्डवा जिला मुख्यालय पर एकत्र होकर नर्मदा घाटी में लाखों प्रभावितों की दुर्दशा की ओर
आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहते है। नर्मदा घाटी के विस्थापितों के लिये बनी पुनर्वास
नीति के अनुसार विस्थापितों का जमीन के बदले जमीन, वयस्क पुत्रों को जमीन एवं सभी को
पुनर्वास की अन्य सुविधाऐं देकर बसाना था। परंतु इस नीति का खुला उल्लंघन करते हुए,
विस्थापितों को धोखे एवं दमन के आधार पर ही उजाडा गया है।
इतना ही नहीं विस्थापितों के हक में दिये गये सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय
के फैसलों पर भी अमल नही किया जा रहा है। प्रदेश व देश के विकास के नाम पर त्याग
करने वाले लाखों विस्थापित आज दर दर की ठोकरे खाने पर मजबूर है जबकि दूसरी ओर
इंदिरा सागर और औंकारेश्वर बाँध बनाने वाली कम्पनी एन.एच.डी.सी. ने गत् ४ वर्षों में १२००
करोड़ रु. से अधिक का शुध्द लाभ कमाया है।
आज खण्डवा में एकत्र हम हजारों प्रभावित राज्य सरकार से मांग करते है कि : -
इंदिरा सागर परियोजना
१. माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा दायर याचिका में
पहले ८ सितम्बर २००६ ओर फिर २ सितम्बर २००९ को यह आदेश दिया है कि किसानों
के समस्त वयस्क पुत्र और अविवाहित पुत्रियों को ५.५ एकड़ कृषि जमीन दी जाए,
इसका पालन करते हुए वयस्क पुत्रों को तुरंत जमीन दी जाय।
२. विस्थापित मजदूर परिवारों को डूब से खुलने वाली हजारों एकड़ तलक की जमीन
बाँटी जाए तथा सिंचाई की सुविधा मुहैया कराई जाय ताकि पानी खुलने पर, हर साल
गेहूँ व गर्मी की फसल कमाकर विस्थापित मजदूर परिवार भी इज्जतदार रोजगार कर
सके।
३. इंदिरा सागर डूब क्षेत्र में विस्थापित मछुआरों के साथ गुंडागर्दी एवं मारपीट की जा रही
हैं। इसे तत्काल रोका जाय और इंदिरा सागर में मछली मारने का अधिकार ठेकेदार
को नहीं, विस्थापित को दिया जाय।
४. कृषि जमीनों को एन.एच.डी.सी. ने मृट्ठी भर मुआवजा देकर कब्जा कर लिया, जिससे
किसान दोबारा जमीन नहीं खरीद पाया। इसलिए जमीन के लिए दी जाने वाले विशेष
पुनर्वास अनुदान ¼बढ़त राशि½ को हरदा कमाण्ड के अच्छे रेट १.५ से २ लाख रूपए
एकड़ दिया जाय।
५. अभी भी डूब क्षेत्र में छूटे हुए हजारों घर, जो मुआवजे से छूटे है, उनका भू-अर्जन
करके मुआवजा दिया जाय।
६. जहाँ जमीन डूब चुकी है और अब जीने का कोई जरिया बचा ही नही है, उन गाँवों के
सभी घरों का भू-अर्जन करके विस्थापितों को मुआवजा तथा पुनर्वास दिया जाय।
७. इंदिरा सागर डूब क्षेत्र विशेषत: हरदा जिले में भयावह भ्रष्टाचार फैला है। प्रभावितों के
अनुदान दलालों द्वारा अधिकारियों की मिलीभगत से निकाले जा रहे है। इस पर रोक
लगाई जाय और स्वतंत्र जाँच कर दोषियो को दण्डित किया जाय।
८. सभी पुनर्वास स्थलों पर विस्थापितों के लिए पूर्ण रोजगार मुहैया किया जाय सभी
विस्थापितों के बी.पी.एल. राशन कार्ड बनाया जाय और पुनर्वास स्थल पर स्कूल,
अस्पताल, पेयजल आदि सभी सुविधाऐं प्रदान की जाय।
९. बहुत से गाँवों में अभी तक परिवार सूची ही नही बनी है और वे पुनर्वास के समस्त
लाभों से वंचित है, उन गाँव की परिवा सूचियाँ बनाकर, सभी विस्थापितों को पुनर्वास
के लाभ दिये जाय।
१०. हंडिया नेमावर तक के पीछे के इंदिरा सागर के डूब में आने वाले छूटे हुए गाँव का
सर्वे करके परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास दिया जाय।
११. २५ प्रतिशत् से कम बची जमीन के भू-अर्जन के साथ परिसम्पत्तियों का भी अर्जन
किया जाय।
१२. जहाँ घर डूब है और जमीने बची है वहाँ १ किलो मीटर के अंदर पुनर्वास स्थल का
निमार्ण किया जाय।
१३. इंदिरा सागर बाँध स्थल पर जल स्तर सूचित करने वाला स्केल मिटा दिया गया है,
जो कि अत्यंत गंभीर है। बाँध का जल स्तर बताने वाला सार्वजनिक स्केल पुन: लिखा
जाय।

औंकारेश्वर परियोजना

१. उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुसार विस्थापितों को सिंचित
एवं उपजाऊ जमीन देकर बसाया जाय।
२. विस्थापितों को जमीन आवंटन के लिये अतिक्रमित जमीनों को न दिया जाय, ताकि
अन्य गरीब परिवारों की रोटी न छिने और विस्थापित की सुरक्षति बसाहट हो सके।
३. उच्च न्यायालय के दिनांक २३ सितम्बर २००९ एवं अन्य सभी आदेशों का तत्काल पालन
किया जाय।
४. न्यायालयीन आदेश तथा पुनर्वास नीति के अनुसार कमाण्ड एरिया में विस्थापितों की
इच्छा अनुसार घर प्लॉट दिये जाय।
५. छूटे हुए मकानों का भू-अर्जन किया जाय।
६. किसानों को अपर्याप्त मुट्ठी भर मुआवजा दिया गया है। कृषि जमीन का विशेष
पुनर्वास अनुदान ¼बढ़त राशि½ कम से कम १.५ से २ लाख रूपए एकड़ दिया जाय।
७. तालाब में मछली ठेकेदार को नहीं दी जाय। मछली मारने का सम्पूर्ण अधिकार
विस्थापित को दिया जाय।
८. पुनर्वास के लाभों से मनमानी पू्र्वक वंचित सभी परिवारों को घर प्लॉट, अनुदान व
समस्त लाभ दिया जाय।
९. सन् २००४ में धाराजी प्रकरण में सैकड़ो लोगों को एन.एच.डी.सी. द्वारा पानी छोड़ने से
बह जाना तथा पिछले महिने गांव कामनखेड़ा में नन्ही हरिजन बालिका का
एन.एच.डी.सी. द्वारा पानी बढ़ाने से मौत के लिए जिम्मेदार एन.एच.डी.सी. को दण्डित
किया जाय।
आशा है आप उपरोक्त पर तत्काल एवं गंभीरता से कारवाई करेंगे।
दिनांक : २८ अक्टूबर २००९
भवदीय,
इंदिरा सागर एवं औंकारेश्वर बाँध
प्रभावित हजारों विस्थापित

~~~~~~~~~~~~~~~

उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायलय द्वारा पुनर्वास के लिए दिए गए निर्देशों और फैसलों को लागू किए जाने के लिए उपर्युक्त मांगें की गई हैं । इन मांगों के समर्थन में पूर्वघोषित कार्यक्रम के अनुसार हजारों विस्थापित जिला मुख्यालय पर लोकतांत्रिक तरीके से धरना दे रहे थे । जिला प्रशासन के समस्त अधिकारी लगता है इस पूर्व सूचना के कारण ही एक साथ ’बीमार’ पड़ गये थे । इन परिस्थितियों में धरनारत कुछ आन्दोलनकारी जिला कलेक्टर के दफ़्तर में दरियाफ़्त करने जा रही थीं । यही पुलिस द्वारा आन्दोलन की प्रमुख नेता चित्तरूप पालित , रामकुँवर रावत तथा कमला यादव को पुलिस द्वारा बर्बर तरीके से पीटा गया एवं फर्जी धाराएं लगा कर गिरफ़्तार कर दिया गया । इसके पश्चात खंडवा स्थित नर्मदा बचाओ आन्दोलन के दफ़्तर में बिना किसी वारंट छापा मार कर कम्प्यूटर आदि की छानबीन की गई तथा आन्दोलन के एक अन्य नेता आलोक अग्रवाल को भी पीट कर गिरफ़्तार कर लिया गया ।

रामकुँवर तथा चित्तरूपा

रामकुँवर तथा चित्तरूपा

समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुनील ने खण्डवा का दौरा करने के बाद कहा है कि म.प्र. की भाजपा सरकार ने शान्तिपूर्ण आन्दोलनकारियों पर बर्बर दमन चक्र चला कर अपने जन विरोधी स्वरूप को उजागर कर दिया है । सुनील ने विस्थापित आन्दोलनकारियों की समस्त मांगे तत्काल मानने तथा गिरफ़्तार लोगों को रिहा करने की मांग की है ।

 

नर्मदा बचाओ आन्दोलन दफ़्तर पर अवैध छापा

न.ब.आ. दफ़्तर पर अवैध छापा