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आअधुनिक केंद्रित व्यवस्थाओं में ऊंचे ओहदे वाले लोग अपने फैसले से किसी व्यक्ति को विशाल धन राशि का लाभ या हानि पहुंचा सकते हैं । लेकिन इन लोगों की अपनी आय अपेक्षतया कम होती है । इस कारण एक ऐसे समाज में जहां धन सभी उपलब्धियों का मापदंड मान लिया जाता हो व्यवस्था के शीर्ष स्थानों पर रहने वाले लोगों पर इस बात का भारी दबाव रहता है कि वे अपने पद का उपयोग नियमों का उल्लंघन कर नाजायज ढंग से धन अर्जित करने के लिए करें और धन कमाकर समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करें । यहीं से राजनीति में भ्रष्टाचार शुरु होता है । लेकिन विकसित औद्योगिक समाजों में व्यवस्था की क्षमता को कायम रखने के लिए नियम कानून पर चलने और बरारबरी की प्रतिस्पर्धा के द्वारा सही लोगों के चयन का दबाव ऐसा होता है जो ऐसे भ्रष्टाचार के विपरीत काम करता है ।ऐसे समाजों में लोग भ्रष्ताचार के खिलाफ सजग रहते हैं क्योंकि इसे कबूल करना व्यवस्था के लिए विघटनकारी हो सकता है । हमारे समाज में भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसे व्यवस्थागत मूल्यों का निर्माण नहीं हो पाया है । इसके विपरीत जहां हमारी परंपरा में संपत्ति और सामाजिक सम्मान को अलग – अलग रखा गया था वहीं आज के भारतीय समाज में संपत्ति ही सबसे बड़ा मूल्य बन गयी है और लोग इस विवेक से शून्य हो रहे हैं कि संपत्ति कैसे अर्जित की गई है इसका भी लिहाज रखें । इस कारण कोई भी व्यक्ति जो चोरी , बेईमानी , घूसखोरी तथा हर दूसरी तरह के कुत्सित कर्मोम से धन कमा लेता है वह सम्मान पाने लगता है। इस तरह कर्म से मर्यादा का लोप हो रहा है।
आधुनिकतावादियों पर , जो धर्म और पारंपरिक मूल्यों को नकारते हैं तथा आधुनिक उपकरणों से सज्जित ठाठबाट की जिंदगी को अधिक महत्व देते हैं , भ्रष्ट आचरण का दबाव और अधिक होता है । इस तरह हमारे यहां भ्रष्टाचार सिर्फ वैयक्तिक रूप से लोगों की ईमानदारी के ह्रास का परिणाम नहीं है बल्कि उस सामाजिक मूल्यहीनता का परिणाम है जहां पारंपरिक मूल्यों का लोप हो चुका है पर पारंपरिक वफादारियां अपनी जगह पर जमी हुई हैं । इसी का नतीजा है कि आधुनिकता की दुहाई देने वाले लोग बेटे पोते को आगे बढ़ाने में किसी भी मर्यादा का उल्लंघन करने से बाज नहीं आते । चूंकि हमारे समाज में विस्तृत परिवार के प्रति वफादारी के मूल्य को सार्वजनिक रूप से सर्वोपरि माना जाता रहा है कुनबापरस्ती या खानदानशाही के खिलाफ सामाजिक स्तर पर कोई खास विरोध नहीं बन पाता। आम लोग इसे स्वाभाविक मान्कर नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसी स्थिति में इनका विरोध प्रतिष्ठानों के नियम कानून के आधार पर ही संभव हो पाता है ।
ऊपर की बातों पर विचार करने से लगता है कि जब तक संपत्ति और सत्ता का ऐसा केंद्रीयकरण रहेगा जहां थोड़े से लोग अपने फैसले से किसी को अमीरऔर किसी को गरीब बना सकें और समाज में घोर गैर-बराबरी बनी रहेगी तब तक भ्रष्टाचार के दबाव से समाज मुक्त नहीं हो सकता । यही कारण है कि दिग्गज स्वतंत्रता सेनानी और आदर्शवादी लोग सत्ता में जाते ही नैतिक फिसलन के शिकार बन जाते हैं । एक ऐसे समाज में ही जहां जीवन का प्रधान लक्ष्य संपत्ति और इसके प्रतीकों का अंबार लगाकर कुछ लोगों को विशिष्टता प्रदान करने की जगह लोगों की बुनियादी और वास्तविक जरूरतों की पूर्ति करना है भ्रष्ट आचरण नीरस बन सकता है।
भ्रष्टाचार का उन्मूलन एक समता मूलक समाज बनाने के आंदोलन के क्रम में ही हो सकता है जहां समाज के ढांचे को बदलने के राष्ट्रव्यापी आंदोलन के संदर्भ में स्थानीय तौर से भ्रष्ताचार के संस्थागत बिंदुओं पर भी हमेशा हमला हो सके ।बिहार में चलने वाले 1974 के छात्र आंदोलन की कुछ घटनाएं इसका उदाहरण हैं , जिसमें एक अमूर्त लेकिन महान लक्ष्य ‘संपूर्ण क्रांति’ के संदर्भ में नौजवानों में एक ऐसी उर्जा पैदा हुई कि बिहार के किशोरावस्था के छात्रों ने प्रखंडों में और जिलाधीशों के बहुत सारे कार्यालयों में घूसखोरी आदि पर रोक लगा दी थी । लेकिन न तो संपूर्ण क्रांति का लक्ष्य स्पष्त था और न उसके पीछे कोई अनुशासित संगठन ही था । इसलिए जनता पार्टी को सत्ता की राजनीति के दौर में वह सारी उर्जा प्राप्त हो गई ।
अंततः हर बड़ी क्रांति कुछ बुनियादी मूल्यों के इर्दगिर्द होती है । इन्हीं मूल्यों से प्रेरित हो लोग समाज को बदलने की पहल करते हैं। हमारे देश में , जहां परंपरागत मूल्यों का ह्रास हो चुका है और आधुनिक औद्योगिक समाज की संभावना विवादास्पद है , भ्रष्टाचार पर रोक लगाना तभी संभव है जब देश को एक नयी दिशा में विकसित करने का कोई व्यापक आंदोलन चले। इसके बिना भ्रष्टाचार को रोकने के प्रयास विफलाओं और हताशा का चक्र बनाते रहेंगे।
- सच्चिदानंद सिन्हा.
भाग 1

भाग 2

इस चुनाव में देश की निगाह हम बनारसियों पर रहेगी। यह शहर न सिर्फ भगवान शिव के लिए जाना जाता है अपितु महात्मा बुद्ध ,कबीर एवं रैदास की कर्मस्थली रही है। ऐसी दशा में अगले चुनाव में हमारा मतदान पूरे देश के लिये एक सन्देश होगा। इस चुनाव में मुख्य धारा के राजनैतिक दलों पर बहुत से सवाल तैर रहें हैं जिस पर काशीवासियों को गौर करना जरूरी है |

*महंगाई के मुद्दे पर लड़े जा रहे चुनाव में अबतक की सबसे सबसे महंगी रैलियां आयोजित हों रहीं हैं। इस बात के पूरे संकेत हैं कि बनारस में सभी प्रमुख उम्मीदवारों द्वारा करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। दलों द्वारा चुनाव खर्च पर आज के कानून के तहत कोई भी सीमा नहीं हैं। किसी भी दल ने इस सीमा के निर्धारण की बात नहीं उठाई है। इसके फलस्वरूप विदेशी कंपनियों , काले बाजारियों और देशी-विदेशी पूंजीपतियों का पैसा अबाध रूप से चुनाव में खर्च होता है।
*पिछले २० वर्षों में हुए सभी बड़े घोटालों की जड़ में सरकारी नियंत्रण समाप्त किए जाने, निजीकरण,उदारीकरण की नीतियां हैं। पिछले आठ सालों में चार सरकारों ने उद्योगपतियों को ३१९ खरब रुपयों की छूट दी है। इसके अलावा राज्य सरकारों द्वारा सस्ती जमीन , बिजली , पानी,खनिज देना अलग। यह इस गरीब देश के खजाने की एक बड़ी लूट है । चुनाव लड़ रहे सभी दल या तो इसमें शामिल हैं या इस पर चुप हैं ।
* जबरदस्त बेरोजगारी के कारण लाखों नौजवान अपना घर छोड़कर जाने को मजबूर हो रहे हैं। निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों के कारण लाखों छोटे उद्योग,कुटीर उद्योग,करघे बन्द हुए हैं। इस रोजगारनाशी विकास को पलटने के लिए कौन तैयार है ? पूर्वी उत्तर प्रदेश ,बिहार ,झारखण्ड और ओड़ीशा जैसे राज्यों के नौजवानों की श्रम-शक्ति से गुजरात-मुंबई में चकाचौंध पैदा की जाती है।इन प्रवासी श्रमिकों पर सिर पर मनसे -शिव सेना-भाजपा के द्वेष की तलवार लटकती रहती है ।
महात्मा गांधी के नाम पर चल रही मनरेगा का स्वरूप दिल्ली से तय होता है जिसके फलस्वरूप गड्ढ़ा खोदने और फिर उसे पाटने जैसा अनुत्पादक श्रम कराया जाता है। पूरे वर्ष काम की गारंटी मिलनी चाहिए। इस योजना में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के वेतन के बराबर मजदूरी क्यों न हो ? खेती के साथ साथ बुनकरी,शिल्पकारी एवं दस्तकारी तथा अन्य छोटे उद्योगों के साथ इस योजना को जोड़ा जाना चाहिए। इस योजना को बनाने और क्रियान्वयन का अधिकार पंचायत स्तर पर होना चाहिए।
*पड़ोसी स्कूल पर आधारित साझा स्कूल प्रणाली से ही पूरा देश शिक्षित हो सकेगा। आज शिक्षा के निजीकरण द्वारा शिक्षा आम आदमी की पहुंच के बाहर हो गई है । शिक्षा में भेद- भाव समाप्त ए बगैर कथित ‘शिक्षा का अधिकार’ वैसा ही है मानो किसी भूखे को कागज के टुकड़े पर लिख कर दे दिया जाए – ‘रोटी’!

* देश की ४० फीसदी रोजगार कृषि पर आधारित है लेकिन मुख्य राजनैतिक दलों के एजेण्डे से खेती किसानी गायब है।
कृषि उपज के मूल्य निर्धारण की बाबत चुनाव लड़ रही सभी पार्टियों में समझ का अभाव है। पिछले १९ वर्षों में देश भर में तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं । देश के अन्नदाता की यह बदहाली क्यों?
कथित विकास परियोजनाओं के लिए भूमि-अधिग्रहण किसानों की सहमति और उनकी शर्तों को मंजूर किए बगैर नहीं होना चाहिए।

* देश की लगभग ५० फीसदी रोजगार खुदरा ब्यापार और लघु उद्योगों पर आधारित है
लेकिन मुख्य राजनैतिक दल इसको बचाने की कौन कहे इसपर चुप्पी साधकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के एजेंट बने हुए हैं।
मुख्य विपक्षी दल ने भले ही मल्टी ब्राण्ड खुदरा व्यापार का कभी विरोध किया अब उसकेका प्रधानमंत्री के उम्मीदवार विदेशी पत्रिकाओं के माध्यम से संदेश दे रहे हैं,’कि भारत के छोटे व्यापारियों को बड़े खिलाड़ियों से स्पर्धा के लिए तैयार रहना होगा।’
यानि वाल मार्ट जैसी कम्पनियों को आश्वस्त कर रहे हैं।

* धार्मिक उन्माद के भरोसे चुनाव गंगा को पार करने वाली शक्तियां इस देश को कब गृहयुद्ध में झोंक देंगी काशीवासियों को इस पर विचार करना होगा।
* बनारस की जनता ने ‘ काशी, मथुरा बाकी है’ की बात को अहिल्याबाई होल्कर द्वारा विश्वनाथ मन्दिर के जीर्णोद्धार के समय ही खारिज कर दिया था। ज्ञानवापी मस्जिद और विश्वनाथ मन्दिर में जाने के मार्ग भी उसी समय काशी की विद्वत परिषद तथा आलिमों द्वारा निर्धारित कर दिए गए थे जिसके जरिए आज तक बिना विवाद लोग अपनी आस्था का पालन कर पा रहे हैं। विधायिकाओं में महिला आरक्षण के मुद्दे पर सभी दल मानो एक मत होकर चुप्पी साधे हुए हैं। भारतीय समाज में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे जातिगत भेदभाव और एकाधिकार को तोड़ने का एक औजार आरक्षण है। सिर्फ एक बार ही आरक्षण देने की मांग संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है।

* धर्म की राजनीति करने वाले राजनैतिक दलों द्वारा धर्म के अंदर की बुराइयों जैसे जातीय
एवं स्त्री के प्रति भेदभाव एवं गैरबराबरी , दहेज, अंधविश्वास तथा भ्रष्ट तरीके से धनपशु बनें लोगों के सामाजिक बहिष्कार का कार्यक्रम न करके मात्र चुनाव के समय धर्म को कैश करने की प्रवृत्ति पर काशीवासियों को सवाल खड़ा करना होगा। स्त्रियों पर होने वाले अत्याचार की बाबत न्यायमूर्ति जस्टिस वर्मा की अधिकांश सिफारिशें ठण्डे बस्ते में डाल दी गई हैं। हम इन्हें पूरी तरह लागू करने की मांग करते हैं।
* बनारसी हैंडलूम पावरलूम से पिटने के कारण बुनकरो की बहुत बड़ी जनसंख्या कृषि मजदूरी या अन्य मजदूरी करने को बाध्य हो गयी है तथा बदहाल है ।
*हैण्डलूम और पावरलूम के बीच स्पर्धा न हो इसके लिए अंगूठा-काट कपड़ा नीति को बदलना होगा। कपड़ा नीति बनाने में बुनकरों के सही नुमाइन्दे शामिल करने होंगे,निर्यातकों को नहीं रखना होगा। चीनी ,जापानी कम्प्यूटर-आधारित मशीनों के कारण बुनकरों की बदहाली ,भुखमरी की स्थिति बनी है। ऐसी मशीनों पर तत्काल रोक लगाई जाए।

* गंगा को स्वक्छ और निर्मल बनाने के लिए राजनैतिक दलों द्वारा कौन सी कार्ययोजना बनाई गयी है ? दुनिया की सबसे ज्यादा प्रदूषित नदी दमन गंगा गुजरात में है यह हम न भूलें।

* बनारस में चुनाव मैदान में उतरे सभी दलों में व्यक्ति केन्द्रित संस्कृति हावी है। सारे फैसले शीर्ष पर लिए जाते हैं और नीचे थोपे जाते हैं।
* हमारे राजनैतिक दल किसके चंदे से चहकते हैं इसकी जानकारी के लिए राजनैतिक दलों को आर ० टी ० आई ० के दायरे में लाए जाने के पक्ष में बनारस से चुनाव लड़ रहे राजनैतिक दल हैं या नहीं ? ठीक इसी प्रकार स्वयंसेवी संस्थाओं पर भी जनसूचना अधिकार लागू किया जाना चाहिए।
* जनलोकपाल कानून के दाएरे में कॉर्पोरेट – भ्रष्टाचार को लाने के अलावा औपनिवेशिक नौकरशाही के ढांचे को बदलने के बात बनारस से चुनाव में लड़ने वाले किसी दल ने नहीं किया है।
*केन्द्र सरकार द्वारा १२४(अ), UAPA,CSPA तथा AFSPA जैसे कानूनों की मदद से शान्तिपूर्ण जन आन्दोलनों के दबाने के प्रयोग किए जा रहे हैं। सबसे लम्बे समय से अहिंसक प्रतिकार कर रही लौह महिला इरोम शर्मिला की मांग का समर्थन करते हुए हम ऐसे कानूनों की पुनर्विवेचना की उम्मीद करते हैं ।
साझा संस्कृति मंच वाराणसी के नागरिकों से आवाहन करता है कि अपने अमूल्य मत का प्रयोग करने के पहले इन मुद्दों पर विचार करें तथा वोट देने के बाद भी राजनीति पर निगरानी रखें और कारगर हस्तक्षेप जारी रखें।
निवेदक,
साझा संस्कृति मंच
लोकविद्या जन आंदोलन , दिलीप कुमार ‘दिली’ 9452824380
प्रेरणा कला मंच , मुकेश झंझरवाला , 9580649797
विश्व ज्योति जन संचार केन्द्र , फादर आनन्द 9236613228
आशा ट्रस्ट , वल्लभाचार्य पाण्डे , 9415256848
फेरी-पटरी ठेला व्यवसायी समिति, प्रमोद निगम , 945114144
सूचना का अधिकार अभियान -उ.प्र , धनन्जय त्रिपाठी , 7376848410
विजन , जागृति राही , 9450015899
गांधी विद्या संस्थान , डॉ मुनीजा खान 9415301073
बनारस जरदोज फनकार यूनियन , सैय्यद मकसूद अली , 8601538560
नारी एकता , डॉ स्वाति , 9450823732
समाजवादी जनपरिषद, चंचल मुखर्जी , 8765811730
सर्वोदय विकास समिति , सतीश कुमार सिंह , 9415870286
बनारस पटरी व्यवसाई संगठन , काशीनाथ , 9415992284
लोक समिति , राजा तालाब , नन्दलाल मास्टर , 9415300520
लोक चेतना समिति , डॉ नीति भाई , 2616289
अस्मिता , फादर दिलराज , 9451173472
काशी कौमी एकता मंच , सुरेन्द्र चरण एड. 9335472111
बावनी बुनकर पंचायत , अब्दुल्लाह अन्सारी 9453641094
सर्व सेवा संघ , अमरनाथ भाई 9389995502
मानवाधिकार जन निगरानी समिति , डॉ लेनिन रघुवंशी 9935599333

साझा संस्कृति मंच
वाराणसी
प्रेस विज्ञप्ति
वाराणसी , ९ मई , २०१४ |
दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में गिनी जाने वाली ‘दमन-गंगा’ गुजरात में बहती है । केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड ने इस नदी के प्रदूषण की बाबत रपट दी है तथा लोक सभा के प्रश्नोत्तर में भी यह तथ्य शामिल है। ‘साबरमती रिवर फ्रन्ट’ का निर्माण नदी के किनारे बसे अहमदाबाद के हजारों परिवारों को हटा कर हुआ है। फिलहाल इसके जल-स्तर को बरकरार रखने के लिए नर्मदा का पानी इसमें प्रवाहित किया जा रहा है। गंगा के सिकुड़ते जल-स्तर के लिए मुख्यतः टिहरी बांध तथा गढ़मुक्तेश्वर से
पानी
बहुराष्ट्रीय कम्पनी सुएज की मदद से दिल्ली ले जाना जिम्मेदार है। वाराणसी के मतदाताओं का यह हक है कि वे इस अहम सांस्कृतिक प्रश्न पर लोक सभा चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों का पक्ष जानें ।
१९९१ के आम चुनाव में वाराणसी में मतदान कर्फ्यू में हुआ था तथा मतदान केन्द्र पर दो युवाओं की हत्या हुई थी। साझा संस्कृति मंच ने चुनाव आयोग से यह मांग की है कि प्रशासन इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए मुस्तैद रहे। मंच ने काशी की जनता से अपील की है कि ऐसी हरकतों के प्रति सजग रह कर उन्हें विफल करे ।
साझा संस्कृति मंच द्वारा काशी की जनता से अपील आज एक परचे के रूप में जारी की गई है जिसे प्रेस वार्ता में मीडिया को भी जारी किया जा रहा है। मंहगाई के दौर में खर्चीले चुनाव, उद्योगपतियों द्वारा चुनाव में बढ़ रहा हस्तक्षेप, घोटालों से आर्थिक नीतियों का संबंध,खेती-किसानी-बुनकरों-कारीगरों का संकट, विधायिकाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण तथा सामाजिक न्याय,समान स्कूल व्यवस्था,साम्प्रदायिकता , दमनकारी कानूनों की वापसी आदि राष्ट्रीय व स्थानीय मुद्दों की चर्चा है। मंच की अपील है कि काशी के मतदाता इन मुद्दों पर विचार करे तथा मतदान के बाद भी राजनीति पर निगरानी रखे तथा कारगर हस्तक्षेप जारी रखे ।

अफलातून दिलीप सिंह ‘दिली’ मुकेश झंझरवाला फादर आनन्द
राष्ट्रीय सचिव, लोक विद्या जन आन्दोलन प्रेरणा कला मंच विश्व ज्योति जन संचार केन्द्र
समाजवादी जनपरिषद .

नीचे दी गई कड़ी पर खटका मारिए -
लड़ेंगे तुमसे कदम कदम पर

सहयोग की अपील

पिछले कुछ वर्षों से आप मेरी नेट गतिविधियों के जरिए समाजवादी जनपरिषद ,उसके विचार और आन्दोलन से कुछ हद तक परिचित हैं । नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए हम उन स्थानों पर चुनाव लड़ते हैं जहां हमने शांतिमय संघर्ष किए हैं और रचनात्मक कार्यक्रम हाथ में लिए है। सीमित स्थानों पर चुनावी हस्तक्षेप एक shortcoming मानी जा सकती है। हमारे कुछ प्रमुख साथी थोक में लड़ने की मान्यता के साथ आआपा से स्थापना से ही जुड़ गए। अपनी इस मान्यता को पूरा करने के लिए उन्होंने वै्चारिक आग्रहों को ठण्डे बस्ते में डालने की रणनीति अपनाई है। स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रति हमारा जो सुचिन्तित रवैया था उससे विपरीत वे सोचते हैं। उनका आग्रह था कि अन्य समूह उनमें विलय कर जांए। हमारी मान्यता है ः

  1. नदी-नाले समुद्र में मिलकर उसके पानी को मीठा कर लेने की उम्मीद न रखें।
  2. जब खेती वर्षा पर आधारित थी तब सूखा पड़ने पर कुछ अनाज अगले साल बारिश की उम्मीद में बीज के रूप में बचा कर रख लिए जाते थे। समतावादी मूल्यों का आग्रह रखने वाले विलुप्त न हों यह हमारा संकल्प है।
     इन आम चुनावों में हम बेतूल और अलीपुरद्वार लोक सभा सुरक्षित सीट(दोनों अनुसूचित जन जाति) तथा ओड़ीशा विधान सभा की भवानी पटना सुरक्षित सीट (अनुसूचित जाति) पर चुनाव लड़ रहे हैं।
आप  से चुनाव के लिए आर्थिक सहयोग की अपील कर रहा हूं।
विनीत,

आपका,
अफलातून.

aflatoonATgmailDOTcom

बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम

बेतूल से सजप उम्मीदवार फागराम


क्योंकि

भ्रष्ट नेता और अफसरों कि आँख कि किरकिरी बना- कई बार जेल गया; कई झूठे केसो का सामना किया!
· आदिवासी होकर नई राजनीति की बात करता है; भाजप, कांग्रेस, यहाँ तक आम-आदमी और जैसी स्थापित पार्टी से नहीं जुड़ा है!
· आदिवासी, दलित, मुस्लिमों और गरीबों को स्थापित पार्टी के बड़े नेताओं का पिठ्ठू बने बिना राजनीति में आने का हक़ नहीं है!
· असली आम-आदमी है: मजदूर; सातवी पास; कच्चे मकान में रहता है; दो एकड़ जमीन पर पेट पलने वाला!
· १९९५ में समय समाजवादी जन परिषद के साथ आम-आदमी कि बदलाव की राजनीति का सपना देखा; जिसे, कल-तक जनसंगठनो के अधिकांश कार्यकर्ता अछूत मानते थे!
· बिना किसी बड़े नेता के पिठ्ठू बने: १९९४ में २२ साल में अपने गाँव का पंच बना; उसके बाद जनपद सदस्य (ब्लाक) फिर अगले पांच साल में जनपद उपाध्यक्ष, और वर्तमान में होशंगाबाद जिला पंचायत सदस्य और जिला योजना समीति सदस्य बना !
· चार-बार सामान्य सीट से विधानसभा-सभा चुनाव लड़ १० हजार तक मत पा चुका है!

जिन्हें लगता है- फागराम का साथ देना है: वो प्रचार में आ सकते है; उसके और पार्टी के बारे में लिख सकते है; चंदा भेज सकते है, सजप रजिस्टर्ड पार्टी है, इसलिए चंदे में आयकर पर झूठ मिलेगी. बैतूल, म. प्र. में २४ अप्रैल को चुनाव है. सम्पर्क: फागराम- 7869717160 राजेन्द्र गढ़वाल- 9424471101, सुनील 9425040452, अनुराग 9425041624 Visit us at https://samatavadi.wordpress.com

समाजवादी जन परिषद, श्रमिक आदिवासी जनसंगठन, किसान आदिवासी जनसंगठन

नारी जागृति मंच, जिला होशंगाबाद, मध्य प्रदेश

विज्ञप्ति

होशंगाबाद, 5 मार्च, 2014

शराब दुकान के खिलाफ महिलाओं का गाँधीवादी सत्याग्रह

           आज, 5 मार्च 2014 को, सुबह 11 बजे से महिलाओं ने मालाखेड़ी शराब दुकान के सामने उसे बंद करने की मांग को लेकर दिन-रात का अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया है. वे वहां बैठ कर भजन कर रही हैं, जो शराब खरीदने आ रहा है, उसे फूल देकर, हाथ जोड़ कर, शराब खरीदने और पीने से मना कर रही हैं. उनके बैनर पर महात्मा गाँधी का चित्र लगा है. आज़ादी के आन्दोलन में शराब दुकानों पर महिलाओं की पिकेटिंग होती थी, उससे प्रेरणा लेकर शुरू किया गया यह गाँधीवादी सत्याग्रह दिन-रात तब तक चलता रहेगा जब तक दुकान स्थाई रूप से बंद करने का फैसला नहीं हो जाता. आज धरना स्थल पर भारी मात्रा में पुलिस पहुँच गई, शुरू में उन्होंने गालियां देकर और चिल्ला कर भीड़ को तितर-बितर करना चाहा, लेकिन महिलाओं ने कड़ा विरोध किया। बाद में आबकारी और राजस्व विभाग के अधिकारीयों से चर्चा हुई. उन्होंने बताया कि यदि पचास प्रतिशत महिलाएं लिख कर देंगी तो शराब दुकान बंद करने का प्रावधान है। नारी जाग्रति मंच ने मांग की कि वे इसे लिख कर दे और यह भी कि महिलाओं के हस्ताक्षरों की जाँच मंच के प्रतिनिधियों के सामने की जायेगी और दस दिन के अंदर यह काम पूरा करके दुकान बंद करने की सिफारिश कर दी जायेगी तो अधिकारी पहले तो सहमत हो गए और कहा कि वे लिख कर भिजवा रहे हैं, लेकिन फिर वे लौट कर नहीं आये।

        होशंगाबाद के बगल में मालाखेड़ी गांव (जो अब होशंगाबाद नगरपालिका का हिस्सा है) की महिलाएं पिछले छह महीने से ज्यादा समय से वहां की शराब दुकान को बंद करने की मांग कर रही है और इसके लिए आन्दोलन कर रही हैं. शराब के कारण उनके परिवार बरबाद हो रहे हैं, घरों की शांति खतम हो गई है, महिलाओं पर अत्याचार बढते जा रहे हैं. गांव में शराब दुकान होने से बच्चे भी शराब पीने लगे हैं.

     वे कई बार इस दुकान को बंद करने की मांग को लेकर होशंगाबाद कलेक्टर और मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेज चुकी हैं. जब उनका सब्र टूट गया और वे ज्यादा परेशान हो गई, तो अक्तूबर 2013 में उन्होंने शराब दुकान में तोड़-फोड भी की और 6 दिन तक दुकान खुलने नहीं दी. 7 फरवरी 2014 को उन्होंने और जिले की अन्य महिलाओं ने शराब के खिलाफ पूरे शहर में जुलूस निकाला. जिला प्रशासन ने इस जुलूस की अनुमति नहीं दी और भारी पुलिस लगा कर जुलूस रोकने की कोशिश की, गिरफ्तार करने की धमकी भी दी, लेकिन महिलाओं ने पुलिस को धका कर, एक तरफ कर, जुलूस आगे बढाया. उस दिन भी उन्होंने जिला कलेक्टर को चेतावनी दी कि शराब दुकान बंद नहीं की गई तो वे खुद इसे बंद कर देगी.

     नारी जागृति मंच भी पिछले एक साल से शराब बिक्री के खिलाफ और पूरे मध्य प्रदेश में शराब बिक्री बंद करने की मांग को लेकर हस्ताक्षर अभियान चला रहा है. 2 अक्तूबर 2013 को गाँधी जयंती पर इटारसी में जयस्तंभ चौक पर महिलाओं ने शराब और नशे के खिलाफ दिन भर का धरना और उपवास भी रखा.

     होशंगाबाद के नजदीक डोंगरवाडा गांव की महिलाएं भी दो-तीन बार वहां बिकने आ रही अवैध शराब को जब्त कर चुकी हैं और शराब की अवैध बिक्री बंद करने की मांग प्रशासन से कर चुकी हैं.

      होशंगाबाद जिले से तीन महिलाओं और एक नवयुवक ने छत्तीसगढ़ में बिलासपुर के पास गनियारी स्थित ‘जन स्वास्थ्य सहयोग’ द्वारा आयोजित नशामुक्ति पर दो दिवसीय प्रशिक्षण (28 फरवरी-1 मार्च) में भी भाग लिया है.

       नारी जागृति मंच ने अपील की है कि मालाखेड़ी की महिलाओं ने अपना जीवन, अपना परिवार, समाज और देश को बचाने के लिए जो संघर्ष शुरू किया है, उसे समाज और नागरिक पूरा समर्थन और सहयोग दें. मंच ने अपील की है कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में मालाखेड़ी पहुँच कर इस सत्याग्रह में शरीक हों, इसके समर्थन में बयान दें, जगह-जगह धरना दे, ज्ञापन दें, मुख्यमंत्री को फेक्स और ईमेल करें.

 

ममता सोनी (07869530451), बिस्तोरी (08435445476), सुनील (09425040452), शम्भुनाथ गुप्ता (09425642273)    

6 फरवरी,11 बजे चलो दि‍ल्‍ली सचि‍वालय!

 

साथियो!

पिछले लगभग एक माह से पूरी दिल्‍ली की मज़दूर बस्तियों और औद्योगिक क्षेत्रों में दिल्‍ली मज़दूर यूनियन, उत्‍तर-पश्चिमी दिल्‍ली मज़दूर यूनियन और स्‍त्री मज़दूर संगठन की ओर से माँगपत्रक आन्‍दोलन चलाया जा रहा है। मज़दूरों की माँगें एकदम स्‍पष्‍ट हैं। उनका महज इतना कहना है कि दिल्‍ली के मज़दूरों से किये गये अपने वायदों को पूरा करें।

 

आखिर इतनी बौखलाहट क्‍यों?

 

फिर आखिर इस आन्‍दोलन से आम आदमी पार्टी को इतनी बौखलाहट क्‍यों है कि आन्‍दोलन की अभियान टोलियों के साथ जगह-जगह उनके कार्यकर्ता उलझ रहे हैं, गाली-गलौज कर रहे हैं और पर्चे जला रहे हैं। पिछले एक हफ्ते से उत्‍तर-पश्चिमी दिल्‍ली क्षेत्र में लगभग हर रोज़ ‘आप’ के कार्यकर्ताओं ने अभियान टोली के साथ बदसलूकी की, प्रचार सभाओं में बाधा पैदा करके मज़दूरों को तितर-बितर करने की कोशिश की। एक दिन एक प्रचार टोली से पर्चे छीन कर जलाये। यहाँ तक कि शाहाबाद डेयरी स्थित जिस शहीद भगतसिंह पुस्‍तकालय में स्‍त्री और पुरुष मज़दूरों की मीटिंगें और विविध सांस्‍कृतिक कार्यक्रम हुआ करते हैं, रात में उसका बोर्ड कुछ लोग उतार ले गये। फिर वहाँ पत्‍थरबाजी भी की गयी। कल शाम को गाड़ी में सवार पीकर धुत्‍त ‘आप’ पार्टी के कुछ लोगों ने बादली में प्रचार टोली की स्‍त्री सदस्‍यों के साथ गाली-गलौज की और धमकियाँ दीं, फिर मज़दूरों के इकट्ठा होने पर वे वहाँ से चले गये!पहली बात, यही वह लोकतांत्रिक संस्‍कृति है, जिसकी केजरीवाल, सिसोदिया और योगेन्‍द्र यादव दुहाई देते नहीं थकते? मज़दूरों के नितान्‍त शान्तिपूर्ण आन्‍दोलन से इतनी बौखलाहट क्‍यों? आखिर मज़दूर माँग ही क्‍या रहे हैं? उनका मात्र इतना कहना है कि केजरीवाल ने मज़दूरों से जो वायदे किये थे, उन्‍हें पूरा करने के बारे में कुछ तो बोलें! वे तो सत्‍तासीन होने के बाद साँस-डकार ही नहीं ले रहे हैं।

 

मज़दूरों से किये गये एक भी वायदे की चर्चा भी नहीं की!

 

केजरीवाल ने पूरी दिल्‍ली से ठेका प्रथा को खत्‍म करने का वायदा किया था। अब उन्‍होंने इसकी तकनीकि जाँच के लिए एक समिति बना दी है, जिसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। उन्‍हें करना सिर्फ इतना था कि सिर्फ एक दिन का विधान सभा सत्र बुलाकर इस आशय का विधेयक पारित करवा लेना था कि दिल्‍ली में कोई भी निजी या सरकारी नियोक्‍ता नियमित प्रकृति के काम के लिए ठेका मज़दूर नहीं रह सकता। इसके बजाये एक समिति बनाकर केजरीवाल ने मामले को टाल दिया है। समिति रिपोर्ट देगी और उसपर सरकार विचार करेगी, तबतक लोकसभा चुनावों की आचार संहिता लागू हो जायेगी।केजरीवाल ने कहा था कि निजी झुग्‍गीवासियों को पक्‍के मकान दिये जायेंगे और तबतक कोई झुग्‍गी उजाड़ी नहीं जायेगी। अब इस काम के लिए समय-सीमा बताना तो दूर, केजरीवाल कुछ बोल ही नहीं रहे हैं। यही नहीं, कांग्रेस सरकार के समय जिन झुग्‍गी बस्तियों का नियमतिकरण हुआ था, अब उनमें भ्रष्‍टाचार बताकर उस फैसले को पलटने की बात की जा रही है। यानी लाखों मज़दूरों को पुनर्वास की व्‍यवस्‍था के बिना उजाड़ने की भूमिका तैयार की जा रही है।केजरीवाल ने दिल्‍ली के सभी पटरी दुकानदारों और रेहड़ीवालों को लाइसेंस और स्‍थाई स्‍थान देने का वायदा किया था, उसके बारे में भी वे अब साँस-डकार नहीं ले रहे हैं।चुनाव प्रचार के दौरान मज़दूर बस्तियों में उनके उम्‍मीदवार सौ अतिरिक्‍त सरकारी स्‍कूल खोलने और वर्तमान स्‍कूलों के स्‍तर को ठीक करने का वायदा कर रहे थे। इस वायदें को भी ठण्‍डे बस्‍ते में डाल दिया गया।

 

केजरीवाल का भ्रष्‍टाचार-विरोध मज़दूरों के लिए नहीं है!

 

केजरीवाल की राजनीति की पूरी बुनियाद भ्रष्‍टाचार-विरोध पर टिकी है। फिलहाल हम इस बुनियादी प्रश्‍न पर नहीं जाते कि पूँजीवाद को पूरी तरह भ्रष्‍टाचार-मुक्‍त किया ही नहीं जा सकता, कि पूँजीवाद स्‍वयं में ही भ्रष्‍टाचार है और यह कि जनता को भ्रष्‍टाचार-मुक्‍त पूँजीवाद नहीं, बल्कि पूँजीवाद-मुक्‍त राज और समाज चाहिए। भष्‍टाचार कितनी अधिक धनराशि का है, इससे अधिक अहम बात यह है कि किस भ्रष्‍टाचार से व्‍यापक आम आबादी का जीना मुहाल है! दिल्‍ली की साठ लाख मज़दूर आबादी का जीना मुहाल करने वाला भ्रष्‍टाचार है — श्रम विभाग का भ्रष्‍टाचार। किसी भी फैक्‍ट्री या व्‍यावसायिक प्रतिष्‍ठान में मज़दूरों को न्‍यूनतम मज़दूरी नहीं मिलती, काम के तय घण्‍टों से अधिक काम करना पड़ता है, ओवरटाइम तय से आधी दर पर मिलता है, कैजुअल मज़दूरों का मस्‍टर रोल नहीं मिंटेन होना, सैलरी स्लिप नहीं मिलती, पी.एफ. इ.एस.आई. की सुविधा नहीं मिलती, फैक्‍ट्री इंस्‍पेक्‍टर, लेबर इंस्‍पेक्‍टर आदि दौरा नहीं करते, कारखाने स्‍वास्‍थ्‍य, सुरक्षा और पर्यावरण के निर्धारित मानकों का पालन नहीं करते! तात्‍पर्य यह कि किसी भी श्रम कानूनों का पालन नहीं होता। यदि केजरीवाल वास्‍तव में भ्रष्‍टाचार से आम लोगों को होने वाली परेशानी से परेशान हैं, तो सबसे पहले उन्‍हें श्रम विभाग के भ्रष्‍टाचार को दूर करना चाहिए। मज़दूरों की यही माँग है।लेकिन मज़दूरों के प्रति केजरीवाल की सरकार का रवैया क्‍या है? डी.टी.सी. के 20हजार ठेका कर्मचारियों और 10हजार अस्‍थाई शिक्षकों के धरने और अनशन को हवाई आश्‍वासन की आड़ में नौकरी छीन लेने और दमन की धमकी से समाप्‍त कर दिया गया। वजीरपुर कारखाना यूनियन के मज़दूर जब अपनी माँगों को लेकर सचिवालय पहुँचे तो बैरिकेडिंग करके पुलिस खड़ी करके उन्‍हें मंत्री से मिलने से रोक दिया गया और दफ्तर में केवल उनका माँगपत्रक रिसीव कर लिया गया। केजरीवाल का जनता दरबार तो हवा हो ही गया, अब उनके मंत्री जनता से मिलते तक नहीं।

 

‘आप’ के आम आदमी

ये ‘आप’ के आम आदमी हैं कौन? यूँ तो ऊपर भी विचित्र खिचड़ी है! केजरीवाल का एन.जी.ओ. गिरोह, किशन पटनायक धारा के समाजवादी योगेन्‍द्र यादव, राज नारायण धारा के समाजवादी आनंद कुमार, मंचीय नुक्‍कड़ कवि, घोर दखिणपंथी विचारों वाला कुमार विश्‍वास, ए.बी.वी.पी. से एन.एस.यू.आई. से भा.क.पा.(मा-ले) होते हुए यहाँ तक आये गोपाल राय तथा कमल मित्र शेनॉय, परिमल माया सुधाकर, बली सिंह चीमा, आतिशी मारलेना आदि-आदि भाँति-भाँति के, रंग-बिरंगे ”वामपंथियों” के साथ कैप्‍टन गोपी नाथ, नारायण मूर्ति और वी. बालाकृष्‍णन जैसे कारपोरेट शहंशाह…। ऐसी लोकरंजक राजनीतिक खिंचड़ी का असली रंग और स्‍वाद तो ग्रासरूट स्‍तर पर पता चलता है। केजरीवाल को मध्‍यवर्गीय इलाकों में आर.डब्‍ल्‍यू.ए. खुशहाल मध्‍य वर्गीय जमातों, कारोबारियों और आई.टी. – व्‍यापार प्रबंधन आदि पेशों में लगे उन युवाओं का समर्थन प्राप्‍त है, जो पारम्‍परिक तौर पर दक्षिणपंथी विचारों के और प्राय: भाजपा के वोट बैंक होते रहे हैं। लेकिन सबसे दिलचस्‍प दिल्‍ली की मज़दूर बस्तियों में देखने को मिलता है। वहाँ सारे छोटे कारखानेदारों, दुकानदारों, लेबर-कांट्रेक्‍टर के अतिरिक्‍त मज़दूरों को सूद पर पर पैसे देने वाले, कमेटी डालने वाले, मज़दूरों के रिहाइश वाले लॉजों-खोलियों और घरों के मालिक तथा प्रापर्टी डीलर और उनके चम्‍पुओं के गिरोह — यही आम आदमी की टोपी पहनकर मज़दूर बस्‍तियों में घूम रहे हैं। पिछले एक माह के अभियान के दौरान हमलोगों ने इस नंगी-कुरूप सच्‍चाई को बहुत गहराई से महसूस किया और झेला। सिर्फ एक उदाहरण ही काफी होगा। ‘बवाना चैम्‍बर ऑफ इण्‍डस्‍ट्रीज’ के चेयरमैन प्रकाशचंद जैन उत्‍तर-पश्चिमी दिल्‍ली में आम आदमी पार्टी के एक अग्रणी नेता हैं। इनके साथ और भी कई फैक्‍ट्री मालिक, प्रॉपर्टी डीलर और ठेकदार हैं। कोई प्रकाश चन्‍द जैन से ही पूछे क्‍या उनके कारखानों में मज़दूरों को न्‍यूनतम वेतन, पी.एफ., ई.एस.आई. आदि दिया जाता है, क्‍या वहाँ श्रम कानूनों का पालन होता है? कमोबेश यही स्थिति दिल्‍ली के सभी औद्योगिक इलाकों और मज़दूर बस्तियों की है। इसके बावजूद, एन.जी.ओ.-सुधारवादियों और भाँति-भाँति के सामाजिक जनवादियों को तो छोड़ ही दें, आम आदमी पार्टी की झोली में यूँ ही जा टपकने वाले भावुकतावादी कम्‍युनिस्‍टों को अभी भी केजरीवाल की राजनीति का असली रंग नहीं दिख रहा है, तो निश्‍चय ही राजनीतिक काला मोतिया के चपेट में वे अंधे हो चुके हैं। या हो सकता है, वे पहले से ही अंधे रहे हों।आम जनता स्‍वराज और सड़क से सत्‍ता चलाने की रट लगाने वाले लोकरंजकातावादी मदारी अब सरकारी धोखाधड़ी और धमकी, पुलिसिया धौंसपट्टी और पार्टी कार्यकर्ताओं की दादागीरी का खुलकर सहारा ले रहे हैं। मज़दूरों की वर्ग दृष्टि एकदम साफ है। वह केजरीवाल के लोकरंजकतावाद की असलियत को अभी से समझने लगा है। वह कुछ कुलीनतावादी दिवालिये किताबी वामपंथियों की तरह मतिभ्रम-संभ्रम-दिग्‍भ्रम का शिकार नहीं है।कल 6 फरवरी को सचिवालय पहुँचकर दिल्‍ली के मज़दूर केजरीवाल की दहलीज पर याददिहानी की पहली दस्‍तक देंगे। यह अंत नहीं, महज एक नयी शुरुआत है।जो भी साथी दिल्‍ली के मेहनतकशों की इस आवाज के साथ है, वे भी कल उनके समर्थन में ज़रूर पहुँचें। कल ग्‍यारह बजे हम सभी राजघाट पर एकत्र होंगे और वहाँ से सचिवालय की ओर मार्च करेंगे।

 

इस अभियान के बारे में विस्‍तार से जानने के लिए देखें हमारी वेबसाइट 

 

http://www.workerscharter.in/

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