इरोम शर्मिला का सत्याग्रह:सैन्य दमन के खिलाफ़ बहादुराना प्रतिरोध

यह मणिपुरी कवियत्री और कार्यकर्ता ईरोम शर्मिला चनू की भूख हड़ताल का दसवां साल है । शर्मिला अपने राज्य में पिछले ५१ सालों से लागू आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट , १९५८ ( सैन्य बल विशेष शक्तियाँ कानून , १९५८ ) या ” आफ़्स्पा ” के खिलाफ़ सत्याग्रह कर रही हैं। इस राक्षसी कानून के अन्तर्गत सैन्य बलों को –

  • बिना वॉरण्ट के गिरफ़्तारी और तलाशी की छूट
  • सिर्फ शक के बिना पर गोली चलाकर जान से मारने की छूट
  • आम कानूनी कार्रवाई से छूट (दण्ड मुक्ति) मिली हुई है ।

१९४२ में भारत छोड़ो आन्दोलन को दबाने के लिए जो अधिनियम बना था लगभग हूबहू वही ’आफ़्स्पा ’ के रूप में आजाद भारत की सरकार ने अपने देश के कुछ हिस्सों पर लगाया । इस कानून की आड़ में पिछले ५० साल से सेना ने अपना बर्बर राज मणिपुर व अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में चला रखा है । लूट , बलात्कार , मार-पीट , हत्या आदि का इस्तेमाल आम जनता के खिलाफ़ तथाकथित रूप से उग्रवाद को दबाने के लिए किया जाता है परन्तु सच यह है कि पिछले ५० सालों में इस क्षेत्र में  राज्य के दमन और मुख्य धारा से काटे रखने की प्रतिक्रियास्वरूप उग्रवाद बढ़ा ही है । मालोम गाँव के बस स्टॉप पर बस के इन्तेज़ार में खडे़ १० निहत्थे नागरिकों को उग्रवादी होने के सन्देह पर मार दिया गया  – इस घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप २ नवम्बर २००० को शर्मीला ने आफ़्स्पा हटाये जाने के लिए आमरण अनशन शुरु किया । ६ नवम्बर को उन्हें “आत्महत्या करने के प्रयास” के जुर्म में गिरफ़्तार किया गया । २० नवम्बर २०० को जबरन उनकी नाक में तरल पदार्थ डालने की कष्टदायक नली डाली गयी । पिछले ९ सालों से इसी हालत में उन्हें कैद रखा गया है ।

शासकीय दमन के खिलाफ़ शर्मिला अकेली आवाज नहीं हैं । २००४ में असम राईफल के जवानों ने मनोरमा नाम की महिला का बलात्कार कर उसकी नृशंस हत्या कर दी । इस घटना के विरोध स्वरूप अधेड़ मणिपुरी महिलाओं ने सी आर पी एफ़ के मुख्यालय के सामने निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया । इंसान से उसकी गरिमा और लोकतांत्रिक अधिकार छीन लेने वाले प्रशासन के प्रति यह इन महिलाओं के गुस्से का इजहार था और आधुनिक भारतीय राष्ट्र के लिए के शर्मनाक घटना । दूसरी तरफ शर्मिला के इस संघर्ष में कई और जांबाज साथिनें भी 10 दिसंबर 2008 से जुड़ गई हैं- मणिपुर के कई महिला संगठन पिछले साल से ही रिले भूख हड़ताल पर प्रतिदिन बैठ रहे हैं. सैन्य दमन की सभी घटनाओं में सरकार द्वारा दोषियों के खिलाफ़ सन्तोषजनक कार्रवाई नहीं की गई है ।

” आफ़्स्पा ” कानून जम्मू और कश्मीर में भी लगाया गया है और पिचले २५ सालों में सेना के बढ़ते अत्याचार और केन्द्र सरकार द्वारा राज्य की लोकतांत्रिक पेक्रियाओं से खिलवाड़ की प्रतिक्रिया स्वरूप यहाँ भी उग्रवाद और आतंकवाद बढ़ता ही जा रहा है । कश्मीर पिछले कई महीनों से शोपियां काण्ड को लेकर उबलता रहा है और इस आन्दोलन में  भी काफ़ी लोगों की जानें गई हैं । सेना के जवनों द्वारा दो लड़कियों के  बलात्कार और हत्या की इस घटना में राज्य सरकार ने आरोपियों को बचाने का ही काम किया है ।

अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे लोगों को राज्य सत्ता द्वारा हमेशा ही दबाया जाता रहा है । नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों के तहत प्राकृतिक संसाधनों की लूट देश के सभी राज्यों की सरकारों ने चला रखी है । कृषि भूमि को छीन कर एस.ई.ज़ेड (विशेष आर्थिक क्षेत्र) में बदला जा रहा है और जंगलों से आदिवासियों को खदेड़ कर खनिजों को औने-पौने दामों में निजी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले किया जा रहा है । जल – जंगल – जमीन के हक के लिए लोग आन्दोलन कर रहे हैं और इन जनान्दोलनों को दबाने के लिए सरकारी दमन बढ़ता ही जा रहा है । काशीपुर , कलिंगनगर , सिंगूर , नन्दीग्राम आदि में राज्य सरकारों द्वारा आंदोलनकारियों की हत्या , प्रताड़ना , बलात्कार , लूट आदि की घटनायें सामने आई हैं । इसके अलावा भी देश भर में प्रदर्शनकारियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को झूठे आरोपों में बन्द करना और हिरासत में प्रताड़ित करना भी सरकारी रणनीति के तहत होता रहता है । इस प्रकार सरकार लोकतांत्रिक विरोध के सभी तरीके बन्द करती जा रही है ।

समाजवादी जनपरिषद यह माँग करती है कि जम्मू और कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों से तत्काल ’आफ़्स्पा’हटाया जाए और जैसा कि एक लोकतांत्रिक सरकार से अपेक्षा की जाती है , इन क्षेत्रों के लोगों की मूलभूत समस्याओं का राजनैतिक समाधान किया जाए । इसके अलावा जनान्दोलनों के कार्यकर्ताओं पर पुलिसिया दमन बन्द किया जाए ।

इरोम शर्मिला को रिहा करो !          आफ़्स्पा कानून रद्द करो !!         जनान्दोलनों का सरकारी दमन बन्द करो !!!

- ले. प्योली

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शिवराज सरकार का दमनकारी चेहरा

नर्मदा बचाओ आन्दोलन का २८ अक्टूबर का ज्ञापन

प्रति,
श्री शिवराजसिंह चौहान,
मुख्यमंत्री,
मध्य प्रदेश शासन,
भोपाल म.प्र.
विषय : इंदिरा सागर परियोजना व औंकारेश्वर बाँध प्रभावितों के पुनर्वास बाबत्
द्वारा : जिला कलेक्टर, खण्डवा, म.प्र.
माननीय,
नर्मदा घाटी में बन रहे इंदिरा सागर और औंकारेश्वर बाँध के हजारों प्रभावित आज
खण्डवा जिला मुख्यालय पर एकत्र होकर नर्मदा घाटी में लाखों प्रभावितों की दुर्दशा की ओर
आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहते है। नर्मदा घाटी के विस्थापितों के लिये बनी पुनर्वास
नीति के अनुसार विस्थापितों का जमीन के बदले जमीन, वयस्क पुत्रों को जमीन एवं सभी को
पुनर्वास की अन्य सुविधाऐं देकर बसाना था। परंतु इस नीति का खुला उल्लंघन करते हुए,
विस्थापितों को धोखे एवं दमन के आधार पर ही उजाडा गया है।
इतना ही नहीं विस्थापितों के हक में दिये गये सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय
के फैसलों पर भी अमल नही किया जा रहा है। प्रदेश व देश के विकास के नाम पर त्याग
करने वाले लाखों विस्थापित आज दर दर की ठोकरे खाने पर मजबूर है जबकि दूसरी ओर
इंदिरा सागर और औंकारेश्वर बाँध बनाने वाली कम्पनी एन.एच.डी.सी. ने गत् ४ वर्षों में १२००
करोड़ रु. से अधिक का शुध्द लाभ कमाया है।
आज खण्डवा में एकत्र हम हजारों प्रभावित राज्य सरकार से मांग करते है कि : -
इंदिरा सागर परियोजना
१. माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने नर्मदा बचाओ आंदोलन द्वारा दायर याचिका में
पहले ८ सितम्बर २००६ ओर फिर २ सितम्बर २००९ को यह आदेश दिया है कि किसानों
के समस्त वयस्क पुत्र और अविवाहित पुत्रियों को ५.५ एकड़ कृषि जमीन दी जाए,
इसका पालन करते हुए वयस्क पुत्रों को तुरंत जमीन दी जाय।
२. विस्थापित मजदूर परिवारों को डूब से खुलने वाली हजारों एकड़ तलक की जमीन
बाँटी जाए तथा सिंचाई की सुविधा मुहैया कराई जाय ताकि पानी खुलने पर, हर साल
गेहूँ व गर्मी की फसल कमाकर विस्थापित मजदूर परिवार भी इज्जतदार रोजगार कर
सके।
३. इंदिरा सागर डूब क्षेत्र में विस्थापित मछुआरों के साथ गुंडागर्दी एवं मारपीट की जा रही
हैं। इसे तत्काल रोका जाय और इंदिरा सागर में मछली मारने का अधिकार ठेकेदार
को नहीं, विस्थापित को दिया जाय।
४. कृषि जमीनों को एन.एच.डी.सी. ने मृट्ठी भर मुआवजा देकर कब्जा कर लिया, जिससे
किसान दोबारा जमीन नहीं खरीद पाया। इसलिए जमीन के लिए दी जाने वाले विशेष
पुनर्वास अनुदान ¼बढ़त राशि½ को हरदा कमाण्ड के अच्छे रेट १.५ से २ लाख रूपए
एकड़ दिया जाय।
५. अभी भी डूब क्षेत्र में छूटे हुए हजारों घर, जो मुआवजे से छूटे है, उनका भू-अर्जन
करके मुआवजा दिया जाय।
६. जहाँ जमीन डूब चुकी है और अब जीने का कोई जरिया बचा ही नही है, उन गाँवों के
सभी घरों का भू-अर्जन करके विस्थापितों को मुआवजा तथा पुनर्वास दिया जाय।
७. इंदिरा सागर डूब क्षेत्र विशेषत: हरदा जिले में भयावह भ्रष्टाचार फैला है। प्रभावितों के
अनुदान दलालों द्वारा अधिकारियों की मिलीभगत से निकाले जा रहे है। इस पर रोक
लगाई जाय और स्वतंत्र जाँच कर दोषियो को दण्डित किया जाय।
८. सभी पुनर्वास स्थलों पर विस्थापितों के लिए पूर्ण रोजगार मुहैया किया जाय सभी
विस्थापितों के बी.पी.एल. राशन कार्ड बनाया जाय और पुनर्वास स्थल पर स्कूल,
अस्पताल, पेयजल आदि सभी सुविधाऐं प्रदान की जाय।
९. बहुत से गाँवों में अभी तक परिवार सूची ही नही बनी है और वे पुनर्वास के समस्त
लाभों से वंचित है, उन गाँव की परिवा सूचियाँ बनाकर, सभी विस्थापितों को पुनर्वास
के लाभ दिये जाय।
१०. हंडिया नेमावर तक के पीछे के इंदिरा सागर के डूब में आने वाले छूटे हुए गाँव का
सर्वे करके परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास दिया जाय।
११. २५ प्रतिशत् से कम बची जमीन के भू-अर्जन के साथ परिसम्पत्तियों का भी अर्जन
किया जाय।
१२. जहाँ घर डूब है और जमीने बची है वहाँ १ किलो मीटर के अंदर पुनर्वास स्थल का
निमार्ण किया जाय।
१३. इंदिरा सागर बाँध स्थल पर जल स्तर सूचित करने वाला स्केल मिटा दिया गया है,
जो कि अत्यंत गंभीर है। बाँध का जल स्तर बताने वाला सार्वजनिक स्केल पुन: लिखा
जाय।

औंकारेश्वर परियोजना

१. उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुसार विस्थापितों को सिंचित
एवं उपजाऊ जमीन देकर बसाया जाय।
२. विस्थापितों को जमीन आवंटन के लिये अतिक्रमित जमीनों को न दिया जाय, ताकि
अन्य गरीब परिवारों की रोटी न छिने और विस्थापित की सुरक्षति बसाहट हो सके।
३. उच्च न्यायालय के दिनांक २३ सितम्बर २००९ एवं अन्य सभी आदेशों का तत्काल पालन
किया जाय।
४. न्यायालयीन आदेश तथा पुनर्वास नीति के अनुसार कमाण्ड एरिया में विस्थापितों की
इच्छा अनुसार घर प्लॉट दिये जाय।
५. छूटे हुए मकानों का भू-अर्जन किया जाय।
६. किसानों को अपर्याप्त मुट्ठी भर मुआवजा दिया गया है। कृषि जमीन का विशेष
पुनर्वास अनुदान ¼बढ़त राशि½ कम से कम १.५ से २ लाख रूपए एकड़ दिया जाय।
७. तालाब में मछली ठेकेदार को नहीं दी जाय। मछली मारने का सम्पूर्ण अधिकार
विस्थापित को दिया जाय।
८. पुनर्वास के लाभों से मनमानी पू्र्वक वंचित सभी परिवारों को घर प्लॉट, अनुदान व
समस्त लाभ दिया जाय।
९. सन् २००४ में धाराजी प्रकरण में सैकड़ो लोगों को एन.एच.डी.सी. द्वारा पानी छोड़ने से
बह जाना तथा पिछले महिने गांव कामनखेड़ा में नन्ही हरिजन बालिका का
एन.एच.डी.सी. द्वारा पानी बढ़ाने से मौत के लिए जिम्मेदार एन.एच.डी.सी. को दण्डित
किया जाय।
आशा है आप उपरोक्त पर तत्काल एवं गंभीरता से कारवाई करेंगे।
दिनांक : २८ अक्टूबर २००९
भवदीय,
इंदिरा सागर एवं औंकारेश्वर बाँध
प्रभावित हजारों विस्थापित

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उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायलय द्वारा पुनर्वास के लिए दिए गए निर्देशों और फैसलों को लागू किए जाने के लिए उपर्युक्त मांगें की गई हैं । इन मांगों के समर्थन में पूर्वघोषित कार्यक्रम के अनुसार हजारों विस्थापित जिला मुख्यालय पर लोकतांत्रिक तरीके से धरना दे रहे थे । जिला प्रशासन के समस्त अधिकारी लगता है इस पूर्व सूचना के कारण ही एक साथ ’बीमार’ पड़ गये थे । इन परिस्थितियों में धरनारत कुछ आन्दोलनकारी जिला कलेक्टर के दफ़्तर में दरियाफ़्त करने जा रही थीं । यही पुलिस द्वारा आन्दोलन की प्रमुख नेता चित्तरूप पालित , रामकुँवर रावत तथा कमला यादव को पुलिस द्वारा बर्बर तरीके से पीटा गया एवं फर्जी धाराएं लगा कर गिरफ़्तार कर दिया गया । इसके पश्चात खंडवा स्थित नर्मदा बचाओ आन्दोलन के दफ़्तर में बिना किसी वारंट छापा मार कर कम्प्यूटर आदि की छानबीन की गई तथा आन्दोलन के एक अन्य नेता आलोक अग्रवाल को भी पीट कर गिरफ़्तार कर लिया गया ।

रामकुँवर तथा चित्तरूपा

रामकुँवर तथा चित्तरूपा

समाजवादी जनपरिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुनील ने खण्डवा का दौरा करने के बाद कहा है कि म.प्र. की भाजपा सरकार ने शान्तिपूर्ण आन्दोलनकारियों पर बर्बर दमन चक्र चला कर अपने जन विरोधी स्वरूप को उजागर कर दिया है । सुनील ने विस्थापित आन्दोलनकारियों की समस्त मांगे तत्काल मानने तथा गिरफ़्तार लोगों को रिहा करने की मांग की है ।

 

नर्मदा बचाओ आन्दोलन दफ़्तर पर अवैध छापा

न.ब.आ. दफ़्तर पर अवैध छापा

क्या माओवादियों ने चीन के विकास पर ध्यान दिया ? -सच्चिदानन्द सिन्हा

पिछले भाग से आगे :

वैसे तो यह औद्योगिक व्यवस्था पूंजीवाद द्वारा पैदा की गयी है जिसमें निजी स्वामित्व की प्रधानता है , लेकिन धीरे धीरे उद्योगों का यह ढांचा , जो वृहद कॉर्पोरेशनों के रूप में विकसित हुआ है , पूंजीपतियों के व्यक्तिगत नियन्त्रण से मुक्त हो एक स्वतंत्र स्वरूप धारण करने लगा है और इसका मूल रुझान पूर्ववत श्रम और संसाधनों के शोषण से प्रतिष्ठानों के लिए ज्यादा मुनाफा कमाना होता है । विख्यात अमेरिकी अर्थशास्त्री गालब्रेथ ने विकसित हो रहे स्वायत्त पूंजी के व्यवस्थापकों के इस समूह को ’टेक्नोस्ट्रक्चर’ का नाम दिया था । निजी या सार्वजनिक दोनों ही क्षेत्रों में इनकी व्यवस्था को चलाने के लिए व्यवस्थापकों और नौकरशाहों का ऐसा ही संवेदनहीन ढांचा तैयार हुआ है जिसका एक मात्र लक्ष्य अपना विस्तार करना और कॉर्पोरेशन के मुनाफे को बढ़ाना भर है । सार्वजनिक क्षेत्र के कॉर्पोरेशन एक अर्थ में जरूर भिन्न होते हैं।  इनके मुनाफे पर एक हद तक – जहाँ लोकतंत्र है, जन प्रतिनिधियों का नियन्त्रण होता है । लेकिन इनकी मूल प्रवृत्तियाँ निजी पूंजीवादी प्रतिष्ठानों से भिन्न नहीं होतीं । और इसी कारण यह भी पूंजीवादी व्यवस्था के फैलाव और संकोच के व्यापार चक्र से बिल्कुल मुक्त नहीं होते । चूँकि बुनियादी तौर से यह निजी प्रतिष्ठानों से भिन्न नहीं होते सरकारें जब चाहें तो विनिवेश द्वारा इनकी पूँजी को निजी क्षेत्र में स्थानान्तरित कर सकती है – जैसा हाल में मनमोहन सिंह सरकार ने एन.टी.पी.सी में किया है ।

अशोक सेक्सरिया - सच्चिदानन्द सिन्हा

अशोक सेक्सरिया - सच्चिदानन्द सिन्हा

समग्र रूप से यह पूंजीवादी कॉर्पोरेटी दुनिया आम आदमियों , विशेष कर आदिवासियों और किसानों के जीवन पर कहर बरसाती है | जिस औपनिवेशिक शोषण के बल पूंजीवाद का विकास हुआ है वह शोषण और भी भयावह होता जा रहा है क्योंकि इस व्यवस्था की संसाधनों की भूख असीम है । इसका सरल सूत्र है – अधिक मुनाफे के लिए अधिक उत्पादन चाहिए और अधिक उत्पादन के लिए अधिक संसाधान यानी अधिक जंगल की कटाई , अधिक खनिजों का खनन , अधिक अन्न और दूसरे कृषिजन्य कच्चे माल । इनके संयन्त्रों के लिए भूमि और सबसे ऊपर व्यापार के लिए परिवहन का तानाबाना चाहिए , ताकि सभी दूरदराज स्थानों को यह ऑक्टोपस (अष्टपाद) की तरह अपनी गिरफ़्त में ले सकें । पिछले दिनों ’स्पेशल इकॉनॉमिक ज़ोन ’के नाम पर और सड़कों के चौड़ीकरण के नाम पर एक्सप्रेस वे एवं हाईवे के लिए देश भर में भूमि अधिग्रहण का सिलसिला चलाया जा रहा है । इन्हीं के खिलाफ़ प्रतिरोध से सिंगूर और नन्दीग्राम की त्रासदीपूर्ण घटनाएं हुई हैं । इसके पहले उड़ीसा , छत्तीसगढ़  और स्वयं झारखण्ड में देशी , विदेशी बड़ी कंपनियों द्वारा आदिवासियों और किसानों की जमीन पर सरकारी बल के सहारे अधिग्रहण के ऐसे प्रयास लगातार होते रहे हैं और जगह जगह इनके खिलाफ़ आन्दोलन होते रहे हैं जिन्हें दबाने की कोशिश भी होती रही है । जहाँ तहाँ माओवादी गतिविधियों में उभार में भी यह जन प्रतिरोध प्रतिबिंबित होता है । जब भारत के प्रधान मन्त्री मनमोहन सिंह “नक्सली हिंसा” को देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती बताते हैं तो उनकी चिंता व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए संसाधनों की उपलब्धि की ही है । विश्व बैंक की आर्थिक नीति को देश में लागू करने में अग्रिम भूमिका निभाने वाले हमारे प्रधान मन्त्री का यह रुख स्वाभाविक है ।

लेकिन हमारे माओवादी मित्र भी लगभग वैसे ही दृष्टिकोण के शिकार हैं । अगर उन्होंने माओ के देश चीन पर ध्यान दिया होता तो वे माओवाद की जगह समाज परिवर्तन की किसी वैकल्पिक नीति की तलाश करते । माओ के चीन में आज क्या हो रहा है ?  माओ के नेतृत्व में चालीस वर्ष से अधिक तक चलने वाले आन्दोलन – जिसमें अनगिनत लोगों ने अपनी आहुति – का अन्तिम परिणाम क्या हुआ? आज चीन पूंजीवादी विकास और कॉर्पोरेटी व्यवस्था का सबसे सशक्त और निर्मम नमूना है । वहाँ की सालाना विकास दर भारत से भी कहीं ज्यादा है , जो कभी १२ प्रतिशत पार कर गयी थी । लेकिन इसका फायदा वहाँ के नवोदित पूंजीपति वर्ग और व्यवस्थापक वर्ग को मिल रहा है , जिनकी सुविधायें पश्चिमी दुनिया के संपन्नों की बराबरी कर रही हैं । लेकिन आम किसानों और मजदूरों की स्थिति दर्दनाक बनी हुई है । सरकार को उनकी सुरक्षा की चिंता इतनी कम है कि हजारों लोग कोयला खदानों की दुर्घतनाओं में मरते रहते हैं । माओवादी मित्रों को इस पर विचार करना चाहिए कि वे माओ की तर्ज पर खूनी क्रांति में स्वयं अपनी और हजारों दूसरे प्रतिबद्ध लोगों की शहादत से फिर चीन जैसा ही पूंजीवादी ढांचा तैयार करना चाहते हैं क्या ? वैसे ढाचे में तो आदिवासी और किसान वैसे ही विस्थापित होंगे और कुचले जायेंगे जैसे भारत और दुनिया के दूसरे देशों में पूंजीवादी विकास के क्रम में हो रहा है । देंग या कुछ दूसरे व्यक्तियों पर इस “भटकाव” की जवाबदेही डाल हम गंभीर सामाजिक विश्लेषण से बच नहीं सकते ।

सजप सम्मेलन धनबाद

सजप सम्मेलन धनबाद

समाजवादी जन परिषद बुनियादी तौर से ऐसे विकास को ( भले ही वह समाजवाद के नाम पर हो रहा हो ) नकारती रही है और आगे भी नकारती रहेगी । हमें एक ऐसे वैकल्पिक ढांचे की तलाश जारी रखनी होगी जिसमें मेहनतकशों की स्वायत्तता और व्यवस्था की मानवीयता बनी रहे । हमें स्पष्ट रूप से यह घोषित करना है कि किसानों और आदिवासियों के जीवन पर आघात करने वाली किसी विकास की व्यवस्था को हम स्वीकार नहीं करेंगे । हमें ऐसी छोटी राजकीय और आर्थिक इकाइयाँ विकसित करने की दिशा में पहल करना होगा जिसमें आदमी पूरे अर्थ में स्वतंत्र हो और अपनी व्यवस्था बनाने के लिए उसे पूर्ण स्वायत्तता प्राप्त हो । खनिजों की खुदाई के लिए किसानों और आदिवासियों के विस्थापन का हम शुरु से विरोध करते रहे हैं। बाल्को के गंधमार्दन में बॉक्साईट खनन का अहिंसक विरोध समता संगठन ( जिसके प्रयासों से बाद में समाजवादी जनपरिषद का निर्माण हुआ ) ने कुछ दूसरे सहयोगी संगठनों के साथ किया था और उसमें एक हद की सफलता भी मिली थी। हमारा यह संकल्प होना चाहिए कि आगे भी हम सदा ऐसा अहिंसक प्रतिरोध जारी रखेंगे ।

ऐसे अहिंसक संघर्षों की श्रृंखला से ही भविष्य में वह वातावरण तैयार होगा जिसमें एक वैकल्पिक समाज व्यवस्था – जो केन्द्रीकृत राज्य व्यवस्था और विशाल पूंजीवादी और नौकरशाही शोषण से समाज को मुक्त कर सके – अस्तित्व में आये । समाजवादी जनपरिषद को अपने इस प्रयास में देश के तमाम शोषित लोगों , आदिवासियों , किसानों ,  मजदूरों एवं बुद्धिजीवियों को शामिल करने की कोशिश करनी चाहिए । हमें लोगों को सचेत करना चाहिए कि प्राकृतिक संपदा के अन्धाधुंध दोहन की मुहिम को वर्तमान औद्योगिक विकास और उपभोक्तावादी संस्कृति से अलग कर नहीं देखें ।  जो लोग आज की विकास प्रक्रिया को तो कबूल करते हैं पर जल , जंगल , और जमीन के कॉर्पोरेटी अधिग्रहण का विरोध करते हैं , वे स्वयं अपने को और तमाम जनता को भ्रम में डालते हैं । दोनों का अनिवार्य संबंध है इस सत्य को हमें उजागर करते रहना है ।

हमारा पिछला राष्ट्रीय सम्मेलन सत्याग्रह आन्दोलन के शताब्दी वर्ष में हुआ था । आज का सम्मेलन “हिन्द स्वराज” के शताब्दी वर्ष में हो रहा है । आज की व्यवस्था के विरुद्ध अहिंसक संघर्ष के क्रम में विकेन्द्रित ग्राम गणतंत्र की दिशा में समाज को ले जाने के प्रयास में “हिन्द स्वराज” की मूल कल्पना से प्रेरणा मिलेगी यह आशा है ।

- सच्चिदानन्द सिन्हा , धनबाद ,२८ अक्टूबर , २००९ .

झा्रखण्ड के बहाने – आज के प्रश्न और विकल्प की तलाश / सच्चिदानन्द सिन्हा

[ २८ , २९ , ३० अक्टूबर २००९ को धनबाद में समाजवादी जनपरिषद का द्विवार्षिक सम्मेलन सम्पन्न हुआ । सम्मेलन का उद्घाटन  दल से जुड़े चिन्तक सच्चिदानन्द सिन्हा ने किया । प्रस्तुत है उनका उद्घाटन भाषण ]

सच्चिदानन्द सिन्हा

सच्चिदानन्द सिन्हा

झारखण्ड , जहाँ हम सम्मेलन में बैठे हैं , एक अर्थ में मानव इतिहास की समेकित प्रतिछाया प्रस्तुत करता है । अपनी बात को मैं थोड़ा स्पष्ट करना चाहता हूँ । मानव समाज के अनुभवों के परिपेक्ष्य में पिछली दो शताब्दी का इतिहास यह बतलाता है कि सारी आदिम समाज से कारपोरेटीकरण की तरफ़ संक्रमण और इस क्रम में आम आदमी के दरिद्रीकरण की रही है । दरिद्रीकरण , आधुनिक अर्थ में धन के अभाव से ही नहीं , बल्कि आदमी की स्वायत्तता , आत्म सम्मान एवं सामाजिक दायित्व बोध के लोप के अर्थ में भी । मार्क्स समेत ज्यादातर चिंतकों के विचार इस प्रक्रिया से बाहर कोष्ठकों में बन्द विवरण भर हैं ।

आम आदमी के जीवन में यह संक्रमण तीन चरणों में आया है – पहला , जब आदमी कबीले के सम्मानित सदस्य के रूप में स्थित था , दूसरा , जब वह किसान बना और अपने उत्पादन के अधिशेष से व्यवस्था एवं इसके शीर्ष पर उपस्थित विभिन्न तरह के शोषक समूहों का पोषण करता रहा , और तीसरा जब वह आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था में सर्वहारा या श्रमिक बन अपने काम और आय दोनों के लिए पराश्रित बना । वर्तमान पूंजीवादी समाज में वह कौन सा काम करेगा और किन उपक्रमों में किन स्थितियों में करेगा , दूसरों द्वारा निर्धारित होता है । दरअसल इतिहास बतलाता है मनुष्य पूर्ण स्वायत्तता की स्थिति में सिर्फ प्रथम चरण में ही था जब वह सामूहिक शिकार या वनोपजों के संग्रह से जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करता था । उस काल में सभी लोग वास्तविक या कल्पित लहू के संबंध से सगे और सहयोगी थे । हाल के अनेक अध्ययनों से यह बात सिद्ध होती है कि उनके कठोर जीवन और आपसी खूनी संघर्षों की कहानी प्राय: विद्वानों द्वारा वर्तमान समाज में फैले द्वेष – राग का प्रचीन स्थितियों पर प्रक्षेपण का परिणाम है ।

झारखण्ड में हम एक विकृत रूप में विकास के इन तीनों खण्डों का सह – अस्तित्व पाते हैं । (१) यहाँ आज भी अनेक कबीलायी समूह हैं जो मूल्त: आखेट और वनोपजों के संग्रह से जीविका पाते हैं – हाँलाकि आधुनिक खदानों , उद्योगों और शहरीकरण ने उन्हें अति छोटे दायरों में सीमित कर दिया है । वे आज विलुप्त होने की कगार पर हैं । (२) वर्तमान भूमि व्यवस्था के तहत खेतीबारी करने वाले किसान और (३) खदानों , कारखानों , निर्माण कार्यों एवं परिवहन में कार्यरत मजदूर जो स्थायी या दिहाड़ी मजदूरी पर काम करते हैं ।

झारखण्ड की त्रासदी यह है कि यहाँ वनोपजों की भरमार है ( या थी )और खनिजों का विपुल भंडार है – शायद भारत के तमाम खनिजों के तीस से चालीस प्रतिशत तक । इसलिए जब से भारत में आधुनिक औद्योगीकरण ने अपना पांव पसारना शुरु किया तब से कोयला , लौह – अयस्क , और दूसरे खनिजों के लिए यहाँ के उर्वर वनों से हरे भरे प्रदेश की खदानों के लिए खुदाई शुरु हुई । और यह हरा भरा प्रदेश उबड़ खाबड़ खड्डों और खंडहरों का बियाबान बनने लगा ।  पारंपरिक जीवन के आधार से विस्थापित यहाँ के स्वस्थ और सुन्दर पुरुष और स्त्रियों को बिचौलियों के माध्यम से दूर दराज स्थानों पर उत्तर बंग से लेकर असम तक के चाय बगानों में काम करने के लिए ले जाया गया । वहाँ वे अपनी पूरी सांस्कृतिक विरासत से कट गये , और आज जहाँ हैं और जिस जमीन को उन्होंने अपने खून पसीने से सींचा और बनाया है ,उस पर भी उनके सत्व की स्वीकृति नहीं है । पारंपरिक जीवन के आधार के नष्ट होने से आजीविका के साधन से हीन यहाँ के लोगों को आज भी बड़ी संख्या में ठेकेदारों द्वारा कठोर अस्थायी निर्माण कार्यों के लिए बाहर ले जाया रहा है ।

दूसरी तरफ़ झाखण्ड के खदानों और कारखानों में काम करने के लिए पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों से बड़ी तादाद में श्रमिक यहाँ आये । वे भी अंग्रेजी हुकूमत द्वारा पैदा की गयी दरिद्रता और विस्थापन की एक कहानी के साथ आये थे । अंग्रेजी शासन ने वहाँ भी दरिद्रता और अकाल की एक व्यवस्था पैदा की थी । अत्यधिक शोषण और शासकीय लापरवाही से कृषि व्यवस्था नष्ट हो गयी थी और अकालों का एक सिलसिला शुरु हुआ । दूसरी ओर औद्योगिक क्रांति के बाद के बर्तानी उद्योगों की प्रतिस्पर्धा और शासकीय पक्षपात के कारण वहां के पारंपरिक घरेलू उद्योग नष्ट हो गये और इनमें लगे शिल्पी बेरोजगार हो गये । इसी पृष्टभूमि में वहाँ से बड़ी संख्या में लोगों को बंधुआ मजदूरों के रूप में मॉरिशस , सुरीनाम , गायना, फिजी आदि में ले जाया गया । जो बाकी बचे उनमें बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में कोलकाता , जैसे महानगरों या फिर झारखण्ड की खदानों में काम करने आये । कुछ ऐसे ही कारणों से छत्तीसगढ़ और बिलासपुर से भी बड़ी संख्या में लोग झारखंड की खदानों में काम करने आये । इससे इस इलाके में विभिन्न स्थानों से आये मजदूरों में भी एक दूसरे के प्रति तनाव पैदा होता रहा है । कोयला या दूसरे अयस्कों की ढुलाई के खर्च से बचने के लिए कुछ बड़े औद्योगिक संयन्त्र टाटा , बोकारो , हटिया , सिंदरी  आदि में लगे । पर इनमें दक्षता और बड़ी आय वाले स्थानों पर प्राय: वैसे लोगों को लगाया गया जो विकसित औद्योगिक क्षेत्रों से आते थे और दक्षता वाले कामों में प्रशिक्षित थे । नये तरह के उद्योगों में रोजगार देने की क्षमता घटती जा रही है और इससे रोजगार के लिए प्रतिस्पर्धा और श्रमिकों के विभिन्न समूहों में आपसी तनाव बढ़ता गया है । लोग इस बात को नजरअंदाज करते रहे हैं कि समस्या के मूल में आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था ही है जो लगातार उद्योगों में काम करने वाले श्रमिकों की संख्या ऑटोमेशन और कम्प्यूटरीकरण के जरिये घटाती चलती है । चूँकि उद्योग धन्धे मूलत: वहीं विकसित होते हैं जहाँ संरचनात्मक सुविधाओं का विकास हुआ होता है । उद्योग प्राय: वहीं फैलते हैं जहाँ  इनका आधार एक बार निर्मित हो चुका होता है । देश के हर हिस्से से लोग ऐसे औद्योगिक नगरों की ओर रुख करते हैं और काम नहीं मिलने पर उनकी झुग्गियों और झोपड़ पट्टी को आबाद करते हैं । इन स्थानों पर लोगों में प्राय: मूल , भाषा आदि के सवाल पर तनाव पैदा होता है ।  यूरोप के देशों में इस तरह का विरोध बाहर से काम की तलाश में आने वाले अप्रवासियों के खिलाफ़ होता है । झारखंड में भी यदा कदा इस तरह का तनाव विभिन्न मूल के लोगों के बीच देखा जा सकता है । इसके मूल में वर्तमान पूंजीवादी उद्योगों का चरित्र है जिस में स्थायी और अस्थायी बेरोजगारी निहित है । इससे सीमित रोजगार के लिए मजदूरों में छीना झपटी होती रहती है ।

( जारी )

इलाहाबाद गोष्ठी / स्फुट झलकियाँ /स्फुट विचार

मुख्य अतिथिद्वय

मुख्य अतिथिद्वय

प्रियंकर साहित्य , काम – काज की भाषा और चिट्ठेकारी इन सभी मोर्चों पर हिन्दी-सेवा में लगे हैं । अपने तजुर्बे से उन्हों ने मुझे बताया था कि तदर्थवाद ने हिन्दी का नुकसान किया है । विभूति राय प्रशासनिक अधिकारी रहते हुए सिर्फ़ साहित्य से नहीं जुड़े रहे उनके स्पष्ट , प्रतिबद्ध सामाजिक सरोकार भी रहे हैं । इसलिए तदर्थवाद की कमजोरी को वे भी समझते ही होंगे । इस सेमिनार के तदर्थवाद की बाबत निमन्त्रणकर्ताओं से जल्दबाजी की शिकायत  के बारे में उन्होंने उद्घाटन सत्र की सदारत करते हुए खुद जिक्र किया तथा खेद प्रकट किया । निश्चित तौर पर किसी हद तक सेमिनार और चिट्ठेकारी ने इसका खामियाजा भुगता । स्कू्ली बच्चों को जैसे ’अधिकार के साथ कर्तव्य’ पर निबन्ध लिखवाया जाता है या ’विज्ञान : वरदान नहीं अभिशाप है’ पर वाद-विवाद करवाया जाता है उसी लहजे में नामवर सिंह ने जो विधा ही खुद अभी पल्लवित हो रही है उससे जुड़े़ लोगों को सन्देश दिया ।

लाजमी तौर पर स्मरण हो आया कि हमारे देश में अभिव्यक्ति के तमाम हक़ जिन १९ महीनों में मुल्तबी रखे गये थे तब नामवर सिंह का दल (भाकपा,इसके निशान पर वे चुनाव भी लड़े हैं) और उससे जुड़ा अध्यापक संगठन कैसे तानाशाह के छुटभैय्ये बने हुए थे । भाकपा का गद्दारी करने के बाद ’ऐतिहासिक भूल कबूलने’ का भी इतिहास है । ’७४ दिसम्बर में इलाहाबाद में तरुण शान्ति सेना द्वारा युवाओं के राष्ट्रीय सम्मेलन में ’जयप्रकाशजी आए हैं ,सन’  ’४२ लाए हैं’ के नारों से अगस्त क्रान्ति के नायक का युवजनों ने अभिवादन हमने भी किया था । अगस्त क्रान्ति ( ’४२ ) तथा दु:शासन पर्व (अपातकाल ) के गद्दारों को याद करना जरूरी नहीं है। लोहिया कहते थे ,’गद्दार या गद्दारी अपने आप में इतना खतरनाक नहीं होते । यदि जनता साथ न दे तो वे बेमानी होंगे । वे खतरनाक साबित होते हैं यदि वे जनता का समर्थन हासिल करने में कामयाब हो जाएं ’ । यह गौरतलब है कि हिन्दुत्ववादी धारा ने भी कम्युनिस्टों की तरह भारत छोड़ों आन्दोलन में हिस्सा न लेना उचित समझा था । इस उमर में अब नामवर दलों की दाएरों से ऊपर उठ गए हैं – राजस्थान की भाजपा सरकार के कोटे से हिन्दी के अंतर्रा्ष्ट्रीय सम्मेलन में शिरकत में उन्हें दिक्कत नहीं होती । काशी विश्वविद्यालय के मसले पर पूर्व छात्रों के एक प्रतिनिधिमण्डल का  रामबहादुर राय के अनुरोध पर नेतृत्व करते हुए वे जब तत्कालीन प्रधान मन्त्री से मिलने गए तब अटलजी ने स्वाभाविक तौर पर उन्हें सम्मान दिया था । रामबहादुर राय साहब के गुरु से भी परस्पर पीठ खजुआने का उनका नाता है । रामबहादुर राय साहब ने जब प्रभाष जोशी का भव्य जनमदिवस आयोजन किया तो प्रमुख मेहमान नामवर थे । क्या पता सती – प्रथा एवं जाति – प्रथा पर भी इसी लिहाज से न बोलें -’ कर्व्यनिष्ठ अभिव्यक्ति की आजादी’ के तहत !

रवि भाई ने चिट्ठों के राजनैतिक होने पर अपना भय उद्घाटन सत्र के अपने प्रस्तुतीकरण में प्रकट किया । हांलाकि उनका आशय प्रचलित, भ्रष्ट और डॉ. अरविन्द मिश्र के अल्फ़ाज़ में ’बेहयाई वाली राजनीति ’ से रहा होगा । रवि रतलामी और डॉ. अरविन्द मिश्र संसदीय लोकतंत्र को क्या नक्सलवादियों की तरह पूरी तरह खारिज करते होंगे ? शायद नहीं । जैसा भी लोकतंत्र है उसे गंवा कर न सिर्फ किसी भी जन आन्दोलन को कठिनाई होगी , अरविन्द भाई के अन्धविश्वास निर्मूलन अभियान को भी होगी । क्या संसदीय लोकतंत्र बिना दलीय राजनीति के भी चल सकता है ? इससे आगे बढ़कर विभूति राय ने ’राजनैतिक न होने की राजनीति’ का जिक्र किया । उन्होंने तानाशाही सत्ता और कठमुल्लों के विरुद्ध पाकिस्तान की ब्लॉगिंग तथा चीन में जम्हूरियत स्थापित करने की इच्छा रखने वालों द्वारा ब्लॉगिंग का भी जिक्र किया । उन्होंने बताया कि कट्टर पंथी मुल्लाओं के खिलाफ़ लिखे जा रहे ब्लॉगों को पढ़ते हुए उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।

रवि रतलामी

रवि रतलामी

मुझे बनारस के बुनकरों के मोहल्ले में सदभाव अभियान द्वारा आयोजित गोष्ठी में बोलते विभूति राय की याद आ गई । राजस्थान के उन मुसलिम किसानों की मिसाल उन्होंने दी थी जो पारम्परिक तौर पर धोती पहनते आए हैं तथा जिन पर उन कट्टरपंथियों का असर नहीं होता जो चाहते हैं कि धोती को हिन्दू-वस्त्र मानते हुए वे पहनना छोड़ दें ।

विशिष्ट श्रोता रामजी राय इरफ़ान के साथ

विशिष्ट श्रोता रामजी राय, इरफ़ान

सिद्धार्थ मिश्र के चिट्ठों की किताब का लोकार्पण हुआ । युनीकोड नेट पर विभिन्न भाषाओं को सर्वव्यापी बनाने के लिए है ,किताब छापने के लिए नहीं। बिना फिर से टंकण कराये भी वे कागजी मुद्रण के लिए फॉन्ट तब्दीली कर सकते थे । लेकिन शायद कितबिया तब दुबरा जाती । किताब पर चर्चा के लिए उन्होंने दो गैर चिट्ठेकारों को बुलवाया । चिट्ठे पढ़ने वालों ने किताब में संकलित चिट्ठे आदि पढ़े होंगे इस आधार पर वे चिट्ठेकारों को भी किताब पर चर्चा के लिए बुला सकते थे। मुझे लगा कि वे जानबूझकर ऐसा नहीं करना चाहते थे। संचालन से अलग सेमिनार के किसी भी विषय पर बोलने लायक उन्होंने खुद  को नहीं समझा । ब्लॉगिंग के ’ नारद विवाद’ के दौरान भी मैंने पूर्वी उत्तर प्रदेश में कबड्ड़ी खेल में प्रचलित ’गूँगी कबड्डी’ का जिक्र किया था। (प्रथा समझने के लिए इस लिंक पर जांए ) । ’ प ’ बोलते वक्त होंठ बन्द हो जाते हैं । इसलिए ’चार सेना हड़प्प ’ बोल कर खिलाड़ी प्रतिद्वन्द्वी पाले में घुसता है । अपनी किताब का जिक्र जब सिद्धार्थ ने अपने ब्लॉग पर किया था तब किन्हीं ’बेनामी’ ने यह तथ्य अपनी टिप्पणी से प्रसारित कर दिया था कि किताब छापने वाली संस्था का कोषाध्यक्ष ही लेखक है । चिट्ठेकारी पर चर्चा के लायक तमाम जरूरी मुद्दों से ज्यादा तरजीह ’कुंठासुर’ – बेनामी वाले विषय को दी गयी थी । सिद्धार्थ को एक कविता छापने की नामंजूरी सार्वजनिक तौर पर मिली थी , घुघूती बासूती के ब्लॉग पर । एक दिन पहले किए गए सार्वजनिक आमन्त्रण से अलग निमन्त्रितों में घुघूती बासूती को नहीं शरीक किया गया था। हिन्दी चिट्ठेकारी करने वालों में दो मत न होगा कि घुघूती बासूती एक प्रमुख चिट्ठेकार है ।

उभरता सितारा : विनीत कुमार

उभरता सितारा : विनीत कुमार

इस सेमिनार के कारण कई ब्लॉगरों और मित्रों से पहलेपहल मिलने का मौका मिला । साहित्यिक ब्लॉगर और प्रिय मित्र प्रियंकर , प्रिय सांस्कृतिक – राजनैतिक कर्मी इरफ़ान , तेज तर्रार युवा खबरनवीस विनीत कुमार , जनतंत्र वाले समरेन्द्र ,विस्फोट वाले संजय तिवारी , हिन्दुत्ववादी- वरिष्ट -युवा ब्लॉगर प्रमेन्द्र तथा प्रगतिशील ब्लॉगर रेयाज-उल-हक़ , विज्ञान ब्लॉगिंग करने वाले बाल साहित्यकार जाकिर अली रजनीश ,विज्ञान और विज्ञान गल्प ब्लॉगिंग से जुड़े डॉ. अरविन्द मिश्रा,संगीत -व्यंग्य-नाटक और एनीमेशन से जुड़े युवा वकील ब्लॉगर कृष्ण मोहन मिश्र तथा मेरे पड़ौसी जिले चन्दौली के उभरते चिट्ठा – चर्चाकार हिमान्शु पाण्डे । हिन्दी विश्वविद्यालय के सन्तोष भदौरिया चिट्ठेकार तो शायद अभी नहीं हैं लेकिन उन से मिलने में गर्म जोशी का अहसास हुआ ।

मेरे मित्र विप्लव राही का लम्बे समय से आग्रह था कि मेरी समरेन्द्र से मुलाकात हो । समरेन्द्र को अलग टिकाया गया था । हांलाकि वह जगह हमारे अतिथि भवन से दूर न थी फिर भी सतसंगति का अवसर हम चूक गये ।

प्रियंकर / अध्यक्ष/भाषा -सत्र

प्रियंकर / अध्यक्ष/भाषा -सत्र

अभय की फिल्म सरपत दूसरी बार देखने का अवसर मिला । स्टेशन पर अनूप से पता चला कि के.के पाण्डे से फिल्म का डीवीडी मिला था । पहले पता चलता तो मैं निश्चित ही उनसे सम्पर्क करता,मिलना चाहता । केके काशी विश्वविद्यालय में एक युवा संगठन के प्रभारी होकर आये थे । उन्होंने अपने साथी कवि महेश्वर को अपना गुर्दा प्रदान किया था ।

मसिजीवी से दिल्ली में ब्लॉगवाणी के दफ़्तर में मुलाकात हुई थी । पहली बार मंच से बोलते सुना । उनकी शैली और लहजा सुन कर मुझे लगा कि इनका निर्धारण भौगोलिक इलाकों के अलावा भी होता है। मसिजीवी दिल्ली की एक संस्था में काम कर चुके हैं । उस संस्था से मुझसे परिचित एक व्यक्ति भी जुड़ा रहा है । मुझे भारी अचरज हुआ कि इन दोनों का लहजा और शैली असाधारण तौर पर समान हैं । वैसे , साथ काम करने वालों के बोलने ढंग का असर परस्पर तो होता ही है ।

मसिजीवी , प्रियंकर , अनूप,रविजी (बाँ. से दाँ.)

मसिजीवी , प्रियंकर , अनूप,रविजी (बाँ. से दाँ.)

विनीत कुमार की लेखन शैली से मैं हाल ही में परिचित हुआ था और प्रभावित भी । उसने दो सत्रों में अपने विचार बहुत ही स्पष्ट और नियोजित ढंग से रखे । सेमिनार के दौरान वह सीधे लोटपोट पर नोट्स ले रहा था ।

लोटपोट का प्रयोग यहाँ जानबूझकर किया गया है । जैसे नामवर द्वारा ’चिट्ठेकारी’ के अपहरण से अनूप आहत है और शब्द के जन्मदाता को सचेत कर रहा है वैसे ही ’लोटपोट’ का इस्तेमाल बिना श्रेय दिए चिट्ठा चर्चा की हेडिंग में कर दिया है । लाजमीतौर पर जनक पीडित होंगे/होंगी । ’ताकि सनद रहे वक्त पर काम दे’ , यह बात दर्ज की गई ।

अभय के फिल्म की ग्रामीण नायिका के परदे पर आते ही मेरे बगल में बैठे युवा में तेज हरकत हुई । यह युवा अधिवक्ता कृष्ण मोहन मिश्र था । अवसर पाते ही उसने बताया कि ८-९ वर्ष पहले उसने ’मैला आंचल’ में उस अभिनेत्री (गरिमा श्रीवास्तव?)के साथ अभिनय किया था। कृष्ण मोहन अपनी गाड़ी में हमें स्टेशन / बस स्टैण्ड छोड़ने जा रहा था । गाड़ी पत्थर गिरजा से स्टेशन वाली सड़क पर घूमी तो अनूप ने कहा कि निर्माता अभय बता रहे थे कि फिल्म में कहाँ से ट्विस्ट आता है । याद करने का प्रयास करने के बावजूद कृष्ण मोहन नायिका के पति (वास्तविक जीवन में ) का नाम याद न कर सके ।

समापन सत्र के अध्यक्ष ने एक परिभाषा उद्धृत करते हुए कहा कि समस्त संचित ज्ञान – निधि साहित्य का हिस्सा है  । इस प्रकार विज्ञान , कला ,खेल आदि सभी क्षेत्रों के चिट्ठों को साहित्य की परिधि में गिना जा सकता है । कृ्ष्ण मोहन ने फिर मुझे खुश होकर बताया कि इन्हें चिट्ठों के बारे में मैंने ही पहले पहल   बताया था ।

मैंने उम्मीद की थी जनमत के सम्पादक रामजी राय जो उद्घाटन सत्र में मौजूद थे आगे के सत्रों में भी रहेंगे तथा हमें उनके विचार सुनने को मिलेंगे । लगता है अन्य व्यस्तताओं के कारण ऐसा न हो सका।

जो भी विषय निर्धारित किए गए थे उन पर गंभीर चर्चाएं हुई । विनीत ने बताया कि ब्लॉगों पर महिला – लेखन और स्त्री विमर्श मजबूती से हुआ है । प्रियंकर ने अनाम चिट्ठेकारों की प्रभावशाली लेखन शैली से उनके अनाम होने से बाधा कत्तई नहीं आई है ,यह कहा । संजय तिवारी ने आगाह किया कि तकनीकी के परिवर्तनों में आ रहे त्वरण का चिट्ठेकारी पर भी प्रभाव पड़ सकता है तथा इसके प्रति हमे सचेत रहना पड़ेगा । डॉ. अरविन्द मिश्रा ने सन्तुलित ढंग से हिन्दी चिट्ठेकारी में विज्ञान लेखन की स्थिति का ब्यौरा दिया । चूंकि वे विज्ञान पर लिखने वालों में प्रमुख हैं इसलिए उनके द्वारा अपने और साइंस ब्लॉगर एसोशियेशन का कार्य विवरण न देना विषय के साथ अन्याय होता । वरिष्ट चिट्ठेकार उन्मुक्त के लेखन का भी उन्होंने हवाला दिया । वे आत्म प्रचार करते नहीं दिखे। मैंने इन्टरनेट के कथित खुलेपन पर बन्दिशें लगानी की साजिशों के बारे में लिखे एक लेख का जिक्र किया ।

’ अपना ’ प्रमेन्द्र दोनों दिन घर में चल रहे मरम्मत- काम से समय निकाल कर आया था । पहले दिन साथ में अदिति भी थी । विनीत के चिट्ठे पर आने के पहले जो लिस्ट छापी गयी थी उसमें भी उसका नाम था । प्रमेन्द्र का हवाला अलग अनुच्छेद में क्योंकि कहीं सरसरी तौर पर लिखा देखा कि हिन्दुत्ववादियों को नहीं बुलाया गया ।

चिट्ठेकार खुश थे की मुख्यधारा की एक संस्था ( गांधी हिन्दी वि. वि. ,वर्धा ) ने यह सेमिनार करवा दिया । हमें विश्वास है कि इस विश्वविद्यालय से जुड़े सन्तोष भदौरिया अपनी  टीम के सहयोग से सेमिनार में हुई चर्चा का दस्तावेजीकरण भी करेंगे । ऐसे आयोजनों में पहले से विभिन्न पहलुओं पर चिट्ठेकारों से परचे आमन्त्रित किए जाने चाहिए थे । प्रशिक्षण के लिए हिन्दी विश्वविद्यालय को रवि रतलामी जैसे विशेषज्ञों के सहयोग से कार्यशालायें चलाने की योजना चलानी चाहिए । ब्लॉगिंग से पहले तो इन्टरनेट की बाबत B.B.C Webwise जैसा कार्यक्रम हिन्दी में प्रस्तुत करना चाहिए ।

( ताजा कलम : अनूप ने इस रपट के बाद अपनी रपट में पुनश्च लगा कर सुधार कर लिया है।इस बहाने मुझे ता.क. चलाने का मौका मिला। गांधी के पत्रों में पुनश्च की जगह ता.क रहता था।ताजा कलम।मुझे पुनश्च से सुन्दर लगा था।हांलाकि अब कलम ही नहीं रही। )

एक शिक्षक कैसे पढ़ाएगा पांच कक्षाओं को?/उजड़े उखड़े गाँव की कहानी/बाबा मायाराम

[मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में वन्य प्राणियों के लिए तीन सुरक्षित उद्यान/अभयारण्य बनाए गए है– सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान, बोरी अभयारण्य और पचमढ़ी अभयारण्य। तीनों को मिलाकर फिर सतपुड़ा टाईगर रिजर्व बनाया गया है। तीनों के अंदर कुल मिलाकर  आदिवासियों के लगभग 75 गांव है और इतने ही गांव बाहर सीमा से लगे हुए है। इन गांवों के लोगों की जिंदगी और रोजी–रोटी का मुख्य आधार जंगल है। पर अब इन गांवों को हटाया जा रहा है। बोरी अभयारण्य का धांई पहला गांव है जिसे हटाया जा चुका है। बाबा मायाराम विस्थापन झेल रहे आदिवासियों पर मेरे चिट्ठों पर लिखते रहे हैं । प्रस्तुत है इस क्रम की दूसरी कड़ी। बाबा मायाराम की अति शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक में इस प्रकार के लेख होंगे । उन्होंने यह लेख इन्टरनेट पाठकों के लिए सहर्ष दिए हैं । कोई पत्रिका/अखबार/फीचर एजंसी/वेब साइट यदि इसे प्रकाशित करना चाहती है तो यह उम्मीद की जाती है कि पारिश्रमिक और कतरन बाबा मायाराम को भेजे। - अफ़लातून]
दोपहर भोजन की छुट्टी में बच्चे खेल रहे हैं। उछल–कूद रहे हैं। शिक्षक अपने कक्ष में बैठे कुछ लोगों से गप–शप कर रहे हैं। इसी समय मैं अपने एक सहयोगी के साथ नई धांई स्कूल पहुंचा। यह गांव नया है, जो वर्ष 2005 के आसपास ही अस्तित्व में आया है। पहले यह गांव बोरी अभयारण्य के अंदर बसा था। सतपुड़ा टाईगर रिजर्व के अंतर्गत आने वाले बोरी अभयारण्य के इस गांव को विस्थापित कर बाबई तहसील में सेमरी हरचंद के पास बसाया गया है।

एक साथ पांच कक्षाएं

एक साथ पांच कक्षाएं

नई धांई की बसाहट पूरी हो गई है। बड़े आकार के कबेलू (खपरैल) वाले मकान बन गए हैं। घरों के पीछे बाड़ी है, जिसमें मक्का बोया गया है। आधी–अधूरी पक्की सड़कें बन गई है। गांव में घुसते ही एक बोर्ड लगा है जिसमें नई धांई का मोटा–मोटी ब्यौरा दिया गया है। सतही तौर पर देखने में यहां सुंदर बसाहट और पुनर्वास का आभास मिलता है पर यहां के  बच्चों और ग्रामीणों से बात करने पर उजड़ने का दर्द छलकने लगता है।

यहां की आबादी 336 के करीब है। यहां के बाशिन्दे सभी कोरकू आदिवासी हैं। पुराना गांव धांई जंगल के अंदर था। जहां आदिवासियों का जीवन जंगल और आंशिक तौर पर  खेती पर आधारित था। नई बसाहट में यहां हर परिवार को 5–5 एकड़ जमीन मिली है। पर ज्यादातर खेतों में पेड़ के ठूंठ होने के कारण खेती में अड़चन आ रही है।

छुट्टी के बाद स्कूल फिर शुरू हुआ। यहां पांच कक्षाएं और शिक्षक एक है। नियुक्ति तो एक और शिक्षिका की है पर वह 3 माह के लिए प्रसूति अवकाश पर है। स्कूल में बच्चों की कुल दर्ज संख्या 78 है। जब शिक्षक से यह पूछा कि आप अकेले 5 कक्षाएं कैसे संभालते हैं ? शिक्षक ने इसके जवाब में आसमान की ओर देखा जैसे कह रहे हो– भगवान भरोसे। फिर संभलते हुए कहा कि गांव का एक और पढ़ा–लिखा लड़का स्वैच्छिक रूप से बच्चों की पढ़ाई में मदद करता है।

दीदी के साथ पढ़ते हैं

दीदी के साथ पढ़ते हैं

एक ही कमरे में सभी पांचों कक्षाओं  के बच्चे ठुंसे हुए थे। मैले–कुचैले और फटे–पुराने कपड़े पहने आपस में बतिया रहे थे। स्वैच्छिक मदद करनेवाला युवक कुर्सी पर बैठकर उन्हें पढ़ा रहा था। मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि वह कौन सी कक्षा के छात्रों को पढ़ा रहे हैं क्योंकि उनके हाथ में कोई किताब तो थी नहीं। जाहिर है जब उनकी नियुक्ति नहीं हुई है तो उन्हें पढ़ाने–लिखाने का कोई प्रशिक्षण भी नहीं मिला होगा।

जब मैंने कक्षा में जाकर बच्चों से बात करने की इच्छा जाहिर की। वह युवक अपने आप कुर्सी छोड़कर बाहर चला गया। जैसे वह इससे मुक्त होना चाह रहा था। तत्काल कक्षा हमारे हवाले कर दी। उस कमरे में शायद ज्यादा लोगों के बैठने की जगह भी नहीं थी। मैं बच्चों के साथ टाटपट्टी पर बैठ गया। शिक्षक ने हमें बच्चों से बात करने का मौका दिया। मैंने उनसे पूछा आपकी अपने पुराने गांव की सबसे अच्छी क्या याद है? सबने कोरस में जवाब दिया–नदी की।

इसके बाद उन्होंने एक के बाद एक नदियों के नाम गिनाएं–बोरी नदी, काकड़ी नदी और सोनभद्रा। सोनभद्रा यहां की बड़ी नदी है। कई और छोटे नदी–नाले हैं। छोटे–छोटे नदी घाटों के नाम बताएं। वे आगे कहते है कि हम इनमें कूद–कूदकर नहाते थे, डंगनियां से मछली और केकड़ा पकड़ते थे। अब यहां पानी ही नहीं है। वे सब तैरना जानते हैं। इनमें से कुछ नदियां सदानीरा है। इनमें साल भर पानी रहता है। वहां तो एक नदी में मगर भी रहता था।

क्या आपको जंगल से भी कुछ चीजें खाने की मिलती थी? इसके जवाब में दिलीप, सोनू, आशा और विजय आदि ने बहुत सारे फल, फूल और पत्तों के नाम गिनाए। जैसे तेंदू , अचार (जिसे फोड़कर चिरौंजी प्राप्त होती है) , कबीट , सीताफल , गुल्ली (महुए के बीज वाला फल)  , पीपल का बीज, जामुन, इमली, आम, बेर, मकोई, आंवला इत्यादि। उन्होंने कई जंगली जानवरों को भी देखा है– जैसे शेर, भालू, हाथी, सुअर, चीतल, नीलगाय, जंगली भैंसा, सोनकुत्ता, सियार, बंदर आदि।

इस बातचीत के दौरान धीरे–धीरे उनकी झिझक खत्म हो गई। उनका उत्साह बढ़ने लगा। वे वहां की कई बातें खुलकर बताने लगे। कक्षा में बहुत शोर होने लगा। हर बच्चा कुछ न कुछ बताना चाह रहा था। लड़के–लड़कियां सब कोई। उन्हें याद है वहां के पहाड़, पत्थर, पेड़, नदी और वहां का अपूर्व प्राकृतिक सौंदर्य। सोनू, दिलीप, आशा, सीमा, विनेश, विजय, रवि आदि कई बच्चों ने अपनी यादें साझा कीं। वे ऐसे बता रहे थे जैसे यह सब बातें कल की हो।
यहां का चौथी कक्षा में पढ़नेवाला अनिकेश कहता है मुझे यहां कुछ अच्छा नहीं लगता। जब वे अपने गांव से उजड़ रहे थे तब उसे पता भी नहीं था कि कहां जा रहे है। वह कहता है हम अपनी बात अपने मां–बाप से भी नहीं कह पाते। वे सुबह से काम पर चले जाते हैं। फिर उनसे क्या कहें ? जब कभी ज्यादा मन भर आता है तब दोस्तों के साथ पास ही सिद्ध बाबा चले जाते हैं। जब उससे यह पूछा कि अगर उसे कहीं और ले जाया जाए तो उसे क्या–क्या चीजें चाहिए जिनसे उसे अच्छा लगेगा। उसने जवाब दिया– नदी, जंगल, पहाड़ और गाय–बैल। मैं सोच रहा था कि इन जंगल क्षेत्र के बच्चों को अपने परिवेश, जंगल–पहाड़ कितने प्रिय हैं ? काश, उनके आसपास ये चीजें होती और उनके पाठ्यक्रम में होती।

यह साफ है कि अब इन बच्चों को वह स्वच्छ , ठंडा और खुला वातावरण नहीं मिलेगा। उन्हें जंगल, पेड़ , पहाड़ , पत्थर , नदियां नहीं मिलेगी , जिनसे वे रोज साक्षात्कार करते थे, वहां खेलते थे।  जंगली जानवर नहीं मिलेंगे, जिनके संग खेलकर वे बड़े हुए थे। वे फल–फूल, पत्तियां और शहद नहीं मिलेगी , जिसे वे यूं ही तोड़कर खा लिया करते थे। अब उनकी दिनचर्या और जिंदगी बदल गई है। अब नदी की जगह उनके पास हैंडपंप हैं जिनमें ज्यादा मेहनत करने पर पानी कम टपकता है। जंगल और पहाड़ उनकी स्मृतियों में हैं। इन बच्चों को ठीक से पता भी नहीं है ​कि वे जंगल के गांव से यहां क्यों आ गए ?

बच्चों से संबंधित तमाम कानूनों की मोटी किताबों में बच्चों के लिए बहुत से प्रावधान हैं। संयुक्त राष्ट्र का समझौता है। संविधान में शिक्षा व पोषण का अधिकार है। बच्चों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट का समझौता है। उस पर भारत सरकार ने 12 नवंबर 1992 को दस्तख्वत कर अपनी मुहर लगाई है। उसमें बच्चों के जीने का अधिकार , विकास का , सुरक्षा और सहभागिता का अधिकार दिए गए है।  लेकिन इसके बावजूद हमारे देश में बच्चों की हालत अच्छी नहीं है। मध्यप्रदेश में तो इस साल कई स्थानों से कुपोषण से मौतों की खबरें आई है। आदिवासियों में कुपोषण और भी अधिक है। विस्थापन जैसे जीवन में बड़े जीवन में बड़े बदलाव लानेवाले निर्णयों में बच्चों के बारे में विशेष ध्यान देने की जरूरत है। जीवन में उथल–पुथल लाने वाले ऐसे निर्णयों में उनकी सहभागिता होनी चाहिए। लेकिन उनसे कभी उनकी रूचियों व राय के बारे में नहीं पूछा जाता है। उनकी शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता है।

पाठशाला : नई धाईं

पाठशाला : नई धाईं

अक्सर विस्थापन के समय यह दलील दी जाती है कि बच्चों का भविष्य बेहतर होगा। और ग्रामीण भी अपने बच्चों का भविष्य जंगल के बाहर ही देखते हैं। यह स्वाभाविक है। लेकिन नई धांई के स्कूल को देखकर ऐसी कोई उम्मीद बंधती नजर नहीं आती। जहां पांच कक्षा और एक शिक्षक है। स्कूल के ही एक हिस्से में राशन का वितरण होता है। जबकि राशन का भंडारण बाजू में स्थित आंगनबाड़ी भवन में है। ऐसे में बच्चों के बेहतर भविष्य की उम्मीद नहीं की जा सकती।

- बाबा मायाराम

लेखक का सम्पर्क पता : अग्रवाल भवन , निकट पचमढ़ी नाका , रामनगर कॉलॉनी, पिपरिया , जिला – होशंगाबाद , मध्य प्रदेश , 461775 .

सिंथेटिक वस्त्र : एक महिला सामाजिक कर्मी का नोट / नीला हार्डीकर

[ ' खादी की राखी ’ पर मेरी एक पोस्ट पर नीला हार्डीकर ने एक गंभीर टिप्पणी डाक से भेजी थी । इसे मैंने अलग पोस्ट के रूप में प्रकाशित किया था । इसके साथ ही नीलाजी ने ’सिंथेटिक वस्त्रों’ पर एक सुन्दर नोट भी भेजा था। इसे आज प्रकाशित किया जा रहा है । कपड़ा नीति के बारे में इन तीन पोस्टों से जो चर्चा शुरु हुई है उनकी बाबत यदि कोई पाठक अपने विचार भेजना चाहे तो उनका स्वागत है ।

नीला हार्डीकर अवकाश प्राप्त शिक्षिका हैं और मध्य प्रदेश के मुरेना में महिलाओं और दलितों के साथ काम करती हैं । नर्मदा बचाओ आन्दोलन और मध्य प्रदेश में चलने वाले आदिवासियों , स्त्रियों , विस्थापितों के जन आन्दोलनों के साथ वे सक्रीयता से जुड़ी हैं । उनके प्रति आभार के साथ यह नोट प्रकाशित करते हुए मुझे खुशी हो रही है । ]

सिंथेटिक वस्त्र

गर्मी के के दिनों में मध्यप्रदेश में ४० डिग्री से ५० डिग्री तापमान आम बात है । ऐसे में , बस अड्डों पर, हाट – बाजारों में धूलधक्कड़-भरी दोपहरी में गरीब और मध्यम वर्गीय महिलायें सिंथेटिक साड़ियों में बैठी हमेशा ही मिलती हैं । इनमें वृद्धाएं , गर्भवती और बीमार महिलाएं भी होती हैं । पहले कभी ऐसे ताप में सूती वस्त्र शरीर को कुछ आराम पहुंचाते थे । अब , उस आराम की गरीब जन कल्पना भी नहीं करतीं , शायद कभी अनुभव भी नहीं किया है , क्योंकि , दो दशक से गांव , कस्बों की दुकानों से और गरीब घरों से सूती साड़ियां और अन्य वस्त्र गायब ही हो गये हैं । नवजात शिशुओं को भी सिंथेटिक वस्त्र पहनाए जाते हैं ।

रसोई घरों में मसालों की कपड़छान या भीगी दालों को बांधने के लिए सूती कपड़ा अब मुश्किल से मिलता है । चूल्हे से बर्तन उतारने के लिए सूती कपड़ा अब खरीदना पड़ता है ; घरों में चादरें भी सिंथेटिक होती हैं ।

कोक - पेप्सी विरोधी सभा , मुर्दहा

कोक - पेप्सी विरोधी सभा , मुर्दहा

सिंथेटिक का खतरा : सिंथेटिक वस्त्रों के उपयोग में सावधानियां लोगों को न उद्योग ने सिखाई , न स्कूलों ने । एक लड़की (जबलपुर जिले की घटना है ) स्टोव जला रही थी कि उसके दुपट्टे ने आग पकड़ ली । कुर्ता भी सिंथेटिक , सो आग जल्दी भड़की । इतना ही नहीं , जैसे ही लड़की की मां को पता चला , उसने आग बुझाने की नीयत से गुदड़ी निकाली और उसे लड़की के ऊपर डाला । किंतु हाय! वह गुदड़ी सिंथेटिक साड़ियों की बनी थी !! किस्सा ख़तम ।

महाराष्ट्र की महिलायें नौ गज की धोती पहनती हैं , जो शरीर से खूब चिपकी रहती है । २५ डिग्री से अधिक ताप में इस धोती का स्पर्श सतत अनचाहा होता है ।

ब्लाउज , कुर्ते , सलवार , शर्ट , पुरुषो और बच्चों के अन्य कपड़े – गरीबों के लिए सिर्फ सिंथेटिक ही उपलब्ध हैं ।

ये कपड़े सस्ते होने का लाभ किसको मिलता है ? क्या निम्न आय वर्ग इन्हें खरीदकर खुश है ? पता करना चाहिए । ज्ञात तथ्य यह है कि गांव , कस्बों , छोटे शहरों के बाजार में सूती वस्त्र मिलता ही नहीं । १९८० के दशक के मध्य तक कॉपरेटिव सोसायटियों में सूती धोतियां रियायती दर पर मिलती थीं । इनका वितरण बन्द कर दिया गया । यानी गरीबों और ग्रामीणों को मजबूर किया गया सिंथेटिक वस्त्र खरीदने और पहनने के लिए ।

सिंथेटिक वस्त्रों का उत्पादन सस्ता रखने में सरकारी हस्तक्षेप की कितनी भूमिका है ? इसके अलावा उसकी पर्यावरणीय कीमत क्या है ? इन वस्त्रों के उपयोग के अन्त में कचरा किस चीज को कितना प्रदूषित करता है ? इस सब का आंकलन लगाना चाहिए ।

सिंथेटिक धोती के लाभ एक महिला ने गिनाए : ” धोती चमकदार होती है और टिकती ज्यादा है । “

- नीला हार्डीकर

(सम्पर्क – hneelaATyahooDOTcom)

जयप्रकाश : जन्मजात योद्धा : महात्मा गांधी

गांधीजी की नजर में जेपी

    जयप्रकाश जमजात योद्धा है , उसने अपने देश की मुक्ति के लिए सबकुछ का त्याग किया है । परिश्रम और प्रयत्न करने से वह कभी चूकता नहीं । कष्त और यातना सहने की उसकी क्षमता का कोई जवाब नहीं ।
    - महात्मा गांधी

    यह सम्पूर्ण क्रान्ति है

    यह संघर्ष केवल सीमित उद्देश्यों के लिए नहीं हो रहा । इसके उद्देश्य तो बहुत दूरगामी है: भारतीय लोकतंत्र को ’ रीयल ’ याने वास्तविक तथा सुदृढ़ बनाना है ,जनता का सच्चा राज कायम करना है , समाज से अन्याय , शोषण आदि का अन्त करना , एक नैतिक , सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक क्रान्ति करना , नया बिहार बनाना और अन्ततोगत्वा नया भारत बनाना है । यह सम्प्पूर्ण क्रान्ति है – total revolution है । और इसके आप अगुआ हैं । यह बड़ा कठिन है , परन्तु आपकी सफलता निश्चित है , क्योंकि यह युगधर्म की पुकार है ।
    - ( ५ जून ’७४ को पटना के गांधी मैदान में आयोजित विराट जन-सभा में दिए गए ऐतिहासिक भाषण की टेप – ट्रान्स्क्रिप्ट से )

    ( दोनों चित्र राजनारायण लाल )

मों ब्लां कलम-कम्पनी से तुषार गांधी ने ७२ लाख रुपये लिए हैं

फाउन्टेन पेन बनाने वाली जर्मन कम्पनी मों ब्लां द्वारा ’डांडी यात्रा से प्रेरित हो कर’ कुल २४१ की संख्या में गांधी-छाप फाउन्टेन पेन बनाने की खबर आप सब जानते हैं । इस कलम की कीमत भारत में ११.३९ लाख है ,यह भी जानते हैं। गांधी के प्रति समझदारी और आदर से प्रेरित हो कर भारत वर्ष के कई नागरिकों ने इस व्यावसायिक कदम पर अपनी राय और गुस्सा प्रकट किया ।
इस मौके पर ताज महल होटल में हुई प्रेस कॉन्फ़रेंस में पहली बार भारत पधारे कलम कम्पनी के सी ई ओ लुट्ज़ बेथगे और १९९४ से भारत में मों ब्लां कलम बेचने का अधिकार प्राप्त कम्पनी एन्ट्रैक के अध्यक्ष दिलीप दोशी के अलावा एक विशिष्ट व्यक्ति मौजूद था । यह था, अरुण मणिलाल गांधी का पुत्र तुषार गांधी ! गांधीजी का वह प्रपौत्र जो पहले सपा में फिर कांग्रेस में रहा !
उस कमरे के एक छोर पर लकड़ी की एक संग्रहालयों में पाया जाने वाली किस्म की मेज थी। इस पर ’महात्मा गांधी लिमिटेड एडिशन २४१’ कलम तथा गांधी जैसा एक चश्मा दैदिप्यमान थे और गांधी-छाप लेबल लगी लाल स्याही की एक दवात भी रखी हुई थी । Gandhi-pen-1-162x300
कमरे के दूसरे छोर पर चाय – कॉफ़ी नाश्ता था । सुनने वाले सिर्फ़ पत्रकार ही नहीं थे- कुछ फैशनजादे और अफ़सर भी थे । बेथगे ने बताया कि चूँकि डाँडी यात्रा में गाँधी २४१ मील चले थे इसलिए कुल इस कलम के २४१ ही सेट बनाये गये हैं ।
जर्मन सी ई ओ ने हर्मन के उपन्यास ’सिद्धार्थ’ का उदाहरण दिया – यह जताने के लिए कि जर्मन लोग भारत को कितना प्यार करते हैं । दोशी ने यह बताया कि मों ब्लां को सांस्कृतिक विरासत की रक्षा की कितनी परवाह है और यह कलम हासिल करना संग्रहकर्ताओं के लिए कितनी जरूरी होगी !
तुषार ने कहा कि बैरक ओबामा को यह कलम हासिल करनी चाहिए और उसीसे शान्ति करारों पर दस्तख़त करने चाहिए । तुषार को कम्पनी की तरफ़ से कलम का पहला सेट तथा उसकी निजी दुकान ’ महात्मा गांधी फाउन्डेशन’ के लिए ७२ लाख रुपये दिए गए । उसने बताया कि कुछ साल पहले उसने डांडी यात्रा के मार्ग पर यात्रा की थी ।
मित्रों , इस समूचे प्रकरण के सन्दर्भ में कदाचित गांधी क्या करते ? सौ खण्डों में छपे सम्पूर्ण गांधी वांग्मय के मूल रचयिता का कलम – दवात से क्या मजबूत नाता रहा होगा ? खुद से व्यावसायिकता को जोड़ने की बाबत कितना सौम्य प्रतिवाद जताते,बापू ? एक खूबसूरत चित्र और स्केच सहित गोपालकृष्ण गांधी ने अपने करुणा-प्रेरित अन्वेषण को दो अक्टूबर के ’द हिन्दू’ में अभिव्यक्ति दी है । वह लेख करोड़ों लोगों के आघात की न्यायपूर्ण अभिव्यक्ति है ।
( विवरण संयुक्ता शर्मा के ब्लॉग के आधार पर है ।

डाक से प्राप्त दो महत्वपूर्ण टिप्पणियों को सलाम

ब्लॉगिंग का एक मूल स्वरूप रोजनामचा लिखने का रहा है । वेब + लॉग में ’लॉग’ के लिए हिन्दी शब्द फादर कामिल बुल्के के अनुसार – रोजनामचा , यात्रा – दैनिकी , कार्य- पंजी भी है । इस हिन्दी सेवी ऋषि की जन्म-शताब्दी वर्ष पर उनके कोश का उपयोग करते हुए ,पुण्य स्मरण के साथ यह पोस्ट ।
तो, पिछले सत्तर से ज्यादा वर्षों से रोजनामचा या दैनिन्दनी लिखने वाले ब्लॉगिंग विरोधी एक सज्जन यह मानते रहे हैं कि इन्टरनेट पर लेखन और प्रकाशन फौरी-तुष्टीकरण ( instant gratification) मात्र का जरिया है । – ’फौरी तुष्टीकरण’ को ’तात्कालिक सन्तुष्टि’ कह देने पर मैं उनके आरोप को कबूलने के लिए तैयार था । उनका आगे कहना था कि ’कागज पर छपे का भविष्य के लिए महत्व है ’ (इन्टरनेट पर छपा हुआ मानो लम्बी अवधि तक नहीं देखा जाएगा) ।
सामाजिक जीवन-यात्रा में गुजराती , हिन्दी और अंग्रेजी में चार दर्जन से अधिक छोटी – बड़ी पुस्तकें लिख चुके इन महाशय को खादी पर लिखी मेरी पोस्ट का प्रिन्ट आउट मेरी भान्जी चारुस्मिता (दुआ) ने दिया । उन्होंने उसी दिन एक पोस्ट कार्ड उसकी बाबत मुझे लिख भेजा ।
यह कहने में मुझे लेशमात्र दुविधा नहीं है कि दिसम्बर , २००३ से अब तक हुई मेरी चिट्ठेकारी (शुरुआत अंग्रेजी से हुई थी । तब ब्लॉगर को गूगल ने नहीं खरीदा था।) पर की गई यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण टिप्पणियों में एक है ।
टिप्पणी प्रस्तुत करने के पहले टिप्पणीकार की बाबत कुछ जरूरी बातें । वे सेवाग्राम में गांधीजी द्वारा स्थापित ’खादी विद्यालय’ के शुरुआती विद्यार्थियों में थे । (चिट्ठेकार संजीत त्रिपाठी के पिता भी उस वक्त उनके सहपाठी थे ।)
४ – ५ साल की उम्र से चरखा चलाना सीखा तथा ११-१२ वर्ष की उम्र में इन्होंने टाइपिंग सीखी । महात्मा गांधी द्वारा हिटलर को भेजा गया एक ऐतिहासिक पत्र उन्होंने टाइप किया था, यह उन्हें स्मरण है । चरखा चलाने के पराक्रम में दो कातने वालों द्वारा दिन-रात लगातार चरखा चलाना उल्लेखनीय है। अपनी पुस्तक ’बापू की गोद में’ (ब्लॉग-किताब के रूप में उपलब्ध) में टिप्पणीकार अपने शैशव में चरखे और कातने के महत्व पर गौर कराने वाली यह बातें लिखते हैं :

…लेकिन इस तरह के धार्मिक और सामाजिक त्योहारों को भी पीछे छोड़ने वाली याद चरखा – जयन्ती ( रेटियो बारस ) की है । बापू के आश्रम में बापू का ही जन्मदिन? यह कैसा शिष्टाचार ? लेकिन इस जन्मदिन को बापू ने अपना जन्मदिन माना ही नहीं था ।यह तो चरखे का जन्मदिन था । इसलिए स्वयं बापू भी हमारे साथ उसी उत्साह से उसमें शरीक हो जाते थे । लोगों से बचने के लिए उस रोज उनको कहीं भाग जाना नहीं पड़ता था और न उस दिन के नाटक का उनको प्रमुख पात्र बनना पड़ता । उस दिन बापूजी एक सामान्य आश्रमवासी की तरह ही रहते थे । कभी हमारी दौड़ की स्पर्धा में समय नोट करने का काम करते , तो कभी – कभी हमसे बड़े लड़कों के कबड्डी के खेल में हिस्सा लेते । कभी – कभी हम लोगों के साथ साबरमती नदी में ( बाढ़ न हो तब ) तैरते भी थे । शाम को हमें भोजन परोसते और रात को अन्य आश्रमवासियों की तरह नाटक देखने के लिए प्रेक्षक के रूप में बैठ जाते । उस दिन का प्रमुख पात्र होता था चरखा । चरखा – द्वादशी का दिन गांधी – जयन्ती का भी दिन है , यह तो दो – चार चरखा – द्वादशियों को मनाने के बाद मालूम हुआ .

आजकल चरखा – द्वादशी के दिन बापू की झोपड़ी या बापू के मन्दिर खड़े किये जाते हैं । उनके फोटो की तरह – तरह से पूजाएँ की जाती हैं और सूत की की अपेक्षा टूटन का ही अधिक प्रदर्शन दिखाई देता है । लेकिन उन दिनों का जो दृश्य मेरी आँखों के सामने आता है , उसमें बापू का फोटो कहीं भी नहीं देखता हूँ । अखण्ड सूत्रयज्ञ उस समय भी चलते थे । विविध प्रकार के विक्रम ( रेकार्ड ) तोड़ने में हम बच्चों को अपूर्व आनन्द और उत्साह रहता था। कोई सतत आठ घण्टे कात रहा है तो दो साथी एक के बाद एक करके २४ घण्टे अखण्ड चरखा चालू रखते हैं । दिनभर काते हुए सूत के तारों की संख्या नोट कराने में एक – दूसरे की स्पर्धा चलती ।

(सन्दर्भ)

नारायण देसाई उर्फ़ बाबूभाई

नारायण देसाई उर्फ़ बाबूभाई

अपने पिता महादेव देसाई की जीवनी ’अग्नि कुंडमा खिलेलू गुलाब’ के लिए उन्हें केन्द्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था तथा महात्मा गांधी की वृहत जीवनी ’मारू जीवन ए ज मारी वाणी’ के लिए ज्ञानपीठ का मूर्तिदेवी पुरस्कार । लाजमी तौर पर ’गांधी और खादी’ जीने के प्रयास के अलावा उनके ग्रन्थों के लिए किए गए शोध के भी विषय रहे हैं ।
पोस्ट कार्ड नादे

पोस्ट कार्ड नादे

(चित्र : संजय पटेल,इंदौर के सौजन्य से। सभी चित्रों को बड़े आकार में देखने के लिए उन पर खटका मारें)
हांलाकि इनकी लिखावट पाठकों के लिए ’हिंसक’ नहीं है फिर भी पत्र का मजमून टाइप कर दे रहा हूँ :
१५.१०.२००९(त्रृटि) (१८.९. की मुहर)
संपूर्ण क्रांति विद्यालय
प्यारे आफ़लू ,
आज खादी संबंधी तुम्हारे लेख (?) का प्रिन्ट आउट दुआने दिया। सुना कि तुमने सूत की गुण्डी के नाप संबंधी हिसाबमें तो तुमने दुरुस्ती कर ली है : (एक) गुण्डी = १००० मीटर ।
need – greed वाला उद्धरण गांधी का नहीं है । हालाँकि प्यारेलालजी ने लास्टफेजमें पार्ट II पृ. ५५२ पर इसका उपयोग गांधीजी के नाम से किया है । जान पड़ता है यह चमात्कारिक उद्धरण गांधीजी ने भी किया होगा । Oxford Dictionary of Quotations (ने) इसके लेखक का नाम Frank Buchman बताया जो उनकी Legacy of Frank Buchman में Legacy Chapter 15 में छपा है ।
यह जानकारी तुम कहाँ से लाये कि “जब आचार्यजी कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव थे तब जवाहरलाल नेहरू चवन्निया सदस्य भी नहीं थे?” आचार्य कई वर्षों तक कांग्रेस महासचिव जरूर थे । उसमें से कुछ वर्ष जवाहरलालजी अध्यक्ष थे ।
खादी का बुनियादी नियम यह था कि खादी के दाम पर व्यवस्था खर्च अमुक प्रतिशत से अधिक नहीं बढ़ना चाहिए । इसलिए खादी कमीशन की वर्तमान नीति पर तुम्हारी आलोचना सटीक है ।
प्यार,
बाबूभाई.

सूत की गुण्डी सम्बन्धी सूचना में किसी अन्य पाठक द्वारा मेरी भूल को सुधार दिया जाएगा , मैं इस खुशफ़हमी में था । अतएव, साल भर के लिए जरूरी कपड़े के लिए एक व्यक्ति द्वारा १००० किलोमीटर सूत कातने की आवश्यकता होती है ।
आचार्यजी का कथन मैंने गांधी विद्या संस्थान,वाराणसी के अतिथि भवन में जेपी आन्दोलन के दौर में उनके मुख से सुना था तथा स्मृति के आधार पर उद्धृत किया था । अब लगता है कि मुमकिन है यह बात उन्होंने श्रीमती इन्दिरा गांधी के बारे में कही हो। इस बाबत और जानकारी जुटाने की जरूरत है ।
टिप्पणी के अंतिम वाक्य द्वारा इन्टरनेट सम्बन्धी टिप्पणीकर्ता की धारणा (’हृदय’ नहीं कह रहा) में कोई तब्दीली आई होगी , क्या यह माना जा सकता है ?
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जनसत्ता के समांतर स्तंभ में मेरे ब्लॉग से ली गई इसी प्रविष्टी को पढ़कर सुश्री नीला हार्डीकर ने मुझे एक पत्र लिखा है। मेरे साथियों से फोन नम्बर मालूम कर उन्होंने यह बताया कि वे नेट पर हिन्दी टाइपिंग नहीं जानती इसलिए हाथ से लिखा ख़त भेज रही हैं । नीला हार्डीकर अवकाशप्राप्त शिक्षिका हैं तथा मध्य प्रदेश के जन आन्दोलनों से कई दशकों से जुड़ी रही हैं । उन्होंने ’सिंथेटिक वस्त्र’ पर अपनी स्वतंत्र टिप्पणी भी भेजी है जिसे अलग से प्रकाशित किया जाएगा । फिलहाल , ’खादी की राखी’ पर उनकी मूल्यवान टिप्पणी का चित्र तथा टाइप किया हुआ पाठ :

नीला हार्डीकर का पत्र

नीला हार्डीकर का पत्र


मुरेना (म.प्र.)
२८ सितम्बर,२००९
प्रिय अफलातून ,
२४.९.०९ के जनसत्ता में ’खादी की राखी’ पढ़ा । मुद्दे महत्वपूर्ण उठाए हैं आपने , जैसे वस्त्र का बाजार धीरूभाई को उपलब्ध कराना । मैं इतने साल से सोच रही हूँ – राजीव गांधी को क्या रिश्वत मिली होगी इसके लिए । अब अगली स्टेप है ए डी बी की मदद से खादी बेचना ।
मुझे लगता (है) सरकार के उस छोटे फैसले के जो बड़े नतीजे निकले उनका अच्छी तरह अध्ययन होना चाहिए । एक ग्रूप हो जो यह काम करे । कई आयामों पर एक साथ तथ्य संकलन , विश्लेषण करना होगा । उदाहरण के लिए
१. सिन्थेटिक कपड़ों के लाभ नुकसान.
२. गांव , कस्बों के बाजार से और गरीब घरों से सूती वस्त्र गायब होना.
३. बुनकरों की दुर्गति .
४. रंगों की फैक्टरियां खत्म , रंगरेजों का भट्टा बैठना .
५. डिटर्जण्ट्स आदि का जमीन तथा जलस्रोतों पर प्रभाव .
६. सिन्थेटिक धागा non bio-degradable होना.
७. ——-
छानबीन इस सवाल की भी होनी चाहिए कि ADB के लिए महौल बना कैसे ? शायद इस तरह :
अ) कि , खादी अब गरीब का वस्त्र बचा नहीं .
ब) कि , खादी = सादगी से शुरु करके खादी = सत्ता के रास्ते हम खादी = पाखण्ड तक पहुंच चुके हैं .
स) कि, गांधी के चरखे से अब बी.टी. कॉटन का सूत कतता है ।
जब स्वालंबन का बीज ’ मोन्सेण्टो’ के हाथों गिरवी है , तब स्वाव्लंबन के सूत्र संभालना काफी है ? संभव है ?
ये सारे ( और भी कई ) पहलुओं का एकसाथ अध्ययन करके , स्थिति का qualitative के साथ quantitative आकलन करके क्या हम विकल्प का रास्ता ढूंढ़ सकते हैं ?
मैं उपरोक्त बिन्दुओं में से कुछेक पर अपने निरीक्षण लिख रही हूँ । इनमें बहुतों को बहुत कुछ जोड़ना होगा । किसी सामूहिक अध्ययन की कोशिश संभव हो तो बताएं ।
मेरा परिचय स्वाति थोड़ा बहुत देंगी । रिटायर्ड शिक्षिका हूँ । सुनील , स्मिता से मिलती रहती हूँ ।
शुभेच्छाओं सहित,
नीला
९४२५१ २८८३६ , hneelaATyahooDOTcom
नीलाजी ने विषय को जरूरी एवं गंभीर विस्तार दिया है । मुझे उम्मीद है कि उनका ख़त और ’सिंथेटिक वस्त्र ’ विषयक टिप्पणी ( अगली पोस्ट में प्रकाश्य ) एक पहल की शुरुआत होंगे। दोनों टिप्पणीकर्ताओं का अत्यंत आभारी हूँ । नीलाजी को नेट पर हिन्दी टाइप करने , मेल करने आदि की बाबत लिख रहा हूँ ।