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‘’ शिक्षा का बाजार एक विकृति है । किसी भी आधुनिक समाज में शिक्षा के बाजार का मतलब क्या है ? हमारे शिक्षण संस्थानों को पहले हम शिक्षा का मंदिर कहते थे । अब वे शिक्षा की दुकानें बन गई हैं । वहां मुनाफाखोरी चल रही है , घोटाले हो रहे हैं । इसमें यही होगा। भोपाल में व्यापमं (व्यावसायिक परीक्षा मंडल , मध्य प्रदेश ) घोटाला हुआ। मेडिकल की सीटों के लिए आज दस से बीस लाख रुपए लिए जा रहे हैं , चारों तरफ यह हो रहा है । होशंगाबाद में ५ – ६ बी.एड. कॉलेज खुल गए हैं और वहां चालीस हजार फीस है और एक लाख दे दीजिए तो बिना एटैण्डेंस (उपस्थिति) आपको सब मिल जाएगा और आप पास भी हो जाएंगे । यह शिक्षा के बाजार का परिणाम है । बाजार में उसी के लिए जगह है जिसके पास पैसा है । बाज़ार जो टुकड़े व जूठन फेंकेगा , आप उसे उठा सकते हैं ।‘’
‘’ बाजारीकरण क्यों बढ़ रहा है ? निजीकरण की मांग जनता की ओर से नहीं आई । यह विश्व बैंक द्वारा भारत की शिक्षा नीति और व्यवस्था को प्रभावित करके शिक्षा का बाजारीकरण किया गया है । इसमें नेताओं के अपने स्वार्थ हैं । वे सब शिक्षा के इस धंधे में कूद पड़े हैं । जितने भी स्कूल – कॉलेज – मेडिकल ,इंजीनियरिंग , बी.एड हैं – सब नेताओं ने खोल लिए हैं। यह आज उनका निहित स्वार्थ बन गया है। सभी सरकारें शिक्षा के निजीकरण को अंधाधुंध तरीके से बढ़ावा दे रही हैं। इस देश में शिक्षा का धंधा सबसे ज्यादा मुनाफेवाला , सबसे ज्यादा अनियंत्रित और सबसे ज्यादा तेजी से बढ़ने वाला धंधा बन गया है। बड़े – बड़े नेताओं से लेकर छुटभैया नेताओं तक सब इसमें टूट पड़े हैं । इसमें अनाप – शनाप लूट और शोषण है और देश का नुकसान है ।‘’
‘’……… निजी स्कूल का मतलब ही भेदभाव है । जिसके पास पैसा है , उसका बच्चा ऊंचे स्कूल में पढ़ेगा । जिसके पास और पैसा है , उसका बच्चा विदेश में पढ़ने जाएगा । जिसके पास पैसा नहीं है और जो सबसे ज्यादा उपेक्षित , गरीब व मजदूर का बच्चा है , वह सरकारी स्कूल में जाएगा। शिक्षा में भेदभाव, स्वास्थ्य में भेदभाव। बच्चे तो भगवान की देन हैं फिर आप उन बच्चों में भेदभाव क्यों कर रहे हैं ? आपकी समान अवसर की बात सिर्फ एक ढकोसला है । शिक्षा में भेदभाव नहीं होना चाहिए।…‘’
( लोकसभा चुनाव , २०१४ के दौरान राजनीतिक दलों के साथ शिक्षा नीति पर ०७ अप्रैल २०१४ को भोपाल में आयोजित संवाद में सुनील ,राष्ट्रीय महामंत्री ,समाजवादी जनपरिषद के विडियो रेकार्डिंग से लिप्यांतरित ।)
- ‘भारत शिक्षित कैसे बने?’,ले. सुनील,प्रकाशक – किशोर भारती ,अप्रैल २०१४, पृ. ४६ – ४७ से उद्धरित ।

अफ़लातून अफलू:

अनुवादक अखिल कात्याल को बधाई । जैसे अंग्रेजी न जानने वाले प्रणोय राय को जानने वालों में कम हैं वैसे ही अंग्रेजी जानने वालों में किशनजी को जानने वाले कम होंगे – इसलिए अखिल कात्याल और काफिला का आभार।

Originally posted on Kafila:

Translated from the original Hindi by Akhil Katyal

Kishen Pattnayak (1930-2004) was a socialist thinker and writer. He had been a member of the Indian parliament from Orissa. Pattanayak was the founding editor of a Hindi monthly periodical called ‘Samayik Varta’. In this Hindi essay ‘Professor Se Tamashgeer’ published in March, 1994, he understands Prannoy Roy as representative of a new class of intellectuals which came into being precisely with the changing economic policies of the Indian government in the early ’90s.

Those who do not know English in this country might not know Prannoy Roy. But knowing him is important because Prannoy Roy represents a new social phenomenon. Prannoy Roy’s fame has been sealed by the program “The World This Week” running every Friday on Doordarshan. Not unlike a magician putting on a show, it has lately become quite an art for Doordarshan to concentrate the attentions of the…

View original 2,041 more words

मोदी सरकार के आज के इस निर्णय का सभी लोग विश्लेषण करें; जिसमे

हुर्रियत नेताओं और पाक उच्चायुक्त की बातचीत से नाराज भारत सरकार ने पाकिस्तान से बातचीत रद्द कर दी है। 25 अगस्त को इस्लामाबाद में दोनों देशों के विदेश सचिवों के बीच वार्ता होनी थी. रिश्तों को पटरी पर लाने के लिए होने वाली इस बातचीत के रद्द होने से दोनों देशों के बीच रिश्तों के भविष्य पर क्या असर पड़ेगा?

 
मुझे लगता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा भा ज पा का तर्क हीन मुस्लिम द्वेषी दिमाग भारत की विदेश नीति को बरबाद कर के ही रहेगा. और उस पर तड़का लगा हुआ है नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व जो अंदर से बहुत कमजोर है।  अपने भद्दे और भड़काऊ चुनाव भाषणो से मोदी ने अपने रा स्वं  सं जैसे दिमाग वाली  बड़ी भीड़ को मुस्लिम विरोध  के लिए उत्तेजित  दिया है. वार्ता को रद्द करने का फैसला शायद दो वजह से लिया गया है – 1 . विपक्षी पार्टियों द्वारा पाक सीमा पर हो रही फ़ौजी झड़पों पर मोदी का उपहास  2 . कमजोर मोदी की यह मानसिक जरूरत कि उसे मुस्लिम विद्वेषी भीड़ की नज़र में बहादुर दीखना चाहिए।
वार्ता रद्द करने के  लिए यदि कोई और खुफिया सूचना सरकार के पास होती  तो हुर्रियत नेता के पाकिस्तानी उच्चायुक्त से मिलने  पहले ही इस्लामाबाद बैठक रद्द करने की घोषणा सरकार  कर चुकी होती.
हुर्रियत जैसे किसी एक निस्तेज और छिन्न भिन्न हो चुके अलगाव वादी संगठन  नेता का पाकिस्तानी उच्चायुक्त से मिलना ऐसी बड़ी शरारत नहीं है जिसकी वजह से दोनों देशों के बीच पूरी कूटनीतिक प्रक्रिया तोड़ दी जाय। कूटनीतिक प्रक्रिया को तोड़ने से दोनों देशो  बीच ढेरों संभावित प्रगति – आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक, व्यापार, क्षेत्रीय (सार्क), खेल कूद सहयोग, सिविल सोसायटी के आदान प्रदान, ये सभी इससे रुक जाते हैं. आम ज्ञान है कि लड़ाई और कूटनीति दोनों साथ चलते रहते हैं।
सभी देशों के राजदूत तो मेज़बान देश के बिभिन्न नागरिकों से मिलते ही रहते हैं. पाकिस्तान में ज्यादा लोकतांत्रिक व्यवस्था के पैरोकार किसी संगठन के  नेता से क्या इस्लामाबाद स्थित भारतीय राजदूत को नहीं मिलना चाहिए ? क्या पाकिस्तानी सरकार ऐसी किसी मुलाक़ात से क्या कूटनीतिक प्रक्रिया को तोड़ देगी?
इस सरकार, भा ज पा, और वर्त्तमान में देश का सबसे बड़ा संकट यह है कि आगे सरकार के  सारे निर्णय केवल एक व्यक्ति नरेंद्र मोदी के दिमाग से लिए जाएंगे. अभी भा ज  पा  के सारे छोटे- बड़े  नेता और  मन्त्री इतने दास और ग़ुलाम दिमाग के हैं कि मोदी स्वयं सारे महत्वपूर्ण निर्णय लेगा।  वह कोई बड़ा काम किसी दूसरे नेता , मन्त्री या अफसरों के जिम्मे छोड़ेगा ही नहीं। किसी से निर्णायक सलाह भी नहीं लेगा. कोई मंत्री, पूरा काबीना या अफसर में निर्णय करने का अधिकार माँगने की हिम्मत भी नहीं है. इंदिरा गांधी की कार्य शैली को याद करें।
 जिन थैली शाहों, उद्योग पतियों की ग़ुलामी वह कर रहा है वे देश चलाने के  राजनीतिक और नीतिगत मामलों में गलत ही सलाह देंगे.
इस नए नैपोलियन का वाटरलू वही होगा।  लेकिन तब तक  देश बरबाद  हो चुका होगा.
आप सब 5 साल पूरा होने के बहुत पहले ही इस सरकार को हटाने की कोशिश में जी जान से लग जाएं। पहला कदम है अगले विधान सभा चुनावों में भा जा पा को सत्ता से बाहर रखने  लिए अन्य सभी  दलों के बीच राजनीतिक समझौते और बिहार जैसा महा गठबंधन.
 
-चन्द्र भूषण चौधरी

पिछला भाग
आअधुनिक केंद्रित व्यवस्थाओं में ऊंचे ओहदे वाले लोग अपने फैसले से किसी व्यक्ति को विशाल धन राशि का लाभ या हानि पहुंचा सकते हैं । लेकिन इन लोगों की अपनी आय अपेक्षतया कम होती है । इस कारण एक ऐसे समाज में जहां धन सभी उपलब्धियों का मापदंड मान लिया जाता हो व्यवस्था के शीर्ष स्थानों पर रहने वाले लोगों पर इस बात का भारी दबाव रहता है कि वे अपने पद का उपयोग नियमों का उल्लंघन कर नाजायज ढंग से धन अर्जित करने के लिए करें और धन कमाकर समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करें । यहीं से राजनीति में भ्रष्टाचार शुरु होता है । लेकिन विकसित औद्योगिक समाजों में व्यवस्था की क्षमता को कायम रखने के लिए नियम कानून पर चलने और बरारबरी की प्रतिस्पर्धा के द्वारा सही लोगों के चयन का दबाव ऐसा होता है जो ऐसे भ्रष्टाचार के विपरीत काम करता है ।ऐसे समाजों में लोग भ्रष्ताचार के खिलाफ सजग रहते हैं क्योंकि इसे कबूल करना व्यवस्था के लिए विघटनकारी हो सकता है । हमारे समाज में भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसे व्यवस्थागत मूल्यों का निर्माण नहीं हो पाया है । इसके विपरीत जहां हमारी परंपरा में संपत्ति और सामाजिक सम्मान को अलग – अलग रखा गया था वहीं आज के भारतीय समाज में संपत्ति ही सबसे बड़ा मूल्य बन गयी है और लोग इस विवेक से शून्य हो रहे हैं कि संपत्ति कैसे अर्जित की गई है इसका भी लिहाज रखें । इस कारण कोई भी व्यक्ति जो चोरी , बेईमानी , घूसखोरी तथा हर दूसरी तरह के कुत्सित कर्मोम से धन कमा लेता है वह सम्मान पाने लगता है। इस तरह कर्म से मर्यादा का लोप हो रहा है।
आधुनिकतावादियों पर , जो धर्म और पारंपरिक मूल्यों को नकारते हैं तथा आधुनिक उपकरणों से सज्जित ठाठबाट की जिंदगी को अधिक महत्व देते हैं , भ्रष्ट आचरण का दबाव और अधिक होता है । इस तरह हमारे यहां भ्रष्टाचार सिर्फ वैयक्तिक रूप से लोगों की ईमानदारी के ह्रास का परिणाम नहीं है बल्कि उस सामाजिक मूल्यहीनता का परिणाम है जहां पारंपरिक मूल्यों का लोप हो चुका है पर पारंपरिक वफादारियां अपनी जगह पर जमी हुई हैं । इसी का नतीजा है कि आधुनिकता की दुहाई देने वाले लोग बेटे पोते को आगे बढ़ाने में किसी भी मर्यादा का उल्लंघन करने से बाज नहीं आते । चूंकि हमारे समाज में विस्तृत परिवार के प्रति वफादारी के मूल्य को सार्वजनिक रूप से सर्वोपरि माना जाता रहा है कुनबापरस्ती या खानदानशाही के खिलाफ सामाजिक स्तर पर कोई खास विरोध नहीं बन पाता। आम लोग इसे स्वाभाविक मान्कर नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसी स्थिति में इनका विरोध प्रतिष्ठानों के नियम कानून के आधार पर ही संभव हो पाता है ।
ऊपर की बातों पर विचार करने से लगता है कि जब तक संपत्ति और सत्ता का ऐसा केंद्रीयकरण रहेगा जहां थोड़े से लोग अपने फैसले से किसी को अमीरऔर किसी को गरीब बना सकें और समाज में घोर गैर-बराबरी बनी रहेगी तब तक भ्रष्टाचार के दबाव से समाज मुक्त नहीं हो सकता । यही कारण है कि दिग्गज स्वतंत्रता सेनानी और आदर्शवादी लोग सत्ता में जाते ही नैतिक फिसलन के शिकार बन जाते हैं । एक ऐसे समाज में ही जहां जीवन का प्रधान लक्ष्य संपत्ति और इसके प्रतीकों का अंबार लगाकर कुछ लोगों को विशिष्टता प्रदान करने की जगह लोगों की बुनियादी और वास्तविक जरूरतों की पूर्ति करना है भ्रष्ट आचरण नीरस बन सकता है।
भ्रष्टाचार का उन्मूलन एक समता मूलक समाज बनाने के आंदोलन के क्रम में ही हो सकता है जहां समाज के ढांचे को बदलने के राष्ट्रव्यापी आंदोलन के संदर्भ में स्थानीय तौर से भ्रष्ताचार के संस्थागत बिंदुओं पर भी हमेशा हमला हो सके ।बिहार में चलने वाले 1974 के छात्र आंदोलन की कुछ घटनाएं इसका उदाहरण हैं , जिसमें एक अमूर्त लेकिन महान लक्ष्य ‘संपूर्ण क्रांति’ के संदर्भ में नौजवानों में एक ऐसी उर्जा पैदा हुई कि बिहार के किशोरावस्था के छात्रों ने प्रखंडों में और जिलाधीशों के बहुत सारे कार्यालयों में घूसखोरी आदि पर रोक लगा दी थी । लेकिन न तो संपूर्ण क्रांति का लक्ष्य स्पष्त था और न उसके पीछे कोई अनुशासित संगठन ही था । इसलिए जनता पार्टी को सत्ता की राजनीति के दौर में वह सारी उर्जा प्राप्त हो गई ।
अंततः हर बड़ी क्रांति कुछ बुनियादी मूल्यों के इर्दगिर्द होती है । इन्हीं मूल्यों से प्रेरित हो लोग समाज को बदलने की पहल करते हैं। हमारे देश में , जहां परंपरागत मूल्यों का ह्रास हो चुका है और आधुनिक औद्योगिक समाज की संभावना विवादास्पद है , भ्रष्टाचार पर रोक लगाना तभी संभव है जब देश को एक नयी दिशा में विकसित करने का कोई व्यापक आंदोलन चले। इसके बिना भ्रष्टाचार को रोकने के प्रयास विफलाओं और हताशा का चक्र बनाते रहेंगे।
- सच्चिदानंद सिन्हा.
भाग 1

भाग 2

इस चुनाव में देश की निगाह हम बनारसियों पर रहेगी। यह शहर न सिर्फ भगवान शिव के लिए जाना जाता है अपितु महात्मा बुद्ध ,कबीर एवं रैदास की कर्मस्थली रही है। ऐसी दशा में अगले चुनाव में हमारा मतदान पूरे देश के लिये एक सन्देश होगा। इस चुनाव में मुख्य धारा के राजनैतिक दलों पर बहुत से सवाल तैर रहें हैं जिस पर काशीवासियों को गौर करना जरूरी है |

*महंगाई के मुद्दे पर लड़े जा रहे चुनाव में अबतक की सबसे सबसे महंगी रैलियां आयोजित हों रहीं हैं। इस बात के पूरे संकेत हैं कि बनारस में सभी प्रमुख उम्मीदवारों द्वारा करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। दलों द्वारा चुनाव खर्च पर आज के कानून के तहत कोई भी सीमा नहीं हैं। किसी भी दल ने इस सीमा के निर्धारण की बात नहीं उठाई है। इसके फलस्वरूप विदेशी कंपनियों , काले बाजारियों और देशी-विदेशी पूंजीपतियों का पैसा अबाध रूप से चुनाव में खर्च होता है।
*पिछले २० वर्षों में हुए सभी बड़े घोटालों की जड़ में सरकारी नियंत्रण समाप्त किए जाने, निजीकरण,उदारीकरण की नीतियां हैं। पिछले आठ सालों में चार सरकारों ने उद्योगपतियों को ३१९ खरब रुपयों की छूट दी है। इसके अलावा राज्य सरकारों द्वारा सस्ती जमीन , बिजली , पानी,खनिज देना अलग। यह इस गरीब देश के खजाने की एक बड़ी लूट है । चुनाव लड़ रहे सभी दल या तो इसमें शामिल हैं या इस पर चुप हैं ।
* जबरदस्त बेरोजगारी के कारण लाखों नौजवान अपना घर छोड़कर जाने को मजबूर हो रहे हैं। निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों के कारण लाखों छोटे उद्योग,कुटीर उद्योग,करघे बन्द हुए हैं। इस रोजगारनाशी विकास को पलटने के लिए कौन तैयार है ? पूर्वी उत्तर प्रदेश ,बिहार ,झारखण्ड और ओड़ीशा जैसे राज्यों के नौजवानों की श्रम-शक्ति से गुजरात-मुंबई में चकाचौंध पैदा की जाती है।इन प्रवासी श्रमिकों पर सिर पर मनसे -शिव सेना-भाजपा के द्वेष की तलवार लटकती रहती है ।
महात्मा गांधी के नाम पर चल रही मनरेगा का स्वरूप दिल्ली से तय होता है जिसके फलस्वरूप गड्ढ़ा खोदने और फिर उसे पाटने जैसा अनुत्पादक श्रम कराया जाता है। पूरे वर्ष काम की गारंटी मिलनी चाहिए। इस योजना में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के वेतन के बराबर मजदूरी क्यों न हो ? खेती के साथ साथ बुनकरी,शिल्पकारी एवं दस्तकारी तथा अन्य छोटे उद्योगों के साथ इस योजना को जोड़ा जाना चाहिए। इस योजना को बनाने और क्रियान्वयन का अधिकार पंचायत स्तर पर होना चाहिए।
*पड़ोसी स्कूल पर आधारित साझा स्कूल प्रणाली से ही पूरा देश शिक्षित हो सकेगा। आज शिक्षा के निजीकरण द्वारा शिक्षा आम आदमी की पहुंच के बाहर हो गई है । शिक्षा में भेद- भाव समाप्त ए बगैर कथित ‘शिक्षा का अधिकार’ वैसा ही है मानो किसी भूखे को कागज के टुकड़े पर लिख कर दे दिया जाए – ‘रोटी’!

* देश की ४० फीसदी रोजगार कृषि पर आधारित है लेकिन मुख्य राजनैतिक दलों के एजेण्डे से खेती किसानी गायब है।
कृषि उपज के मूल्य निर्धारण की बाबत चुनाव लड़ रही सभी पार्टियों में समझ का अभाव है। पिछले १९ वर्षों में देश भर में तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं । देश के अन्नदाता की यह बदहाली क्यों?
कथित विकास परियोजनाओं के लिए भूमि-अधिग्रहण किसानों की सहमति और उनकी शर्तों को मंजूर किए बगैर नहीं होना चाहिए।

* देश की लगभग ५० फीसदी रोजगार खुदरा ब्यापार और लघु उद्योगों पर आधारित है
लेकिन मुख्य राजनैतिक दल इसको बचाने की कौन कहे इसपर चुप्पी साधकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के एजेंट बने हुए हैं।
मुख्य विपक्षी दल ने भले ही मल्टी ब्राण्ड खुदरा व्यापार का कभी विरोध किया अब उसकेका प्रधानमंत्री के उम्मीदवार विदेशी पत्रिकाओं के माध्यम से संदेश दे रहे हैं,’कि भारत के छोटे व्यापारियों को बड़े खिलाड़ियों से स्पर्धा के लिए तैयार रहना होगा।’
यानि वाल मार्ट जैसी कम्पनियों को आश्वस्त कर रहे हैं।

* धार्मिक उन्माद के भरोसे चुनाव गंगा को पार करने वाली शक्तियां इस देश को कब गृहयुद्ध में झोंक देंगी काशीवासियों को इस पर विचार करना होगा।
* बनारस की जनता ने ‘ काशी, मथुरा बाकी है’ की बात को अहिल्याबाई होल्कर द्वारा विश्वनाथ मन्दिर के जीर्णोद्धार के समय ही खारिज कर दिया था। ज्ञानवापी मस्जिद और विश्वनाथ मन्दिर में जाने के मार्ग भी उसी समय काशी की विद्वत परिषद तथा आलिमों द्वारा निर्धारित कर दिए गए थे जिसके जरिए आज तक बिना विवाद लोग अपनी आस्था का पालन कर पा रहे हैं। विधायिकाओं में महिला आरक्षण के मुद्दे पर सभी दल मानो एक मत होकर चुप्पी साधे हुए हैं। भारतीय समाज में पीढ़ी-दर-पीढ़ी चले आ रहे जातिगत भेदभाव और एकाधिकार को तोड़ने का एक औजार आरक्षण है। सिर्फ एक बार ही आरक्षण देने की मांग संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है।

* धर्म की राजनीति करने वाले राजनैतिक दलों द्वारा धर्म के अंदर की बुराइयों जैसे जातीय
एवं स्त्री के प्रति भेदभाव एवं गैरबराबरी , दहेज, अंधविश्वास तथा भ्रष्ट तरीके से धनपशु बनें लोगों के सामाजिक बहिष्कार का कार्यक्रम न करके मात्र चुनाव के समय धर्म को कैश करने की प्रवृत्ति पर काशीवासियों को सवाल खड़ा करना होगा। स्त्रियों पर होने वाले अत्याचार की बाबत न्यायमूर्ति जस्टिस वर्मा की अधिकांश सिफारिशें ठण्डे बस्ते में डाल दी गई हैं। हम इन्हें पूरी तरह लागू करने की मांग करते हैं।
* बनारसी हैंडलूम पावरलूम से पिटने के कारण बुनकरो की बहुत बड़ी जनसंख्या कृषि मजदूरी या अन्य मजदूरी करने को बाध्य हो गयी है तथा बदहाल है ।
*हैण्डलूम और पावरलूम के बीच स्पर्धा न हो इसके लिए अंगूठा-काट कपड़ा नीति को बदलना होगा। कपड़ा नीति बनाने में बुनकरों के सही नुमाइन्दे शामिल करने होंगे,निर्यातकों को नहीं रखना होगा। चीनी ,जापानी कम्प्यूटर-आधारित मशीनों के कारण बुनकरों की बदहाली ,भुखमरी की स्थिति बनी है। ऐसी मशीनों पर तत्काल रोक लगाई जाए।

* गंगा को स्वक्छ और निर्मल बनाने के लिए राजनैतिक दलों द्वारा कौन सी कार्ययोजना बनाई गयी है ? दुनिया की सबसे ज्यादा प्रदूषित नदी दमन गंगा गुजरात में है यह हम न भूलें।

* बनारस में चुनाव मैदान में उतरे सभी दलों में व्यक्ति केन्द्रित संस्कृति हावी है। सारे फैसले शीर्ष पर लिए जाते हैं और नीचे थोपे जाते हैं।
* हमारे राजनैतिक दल किसके चंदे से चहकते हैं इसकी जानकारी के लिए राजनैतिक दलों को आर ० टी ० आई ० के दायरे में लाए जाने के पक्ष में बनारस से चुनाव लड़ रहे राजनैतिक दल हैं या नहीं ? ठीक इसी प्रकार स्वयंसेवी संस्थाओं पर भी जनसूचना अधिकार लागू किया जाना चाहिए।
* जनलोकपाल कानून के दाएरे में कॉर्पोरेट – भ्रष्टाचार को लाने के अलावा औपनिवेशिक नौकरशाही के ढांचे को बदलने के बात बनारस से चुनाव में लड़ने वाले किसी दल ने नहीं किया है।
*केन्द्र सरकार द्वारा १२४(अ), UAPA,CSPA तथा AFSPA जैसे कानूनों की मदद से शान्तिपूर्ण जन आन्दोलनों के दबाने के प्रयोग किए जा रहे हैं। सबसे लम्बे समय से अहिंसक प्रतिकार कर रही लौह महिला इरोम शर्मिला की मांग का समर्थन करते हुए हम ऐसे कानूनों की पुनर्विवेचना की उम्मीद करते हैं ।
साझा संस्कृति मंच वाराणसी के नागरिकों से आवाहन करता है कि अपने अमूल्य मत का प्रयोग करने के पहले इन मुद्दों पर विचार करें तथा वोट देने के बाद भी राजनीति पर निगरानी रखें और कारगर हस्तक्षेप जारी रखें।
निवेदक,
साझा संस्कृति मंच
लोकविद्या जन आंदोलन , दिलीप कुमार ‘दिली’ 9452824380
प्रेरणा कला मंच , मुकेश झंझरवाला , 9580649797
विश्व ज्योति जन संचार केन्द्र , फादर आनन्द 9236613228
आशा ट्रस्ट , वल्लभाचार्य पाण्डे , 9415256848
फेरी-पटरी ठेला व्यवसायी समिति, प्रमोद निगम , 945114144
सूचना का अधिकार अभियान -उ.प्र , धनन्जय त्रिपाठी , 7376848410
विजन , जागृति राही , 9450015899
गांधी विद्या संस्थान , डॉ मुनीजा खान 9415301073
बनारस जरदोज फनकार यूनियन , सैय्यद मकसूद अली , 8601538560
नारी एकता , डॉ स्वाति , 9450823732
समाजवादी जनपरिषद, चंचल मुखर्जी , 8765811730
सर्वोदय विकास समिति , सतीश कुमार सिंह , 9415870286
बनारस पटरी व्यवसाई संगठन , काशीनाथ , 9415992284
लोक समिति , राजा तालाब , नन्दलाल मास्टर , 9415300520
लोक चेतना समिति , डॉ नीति भाई , 2616289
अस्मिता , फादर दिलराज , 9451173472
काशी कौमी एकता मंच , सुरेन्द्र चरण एड. 9335472111
बावनी बुनकर पंचायत , अब्दुल्लाह अन्सारी 9453641094
सर्व सेवा संघ , अमरनाथ भाई 9389995502
मानवाधिकार जन निगरानी समिति , डॉ लेनिन रघुवंशी 9935599333

साझा संस्कृति मंच
वाराणसी
प्रेस विज्ञप्ति
वाराणसी , ९ मई , २०१४ |
दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में गिनी जाने वाली ‘दमन-गंगा’ गुजरात में बहती है । केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड ने इस नदी के प्रदूषण की बाबत रपट दी है तथा लोक सभा के प्रश्नोत्तर में भी यह तथ्य शामिल है। ‘साबरमती रिवर फ्रन्ट’ का निर्माण नदी के किनारे बसे अहमदाबाद के हजारों परिवारों को हटा कर हुआ है। फिलहाल इसके जल-स्तर को बरकरार रखने के लिए नर्मदा का पानी इसमें प्रवाहित किया जा रहा है। गंगा के सिकुड़ते जल-स्तर के लिए मुख्यतः टिहरी बांध तथा गढ़मुक्तेश्वर से
पानी
बहुराष्ट्रीय कम्पनी सुएज की मदद से दिल्ली ले जाना जिम्मेदार है। वाराणसी के मतदाताओं का यह हक है कि वे इस अहम सांस्कृतिक प्रश्न पर लोक सभा चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों का पक्ष जानें ।
१९९१ के आम चुनाव में वाराणसी में मतदान कर्फ्यू में हुआ था तथा मतदान केन्द्र पर दो युवाओं की हत्या हुई थी। साझा संस्कृति मंच ने चुनाव आयोग से यह मांग की है कि प्रशासन इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए मुस्तैद रहे। मंच ने काशी की जनता से अपील की है कि ऐसी हरकतों के प्रति सजग रह कर उन्हें विफल करे ।
साझा संस्कृति मंच द्वारा काशी की जनता से अपील आज एक परचे के रूप में जारी की गई है जिसे प्रेस वार्ता में मीडिया को भी जारी किया जा रहा है। मंहगाई के दौर में खर्चीले चुनाव, उद्योगपतियों द्वारा चुनाव में बढ़ रहा हस्तक्षेप, घोटालों से आर्थिक नीतियों का संबंध,खेती-किसानी-बुनकरों-कारीगरों का संकट, विधायिकाओं में महिलाओं के लिए आरक्षण तथा सामाजिक न्याय,समान स्कूल व्यवस्था,साम्प्रदायिकता , दमनकारी कानूनों की वापसी आदि राष्ट्रीय व स्थानीय मुद्दों की चर्चा है। मंच की अपील है कि काशी के मतदाता इन मुद्दों पर विचार करे तथा मतदान के बाद भी राजनीति पर निगरानी रखे तथा कारगर हस्तक्षेप जारी रखे ।

अफलातून दिलीप सिंह ‘दिली’ मुकेश झंझरवाला फादर आनन्द
राष्ट्रीय सचिव, लोक विद्या जन आन्दोलन प्रेरणा कला मंच विश्व ज्योति जन संचार केन्द्र
समाजवादी जनपरिषद .

नीचे दी गई कड़ी पर खटका मारिए -
लड़ेंगे तुमसे कदम कदम पर

सहयोग की अपील

पिछले कुछ वर्षों से आप मेरी नेट गतिविधियों के जरिए समाजवादी जनपरिषद ,उसके विचार और आन्दोलन से कुछ हद तक परिचित हैं । नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए हम उन स्थानों पर चुनाव लड़ते हैं जहां हमने शांतिमय संघर्ष किए हैं और रचनात्मक कार्यक्रम हाथ में लिए है। सीमित स्थानों पर चुनावी हस्तक्षेप एक shortcoming मानी जा सकती है। हमारे कुछ प्रमुख साथी थोक में लड़ने की मान्यता के साथ आआपा से स्थापना से ही जुड़ गए। अपनी इस मान्यता को पूरा करने के लिए उन्होंने वै्चारिक आग्रहों को ठण्डे बस्ते में डालने की रणनीति अपनाई है। स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रति हमारा जो सुचिन्तित रवैया था उससे विपरीत वे सोचते हैं। उनका आग्रह था कि अन्य समूह उनमें विलय कर जांए। हमारी मान्यता है ः

  1. नदी-नाले समुद्र में मिलकर उसके पानी को मीठा कर लेने की उम्मीद न रखें।
  2. जब खेती वर्षा पर आधारित थी तब सूखा पड़ने पर कुछ अनाज अगले साल बारिश की उम्मीद में बीज के रूप में बचा कर रख लिए जाते थे। समतावादी मूल्यों का आग्रह रखने वाले विलुप्त न हों यह हमारा संकल्प है।
     इन आम चुनावों में हम बेतूल और अलीपुरद्वार लोक सभा सुरक्षित सीट(दोनों अनुसूचित जन जाति) तथा ओड़ीशा विधान सभा की भवानी पटना सुरक्षित सीट (अनुसूचित जाति) पर चुनाव लड़ रहे हैं।
आप  से चुनाव के लिए आर्थिक सहयोग की अपील कर रहा हूं।
विनीत,

आपका,
अफलातून.

aflatoonATgmailDOTcom

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