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[ फारसी के विद्वान श्री राकेश भट्ट अनेक सामाजिक कामों से जुड़े रहे हैं । इन दिनों बी.बी.सी के लिए खाड़ी के मुस्लिम देशों की खबरों का विश्लेषण करते हैं । सत्य के आग्रह के कारण कोई साढ़े चार साल तक ईरान की जेलों में भी रहे हैं ।
भयानक घटनाएं घटी हैं , पिछले दिनों । इनके प्रति अपना आक्रोश जताने ऐसे लोग भी सड़कों पर उतरे हैं , जिनकी उमर अभी - अभी वोट डालने की हुई है । उन्होंने बिना तोड़ - फोड़ किए , बिना बसें जलाए , बिना पत्थर फेंके ज्यादा बड़ी चोट की है सरकारों पर । इंडिया गेट , जंतर- मंतर , विजय - चौक - सब जगह ये लोग इकट्ठे होते रहे । न्याय तो दूर ठीक से सहानुभूति भी नहीं मिल पाई । लोगों का गुस्सा फांसी की मांग तक गया है , इस ताजी घटना में । पर न यह पहली थी और न अंतिम । कुमार प्रशांत के शब्दों में कहें तो 'असफल सरकारों और निराश लोगों का समीकरण हमें ऐसे ही बर्बर समाज की ओर ले जाएगा ।' सन १९९४ में घटी एक ऐसी घटना पर एक बेहद खामोश टिप्पणी कर रहे हैं श्री राकेश भट्ट । - संपादक ,गांधी-मार्ग ,२२३ दीनदयाल उपाध्याय मार्ग,नई दिल्ली - ११०००२ ]

हाजी हुसैन बहुत कम बोलते थे । हां, कभी – कभी वो जेल के बरामदे में किसी कैदी से यह जरूर पूछ लेते थे कि घर में सब राजी – खुशी तो है ना ? हर कैदी इसका झूठा जवाब दे देता था – हां ! इस सवाल से कैदी को थोड़ी-सी राहत तो मिलती थी कि चलो कोई तो है जो उसके परिवार के बारे में चिंतित है और फिर हाजी हुसैन तो जेलर थे । हाजी हुसैन भी इस जवाब की सच्चाई को जानते थे , लेकिन ‘अल हमदुल्लिलाह’, ईश्वर तेरा भला करे कहते हुए चले जाते थे ।
यूं तो मैं जेल में उदास नहीं रहता था । लेकिन १९९४ दिसंबर महीने की एक सुबह को बहुत उदास हुआ । दिसंबर महीने में ईरान की राजधानी तेहरान गच्च बर्फ से ढक जाती है । एविन नाम का यह जेल पहाड़ियों के बीच बना हुआ है । यहां तो मौसम और भी ठंडा हो जाता है । शायद केदारनाथ – बदरीनाथ जैसी ठंड , कुछ – कुछ मेरे ननिहाल खतस्यूं सिरकोट (श्रीकोट) जैसी ।
मुझे तारीख तो ठीक याद नहीं है । लेकिन दिन याद है – बृहस्पतिवार , क्योंकि कल ही परिवार के साथ मेरी मुलाकात का दिन था । हर बुधवार को मेरी पत्नी ही आया करती थी । अन्य रिश्तेदारों को मुलाकात की मंजूरी नहीं थी । मुलाकात के समय शीशे के आरपार हम एक दूसरे को देख सकते थे । लेकिन बात दोनों तरफ रखे टेलीफोन के जरिए ही हो पाती थी । हम दोनों बहुत संयम से बातें करते थे क्योंकि ये बातें रिकार्ड होती थीं । हमारी बातों का केन्द्र अक्सर हमारी बेटी ही हुआ करती थी – जिसकी शैतानियों का जिक्र जिंदगी की तल्खियों को भुलाने में कारगर होता था – भली ही मुलाकात सात मिनटों के लिए ही क्यों न हो । हां , ठीक सात मिनट के बाद लाइन काट दी जाती थी। और इस ओर मैं हलो… हलो कहता और उस ओर से वह । लेकिन शीशे की मोटी दीवार के कारण आवाज आरपार नहीं हो पाती थी । लेकिन जो सुना नहीं जा सकता वह समझ में आ जाता था । रिश्तों के आगे भाषा की औकात बौनी पड़ती है , यह सुना जरूर था लेकिन देखा वहीं पर । खैर!
जिक्र उदासी का चल रहा था । हुआ यूं कि जेल में सुबह की हाजरी के बाद मैं नाश्ता करने लगा । एक अन्य कैदी साथी अखबार पढ़ रहा था। उसने बताया कि एक खबर हिंदुस्तान के बारे में भी छपी है । ईरान में हिंदुस्तान को बहुत इज्जत के साथ देखा जाता है । मैंने सोचा शायद कोई इसी तरह की खबर होगी , जिसमें अतिशयोक्तियों के साथ हिंदुस्तान की तारीफ की गई होगी । मैंने अपनी जगह बैठ कर कहा कि खबर का शीर्षक पढ़ दो अभी – पूरी खबर बाद में पढ़ूंगा । उसने खबर का शीर्षक पढ़ा । ‘तज्जवोज बा बानुवान-ए-जोम्बिश-ए-उत्तराखंड’ यानी उत्तराखंड आंदोलन की महिलाओं के साथ दुराचार । कमरे के सभी कैदियों ने यह खबर सुनी तो उनको विश्वास ही नहीं हुआ । ईरान के लोग समझते हैं कि हिंदुस्तान में महिलाओं की बहुत इज्जत होती है । मैंने अखबार लिया और खबर पढ़ी । खबर शायद चार या पांच पंक्तियों से बड़ी नहीं थी । इसमें करीब दो महीने पुरानी घटना का संक्षिप्त विवरण था : हिंदुस्तान के मुजफ्फरनगर शहर में पुलिस आंदोलनकारियों पर गोलियां चलाई । कुछ आंदोलनकारी शहीद हुए और पुलिस ने महिलाओं के साथ ज्यादती की । उस वक्त न जाने और कोई क्यों याद नहीं आया । लेकिन अपना गांव बहुत याद आया । बूढ़ी दादी की लगाई हुई ‘पीपल चौंरी’ , कांडा के मंदिर के रास्ते की ‘डूंडी कुलैं’ और गांव का नागरजा , गांव , पीपल , कुलैं और एक खामोश खुदा । मेरी याद में कहीं भी इंसान नहीं था ।
कैदी खामोशी की जबान को पहचानता है । इसीलिए किसी ने मुझसे इसके बारे में पूछा नहीं । उन कैदियों ने मेरी खामोशी को अपनी खामोशी का सहारा दिया । मैं कुछ देर के बाद लाईब्रेरी चला गया । कुरान की हर उस आयत (श्लोक) को पढ़ने लगा , जिसमें निर्दोष पर जुल्म करने वालों की सजा के बारे में लिखा था । बहुत सी ऐसी आयतें थीं । एक आयत मन छू गयी । कुरान के ५वें अध्याय की ३२वीं आयत – ‘यदि कोई किसी निर्दोष व्यक्ति का कत्ल करता है तो समझो कि उसने समस्त मनुष्यता का कत्ल किया है ।’ शायद मन कुछ हल्का जरूर हुआ,मगर उदास ही रहा । दिन के खाने पर भी नहीं गया और शायद लाइब्रेरी के बड़े से हॉल में मैं ही अकेला रह गया था ।
अचानक देखा कि मेरे सामने हाजी हुसैन खड़े थे । मैंने उन्हें सलाम किया और उन्होंने भी वलैकुम अस्सलाम कह कर जवाब दिया । हिंदुस्तानियों को ईरान में हिंदी कहा जाता है । उन्होंने पूछा : हिंदी , आज उदास दिख रहे हो । मैंने कहा – ‘हां हाजी ! उन्होंने मेरी उदासी का कारण पूछा तो मैंने कारण बता दिया । उन्होंने ढाढ़स बंधाते हुए कुरान की एक आयत कही जिसका मतलब है कि – ‘जिन पर अत्याचार हुए हैं , वे अब खुदा के अजीज बन चुके हैं और जो शहीद हुए हैं वे खुदा के पहलू में जिंदा हैं ।’ फिर कुछ क्षणों के बाद उन्होंने कहा कि आज शाम की नमाज के वक्त एक दुआ पढ़नी है तो मैं भी मौजूद रहूं । हां – ठीक है हाजी, मैं आ जाऊंगा। मुझे लगा कि वे मुझसे नमाज के बाद कोई दुआ पढ़वाना चाहते हैं । मेरे कुरान के प्रवचन और दुआ जेल में काफी पसंद किए जाते थे ।
शाम की नमाज पर मैं मौजूद हुआ । हाजी हुसैन भी थे । इमाम ने नमाज पढ़ाई और हाजी हुसैन को दुआ पढ़ने के लिए बुलाया । मुझे लगा कि हाजी हुसैन अब मेरा नाम पुकारेंगे और मुझसे दुआ पढ़ने के लिए कहेंगे । लेकिन ऐसा नहीं हुआ । उन्होंने खुद दुआ पढ़नी शुरु की । इसे मैं पहले भी कई बार पढ़ चुका था , सुन चुका था । लेकिन फिर अचानक उन्होंने कहा – खुदाया यहां जो लोग तेरी शरण में इकट्ठा हुए हैं,उनमें तेरा एक बंदा हिंद देश का वासी है। उसके देश में कुछ बहनों पर अत्याचार हुआ है । तू तो सबसे बड़ा न्यायकर्ता है । उन अत्याचारियों का नाश कर और जो मजलूम बहनें हैं , उनके दुखों का अंत कर, आमीन ! या रब्ब अल -आलमीन ! ऐसा ही हो ! हे समस्त ब्रह्मांडों के स्वामी !
फिर उन्होंने मेरा नाम पुकार कर मुझे बुलाया और कहा कि यदि मैं शहीदों और पीड़ित महिलाओं के नाम जानता हूं तो एक-एक नाम लेकर हम दुआ को दुहरा सकते हैं । मैंने कहा-’मैं नाम नहीं जानता , आप सबका धन्यवाद ।’
रात को जब सोया तो मेरे एक पहलू में मेरा गांव था तो दूसरे पहलू में गांव का नागरजा , बूढ़ी दादी की लगाई हुई ‘पीपल चौंरी’ और कांदा के मंदिर के रास्ते की ‘डूंडी कुलैं’ ।
और इस बार एक इंसान भी शामिल था इनमें – हाजी हुसैन !
[डाक से 'गांधी-मार्ग' वार्षिक १०० रुपये ,दो वर्ष का १९० रुपए,आजीवन ५०० रुपए (व्यक्तिगत), १००० रुपए संस्थागत। शुल्क बैंक ड्राफ्ट,मनी आर्डर द्वारा 'गांधी शान्ति प्रतिष्ठान' के नाम भेजें। पता ऊपर दिया है ।]

जिलाधिकारी,मऊ।
इस संदेश द्वारा मैं आज सुबह घटित एक आपराधिक घटना की ओर ध्यान दिलाना चाहता हूं।हमारे पंजीकृत राजनैतिक दल-समाजवादी जनपरिषद के प्रान्तीय संगठन मन्त्री साथी विक्रमा मौर्य अपने गांव के स्व. राजेन्द्र मौर्य की हत्या में गवाह हैं और गवाही दे चुके हैं।इस हत्या के नामजद अभियुक्तों द्वारा उन्हें गवाही न देने के लिए धमकाया जा रहा था जिसकी सूचना उन्होंने प्रशासन को दी थी।यह अभियुक्त जमानत पर रिहा हैं तथा आज एक सूमो वाहन पर सवार होकर चौथी मील के निकट साइकिल पर सिपाह जा रहे साथी विक्रमा मौर्य पर हत्या की नियत से इन लोगों ने वाहन चढ़ा दिया।वे पलट कर जब दूसरी बार विक्रमा पर गाड़ी चढ़ाने जा रहे थे तब प्रत्यक्षद्र्शियों के शोर मचाने से भाग गये।पूर्व बी.डी.सी. सदस्य विक्रमा मऊ सदर अस्पताल में जीवन संघर्ष कर रहे हैं। आप से निवेदन है कि शासकीय अधिवक्ता द्वारा हत्या के मामले में जमानत पर रिहा इन लोगों की जमानत रद्द करवाने के लिए आवेदन का निर्देश दें।तथ सुनिश्चित करें कि विक्रमा मौर्य द्वारा मधुबन थाने में दी गई तहरीर पर मुकदमा कायम कर तत्काल कार्रवाई हो।
विनीत,
अफलातून,
सदस्य,राष्ट्रीय कार्यकारिणी,समाजवादी जनपरिषद.
5जी एफ रीडर्स फ्लैट,जोधपुर कॉलॉनी,का,हि.वि.वि.,
वाराणसी – 221005,फोन – 08004085923
इन्हें भेजिए,बात कीजिए ः
मुख्यमन्त्री ,उत्तर प्रदेश ई-मेल cmup@nic.in
पुलिस महानिरीक्षक,वाराणसी जोन – ईमेल igzonevns@up.nic.in
जिलाधिकारी मऊ , फोन- 09454417523 , ईमेल – dmmau@nic.in
पुलिस अधीक्षक मऊ, मो. 09454400292 , Email – spmau@up.nic.in

‘‘हमने ‘गार’ के भूत का दफना दिया है। अब पूंजी निवेशकों को डरने की जरुरत नहीं है। हमने खुदरा व्यापार मंे विदेशी पूंजी को इजाजत देने और ईंधन कीमतों मंे बढ़ोत्तरी के फैसले लिए हैं, जिनसे हमारी रेटिंग घटने का खतरा नहीं रहा। इन कदमों से अब निवेशक भारत में फिर से दिलचस्पी ले रहे हैं।’’
- वित्तमंत्री पी. चिदंबरम, 22 जनवरी 2013, हांगकांग

भारत के वित्तमंत्री का यह बयान कई मायनों मंे महत्वपूर्ण हैे और बहुत कुछ कहता है। हांगकांग में सिटी बैंक और बीएनपी नामक दो बहुराष्ट्रीय बैंकों द्वारा ‘निवेश के लिए भारत सम्मेलन’ का आयोजन किया गया था जिसमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों के 200 प्रतिनिधि शामिल हुए। इस मौके पर चिदंबरम के मुंह से यह उद्गार निकले। अगले दिन वे सिंगापुर मंे इसी मिशन पर गए। उसके बाद यूरोप में इसी तरह अंतरराष्ट्रीय पूंजीपतियों की चिरौरी करने गए। इसी समय 23 से 27 जनवरी तक स्विट्जरलैण्ड के दावोस नगर मंे विश्व आर्थिक मंच की सालाना बैठक मंे भारत के वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा और शहरी विकास मंत्री कमलनाथ निवेशकों को लुभाने गए। उसके बाद विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने यूरोप के दो देशों की यात्रा की तो उनके एजेण्डे मंे भी भारत-यूरोप आर्थिक सहयोग प्रमुख रुप से शामिल था।
यह साफ है कि इसके पहले भारत सरकार ने जो कई बड़े-बड़े फैसले लिए, उनका मकसद विदेशी निवेशकों को खुश करना था। ये अंतरराष्ट्रीय पूंजीपति निवेश का फैसला करने के लिए अंतरराष्ट्रीय साख निर्धारण (रेटिंग) एजेंसियों की तरफ देखते हैं। स्टेण्डर्ड एण्ड पुअर, मूडीज, फिच जैसी ये एजेंसियां पूरी तरह नवउदारवादी-पूंजीवादी सोच पर चलती है और उनका एकमात्र मकसद बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों को बढ़ावा देना है। जिस फार्मूले से वे रेटिंग तय करती हैं, वह ब्याज दरों, शेयर बाजार, भुगतान संतुलन के ंचालू खाते के घाटे, सरकारी खर्च, विदेशी निवेशकों को रियायतों आदि पर आधारित होता है। अर्थव्यवस्थाओं के बारे मंे इनके अनुमान कई बार गलत निकले हैं। लेकिन भारत सरकार के लिए वही रेटिंग, शेयर सूचकांक, राष्ट्रीय आय वृद्धि दर जैसे ही मानक सर्वोपरि हो गए हैं।
यह ‘गार’ का भूत क्या है ? भारत सरकार की आमदनी और घाटे से चिंतित पिछले वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी ने पिछले साल के बजट मंे ‘गार’ का प्रावधान किया था। यह अंगरेजी के ‘जनरल एन्टी अवाॅयडेन्स रुल्स’ का संक्षेप है जिसका मतलब है कर-वंचन रोकने के सामान्य नियम। आय कर कानून के तहत बनाए जा रहे इन नियमों का मकसद देशी-विदेशी कंपनियों द्वारा करों की चोरी या कर से बचने की कोशिशों पर लगाम लगाना था। यह भी प्रावधान किया जा रहा था कि यदि कोई कंपनी कोई भी कर नहीं दे रही है तो उस पर एक न्यूनतम कर लगेगा। इसी बीच नीदरलैण्ड की वोडाफोन कंपनी ने भारत में टेलीफोन व्यवसाय के अधिग्रहण का देश के बाहर सौदा करके टैक्स से बचने की कोशिश की थी। उसको रोकने के लिए प्रणव मुखर्जी ने ऐसे सौदों को भी कर-जाल के दायरे मंे लाने और उसे पिछली अवधि से लागू करने की घोषण की थी। वोडाफोन कंपनी पर करीब 11,218 करोड़ रु. के टैक्स का दावा बनता था।
लेकिन प्रणव मुखर्जी का इन मंशाओं के जाहिर होते ही विदेशी कंपनियों मंेे खलबली मच गई। उन्होंने हल्ला मचाना शुरु कर दिया और भारत से अपनी पूंजी वापस ले जाने की धमकियां देनी शुरु कर दी। मनमोहन सिंह दुविधा मंे फंस गए। इस बीच भारत के राष्ट्रपति के चुनाव का एक अच्छा मौका मनमोहन सिंह के हाथ मंे आया। प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति बनाकर राह का रोड़ा हटाया गया। वित्तमंत्री का प्रभार लेते ही मनमोहन सिंह ने आश्वासन दिया कि ‘गार’ की समीक्षा की जाएगी। फिर मंत्रालय में चिदंबरम को लाया गया जिसकी कंपनी-भक्ति में कोई संदेह नहीं था। रंगराजन, कौशिक बसु, रघुराम राजन जैसे आर्थिक सलाहकार भी एक स्वर में अनुदानों को कम करने के साथ-साथ निवेशकों की आशंकाएं दूर करने का राग अलापने लगे। ऐसे ही एक अर्थशास्त्री पार्थसारथी शोम की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई। उसने फटाफट अपनी रपट पेश कर दी। 14 जनवरी को सरकार ने घोषणा कर दी कि गार नियमों को तीन साल के लिए स्थगित किया जाता है और 1 अप्रैल 2016 से उन्हें लागू किया जाएगा। इस बीच वित्तमंत्री यह भी घोषणा कर चुके थे कि किसी भी कंपनी को पिछली तारीख से कर के दायरे मंे नहीं लाया जाएगा। इससे वोडाफोन कंपनी को एक खरब रुपए से ज्यादा का फायदा हो गया।
गार स्थगन की घोषणा के साथ ही विदेशी पंूजीपतियों मंे खुशी की लहर दौड़ गई और दो दिन मंे ही सेन्सेक्स 20,000 के ऊपर पहुंच गया, जो कि दो साल का सबसे ऊंचा स्तर था। इसी समय भारत सरकार ने डीजल की कीमतें क्रमिक रुप से बढ़ाने, बड़े उपभोक्ताओं को बाजार दर पर डीजल देने, धीरे-धीरे डीजल कीमतों को पूरी तरह नियंत्रणमुक्त करने और डीजल पर अनुदान समाप्त करने का फैसला कर दिया। इससे भारतीय जनता पर चाहे बोझ पड़ा हो और महंगाई का नया दौर शुरु होने की संभावना बनी हो, लेकिन रिलायन्स तथा एस्सार कंपनियों को काफी फायदा पहुंचने वाला है। इन कंपनियों के पास तेलशोधन की क्षमता है, लेकिन डीजल-पेट्रोल सस्ता होने के कारण वे अपने पेट्रोल पम्प नहीं चला पा रही थी। अब बाजार दरें लागू होने पर उनका धंधा चल निकलेगा। इसी तरह दुनिया की सबसे बड़ी और बदनाम तेल कंपनी शेल ने भी भारत मंे पेट्रोल पम्पों के लाइसेन्स ले रखे हैं। उसकी भी कमाई के दरवाजे खुल जाएंगे। खुदरा व्यापार के दरवाजे भी प्रबल विरोध के बावजूद वालमार्ट जैसी विशाल कंपनियों के लिए खोले गए हैं। पिछले कुछ सालों मंे दरअसल सरकार के ज्यादातर फैसले कंपनियों को खुश करने और फायदा पहुंचाने के लिए ही किए गए हैं।
यह एक विचित्र बात है कि जो सरकार बजट घाटे का रोना रोती रहती है और खर्च कम करने के लिए आम जनता को मिलने वाले अनुदानों व मदद को कम करने पर तुली हुई है, वही सरकार दुनिया की बड़ी-बड़ी कंपनियों से करों को वसूलने और कर-चोरी रोकने के उपायों को आसानी से छोड़ देती है। मारीशस मार्ग जैसी कर-चोरी को उसने पूरी तरह इजाजत दे रखी है। कंपनियों को दी जाने वाली कर-रियायतें तथा उनको अनुदान हर बजट मंे विशाल मात्रा में बढ़ते जा रहे हैं। कारण यही है कि सरकार मंे बैठे लोग किसी भी किसी भी कीमत पर विदेशी पूंजी को रिझाने, लुभाने, खुश करने और बुलाने के लिए बैचेन है। इसके लिए वे देशहित, जनहित, सरकारहित, नैतिकता, संप्रभुता सबको तिलांजलि देने के लिए तैयार है। विदेशी पंूजी की यह गुलामी अभूतपूर्व है। आधुनिक भारत के इतिहास का यह एक शर्मनाक अध्याय है।
दरअसल भूत ‘गार’ का नहीं है, विदेशी पूंजी का महाभूत है जो भारत सरकार पर पूरी तरह सवार हो गया है। सरकार होश खो बैठी है और यह भूत उसको चाहे जैसा नचा रहा है। लातों के भूत बातों से नहीं मानते। इस भूत को उतारने के लिए एक बड़ा जन-विद्रोह करने करने का वक्त आ गया है।

बराबरी व पारस्‍परिक सहयोग से बनेगा विकास का नया मॉडल: सिन्‍हा

हिंदी विश्‍वविद्यालय के 15वें स्‍थापना दिवस पर सच्चिदानंद सिन्‍हा का वक्‍तव्‍य

 

वर्धा, 29 दिसंबर, 2012; महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय के 15 वें स्‍थापना दिवस के अवसर पर बतौर मुख्‍य अतिथि समाजवादी चिंतक सच्चिदानंद सिन्‍हा ने आज शनिवार को कहा कि वैकल्पिक विकास के मॉडल की बात करना आज उसी तरह अर्थहीन है जैसे कभी यूटोपिया की बात करना समाजवादी आंदोलन के प्रारंभिक काल में था। कोई भी व्‍यवस्‍था सामने की हकीकत के संदर्भ में ही बनती है, बनी-बनाई कल्‍पना के अनुरूप नहीं। ऐसे किसी भी मनचाही ब्‍लूप्रिंट को लागू करने का प्रयास या तो धर्मांधता को जन्‍म देता है या तानाशाही को। बराबरी व पारस्पिरिक सहयोग से विकास का नया मॉडल बन सकता है।

हबीब तवीर सभागार में आयोजित भव्‍य समारोह की अध्‍यक्षता कुलपति विभूति नारायण राय ने की। इस अवसर पर विशिष्‍ट अतिथि के रूप में साहित्‍यकार केशुभाई देसाई, कुलसचिव डॉ. के.जी. खामरे मंचस्‍थ थे।

‘विकास का वैकल्पिक मॉडल’ विषय पर विमर्श करते हुए सच्चिदानंद सिन्‍हा ने कहा कि प्रकृति से तालमेल बिठा कर चलने वाली कोई भी व्‍यवस्‍था समता के मूल्‍यों पर ही आधारित हो सकती है। शोषणमुक्‍त समाज में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने की क्षमता गैरबराबर समाज से अधिक होती है, क्‍योंकि गैरबराबरी से ही दिखावे के लिए बेजरूरत तामझाम पर खर्च जरूरी होता है, और बाजार आश्रित पूंजीवादी समाज में तो बेजरूरी वस्‍तुओं के उत्‍पादन व उपभोग की भूमिका इतनी महत्‍वपूर्ण है कि इसे नियंत्रित करने से पूंजीवादी व्‍यवस्‍था ध्‍वस्‍त हो सकती है। उन्‍होंने कहा कि आज चूंकि पर्यावरण का संकट विविध रूपों में हमारे अस्तित्‍व के लिए सर्वाधिक महत्‍व का बन गया है, इसलिए हमें समाज निर्माण की वैसी दिशा अपनानी होगी जो पर्यावरण के लिए कम से कम नुकसानदेह हो।

वर्तमान विकास के मॉडल पर टिप्‍पणी करते हुए श्री सिन्‍हा ने कहा कि धरती के संसाधनों का संतुलित व जीवन के लिए जरूरी उपयोग तभी संभव है, जब आदमियों के बीच गैरबराबरी न हो और वे पारस्पिक सहयोग पर आधारित छोटी इकाइयों में रहें जैसे कृषि क्रांति के पहले के दिनों में रहते थे तब जीवन का आधार फल-मूल जमा करना और आखेट था। आज हम उस अवस्‍था में नहीं जा सकते। उसका सबसे बड़ा कारण हमारी विशाल जनसंख्‍या है। इस भीड़ भरी दुनिया में खेती ही जीवन का आधार हो सकती है। कृषि छोटी व सहयोगी होगी। यह एक सोची-समझी बाध्‍यता होनी चाहिए, नहीं तो हम उन पुराने दिनों की तरफ लौट सकते हैं जब गुलामों व कृषकों से विशाल साम्राज्‍य कायम हुए। समाज में सब कुछ अनियंत्रित नहीं होता। काफी कुछ मूल्‍यों के आधार पर मनुष्‍यों की संस्‍कृति द्वारा निर्धारित होता है। इस हजार साल के इतिहास का सबक हमें ऐसे समाज के सांस्‍कृतिक निर्धारण में सहायक होगा और अंतत: हममें यह विश्‍वास दृढ़ करेगा कि प्रकृति और समग्र जीव जगत की रक्षा के साथ ही हमारा अपना अस्तित्‍व भी जुड़ा है। ‘स्‍काई इज द लिमिट’ वाला विज्ञापन बकवास है। आदमी धरती से बंधा है और वह तभी तक जीवित रहेगा जब तक यह बंधन कायम है।

सच्चिदानंद सिन्‍हा ने प्राकृतिक संसाधनों से आम जनों को वंचित किए जाने पर चिंता जताते हुए कहा कि सबसे पहले तो वन प्रदेशों या अन्‍य जगहों में रहने वाले आदिवासियों के परंपरागत जीवन से कोई छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। इन्‍हें सैलानियों के हस्‍तक्षेप से भी मुक्‍त रखना होगा। वन प्रदेशों और आदिवासी-बहुल क्षेत्रों में परिवेश से छेड़छाड़ प्रतिबंधित होनी चाहिए। मसलन, वनों की कटाई, खनिजों के लिए खनन, उनके लिए असुविधाजनक रेल या रोड का विस्‍तार, क्षेत्र में बहने वाली जलधारा, झरनों, नदियों के प्रवाह को रोकना आदि।

समाजवादी जनपरिषद के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष साथी विष्णुदेव गुप्त द्वारा स्थापित डॉ राममनोहर लोहिया बालिका विद्यालय , मधुबन के प्रांगण में सजप-उ.प्र राज्य समिति की बैठक दिनांक २४ नवम्बर , २०१२ को राज्य उपाध्यक्ष साथी रामछबीला साहनी की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई।
उपस्थिति – शैलेश कुमार (वि.यु.स.,निमंत्रित),नंदकिशोर विश्वकर्मा (निमंत्रित), सदस्य- लोकनाथ मौर्य,लालबिहारी राजभर,विजयी मौर्य,रामछबीला साहनी,शेषमणि त्रिपाठी,रामलच्छन मौर्य,शिवप्रसाद दुबे,सत्येन्द्र दुबे,रामकेवल चौहान,रामसरीख विश्वकर्मा,विक्रमा मौर्य,जयराम भारती,डॉ. स्वाति, बृजबिहारी मल्ल,चंचल मुखर्जी,सुनील कुमार,अफलातून तथा रामजनम ने भाग लिया ।

    शेषमणि त्रिपाठी (सदस्य, राष्ट्रीय कार्यकारिणी)

- १९९१-’९२ में आर्थिक उदारीकरण की नीतियों को लागू किए जाने के बाद से घपले-घोटाले बढ़ रहे हैं । इन्होंने मार्क्स ,लेनिन व लोहिया को उद्धृत करते हुए भ्रष्टाचार के लिए पूंजीवादी व्यवस्था को जिम्मेदार बताया।
भले ही , १००० पंजीकृत दल हों मगर विचारधारा पर आधारित एक मात्र सजप है । पिछले दो सालों से अन्ना हजारे के नेतृत्व में जो आन्दोलन चल रहा है उसका नाम अंग्रेजी में क्यों है ? इसके कार्यक्रमों में जो मजमा जुटता है वह शहरी मध्य वर्ग का होता है । अन्ना की ईमानदारी पर शक नहीं लेकिन आन्दोलन के कार्यकर्ताओं किसानों – मजलूमों से कोई मतलब नहीं । इन्हें मीडिया का जो फोकस मिल रहा है उसमें भी पैसे का खेल है । गोरखपुर इकाई ने २७ सितम्बर २०१२ को समान शिक्षा ,सांस्कृतिक क्रांति,अंग्रेजी के वर्चस्व की समाप्ति के मुद्दों से भ्रष्टाचार का संबंध रेखांकित करते हुए धरना दिया था। हमें अपनी भीतरी कमियों को दूर करना होगा,त्याग करना होगा और सक्रियता बढ़ानी होगी ।

    अफलातून (सदस्य , राष्ट्रीय कार्यकारिणी)

शेषमणिजी की बातों से यह स्पष्ट हो गया कि इस दल का हर सदस्य मजबूत धरातल पर खड़ा है और उसके भ्रमित होने का सवाल नहीं है।हम विकेन्द्रीकरण में विश्वास रखते हैं तो राजनैतिक प्रक्रियाओं की चर्चा भी बुनियादी इकाइयों से शुरु होकर जिला , राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक होगी। केजरीवाल टीम स्वयंसेवी संस्थाओ पर सूचना अधिकार कानून लागू करने के विरुद्ध है। हम सोमनाथ त्रिपाठी के पत्र की इस बात की निन्दा करते हैं जिसमें वह कह रहे हैं कि ‘कुछ लोग अफवाह फैला रहे हैं।राष्ट्रीय कार्यकारिणी में उन्होंने खुद कहा है सजप को पूरी तरह नए दल में चले जाना चाहिए।
उ.प्र. में साथी विक्रमा मौर्य और सत्येन्द्र यादव को केजरीवाल के दल के प्रति लुभाते हुए इस मुद्दे पर जेपी सिंह ने फोन किया लेकिन राज्य समिति में भाग लेने से वे कतरा गए।
बिहार इकाई के साथी २६ नवम्बर , २०१२ की केजरीवाल की रैली में सजप के झण्डे-बैनर के साथ यदि शामिल हुए तो उससे विलय का भ्रम पैदा होगा इसलिए राष्ट्रीय नेतृत्व को चाहिए उन्हें तत्काल ऐसा न करने के लिए सावधान कर दें ।

    शिवप्रसाद दुबे

अखबारों में योगेन्द्र यादव का नाम देख कर लगा था’हमारे लोग भी लगे हैं।’ १९९५ में जब सजप बनी थी तब भी भारत दलविहीन नहीं था। आज भी दल किसी को रोकता नहीं है । यदि कोई एम.पी-एम.एल.ए बनने के लिए किसी दल में जाते हों तो जाएं। मुलायम सिंह यादव के दल में शामिल होने की पात्रता (आपराधिक पृष्टभूमि) हमारे कार्यकर्ताओं में है ही नहीं ।
हमने वह दौर देखा है जब विष्णुदेवजी ,अफलातूनजी और चंचल मुखर्जी प्रदेश में जम कर दौरा करते थे ।
अन्ना-केजरीवाल के आन्दोलन से जनता कुछ समय के लिए जरूर उत्साहित हुई। प्रान्तीय अध्यक्ष साथी सुभाषचन्द्र जी ने संदीप पाण्डे को साफ शब्दों में कहा था कि बिना राजनीति परिवर्तन संभव नहीं है ।
१७ वर्षों बाद हमारा दल किसी अन्य दल में जाने की बात सोचे भी तो यह मुझे गलत लगता है । घोटालों के खुलासों के दम पर भ्रष्टाचार हट जाएगा यह संभव नहीं है। कुछ लोग अगर यह सोचते हैं तो वे गलत हैं ।

    सत्येन्द्र यादव

७-८ वर्षों से दल से जुड़ा हूं । मेरे राजनैतिक जीवन की शुरुआत यहीं से हुई है। केजरीवाल की नीतियां क्या हैं ? उन्हें हमारे दल में शामिल हो जाना चाहिए। केजरीवाल जन-लोकपाल के दाएरे में NGO को क्यों नहीं चाहते ?

    रामकेवल चौहान (सदस्य,राष्ट्रीय कार्यकारिणी )

जलपाईगुड़ी की राष्ट्रीय परिषद के समय लग रहा था कि पार्टी टूट जाएगी । उस समय सोपा(इंडिया) गठित होने वाली थी ।केजरीवाल का दल १७ महीने भी नहीं चलेगा । उनके काम को देखने के बाद संवाद हो । अगर हमारे साथी केजरीवाल के दल में गये तो वह सीधा सीधा धोखा होगा । विलय का मैं कट्टर विरोधी हूं ।
साथी रामकेवल ने नागपुर में जीरो बजट खेती के शिविर से पहले जेपी सिंह द्वारा बदतमीजी का जिक्र किया।

    रामसरीख विश्वकर्मा

पार्टी के अस्तित्व के पक्ष में खड़ा रहूंगा ।

    जयराम भारती

कुछ निजी कारणों से मेरी सक्रियता में कुछ कमी आई है। दल और संगठन के साथ हूं ।

    विक्रमा मौर्य(संगठन मंत्री)

हमें किसी अन्य दल के विधान को जांचने की जरूरत नहीं । अपने विधान को सामने रख कर सक्रियता से काम करना चाहिए।
हम बरसों से दिन-प्रतिदिन ब्लॉक , तहसील के भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते हैं । कार्यकर्ता आंखों की पुतली होते हैं । जेपी सिंह का व्यवहार इस परिभाषा के विपरीत है । उन्होंने फोन पर मुझे केजरीवाल की पार्टी के प्रति प्रोत्साहित करने की निष्फल कोशिश की थी।

    बृजबिहारी मल्ल

केजरीवाल की पार्टी चार दिनों की है ।

    डॉ स्वाति (स्थाई आमंत्रित राष्ट्रीय कार्यकारिणी )

सजप का गठन अचानक हुई किसी घोषणा से नहीं हुआ था। कई सहमना संगठनों ने लम्बे समय तक जरूरी मसलों पर चर्चा-बहस के बाद एक राय कायम की थी । अचानक हुई घोषणा गलत होती है । विचारों के आदान-प्रदान का इस बार अभाव है ।
इस प्रस्तावित दल की सामाजिक-आर्थिक नीतियां अस्पष्ट हैं । सिर्फ मीडिया में छा जाने से व्यवस्था परिवर्तन नहीं होता ।हम अपने विश्लेषण को अंतिम सत्य नहीं मानते इसलिए बराबरी के आधार पर चर्चा के हक में हैं । विचार मिलने पर साथ काम हो सकता है । विलय का तो सवाल ही नहीं उठता । जमीन से जुड़े लोग कार्यकर्ताओं से हमेशा संवाद रखते हैं ।

    चंचल मुखर्जी

अगर दो व्यक्ति IAC से बात के लिए अधिकृत थे तो उसकी रिपोर्ट संगठन को क्यों नहीं दी गई ? यह बात सिर्फ पदाधिकारियों तक क्यों सीमित रही ? हम राजनीति करते हैं कोई मठ नहीं चलाते । हमारी राजनीति में नीतिगत बातों का जरूरी स्थान है। उतावलापन उनमें होता है जो जमीन से जुड़े नहीं होते।

    लालबिहारी राजभर

विष्णुदेवजी ने कहा था ,‘घूस नहीं देकर आओगे तो उस बात के लिए मैं लड़ूंगा।’

    शैलेश (वियुस,आमंत्रित)

” धीरज धरहिं,सो उतरहिं पारा”
रामजनम (महामन्त्री ) -

    जिला/राज्य इकाइयां व्यक्तिवाद और तदर्थवाद से चल रही हैं । मुझे भी टटोला जा रहा था। दल के अध्यक्ष और महामंत्री उसे ठीक से नहीं चला रहे हैं। राष्ट्रीय परिषद के बाद कार्यक्रम हो ।
    रामछबीला साहनी (अध्यक्षता)

हम विलय के पक्ष में नहीं हैं । उस दल से वार्ता कर सकते हैं। झंडा-बैनर के साथ दूसरे दल के कार्यक्रम में नहीं जाना चाहिए।
बैठक में बलिया के साथी सुनील कुमार पाण्डे को राज्य समिति का सदस्य बनाया गया।
रामजनम ने सूचित किया कि २३ से २७ फरवरी देवरिया में जीरो बजट खेती पर शिबिर होगा।

    इस बैठक में सजप-उ.प्र. राज्य समिति ने सर्व सम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किया है :

सजप-उ.प्र की यह स्पष्ट मान्यता है कि अरविंद केजरीवाल की प्रस्तावित पार्टी की विभिन्न मसलों पर नीतियां अस्पष्ट और अज्ञात हैं। इस परिस्थिति में दल के साथी यदि सजप के झंडे-बैनर के साथ यदि उनके दल के कार्यक्रम में भाग लेते हैं तो दल का नुकसान होगा।अतः दल के राष्ट्रीय नेतृत्व से यह आग्रह है कि उन साथियों को तत्काल सावधान करें कि वे २६ नवंबर को दल के झंडे-बैनर का प्रयोग न करें।
सजप उ.प्र. ने यह फैसला किया है कि सजप के किसी अन्य दल में विलय का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए। अन्य दल/समूह से दल के संवाद में यह ध्यान रखा जाए कि सजप से अधिक से अधिक लोग इस संवाद में भाग लें । तथा संवाद की सूचना राष्ट्रीय कार्यकारिणी , दल की इकाइयों को समय-समय पर देते रहें ।
सजप उ.प्र प्रस्ताव करती है दल में जान फूंकने के लिए राष्ट्रीय परिषद कार्यक्रम का आवाहन करे।

कूडनकुलम भविष्य की भोपाल त्रासदी हो सकता है : नॉम चौम्स्की

संयुक्त राज्य अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी के अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त शिक्षाविद् तथा विचारक नोमचोमस्की ने कहा है कि कूडनकुलम भविष्य में होने वाली भोपाल त्रासदी हो सकता है। संघर्ष कर रहे लोगों के समर्थन में लिखे एकजुटता पत्र में नोम चोमस्की ने कहा कि परमाणु ऊर्जा एक खतरनाक पहल है खासकर भारत जैसे देशों जहां औद्योगिक आपदाएं ज्यादा बड़ी तादाद में होती रहती है। भोपाल आपदा सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है। कूडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के शुरू होने के विरोध में साहसी लोगों के आंदोलन के लिए मैं अपनी एकजुटता व्यक्त करना चाहता हूँ।

नोमचोमस्की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध भाषाविद, दार्शनिक, संज्ञानात्मक वैज्ञानिक, तर्कशास्त्री, इतिहासकार, राजनीतिक आलोचक और कार्यकर्ता है, उन्होंने एमआईटी में भाषा विज्ञान तथा दश्रन के विभाग एक प्रोफेसर के रूप में काम किया है, भाषा विज्ञान में अपने काम के अलावा उन्होंने युद्ध, राजनीति, मास मीडिया और कई अन्य क्षेत्रों पर लिखा है। चोमस्की को 1980 से 1992 के बीच किसी भी अन्य जीवित विद्वान से सबसे ज्यादा उद्धृत किया गया था और 2005 के एक सर्वेक्षण में उन्हें ‘दुनिया का शीर्ष जन बुद्धिजीवि’ चुना गया था। आधुनिक भाषा विज्ञान का पिता कहे जाने वाले चोमस्को को उनकी पुस्तक ‘मैनुफैकचरिंग कन्सेंट’ के लिए जाना जाता है। नेशनल फिश वर्करस फोरम के सचिव टी. पीटर ने कहा ‘‘ नॉम चोमस्की का समर्थन, केरल, तामिलनाडु तथा श्रीलंका के मछुआरा समुदाय के लिए सबसे बड़ा वरदान है जो दुर्भाग्यवश कूडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के पहले पीड़ित हैं। हमें उम्मीद है कि अब अधिक से अधिक सूमहों तथा व्यक्त्यिों का समर्थन इस संघर्ष को मिलेगा।’

आज चोमस्की मौजूदा समय में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के बुद्धिजीवियों में से सबसे अग्रणीय वामपंथी बुद्धिजीवी हैं। यह आश्चर्य की बात है कि जब इस तरह के एक महान व्यक्तित्व ने कूडनकुलम संघर्ष के लिए समर्थन व्यक्त किया है, भारत में वामपंथी अभी भी परमाणु ऊर्जा के खतरों पर अपने रूख के बारे में उलझन में है।- कायकर्ता तथा लेखक ‘सिविक चन्द्रन’ चोमस्की का यह समर्थन कूडानकुलम मुद्दों पर परमाणु विरोधी कार्यकर्ताओं द्वारा इंटरनेट के माध्यम से जानी पहचानी वेबसाइट www.countercurrents.org पर अद्भुत तरीके से चलाये गये अभियान की कोशिशों का हिस्सा है। यह वेबसाइट कूडनकुलम संघर्ष के समर्थन में जाने पहचाने राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय हस्तियों के बयानों को पोस्टर के रूप उनकी फोटो के साथ 11 अक्टूबार के बाद से रोज प्रकाशित कर रही है।

माइरिड मेगुआर , 1976 की नोबल शांति पुरस्कार विजेता तथा आयरिश शांति कार्यकर्ता, ने भी कूडानकुलम संघर्ष के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि यह संघर्ष दुनिया के लिए एक प्रेरणा है उन्होंने कहा कि यह संघर्ष दुनिया के लिए एक प्रेरणा है उन्होंने यह भी कहा मैं कूडनकुलम के साहसी लोगों के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त करती हूं क्योंकि वह अपने इलाकों में कुडानकुलम परमाणु ऊर्जा संयत्र का अहिंसक तरीके से प्रतिरोध कर रहे है। गांव के साहसी पुरुष और महिलायें जो अपने बच्चोकं के जीवन की रक्षा के लिए तथा मछुआरों सभी की आजीविका तथा अपने पर्यावरण के लिए अपने जीवन को खतरे में डाल रहे हैं।

हम आप सभी का समर्थन करते हैं, बहादुर बने रहिये, चुप मत रहिये आप इस संकट से बाहर आ जायेंगे.. अपने काम से आप दुनिया भर में हम जैसे लोगो के लिए प्रेरणा बन गये हैं हम सच्चे अर्थों में आपके साथ हैं शांति।

इंटरनेट पर यह अभियान पोस्टरों के द्वारा केरल के मुख्यमंत्री वी.एस. अच्युतानंदन के साथ शुरू हुआ जिन्होंने कहा ‘हमें इस परमाणु बम की जरूरत नहीं है केन्द्रीय सरकार को इस संयंत्र से संबंधित सारी गतिविधियों तत्काल रोकना चाहिए। केरल सरकार को तुरंत जागना चाहिए और लोगो पर आये इस खतरे पर समझदारी से काम करना चाहिए।

जबकि परमाणु ऊर्जा पर अच्युतानंदन के इस रूख पर बहस की जा रही है, कुछ दूसरे लोगों ने इस अभियान के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त की है: कूडानकुलम की गरीब जनता वही कर रही है जो कोई भी अपनी जिंदगी की तथा अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए करेगा। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि सरकार जो परमाणु लॉबी का एक हिस्सा बन गई है, वह इसे समझ नहीं सकती। उन्हंे चेरनोबिल और फुकुशिमा के व्यापक सबकों से सीखना चाहिए- बिनोय विसवार्म, केरल के पूर्व मंत्री और भाकपा नेता। हम पूरी तरह से कूडानकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के खिलाफ साहसी संघर्ष का समर्थन करते हैं। डेनमार्क में परामणु ऊर्जा के खिलाफ प्रतिरोध मजबूत तथा अच्छी तरह से संगठित था और आज डेनमार्क परमाणु ऊर्जा से मुक्त है। क्रिसटियन जुहल- संसद सदस्य तथा प्रवक्ता, द रेड ग्रीन एलायंस, डेनमार्क।

कूडनकुलम परमाणु संयंत्र फुकुशिमा बनने के जैसा है। यह तमिलों, सिहली और भारतीयों के नरसंहार होने का इंतजार जैसा है। कूडानकुलम से श्रीलंका की दूरी बस पत्थर फेंकने जैसी दूरी है। हम श्रीलंका के लोग, तमिल, सिंहली, तमिल बोलने वाले मुसलमान कूडानकुलम तथा इंदिताकराई के अपने भाई बहनों के साथ इसका विरोध करते हैं। -सिरीतंगा जयसूर्या राष्ट्रपति के पूर्व उम्मीदवार, महासचिव संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी श्री लंका।

हम सहमत हैं कि विकास के लिए बिजली की जरूरत है। लेकिन मुख्य सवाल यह है कि हमने ऊर्जा के उत्पादन के लिए सभी सुरक्षित विकल्पों का इस्तेमाल किया है, इससे पहले की हम परमाणु ऊर्जा के बारे में सोचे। यह सवाल अपने आप में बहुत संदेहों की तरह ले जाता है। -ऐनी राजा, राष्ट्रीय कार्यकारणी सदस्य, भाकपा।

लालची परमाणु लॉबी की शक्ति को तोड़ने के लिए जनदबाव के जरूरत है। कूडानकुलम महत्वपूर्ण संघर्ष है यूरोप में ट्रेड यूनियन तथा परामणु विरोधी आंदोलन के भीतर आपके संघर्ष का प्रचार प्रसार करेन के लिए मैं अपनी अधिकतम कोशिश करूंगा। -प्रख्यात राजनीतिज्ञ पाल मर्फी, आयरलैंड की सोशलिस्ट पार्टी की तरफ से यूरोपियन संसद के सदस्य हैं।

सोशलिस्ट अलटरनेटिव (एसएवी) जर्मनी, कूडानकुलम के शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर राज्य के दमन तथा आतंक की निन्दा करती है। हम पुलिस बल की तत्काल वापसी की मांग करते हैं। हम मांग करते हैं कि सरकार परमाणु विरोधी आंदोलन की समझदार आवाज पर ध्यान दे तथा इस हत्यारी परियोजना को जो कि लोगों को वनस्पति और जीवों, कमजोर पर्यावरण अन्य प्रजातियों को खतरे में डाल रही है, पर तुरंत रोक लगाये। -लूसी रेडलर, सोशलिस्ट अलटरनेटिव (एस ए वी) जर्मनी की प्रवक्ता।

प्रदर्शनकारियों पर क्रूर व्यवहार को सरकार तत्काल रोके और बिना किसी देरी के इस संयंत्र को बंद करे। अक्षय ऊर्जा उत्पादन के लिए निवेश को मोड़ा जाना चाहिए। सारे विकास को सिर्फ कुछ लोगों के फायदे के लिए नहीं बल्कि जनकेन्द्रित होना चािहए। तमिल एकजुटता अभियान कूडनकुलम के परमाणु विरोधी संघर्ष का समर्थन जारी रखेगा तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इसके समर्थन अपना योगदान देता रहेगा। -टीयूसेनन, तमिल एकजुटता अभियान का अन्तर्राष्ट्रीय समन्वयक।

मैं कूडानकुलम के लोगों तथा जहां कही भी परमाणु रियक्टरों के खिलाफ विरोध हो रहा है उनके साथ एकजुटता व्यक्त करती हूं। दुनिया में इसकी जरूरत नहीं है। हम इसके लम्बी अवधि के खतरों को नहीं समझते और सभी नये प्रतिष्ठानों पर प्रतिबंध लगाने चाहिए। -मल्लिका साराभाई, भारतीय शास्त्रीय नृत्यंगाना और सामाजिक कार्यकर्ता।

परमाणु शक्ति मानवता के खिलाफ है। मनुष्य अभी इतना विकसित नहीं हुआ है कि वह परमाणु शक्ति को संभाल सकें। स्रोत के स्तर पर परमाणु ऊर्जा, परमाणु हथियार से अलग नहीं है। प्रत्येक राष्ट्र का परमाणु हथियार तैयार करने का गुप्त एजेंडा है। परमाणु शक्ति को न कहो। – कविनगर थमराई

कूडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र न केवल स्थानीय लोगों के लिए बल्कि पूरे क्षेत्र के लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर परिणाम डालेगा। इसके साथ ही इस पूरे क्षेत्र के मुछआरों समुदायों की आजीविका का बड़े पैमाने पर नुकसान होगा। परमाणु दुर्घटना की लम्बी अवधि के जोखिम अप्रत्याशित हैं। -डॉ. विनायक सेन, सदस्य स्वास्थ्य पर योजना आयोग की संचालन समिति।

आपदा प्रबंधन योजना बिना कूडनकुलम या कोई भी परमाणु रिएक्टर में आपदा के लिए खुला निमंत्रण है यह एक निश्चित जोखिम है। एक परमाणु रिएक्टर संभवतः एक परमाणु बत से भी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि 1 हजार मेगावाट रिएक्टर नागासाकी में गिराये गये 200 परमाणु बमों के बराबर विकिरण की क्षमता रखता है। -डॉ. एम.पी. परमेश्वरन, परमाणु इंजीनियर, के एसएसपी

कूडनकुलम में परमाणु पागलपन बंद करो, ग्रह की रक्षा करो। -आनंद पटवर्द्धन

इदिंतकराई के जो गांव वाले कूडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के विरोध में लड़ रहे हैं उनके साथ मैं अपनी पूरी एकजुटता के साथ खड़ी हूं। मार्च 2011 में जब फुकूशिमा रिएक्टर भूकंप के द्वारा क्षतिग्रस्त हुआ तब में जापान में थी। आपदा के बाद लगभग हर देश जो परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल कर रहा है उन्होंने ऐलान किया कि वह अपनी परमाणु नीति बदल देंगे, सिवाय भारत के। -अरूंधति राय, लेखिका

बहस
Kajal Kumar नॉम चोमस्की को पता होना चाहि‍ए कि‍ परमाणु संयंत्र कि‍स प्रकार लगाए जाते हैं, उनका व्‍यवस्‍थापन कैसे होता है और उनमें कि‍स प्रकार की सि‍क्‍योरि‍टी ड्रि‍ल रहती हैं, भारत में कि‍तने परमाणु हादसे हुए हैं, भारत का परमाणु इति‍हास कि‍तना पुराना है, हमारी क्षमताएं क्‍या हैं … तेल लॉबी के प्रवक्‍ता आज तमि‍लनाडु के हर कोने में उगे चले आ रहे हैं. कि‍तना आसान हो गया है कि‍ कोई झंडा उठाए और भारत में आकर परमाणु क्षेत्र को दो चपत लगा कर चलता बने. क्‍या पापड़ नहीं बेले इन लोगों ने भारत को परमाणु उर्जा से बंचि‍त रखने में. इन्‍हें हमारा अथाह थोरि‍यम दि‍खाई दे रहा है. भारत की उर्जा ज़रूरतों का जो जवाब वे देते हैं उसके लि‍ए मुफ़्त में पैसा काहे नहीं जुटा देते ये …. उस वि‍षय पर बात करने से पहले तय कर ले कि‍ क्‍या उसके बारे में कुछ पता भी है उसे. वि‍कसि‍त देशों में पहले बंद कराओ फि‍र भारत की बात करने आना मि‍यां…
Kumar Sundaram काजल कुमार जी,

आपने कई सारे सवाल एक साथ उठाए हैं. परमाणु ऊर्जा, जी.एम. फ़ूड और ‘विकास’ के कई पेचीदा मसलों पर सरकार ऐसा ही गुमराह कॉमन सेन्स बनाने की कोशिश कर रही है, जिसके आप आत्म-मुग्ध शिकार हैं.

शुरुआत आपकी आख़िरी पंक्ति से करते हैं:

“वि‍कसि‍त देशों में पहले बंद कराओ फि‍र भारत की बात करने आना मि‍यां”

आपको मालूम है पूरी दुनिया में पिछले कुछ सालों से परमाणु ऊर्जा से दूर जाने का चलन बढ़ा है, खास तौर पर ‘विकसित’ देशों में? जापान, जर्मनी, स्वीडन, इटली, स्विटज़रलैंड जैसे देशों ने अणु-ऊर्जा से तौबा कर ली है, खुद फ्रांस परमाणु पर निर्भरता कम करने जा रहा है? अमेरिका ने पिछले तीस सालों से, थ्री मेल आइलैंड दुर्घटना के बाद, एक भी नया प्लांट नहीं लगाया. कुल मिलाकर, ये देश जिस तकनीक के चंगुल से खुद आज़ाद हो रहे हैं अपने मुनाफे के लिए भारत जैसे मुल्कों में डंप कर रहे हैं.

“क्या पापड़ नहीं बेले इन लोगों ने भारत को परमाणु उर्जा से बंचि‍त रखने में.”

बिलकुल झूठी बात है. भारत को परमाणु डील की पेशकश अमेरिका की तरफ से आई थी. रूस, फ्रांस इत्यादि देश उससे पहले से भी रिएक्टरों की सप्लाई के लिए तैयार थे. शुरुआती दशकों में भारत का सारा परमाणु कार्यक्रम अमेरिका, कनाडा और रूस की मदद से तैयार हुआ. मोटा-मोटी कहें तो कनाडा से मिले CANDU डिजाइन पर हमारा पूरा परमाणु-उद्योग खडा है. 1974 में कनाडाई तकनीक और शातिपूर्ण कार्यक्रम के नामपर मिली अंतर्राष्ट्रीय तकनीकी ज्ञान का सहारा लेकर भारत ने परमाणु टेस्ट किए, जो साफ़ तौर पर नीति का उल्लंघन था, इसलिए अगले तीन दशकों तक इसपर बाहरी मदद पर प्रतिबन्ध लगा रहा. लेकिन अपनी खतरनाक तकनीक को यहाँ खपाने और भारत को विदेश नीति में अपना पिट्ठू बनाने के लिए अमेरिका ने हमें इस प्रतिबन्ध से तब निकाला जब ईरान पर इसी तकनीक के इस्तेमाल के लिए प्रतिबन्ध लगाए जा रहे हैं और युद्ध की धमकी रोज दी जा रही है. मतलब ये, कि भारत को इस मामले में उदार अंतर्राष्ट्रीय मदद मिली है. कूडनकुलम में रूसी और जैतापुर में फ्रांसीसी रिएक्टर आपको वंचित रखने के लिए नहीं, अपना बाज़ार बढाने के लिए मिल ही रहे हैं.

“इन्‍हें हमारा अथाह थोरि‍यम दि‍खाई दे रहा है. भारत की उर्जा ज़रूरतों का जो जवाब वे देते हैं उसके लि‍ए मुफ़्त में पैसा काहे नहीं जुटा देते ये ..”

यह हमारे परमाणु प्रतिष्ठान का सबसे झूठा और खोखला दावा है!
थोरियम से भारत को ऊर्जा-संपन्न बनाने का डॉ. भाभा का दिवास्वप्न महँगा और खतरनाक था. थोरियम अपने आप में रेडियोधर्मी ईंधन नहीं होता. उसे प्लूटोनियम के साथ मिलाकर ही इस्तेमाल किया जा सकता है. प्लूटोनियम प्रकृति में नहीं मिलता, उसे यूरेनियम-आधारित रिएक्टरों में तैयार किया जाता है. तो थोरियम तक पहुँचाने के लिए सैकड़ों यूरेनियम रिएक्टर और फिर उतने ही फास्ट-ब्रीडर रिएक्टर चाहिये. सैकड़ों परमाणु रिएक्टरों के लिए हमारे देश में न पैसा है, न ज़मीन और ना इतना पानी (अगर आप इसके खतरों और पर्यावरणीय क्षति से पूरी तरह आँख मूँद लें तब भी). फास्ट-ब्रीडर रिएक्टरों का किस्सा ये है कि जापान और फ्रांस जैसे देश उनकी तकनीक को आजमा कर छोड़ चुके हैं, यह इतनी खतरनाक है. इसकी तकनीक अभी भारत के पास भी मुकम्मल नहीं है. थोरियम रिएक्टर इन सबसे कहीं ज़्यादा रिस्की, महंगे और जटिल होते हैं, जिनकी तो अगले कई दशकों तक खुद परमाणु ऊर्जा विभाग वाले भी कल्पना नहीं करते (आप इस पर ज़्यादा जानकारी के लिए वैज्ञानिक एम्.वी. रमना का यह लेख पढ़ सकते हैं: http://www.outlookindia.com/article.aspx?220858)

इस सवाल में आपने देश की ऊर्जा ज़रूरतों का मसला भी जोड़ा है, जिस पर मैं अभी खाना खाकर वापस आता हूँ तो बात करता हूँ…

Kumar Sundaram “भारत की उर्जा ज़रूरतों का जो जवाब वे देते हैं उसके लि‍ए मुफ़्त में पैसा काहे नहीं जुटा देते ये ..”

परमाणु ऊर्जा भारत की ऊर्जा ज़रूरत का जवाब दूर-दूर तक नहीं है.

भारत में कुल बिजली का मात्र 2.3 प्रतिशत आज अणु-ऊर्जा से आता है, जबकि तकनीकी शोध के राष्ट्रीय बजट का बड़ा हिस्सा, ढेर सारी सब्सिडी और बिना लेखा-जोखा का पैसा इस क्षेत्र में पचास साल से लगा है. अगले दो दशकों में ये लोंग अनुऊर्जा को बढ़ाकर 7-8 प्रतिशत करना चाहते हैं, जिसकी भारी कीमत देश को चुकानी होगी – आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक अर्थों में. आज भी, नवीकरणीय ऊर्जा अनुऊर्जा का चार-गुना, कुल बिजली का लगभग दस प्रतिशत उत्पादित करती है. आज जब हरित ऊर्जा तकनीक दुनिया भर में उन्नत और सस्ती हो रही है, भारत में परमाणु ऊर्जा विभाग के अध्यक्ष रहे सज्जन को पिछले साल सौर-ऊर्जा मिशनों की जिम्मेवारी दे दी गई और अपनी पहली प्रेस वार्ता में उन्होंने कहा कि सौर ऊर्जा का कोई ज़्यादा भविष्य नहीं है.

मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि ऊर्जा के सवाल को थोड़े बड़े फलक पर सोचें. बिजली का सवाल सिर्फ बड़े स्तर पर उत्पादन से हल नहीं होने वाला है. पिछले दो दशकों में बिजली का उत्पादन लगभग दुगुना हुआ है जबकि बिजलीहीन गांवों (देश के 40 प्रतिशत गाँव!) की संख्या में कोई अधिक फर्क नहीं पड़ा है. मतलब ये कि बड़े पैमाने पर केंद्रीकृत ढाँचे में बिजली-उत्पादन की बजाय छोटे स्तर पर विकेन्द्रीकृत बिजली-निर्माण की ज़रूरत है, लेकिन मॉल और हाइवे को विकास का मानक मानने से हमारी प्राथमिकता बदरूप हो जाती है और हमारे नेता लाखों लोगों को बिजली पहुंचाने का भावनात्मक नारा देकर असल में ऐसे रास्ते पर धकेलते हैं जहां सचमुच लोगों को बिजली तो नहीं ही मिलती है, उन्हें ही विस्थापित भी होना पडता है और फिर परमाणु विकिरण का शिकार भी.

आपसे अनुरोध है ऊर्जा के इस मसले पर मेरा जनसत्ता में छापा यह लेख पढ़ाने की जहमत उठाएं: http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/25668-2012-08-04-05-49-58

Kumar Sundaram और फिर,

“नॉम चोमस्की को पता होना चाहि‍ए कि‍ परमाणु संयंत्र कि‍स प्रकार लगाए जाते हैं, उनका व्‍यवस्‍थापन कैसे होता है और उनमें कि‍स प्रकार की सि‍क्‍योरि‍टी ड्रि‍ल रहती हैं, भारत में कि‍तने परमाणु हादसे हुए हैं, भारत का परमाणु इति‍हास कि‍तना पुराना है, हमारी क्षमताएं क्‍या हैं ..”

आपको भारत में हुई परमाणु दुर्घटनाओं और यहाँ परमाणु सुरक्षा की भारी खामी के बारे में जानकारी का अभाव है.

भारत में दर्जनों बड़ी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं जिनमें 1993 में यूपी के नरोरा और 1994 में गुजरात के काकड़ापार में गंभीर दुर्घटनाएं हो चुकी हैं. 2004 की सुनामी के समय कलपक्कम रिएक्टर तक पानी घुस आया था और कैगा में तो निर्माण के दौरान पूरा गुम्बज ही गिर गया था.

भारत उन गिने चुने मुल्कों में है जहां परमाणु सुरक्षा के लिए जिम्मेवार नियामक एजेंसी – परमाणु ऊर्जा नियमन बोर्ड (AERB) – खुद परमाणु ऊर्जा विभाग को ही रिपोर्ट करती है, उसी के पैसे से चलती है और रिएक्टरों की जांच के लिए विशेषज्ञों तक के लिए परमाणु उद्योग पर ही निर्भर है. इस वोर्ड के अध्यक्ष रहे डॉ. ए. गोपालकृष्णन के कई इंटरव्यू है जो मैं आपसे साझा कर सकता हूँ. 1993-95 में परमाणु रिएक्टरों की सुरक्षा पर देश-स्तरीय जांच रिपोर्ट इन्होने तैयार करवाई थी, जिसमें गंभीर खतरों का खुलासा किया था. भारत सरकार ने सुरक्षा के लिए बस इतना एहतियात बरता की उस रिपोर्ट को top secret करार देकर जब्त कर दिया.

फिलहाल आप कूडनकुलम बिजलीघर क्यों नहीं खुलना चाहिए, इस पर इन्हीं डॉ. गोपालाकृष्णन का यह लेख पढ़िए: http://www.dianuke.org/stop-kudankulam-fuelling-lives-are-stake-gopalakrishnan/

यह एक कठिन चुनौती है, जिसकी पर्याप्त तैयारी न होने से निराशा ही हाथ लगेगी, इसकी आशंका है। 1977 के बाद ऐसा ही हुआ था। खास तौर पर अन्ना टीम को निम्न सवालों का सामना करना होगा।
1.    राजनैतिक विकल्प तैयार करने के लिए अन्ना टीम को अपनी नीतियों और वैचारिक दृष्टि को स्पष्ट करना होगा। पूंजीवाद, साम्राज्यवाद, नवउदारवाद, वैश्वीकरण-निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों, कंपनी राज और विकास के आधुनिक माॅडल के बारे में उनकी क्या सोच है ?
2.    सामाजिक न्याय, जाति प्रथा, स्त्री-पुरुष भेद, आरक्षण नीति, मनुवादी-ब्राम्हणवादी व्यवस्था आदि के बारे मंे उनकी क्या राय है ?
3.    अन्ना आंदोलन ने देशभक्ति और राष्ट्रप्रेम की भावना को जगाने की कोशिश की है, जिसका स्वागत है। किन्तु उनको स्पष्ट करना होगा कि उनका राष्ट्रवाद उग्र व संकीर्ण होगा या उदात्त और सहिष्णु होगा ? यह विविधता, बहुलता और विकेन्द्रीकरण पर आधारित होगा या नहीं ? इसमें हाशिए पर रहने वाले छोटे और अल्पसंख्यक समुदायों की बराबरीपूर्ण व सम्मानपूर्ण जगह होगी या नहीं ? साम्प्रदायिकता के सवाल पर भी उन्हें अपनी भूमिका स्पष्ट करनी होगी।
4.    आज के चुनाव दो नंबरी धन, गुण्डों, जातिवाद, साम्प्रदायिकता और कार्यकर्ताओं की फौज के बल पर जीते जाते हैं। अन्ना टीम इसका मुकाबला कैसे करेगी ? गांव-गांव, मोहल्ले-मोहल्ले मंे समर्पित व ईमानदार कार्यकर्ता कहां से लाएगी ? क्या एक वैकल्पिक राजनैतिक संस्कृति और कार्यशैली बनाने के बारे मंे उन्होंने सोचा है ? क्या इसका कोई अनुभव उनके पास है ? यदि नहीं, तो अनुभव की कमी को कैसे दूर करेंगे ?
5.    देश में पहले से अनेक संगठन और समूह जमीन पर जनता की लड़ाई लड़ रहे हैं और वैकल्पिक राजनीति के प्रयोग कर रहे हैं। क्या अन्ना टीम उनके साथ कोई संवाद कायम करेगी  ? लोहिया, जेपी, शंकर गुहा नियोगी, किशन पटनायक एवं सच्चिदानंद सिन्हा जैसे विचारकों और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा, समता संगठन व समाजवादी जन परिषद जैसे संगठनों ने वैकल्पिक राजनीति पर काफी सोचा है और प्रयोग किए हैं। क्या अन्ना के साथी उनके अनुभवों से सीखने और उनके साथ बराबरी का रिश्ता कायम करने के लिए तैयार हैं ?
6.    अन्ना ने कहा है कि वे अच्छे और ईमानदार उम्मीदवारों का चुनाव करेंगे। इसकी क्या कसौटी होगी और क्या गारंटी होगी ? व्यक्तिगत रुप से तो मनमोहन सिंह, ममता बनर्जी और नरेन्द्र मोदी भी ईमानदार हैं। क्या देश चलाने के लिए व्यक्तिगत ईमानदारी पर्याप्त है ?
7.    अन्ना टीम की नजर 2014 के लोकसभा चुनावों पर मालूम होती है। किन्तु वैकल्पिक राजनीति खड़ी करके सफलता पाने के लिए इतना समय काफी अपर्याप्त है। अन्ना टीम की कितनी लंबी तैयारी है ? क्या वे इस बात के लिए तैयार हैं कि चुनाव में उनके अधिकांश उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो जाए ? क्या इससे उन्हें झटका नहीं लगेगा और वे निराश होकर चुप नहीं बैठ जाएंगे ? या चुनावी सफलता पाने के लिए वे भी सिद्धांतों से समझौता नहीं कर लेगें ? क्या वे इसके लिए गलत तत्वों से हाथ नहीं मिलाते जाएंगे और क्या गलत प्रवृत्तियों को अनदेखा नहीं करते जाएंगे ? दोनों स्थितियों में क्या वे देश मंे परिवर्तन चाहने वाली जनता के बीच निराशा की लहर नहीं पैदा करेंगे ?
8.    एक वैकल्पिक राजनीति के लिए जन आंदोलन, रचनात्मक कार्य, वैचारिक स्पष्टता, नीचे से संगठन निर्माण तथा चुनावी अनुभव इन पांचों मोर्चों पर काम करने की जरुरत है। इसके बारे में क्या अन्ना टीम की कोई योजना है और यदि है तो क्या ? व्यवस्था परिवर्तन कैसे होगा, इसका कोई रोडमेप उनके पास है ?
ये सवाल आज कई लोगों के मन में है और इनके जवाब पर अन्ना आंदोलन का भविष्य निर्भर करता है।

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