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एक तरफ स्कूली बच्चों , एन.सी.सी. कैडेटों द्वारा जहां मतदाता जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है वहीं अत्याधुनिक तकनीक जैसे इंटरनेट तथा वीडियो कानफरेंसिंग को प्रचारित करने चुनाव आयोग तथा स्थानीय प्रशासन मताधिकार को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने वाली बुनियादी गलतियां कर चुका है | समाजवादी जनपरिषद का आरोप है की प्रदेश शासन के चतुर्थ एवं लिपिकीय कर्मचारियों द्वारा पूरी मेहनत के बावजूद परिचय पात्र धारक आम मतदाता को मतदाता सूची में में भारी दिक्कत होने जा रही है | समाजवादी जनपरिषद के वाराणसी कैंट के उम्मीदवार अफलातून ने यह आरोप लगाया है की तान्या कम्प्युटर एक निजी कंपनी को मतदाता सूची से संबंधित काम दी जाने के कारण यह समस्या उपस्थित हुई है | अफलातून ने यह भी बताया कि नामांकन प्रक्रिया के दौरान इंटरनेट पर मौजूद मतदाता सूची तथा जिस सूची के आधार पर चुनाव होना है,उसमें अंतर है |

सजप ने निर्णय लिया है कि दिनांक २५ जनवरी २०१२ को ‘ मतदाता दिवस’ के उपलक्ष्य में नए बने मतदाताओं को इन कमियों के प्रति जागरूक किया जाएगा तथा उत्तर प्रदेश शासन के बूथ स्तरीय अधिकारियों को सम्मानित किया जाएगा |

सजप की चुनाव संचालन समिति की बैठक में सर्वश्री प्रो. महेश विक्रम सिंह , योगेन्द्र नारायण शर्मा , डा. नीता चौबे , राज्य महामंत्री रामजनम , राष्ट्रीय महामंत्री प्रो. सोमनाथ त्रिपाठी ,सैय्यद मकसूद , अब्दुल हफीज , मो उम्र , सलीम शिवालवी , चौधरी राजेन्द्र ,नसीम अहमद , मो असलम व काशीनाथ ने विचार व्यक्त किए |

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि यह सूरत बदलनी चाहिए।

आजादी की लड़ाई का एक साफ मकसद था , गुलामी के जुए को उतार फेकना। जब उद्देश्य ऊंचा और साफ-साफ होता है तब समाज का हर तबका उस  राजनीति से जुड़ जाता है । मौजूदा विधान सभा चुनाव एक ऐसे दौर में हो रहा है जब देश के हर नागरिक के मन में भ्रष्टाचार के खिलाफ तीव्र भावना है । लेकिन राजनीति की मुख्यधारा के अधिकांश’ दलों के पांव भ्रष्टाचार के कीचड से सने हैं। इसी वजह से आम जनता का इन चुनावों में उत्साह कम दिख रहा है। देश में बड़े बड़े घोटालों की आई बाढ़ की जड़ से १९९२ से चलाई गई आर्थिक नीतियों का सीधा सम्बन्ध है। इन नीतियों को केन्द्र और राज्य में रही हर दल की सरकार ने अपना लिया है। इसीलिए ये तमाम पारटियां इस चुनाव में इन मसलों से मुंह चुरा रही हैं । 

शिक्षित नौजवानों को छोटी-सी नौकरी भी बिना रिश्वत नहीं मिल रही। नई आर्थिक नीतियों से रोजगार के अवसर संकुचित हुए हैं। आबादी के मुट्ठी-भर लोगों के लिए रोजगार,स्वास्थ्य,शिक्षा की सुविधाओं को बढ़ावा देने का सीधा मतलब है कि आम लोगों को इन सुविधाओं से दूर किया जाना। जब आम जनता की जरूरतों को पूरा करना उद्देश्य होगा तब ही रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और वे रोजगार सुरक्षित रहेंगे। एक प्रभावशाली जन लोकपाल कानून की धज्जियां उड़ाने में सभी बड़े दलों ने कोई कसर नहीं छोड़ी ।  भ्रष्टाचार का सफाया करने के लिए जन लोकपाल के अलावा भी अन्य पहल भी करनी होंगी।

बुनकरी-जरदोजी तथा अन्य रोजगार , स्वास्थ्य , शिक्षा – इन सभी क्षेत्रों में जनता की दुशवारियां बढ़ गई हैं। आम बुनकर और दस्तकार को ध्यान में रखकर कपड़ा नीति और दस्तकार नीति अब तक नहीं बनी है । सभी बड़ी पार्टियां इसके लिए जिम्मेदार हैं । बुनकरों की सहकारी समिति के नाम पर फर्जीवाड़े के मामले भी सामने आए हैं । जरदोजी और दस्तकारी से जुड़े लोगों को बुनकरों के समान सुविधायें मिलनी चाहिए। बुनकर और दस्तकार इस देश के लिए बहुमूल्य विदेशी मुद्रा अर्जित करते हैं लेकिन उनकी तरक्की की हमेशा अनदेखी की जाती है।
खेती और दस्तकारी के बाद हमारे देश में सबसे बड़ा रोजगार खुदरा-व्यापार है जिस पर हमले की रणनीति बन चुकी है। केन्द्र सरकार की पार्टी के राजकुंवर की समझदारी के अनुसार दानवाकार विदेशी कम्पनियों को देश का खुदरा-व्यापार सौंप कर वे किसानों का भला करने जा रहे हैं । देश के सबसे बड़े घराने के द्वारा जिन सूबों में सब्जी का खुदरा-व्यवसाय हो रहा है क्या वहां के किसानों ने खुदकुशी से मुक्ति पा ली है ?
प्रदेश की सरकार द्वारा भ्रष्टाचार को नया संस्थागत रूप दे दिया गया है। किसानों की जमीनें लेकर जो बिल्डर नये नगर और एक्सप्रेस-वे बनाने की जुगत में है, उनके खर्च पर प्रदेश सरकार पुलिस थाने ( चुनार ) का निर्माण करवाया है। कई पुलिस चौकियां अपराधियों के पैसों से बनवाई गई हैं। समाजवादी जनपरिषद नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए बना है। जिन इलाकों में दल ने संघर्ष किया है और मजबूत जमीन बना ली है सिर्फ वहीं चुनाव में शिरकत करता है।  मजबूत राजनैतिक विकल्प बनाने का काम व्यापक जन-आन्दोलन द्वारा ही संभव है । इसलिए भ्रष्ट राजनीति के दाएरे से बाहर चलने वाले आन्दोलनों और संगठनों के मोर्चे का वह हिस्सा है। राष्ट्रीय-स्तर पर लोक राजनीति मंच’ तथा जन आन्दोलनों का राष्ट्रीय समन्वय ऐसी बड़ी पहल हैं तथा स्थानीय स्तर पर साझा संस्कृति मंच , जो सामाजिक सरोकारों का साझा मंच है ।
वाराणसी के हमारे प्रत्याशी की राजनैतिक यात्रा इसी शहर में भ्रष्टाचार विरोधी जयप्रकाश आन्दोलन के किशोर कार्यकर्ता के रूप में  शुरु हुई| छात्र-राजनीति को जाति-पैसे-गुंडागर्दी से मुक्त कराने की दिशा में समता युवजन सभा से वे जुड़े और एक नयी राजनीति की सफलता के शुरुआती प्रतीक बने। लोकतांत्रिक अधिकार और विकेन्द्रीकरण , सामाजिक न्याय ,पर्यावरण तथा आर्थिक नीति के दुष्परिणामों के विरुद्ध संगठनकर्ता बने तथा इन्हीं संघर्षों के लिए समाज-विरोधी ताकतों के लाठी-डंडे खाये और थोपे गए फर्जी मुकदमों में कई बार जेल गये। फिरकावाराना ताकतों का मुकाबला करने के लिए नगर में गठित ‘सद्भाव अभियान’ से वे सक्रियता से जुड़े । साम्प्रदायिक दंगों के दौरान थोपे गये फर्जी मुकदमों को हटाने के पक्ष में तथा हिंसा में शरीक लोगों पर लगे मुकदमों को सरकार द्वारा हटाने के विरुद्ध अफलातून ने कामयाब कोशिश की। पुलिस उत्पीड़न के खिलाफ हमारे समूह ने रचनात्मक संघर्ष का सहारा लिया है तथा मानवाधिकार आयोग द्वारा सार्थक हस्तक्षेप के लिए पहल की है ।
वाराणसी के स्त्री सरोकारों के साझा मंच – समन्वय के माध्यम से शहर में ही नहीं समूचे राज्य में हुए नारी-उत्पीड़न के विरुद्ध कारगर आवाज उठाई गई है ।
रोज-ब-रोज की नागरिक समस्याओं का समाधान नगर निगम और उसके सभासदों के स्तर पर होना चाहिए । विधायक-नीधि का दुरुपयोग ज्यादा होगा यदि कोई ठेकेदार ही विधायक बन जाए।
इसलिए वाराणसी कैन्ट क्षेत्र में भ्रष्ट राजनीति से जुड़े दलों का विकल्प खोजने की आप कोशिश करेंगे तो आपकी निराशा दूर हो सकती है । बड़े दलों से जनता की निराशा के कारण फिर अस्पष्ट बहुमत का दौर शुरु होगा ऐसा प्रतीत हो रहा है।इसलिए समाजवादी जनपरिषद के उम्मीदवार विधान सभा में विपक्ष में रहने और जन आकांक्षाओं की आवाज को बुलन्द करने का संकल्प लेते हैं। हमें जनता के विवेक पर भरोसा है। यह सिर्फ अफवाह ही हो सकती है कि सुबह होगी ही नहीं । सुबह होगी क्योंकि मत, बल,समर्थन आपके हाथ में है। भ्रष्ट राजनीति से जुड़े दलो से छुटकारा पाने की आपकी कोशिश सफल होगी यह हमे यकीन है। विधान सभा में आपकी आवाज बुलन्द हो इसलिए हम आप से अपील करते हैं कि अपना अमूल्य वोट देकर वाराणसी कैन्ट से समाजवादी जनपरिषद के साफ-सुथरे और जुझारु उम्मीदवार अफ़लातून को भारी मतों से विजयी बनाएं ।निवेदक,
समाजवादी जनपरिषद , उत्तर प्रदेश
लोक राजनैतिक मंच                                     साझा संस्कृति मंच

अपनी आवाज अपना गला ( दुनिया मेरे आगे )

Monday, 26 December 2011 06:10

अफलातून जनसत्ता 26 दिसंबर, 2011: हरे राम, हरे कृष्ण’ संप्रदाय द्वारा रूसी में अनूदित गीता पर रूस में आक्षेप लगाए गए हैं और उस पर प्रतिबंध लगाने की बात की गई है। विदेश मंत्री ने संसद और देश को आश्वस्त किया है कि वे रूस सरकार से इस मामले पर बात करेंगे। मामला पर-राष्ट्र का है। क्या भारत में ही इस पुस्तक को लेकर परस्पर विपरीत समझदारी नहीं है? यह मतभेद और संघर्ष सहिष्णु बनाम कट्टरपंथी का है। लोहिया ने इसे ‘हिंदू बनाम हिंदू’ कहा। उन्होंने गांधी-हत्या (हत्यारों की शब्दावली में ‘गांधी-वध’) को भी हिंदू बनाम हिंदू संघर्ष के रूप में देखा। देश के विभाजन के बाद एक बार गांधीजी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर में निमंत्रित किया गया था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गीता के प्रति समझदारी भी उसी प्रसंग में गांधीजी के समक्ष प्रकट हुई थी। सरसंघचालक गोलवलकर ने गांधीजी का स्वागत करते हुए उन्हें ‘हिंदू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ बताया। उत्तर में गांधीजी बोले- ‘मुझे हिंदू होने का गर्व अवश्य है, लेकिन मेरा हिंदू धर्म न तो असहिष्णु है और न बहिष्कारवादी हैं। हिंदू धर्म की विशिष्टता, जैसा मैंने उसे समझा है, यह है कि उसने सब धर्मों की उत्तम बातों को आत्मसात कर लिया है। अगर हिंदू यह मानते हों कि भारत में अ-हिंदुओं के लिए समान और सम्मानपूर्ण स्थान नहीं है और मुसलमान भारत में रहना चाहें तो उन्हें घटिया दर्जे से संतोष करना होगा तो इसका परिणाम यह होगा कि हिंदू धर्म श्रीहीन हो जाएगा। मैं आपको चेतावनी देता हूं कि अगर आपके खिलाफ लगाया जाने वाला यह आरोप सही है कि मुसलमानों को मारने में आपके संगठन का हाथ है तो उसका परिणाम बुरा होगा।’
गोलवलकर से गांधीजी के वार्तालाप के बीच में गांधी-मंडली के एक सदस्य बोल उठे- ‘संघ के लोगों ने निराश्रित शिविर में बढ़िया काम किया है। उन्होंने अनुशासन, साहस और परिश्रमशीलता का परिचय दिया है।’ गांधीजी ने उत्तर दिया- ‘लेकिन यह न भूलिए कि हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासिस्टों ने भी यही किया था।’ उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘तानाशाही दृष्टिकोण रखने वाली सांप्रदायिक संस्था’ बताया।

(पूर्णाहुति, चतुर्थ खंड, पृष्ठ- 17) इसके बाद जो प्रश्नोत्तर हुए उसमें गांधीजी से पूछा गया- ‘क्या हिंदू धर्म आतताइयों को मारने की अनुमति नहीं देता? अगर नहीं देता तो गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने कौरवों का नाश करने का जो उपदेश दिया है, उसके लिए आपका क्या स्पष्टीकरण है?’ गांधीजी ने कहा- ‘पहले प्रश्न का उत्तर ‘हां’ और ‘नहीं’ दोनों है। मारने का प्रश्न खड़ा होने के पहले हम इस बात का अचूक निर्णय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आततायी कौन है? दूसरे शब्दों में- हमें ऐसा अधिकार मिल सकता है, जब हम पूरी तरह निर्दोष बन जाएं। एक पापी दूसरे पापी का न्याय करने या फांसी लगाने के अधिकार का दावा कैसे कर सकता है? रही बात दूसरे प्रश्न की, तो यह मान भी लिया जाए कि पापी को दंड देने का अधिकार गीता ने स्वीकार किया है, तो भी कानून द्वारा उचित रूप में स्थापित सरकार ही उसका उपयोग भली-भांति कर सकती है। अगर आप न्यायाधीश और जल्लाद, दोनों एक साथ बन जाएं तो सरदार और पंडित नेहरू दोनों लाचार हो जाएंगे। उन्हें आपकी सेवा करने का अवसर दीजिए। कानून को अपने हाथों में लेकर उनके प्रयत्नों को विफल मत कीजिए।’ (संपूर्ण गांधी वांग्मय, खंड: 89)
आध्यात्मिक सत्य को समझाने के लिए कई बार भौतिक दृष्टांत की आवश्यकता पड़ती है। यह भाइयों के बीच लड़े गए युद्ध का वर्णन नहीं है, बल्कि हमारे स्वभाव में मौजूद ‘भले’ और ‘बुरे’ के बीच की लड़ाई का वर्णन है। मैं दुर्योधन और उसके दल को मनुष्य के भीतर की बुरी अंत:प्रेरणा और अर्जुन और उसके दल को उच्च अंत:प्रेरणा मानता हूं। हमारी अपनी काया ही युद्ध-भूमि है। इन दोनों खेमों के बीच आंतरिक लड़ाई चल रही है और ऋषि-कवि उसका वर्णन कर रहे हैं। अंतर्यामी कृष्ण, एक निर्मल हृदय में फुसफुसा रहे हैं। गांधीजी तब भले ही एक व्यक्ति हों, आज तो उनकी बातें कालपुरुष के उद्गार-सी लगती हैं और हमारे विवेक को कोंचती हैं। उस आवाज को तब न सुन कर हमने उसका ही गला घोंट दिया था। अब आज? आज तो आवाज भी अपनी है और गला भी अपना!

गांधी जी और संघ

जनसत्ता 29 दिसंबर, 2011: अपनी आवाज अपना गला’ (दुनिया मेरे आगे, 26 दिसंबर) में अफलातून जी ने कुछ तथ्यों को सही संदर्भों के साथ प्रस्तुत नहीं किया है। इसमें संघ-द्वेष से आपूरित पूर्वग्रह की झलक मिलती है। देश विभाजन के बाद गांधीजी किसी संघ शिविर में नहीं गए थे। दिल्ली में भंगी बस्ती की शाखा में उन्हें 16 सितंबर, 1947 को आमंत्रित किया गया था। आमंत्रित करने वाले व्यक्ति सरसंघचालक गोलवलकर नहीं, बल्कि दिल्ली के तत्कालीन प्रांत प्रचारक वसंत राव ओक थे। गांधीजी सदैव खुद को गौरवशाली सनातनी हिंदू कहते थे। वसंत राव ओक ने शाखा पर गांधीजी का परिचय ‘हिंदू धर्म द्वारा उत्पन्न किया हुआ एक महान पुरुष’ कह कर करवाया। गांधीजी ने इस परिचय पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
गोलवलकर से गांधीजी की बातचीत का वर्णन अफलातून जी ने ‘पूर्णाहुति’ का संदर्भ देकर किया है। इस मुलाकात का गांधी संपूर्ण वांग्मय में दो बार जिक्र है। पहला, 21 सितंबर, 1947 को प्रार्थना-प्रवचन में- ‘अंत में गांधीजी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरु (गोलवलकर) से अपनी और डॉ दिनशा मेहता की बातचीत का जिक्र करते हुए कहा कि मैंने सुना था कि इस संस्था के हाथ भी खून से सने हुए हैं। गुरुजी ने मुझे आश्वासन दिलाया कि यह बात झूठ है। उनकी संस्था किसी की दुश्मन नहीं है। उसका उद्देश्य मुसलमानों की हत्या करना नहींं है। वह तो सिर्फ अपनी सामर्थ्य भर हिंदुस्तान की रक्षा करना चाहती है। उसका उद्देश्य शांति बनाए रखना है। उन्होंने (गुरुजी ने) मुझसे कहा कि मैं उनके विचारों को प्रकाशित कर दूं।’
इसका जिक्र गांधीजी ने भंगी बस्ती की शाखा पर अपने भाषण में किया- ‘कुछ दिन पहले ही आपके गुरुजी से मेरी मुलाकात हुई थी। मैंने उन्हें बताया था कि कलकत्ता और दिल्ली में संघ के बारे में क्या-क्या शिकायतें मेरे पास आई थीं। गुरुजी ने मुझे आश्वासन दिया कि हालांकि संघ के प्रत्येक सदस्य के उचित आचरण की जिम्मेदारी नहीं ले सकते, फिर भी संघ की नीति हिंदुओं और हिंदू धर्म की सेवा करना मात्र है और वह भी किसी दूसरे को नुकसान पहुंचा कर नहीं। संघ आक्रमण में विश्वास

नहीं रखता। अहिंसा में उसका विश्वास नहीं है। वह आत्मरक्षा का कौशल सिखाता है। प्रतिशोध लेना उसने कभी नहीं सिखाया।’
इस मुलाकात का जैसा वर्णन अफलातून जी ने किया है और अंत में लिखा है कि ‘उन्होंने (गांधीजी ने) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को ‘तानाशाही दृष्टिकोण रखने वाली सांप्रदायिक संस्था’ बताया।’ ये विचार प्यारेलाल जी के हो सकते हैं, गांधीजी के नहीं। गांधीजी ने अपने भाषण में जो संघ के विषय में कहा, वह इस प्रकार है- ‘संघ एक सुसंगठित और अनुशासित संस्था है। उसकी शक्ति भारत के हित में या उसके खिलाफ प्रयोग की जा सकती है। संघ के खिलाफ जो आरोप लगाए जाते हैं, उनमें कोई सच्चाई है या नहीं, यह संघ का काम है कि वह अपने सुसंगत कामों से इन आरोपों को झूठा साबित कर दे।’
अफलातून जी ने लिखा है- ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गीता के प्रति समझदारी भी उसी प्रसंग में गांधीजी के समक्ष प्रकट हुई।’ इसका भी वर्णन संपूर्ण वांग्मय में है। किसी संघ अधिकारी ने गीता के संदर्भ में वहां कुछ भी नहीं कहा था। एक स्वयंसेवक ने गांधीजी द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के संदर्भ में गीता का हवाला देते हुए यह पूछा था- ‘गीता के दूसरे अध्याय में भगवान कृष्ण कौरवों का नाश करने के लिए जो उपदेश देते हैं, उसकी आप किस तरह व्याख्या करेंगे?’ गांधीजी ने स्वयंसेवक की समझदारी पर कोई सवाल नहीं उठाया, संजीदगी से जवाब दिया- ‘… पापी को सजा देने के अधिकार की जो बात गीता में कही गई है, उसका प्रयोग तो केवल सही तरीके से गठित सरकार ही कर सकती है।’ बाद में गांधीजी ने आग्रह किया कि कानून को अपने हाथ में लेकर सरकारी प्रयत्नों में बाधा न डालें।
लेख के अंत में गीता के अर्थ का जो आध्यात्मिक आयाम अफलातून जी ने प्रस्तुत किया है, उस पर किसी को आपत्ति नहीं होगी। अनावश्यक रूप से संघ को बदनाम करने और घृणा फैलाने के प्रयासों को जब इन आयामों में मिश्रित किया जाता है, तब हम समाज की सेवा नहीं, बल्कि उसका नुकसान कर रहे होते हैं।
’महेश चंद्र शर्मा, (पूर्व सांसद), द्वारका, नई दिल्ली

प्रार्थना-प्रवचन , दिल्ली, चित्र में एम.एस. सुब्बलक्ष्मी भी

प्रार्थना-प्रवचन , दिल्ली, चित्र में एम.एस. सुब्बलक्ष्मी भी

खुले मन की जरूरत

जनसत्ता 30 दिसंबर, 2011: जिस तरह महेश चंद्र शर्मा जी ने ‘संघ’ के बचाव में गांधीजी के निकट के साथी, सचिव और जीवनीकार प्यारेलाल जी पर लांछन लगाया है, वह ‘संघ’ के गोयबल्सवादी तौर-तरीके से मेल खाता है। संपूर्ण गांधी वांग्मय में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार के दौरान छेड़छाड़ की गई थी, उस पर यूपीए-एक सरकार ने वरिष्ठ सर्वोदयकर्मी नारायण देसाई की अध्यक्षता में जांच समिति गठित की थी। जांच समिति ने शोधकर्मियों द्वारा लगाए गए छेड़छाड़ के सभी आरोप सही पाए थे और उक्त संस्करण की पुस्तकों और सीडी की बिक्री पर तत्काल रोक लगाने और असंशोधित मूल रूप की ही बिक्री करने की संस्तुति की थी। बहरहाल, जितनी तफसील में इस विषय पर लिखा जा सकता है, उसका मोह न कर मैं इतिहास-क्रम में उलटा जाते हुए सिर्फ ठोस प्रसंगों को रखूंगा।
गांधी को ‘संघ’ के प्रात:-स्मरणीयों में शरीक करने की चर्चा हम महेश जी, प्रबाल जी, अशोक भगत जी, रामबहादुर जी जैसे स्वयंसेवकों से जेपी आंदोलन के दौर (1974-75) से सुनते आ रहे थे। सितंबर और अक्टूबर 2003 में प्रकाशित संघ के काशी प्रांत की शाखा पुस्तिका मेरे हाथ लग गई। स्मरणीय दिवसों में गांधी जयंती के विवरण में ‘देश विभाजन न रोक पाने और उसके परिणामस्वरूप लाखों हिंदुओं की पंजाब और बंगाल में नृशंस हत्या और करोड़ों की संख्या में अपने पूर्वजों की भूमि से पलायन, साथ ही पाकिस्तान को मुआवजे के रूप में करोड़ों रुपए दिलाने के कारण हिंदू समाज में इनकी प्रतिष्ठा गिरी।’ संघ के साहित्य-बिक्री पटलों पर ‘गांधी-वध क्यों’ नामक पुस्तक में ‘वध’ के ये कारण ही बताए गए हैं।
संघ की शाखा में गांधीजी के जाने की तारीख के उल्लेख में अपनी चूक मैं स्वीकार करता हूं। प्यारेलाल जी द्वारा लिखी जीवनी ‘महात्मा गांधी दी लास्ट फेस’ पर महेश जी ने पूर्वाग्रह का आरोप लगाया है। इसलिए दिल्ली डायरी, प्रार्थना प्रवचन और गांधी द्वारा संपादित पत्रों से ही उद्धरण पेश हैं।
गीता की बाबत दिया गया उद्धरण संपूर्ण गांधी वांग्मय (खंड 89) में मौजूद है।
‘अगस्त क्रांति-दिवस’ (9 अगस्त, 1942) को प्रकाशित ‘हरिजन’

(पृष्ठ 261) में गांधीजी ने लिखा- ‘शिकायती पत्र उर्दू में है। उसका सार यह है कि आसफ अली साहब ने अपने पत्र में जिस संस्था का जिक्र किया है (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) उसके 3,000 सदस्य रोजाना लाठी के साथ कवायद करते हैं, कवायद के बाद नारा लगाते हैं- हिंदुस्तान हिंदुओं का है और किसी का नहीं। इसके बाद संक्षिप्त भाषण होते हैं, जिनमें वक्ता कहते हैं- ‘पहले अंग्रेजों को निकाल बाहर करो, उसके बाद हम मुसलमानों को अपने अधीन कर लेंगे। अगर वे हमारी नहीं सुनेंगे तो हम उन्हें मार डालेंगे।’ बात जिस ढंग से कही गई है, उसे वैसी ही समझ कर यह कहा जा सकता है कि यह नारा गलत है और भाषण की मुख्य विषय-वस्तु तो और भी बुरी है।
नारा गलत और बेमानी है, क्योंकि हिंदुस्तान उन सब लोगों का है जो यहां पैदा हुए और पले हैं और जो दूसरे मुल्क का आसरा नहीं ताक सकते। इसलिए वह जितना हिंदुओं का है उतना ही पारसियों, यहूदियों, हिंदुस्तानी ईसाइयों, मुसलमानों और दूसरे गैर-हिंदुओं का भी है। आजाद हिंदुस्तान में राज हिंदुओं का नहीं, बल्कि हिंदुस्तानियों का होगा, और वह किसी धार्मिक पंथ या संप्रदाय के बहुमत पर नहीं, बिना किसी धार्मिक भेदभाव के निर्वाचित समूची जनता के प्रतिनिधियों पर आधारित होगा।
धर्म एक निजी विषय है, जिसका राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए, विदेशी हुकूमत की वजह से देश में जो अस्वाभाविक परिस्थिति पैदा हो गई है, उसी की बदौलत हमारे यहां धर्म के अनुसार इतने अस्वाभाविक विभाग हो गए हैं। जब देश से विदेशी हुकूमत उठ जाएगी तो हम इन झूठे नारों और आदर्शों से चिपके रहने की अपनी इस बेवकूफी पर खुद हंसेंगे। अगर अंग्रेजों की जगह देश में हिंदुओं की या दूसरे किसी संप्रदाय की हुकूमत ही कायम होने वाली हो तो अंग्रेजों को निकाल बाहर करने की पुकार में कोई बल नहीं रह जाता। वह स्वराज्य नहीं होगा।’
महेश जी खुले दिमाग से तथ्यों को आत्मसात करें और ‘प्रात: स्मरणीय’ के पक्ष से परेशान न हों।
’अफलातून, काहिवि, वाराणसी

अप्रासंगिक विषय

चौपाल’ (30 दिसंबर) में अफलातून का जवाब पढ़ा।  उन्होंने अप्रासंगिक विषयों को अपने पत्र में उठाया है, जैसे गांधी संपूर्ण वांग्मय से राजग सरकार ने छेड़छाड़ की और संघ ने महात्मा गांधी का नाम कैसे ‘प्रात: स्मरण’ में जोड़ा। इन मुद्दों का न तो मेरे पत्र में उल्लेख था, न ही अफलातून के मूल लेख में। इस संदर्भ में केवल इतना  कहना है कि मैं संपूर्ण वांग्मय के जिन खंडों को उद्धृत कर रहा हूं, वे राजग सरकार के समय छपे हुए नहीं, बल्कि मई 1983 में नवजीवन ट्रस्ट, अमदाबाद द्वारा प्रकाशित हैं। जो उद्धरण मैंने दिए हैं वे किसी छेड़छाड़ के नहीं, उसी अधिकृत संपूर्ण वांग्मय के हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शिविरों में भारत के महान पुरुषों के नामों का स्मरण ‘प्रात: स्मरण’ में करता है। अफलातून इससे क्यों नाराज हैं! मैंने प्यारेलाल जी पर कोई लांछन अपने पत्र में नहीं लगाया, कृपया पत्र को पुन: ध्यान से पढ़ें। मैंने अफलातून को ‘पूर्वाग्रह-ग्रस्त’ अवश्य कहा है। यदि अफलातून को संघ विषयक कोई ‘पूर्वाग्रह’ नहीं है, तो निश्चय ही यह खुशी की बात है।
अफलातून ने पुन: गांधीजी को सही प्रकार से उद्धृत नहीं किया। जिस तथाकथित नारे और भाषण की शिकायत दिल्ली प्रांत कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष ने गांधीजी से की थी, उसके संदर्भ में गांधीजी ने जो कुछ ‘हरिजन’ में लिखा उसके वे अंश जो अफलातून ने उद्धृत नहीं किए उन्हें उद्धृत करने से पूरी वास्तविकता ही बदल जाती है।
गांधीजी ने कहा है ‘‘मैं तो यही उम्मीद कर सकता हूं यह नारा अनधिकृत है, और जिस वक्ता के बारे में यह कहा गया है कि उसने ऊपर के विचार व्यक्त किए हैं, वह कोई जिम्मेदार आदमी नहीं है।’’ एक अनधिकृत, गैर-जिम्मेदार नारे और वक्तव्य को लेकर अफलातून क्या सिद्ध करना चाहते हैं, जिसके लेखक के बारे में किसी को कुछ पता नहीं। ऐसे वाहियात नारों और वक्तव्यों के आधार पर आप संघ का आकलन करना चाहते हैं और चाहते हैं कि कोई आपको पूर्वाग्रही भी न कहे! संघ को थोड़ा भी जानने वाला व्यक्ति जानता है कि शाखाओं में कभी नारेबाजी नहीं होती।
उस वाहियात भाषण का भी गांधीजी जवाब देते हैं, यह उनकी संजीदगी है।
अफलातून से केवल इतना निवेदन है कि उन्हें संघ से जो शिकायत हो, वे स्वयं अपने तर्कों से उसे प्रस्तुत करें, किसी महापुरुष की आड़ लेकर उन्हें प्रहार करने की जरूरत क्यों पड़ रही है। पता नहीं काशी प्रांत की कौन-सी शाखा पुस्तिका उनके हाथ लग गई। देश विभाजन को न रोक पाने के कारण महात्मा जी बहुत दुखी थे, वे 15 अगस्त 1947 के उत्सव में भी शामिल नहीं हुए और द्वि-राष्ट्रवादी पृथकतावादियों के आक्रमण से परेशान हिंदुओं ने गांधीजी के सामने अपनी पीड़ाओं और आक्रोश को व्यक्त किया था। इसका उल्लेख करने में अफलातून को उस पुस्तिका से क्या शिकायत है?
’महेश चंद्र शर्मा, नई दिल्ली

हिन्दू द्विराष्ट्रवादी

महात्मा गांधी का संपूर्ण वांग्मय हिंदी और अंग्रेजी (कलेक्टेड वर्क्स ऑफ महात्मा गांधी) में प्रकाशन विभाग, भारत सरकार ने छापा है, नवजीवन ट्रस्ट ने नहीं। उसका स्वत्वाधिकार जरूर 1983 से 2008 तक नवजीवन ट्रस्ट के पास रहा। ‘गांधीजीनो अक्षरदेह’ (गुजराती वांग्मय) जरूर नवजीवन ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित किया गया है। जिस उद्धरण का हवाला महेश जी ने दिया है, उसे मैंने ‘हरिजन’ (गांधीजी का अंग्रेजी मुखपत्र) के पृष्ठ 261 से लिया है। द्वि-राष्ट्रवादी केवल मुसलिम लीग के लोग नहीं थे, हिंदुओं के लिए हिंदू राष्ट्र को मानने वाले भी द्वि-राष्ट्रवादी हैं।
यह ऐतिहासिक तथ्य है कि मुसलिम लीग से पहले सावरकर ने धर्म के आधार पर देश के बंटवारे

की बात शुरू कर दी थी। हिंदू-राष्ट्रवादी गांधी के समक्ष अपनी शिकायत कभी प्रार्थना सभा में बम फेंक कर कर रहे थे। अंतत: उन्हीं गांधी जी को गोली मार दी। महेश जी के शब्दों में यह उनकी पीड़ा और आक्रोश मात्र था, जिन्हें शाखा-पुस्तिका में असली हिंदू माना गया है। महेश जी ने शाखा-पुस्तिका के उद्धरण का खंडन नहीं किया है, भले ही उन्हें यह पता न हो कि मेरे हाथ कौन-सी पुस्तिका लग गई। शाखा में नारे नहीं उद्घोष होते हैं, पथ-संचलन भी मौन नहीं हुआ करते।
गांधी-हत्या को ‘गांधी-वध’ कहने वालों की किताबें भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय कार्यालय 11, अशोक मार्ग पर भी बिक रही थीं-

http://www.bbc.co.uk/blogs/hindi/2011/09/post-195.html
’अफलातून, वाराणसी

 

विदेशी कंपनियों को खुदरा व्यापार में इजाजत देने के बारे में उठे विवाद पर सफाई में प्रधानमंत्री ने कहा है कि यह फैसला बहुत सोच-समझकर किया गया है। प्रधानमंत्री की इस बात में सचाई है। इसकी तैयारी बहुत दिनों से चल रही थी। कैबिनेट सचिवों की समिति ने दो महीने पहले ही इसकी सिफारिश कर दी थी। महंगाई पर जब हल्ला हो रहा था, तभी मोंटेक सिंह अहलूवालिया, रंगराजन और कौशिक बसु ने कह दिया था कि इसका इलाज खुदरा व्यापार में बड़ी कंपनियों को बढ़ावा देने में ही निहित है। भारत के प्रधानमंत्री और वाणिज्य मंत्री काफी पहले से दावोस, न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में वायदा करते आ रहे थे कि वॉलमार्ट के लिए भारत के दरवाजे खोले जाएंगे। जिस दूसरी पीढ़ी के आर्थिक सुधारों की बात वे करते आए हैं, यह उसका एक प्रमुख हिस्सा है।

वैश्वीकरण-उदारीकरण-कंपनीकरण के जिस रास्ते पर हमारी सरकारें चल रही हैं, यह उसका अगला पड़ाव है। इसलिए इस बारे में विपक्ष का विरोध अधूरा एवं खोखला है। जहां और जब वे सत्ता में रहे, उन्होंने भी विदेशी पूंजी को दावत दी। हर मुख्यमंत्री उन्हें न्योता देने विदेश यात्राओं पर गया। नीतीश कुमार जब देश के कृषि मंत्री थे, तो उन्होंने राष्ट्रीय कृषि नीति की घोषणा की, जिसमें खुलकर खेती में विदेशी कंपनियों को आगे बढ़ाने का नुसखा पेश किया गया। इसके खिलाफ हुंकार भरने वाले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने देशी-विदेशी कंपनियों की मिजाजपुर्सी करने के लिए छह-सात ग्लोबल इंवेस्टर्स मीट आयोजित की। जीवन के दूसरे क्षेत्रों में विदेशी कंपनियां प्यारी और खुदरा व्यापार में बुरी, खुदरा व्यापार में भी रिलायंस-भारती-आईटीसी अच्छी और वॉलमार्ट बुरी-ऐसा मानने वालों के अंतर्विरोधों से ही उनका विरोध कमजोर हो जाता है।

भारतीय बाजारों में विदेशी घुसपैठ की शुरुआत तभी हो गई थी, जब भारत विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना और कुछ वर्षों बाद एक झटके में 1,423 वस्तुओं का बाजार विदेशी वस्तुओं के लिए खोला गया। भारत के थोक व्यापार, एक ब्रांड के व्यापार और कृषि व्यापार को विदेशी कंपनियों के लिए खोला गया था, तभी स्पष्ट हो गया था कि अगला नंबर खुदरा व्यापार का है। विडंबना यह है कि इस अवधि में गैर-कांग्रेसी सरकारें भी रहीं।

दृष्टिदोष से ग्रस्त हमारे शासकों एवं विशेषज्ञों को इतना भी दिखाई नहीं देता कि पश्चिमी देशों और भारत की परिस्थितियों में भारी फर्क है। वहां भी वॉलमार्ट ने छोटे दुकानदारों को बेदखल किया, किंतु उनकी संख्या बहुत कम थी और वे खप गए। भारत में तो विशाल श्रमशक्ति है। खेती और उद्योग के बाद व्यापार ही इस देश में सबसे ज्यादा रोजगार प्रदान करता है। एक तरह से घोर बेरोजगारी के इस युग में जब कहीं नौकरी नहीं मिलती, तो एक किराना दुकान, चाय या पान की दुकान ही रोजी-रोटी का जरिया बनती है। अब इसी पर हमला हो रहा है।

अमेरिका का अनुभव है कि वॉलमार्ट का एक मॉल खुलता है, तो उसकी 84 फीसदी आय स्थानीय छोटे व्यापारियों का धंधा हड़पकर ही होती है। यह भी तय है कि बाजार के वॉलमार्टीकरण से स्थानीय छोटे-छोटे उत्पादकों का धंधा मारा जाएगा। सरकार ने महज इतनी ही शर्त लगाई है कि 30 प्रतिशत आपूर्ति छोटे उद्योगों से ली जाएगी, किंतु ये छोटे उद्योग देश या दुनिया में कहीं के भी हो सकते हैं। अब यह भी साफ हो रहा है कि पूरे देश में अतिक्रमण हटाने या नगरों को सुंदर बनाने के नाम पर फुटपाथ विक्रेताओं, गुमटी-हाथठेला विक्रेताओं आदि को हटाने की जो मुहिम चलती रही है, वह शायद मॉलों के लिए ही रास्ता साफ करने की कार्रवाई थी।

प्रधानमंत्री का दूसरा झूठा दावा किसानों को फायदा पहुंचाने का है। खुदरा व्यापार में रिलायंस फ्रेश, चौपालसागर, हरियाली आदि के रूप में बड़ी देशी कंपनियों की शृंखला तो पहले ही काम कर रही है। क्या इससे भारत के किसानों को बेहतर दाम मिले? क्या खेती का संकट दूर हुआ? यदि कुछ बेहतर दाम मिलें भी, तो लागतें भी बढ़ जाती हैं और कांट्रेक्ट खेती के जरिये किसान कंपनियों पर बुरी तरह निर्भर हो जाता है। इस बात की भी पूरी आशंका है कि किसानों की उपज खरीदने के लिए कंपनियां आ चुकी हैं, यह बहाना बनाकर सरकार समर्थन-मूल्य पर कृषि उपज की खरीद बंद कर दे। इसके लिए इन विदेशी कंपनियों का दबाव भी होगा। भारतीय खेती के ताबूत पर यह आखिरी कील होगी।

प्रधानमंत्री का तीसरा झूठ यह है कि इससे व्यापार में बिचौलिये खत्म होंगे और महंगाई कम होगी। यह जरूर है कि छोटे-छोटे लाखों बिचौलियों की जगह चंद बहुराष्ट्रीय बिचौलिये ले लेंगे, जिनकी बाजार को नियंत्रित करने व उस पर कब्जा करने की अपार ताकत होगी। क्या अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को अर्थशास्त्र के इस सामान्य नियम को याद दिलाना होगा कि एकाधिकारी प्रवृत्तियां बढ़ने से कीमतें बढ़ती हैं, कम नहीं होतीं? सच तो यह है कि ये बड़े बहुराष्ट्रीय व्यापारी किसानों, उत्पादकों, उपभोक्ताओं सबका शोषण करेंगे तथा लूट का मुनाफा अपने देश में ले जाएंगे।

यह घोर पतन का युग है। यह ज्यादा खतरनाक भ्रष्टाचार है। इसके खिलाफ कोई जेपी आंदोलन, कोई अरब वसंत या कोई वॉलस्ट्रीट कब्जा आंदोलन चलाने का वक्त आ गया है। किंतु ऐसे किसी भी आंदोलन को नवउदारवाद और विकास के मॉडल पर भी प्रहार करना होगा, तभी उसकी विश्वसनीयता और गहराई बन पाएगी।

भारत के खुदरा व्यापार में विदेशी कंपनियों को इजाजत देने का भारत सरकार का फैसला भारत राष्ट्र और भारत की जनता के प्रति एक विश्वासघात है । संविधान के तहत भारत देश की रक्षा करने की शपथ लेकर हमारे नेताओं एवं जनप्रतिधियों ने भारतीय जनजीवन पर एक और हमला किया है।
1991 में जब से वैश्वीकरण ,निजीकरण और उदारीकरण की नीतियां शुरु हुई हैं तब से भारत की जनता के ऊपर कई मुसीबतें आई हैं । मंहगाई , गरीबी , कुपोषण , बेरोजगारी , भ्रष्टाचार और घोटाले चरम सीमा पर पहुंच गये हैं । देश के किसान व बुनकर आत्महत्या कर रहे हैं । कई कारखाने एवं छोटे उद्योग बन्द हो गए हैं । खेती और उद्योग के बाद खुदरा व्यापार में इस देश में सबसे ज्यादा रोजगार मिलता है । रोजगार का यह आखिरी सहारा भी सरकार छीन लेना चाहती है । करोडो की संख्या में छोटे दुकानदारों का धंधा खतरे में आ गया है ।
सरकार यह झूठ बोल रही है कि विदेशी कंपनियां आने से रोजगार पैदा होंगे। जब 50 और 100 छोटी – छोटी दुकानों की जगह वालमार्ट जैसा एक विशाल मॉल ले लेगा जहां पर सारा काम मशीन और कम्प्यूटर से होगा तो रोजगार बढ़ेगा या घटेगा ?
अब यह साफ हो गया है कि पिछ्ले कुछ सालों से सरकारें अतिक्रमण हटाने के नाम पर पटरी – फुटपाथ पर दुकान लगाने वालों , ठेलों तथा गुमटियों वालों को हटाने का जो काम कर रही थी , वह दरअसल देशी- विदेशी कंपनियों के लिए रास्ता साफ कर रही थी । सरकारों ने उनकी रोजी रोटी छीन कर भुखमरी के कगार पर पहुचा दिया है । कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए देश की गरीब जनता पर अत्याचार करना पिछले 20 सालों में सरकारों का नियम बन गया है ।
सरकारों का दूसरा झूठ है कि इससे किसानों का फायदा होगा । खुदरा व्यापार में रिलायंस (रिलायंस फ्रेश ) ,आई.टी.सी ( चौपाल सागर ) , भारती , एन मार्ट , हरियाली जैसी बड़ी – बड़ी देशी कंपनियां तो पहले से घुस चुकी हैं । इससे भारत के किसानों को क्या फायदा हुआ ? क्या उन्हें बेहतर दाम मिले ? क्या खेती का संकट दूर हुआ ?
उल्टे सरकार के इस कदम से भारत की खेती पर दुनिया की बड़ी – बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा हो जाएगा । भारत का किसान इन दैत्याकार कंपनियों के चंगुल में फंसा छटपटाता रहेगा ।इस बात की पूरी संभावना है कि किसानों की उपज खरीदने के लिए कंपनियां आ चुकी हैं , यह बहाना लेकर इसके बाद सरकार समर्थन मूल्य पर कृ्षि उपज की खरीदी बंद कर दे । इसके लिए इन विदेशी कंपनियों का दबाव भी होगा , ताकि वे दाम गिराकर किसानों का माल सस्ता खरीद सकें।
सरकार का तीसरा झूठ है कि इससे व्यापार में बिचौलिए खत्म होंगे । यह ठीक है कि बिचौलिए व छोटे उत्पादकों का शोषण करते हैं । किन्तु सरकार के इस कदम से बिचौलिए खत्म कहां होंगे ? छोटे – छोटे लाखों बिचौलियों की जगह चंद बहुराष्ट्रीय बिचौलिए ले लेंगे । जिनकी बाजार को प्रभावित व नियंत्रित करने तथा शोषण करने की अपार ताकत होगी । वे किसानों , उत्पादकों और उपभोक्ताओं – सबको लूटकर मुनाफा अपने देश में ले जाएंगी ।
पिछले 20 सालों में हमारी सरकारें इस देश के जन-जीवन के हर क्षेत्र को विदेशी मुनाफाखोर कंपनियों के हवाले करती गई हैं । यह आखिरी क्षेत्र बचा था , जिसी भी सरकार उन्हें तश्तरी में परोसकर उपहारस्वरूप देना चाहती है । अमरीकी आकाओं का हुकुम बजाने तथा उन्हें खुश करने के लिए हमारी सरकार ने यह काम किया है । हजारों ईस्ट इंडिया कंपनियों को वापस बुलाया है । यह भारत की आजादी की लडाई में लाखों स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का अपमान और विश्वासघात है ।
आइए , हम सब पूरी ताकत से इस जन विरोधी और राष्ट्र विरोधी कदम का विरोध करें ।किंतु यह ध्यान रखें कि हमें वैश्वीकरण , उदारीकरण , निजीकरण की पूरी नीतियों का विरोध करना होगा जिसके तहत ये हमले हो रहे हैं । जीवन के हर क्षेत्र में देशी-विदेशी कंपनियों की घुसपैठ का भी विरोध करना होगा। देश की विपक्षी पार्टियां भी इस मामले में गुनहगार हैं ।
समाजवादी जनपरिषद इस मसले पर 1 दिसम्बर को आयोजित भारत बन्द का समर्थन करती है तथा समाज के सभी तबकों से बंद का समर्थन करने की अपील करती है। जनपरिषद से जुडा पटरी-व्यवसाई संगठन भी प्रस्तावित बंद का समर्थन करता है।
(रामजनम, प्रान्तीय महामन्त्री,सजप ) (अफलातून ,सदस्य , राष्ट्रीय कार्यकारिणी,सजप )( डॉ. सोमनाथ त्रिपाठी ,राष्ट्रीय महामन्त्री,सजप) (काशीनाथ , अध्यक्ष , पटरी व्यवसाई संगठन )(मो. भुट्टो ,मन्त्री,पटरी व्यवसाई संगठन )

    जब राहुल गांधी ने पिछले हफ्ते उत्तरप्रदेश के नौजवानों को फटकारते हुए कहा कि यूपी वालों  , कब तक महाराष्ट्र में भीख मांगोगे और पंजाब में मजदूरी करोगे, तो कई लोगों को यह नागवार गुजरा। इसकी भाषा शायद ठीक नहीं थी। आखिर भारत के अंदर रोजी-रोटी के लिए लोगों के एक जगह से दूसरी जगह जाने को भीख मांगना तो नहीं कहा जा सकता। वे अपनी मेहनत की रोटी खाते हैं, भीख या मुफ्तखोरी की नहीं।
किन्तु राहुल आधुनिक भारत की एक बड़ी समस्या की ओर भी इशारा कर रहे हैं। हमारा विकास कुछ इस तरह हुआ है कि रोजगार और समृद्धि देश के कुछ हिस्सों तथा महानगरों तक सीमित हो गई है। बाकी हिस्से पिछड़े, रोजगारहीन और श्रीहीन बने हुए हैं। देहातों में तो हालत और खराब है। वहां बेकारी और मुर्दानगी छायी हुई है और भारी पलायन हो रहा है। जो देहात में रहते हैं वे भी ज्यादातर मजबूरी में रह रहे हैं। दूसरी ओर नगरों व महानगरों में भीड़ बढ़ती जा रही है तथा वहां झोपड़पट्टियों की तादाद विस्फोटक तरीके से बढ़ रही है।
सिर्फ यूपी-बिहार ही नहीं, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बंगाल, उड़ीसा, उत्तराखंड, तेलगांना और विदर्भ से भी बड़ी संख्या में रोजगार की तलाष में नौजवान बाहर जाते हैं। मुंबई, सूरत, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई जहां भी काम मिले, वे निकल पड़ते हैं। कई बार उनके साथ धोखा होता है। पूरी मजदूरी नहीं मिलती, खुले आसमान के नीचे पड़े रहते हैं या गंदगी के बीच नरकतुल्य झुग्गियों में रहते हैं, पुलिस उन्हें तंग करती हैं, दुर्घटना में घायल होने पर ठेकेदार ठीक से इलाज नहीं कराता है। कई बार बेमौत मारे जाते हैं और घर वालों को खबर भी नहीं होती। पिछले दिनों आगरा के पास यमुना एक्सप्रेसवे के निर्माण में लगे इलाहाबाद के मजदूरों पर रात में सोते समय जेसीबी मशीन चढ़ जाने की मार्मिक खबर आई थी।
पिछले दो सौ सालों से चल रही भारतीय गांवों के कुटीर उद्योगों व धंधों के नष्ट होने की प्रक्रिया का नतीजा हुआ है कि खेती छोड़कर वहां कोई धंधा नहीं बचा है। खेती में भी गहरा संकट है और वह घाटे का धंधा बनी हुई है। यह आधुनिक पूंजीवादी विकास से उपजा बुनियादी संकट है जो मनरेगा जैसी योजनाओं से न हल हो सकता था और न हुआ।
गांव से पलायन इसलिए भी बढ़ रहा है कि वहां शिक्षा और इलाज की व्यवस्था या तो है नहीं, या है तो बुरी तरह चरमरा गई है। सरकारी स्कूलों की व्यवस्था तो सुधरने की बजाय बाजारीकरण और निजीकरण के हमले की भेंट चढ़ रही है। गांवों के बहुत लोग अब अपने बच्चों को अच्छी षिक्षा दिलाने के लिए कष्ट उठाकर भी शहरों में रहने लगे हैं।
कभी-कभी लोग भोलेपन से सोचते हैं कि हमारे इलाके में कोई कारखाना लग जाएगा तो हमारा विकास हो जाएगा और हमें यहीं पर रोजगार मिलने लगेगा। कारखाने को ही विकास का पर्याय मान लिया जाता है किन्तु हर जगह कुछ ठेकेदारों, व्यापारियों और दलालों को छोड़कर बाकी लोगों को इसमें निराशा ही हाथ लगती है।
मध्यप्रदेश में रीवा के पास जेपी सीमेन्ट कारखाने का अनुभव इस मामले में बड़ा मौजूं है। करीब 25 साल पहले इस कारखाने के लिए जमीन लेते समय गांववासियों को इसी तरह रोजगार, विकास और खुषहाली के सपने दिखाये गये थे। किन्तु दैनिक मजदूरी पर कुछ चैकीदारों को लगाने के अलावा उन्हें रोजगार नहीं मिला। कारखाना चलाने के लिए तकनीकी कौशल वाले कर्मचारी बाहर से आये। उल्टे कारखाने के प्रदूषण और चूना पत्थर खदानों के विस्फोटों से लोगों का जीना हराम हो गया। स्वास्थ्य, खेती, मकान सब प्रभावित होने लगे। ज्ञापन देते-देते थक गए तो सितंबर 2008 में रोजगार और प्रदूषण रोकथाम की मांग को लेकर उन्होंने आंदोलन किया। उन पर गोली चली। उसमें एक नौजवान मारा गया, 70-75 घायल हुए। जो नौजवान मारा गया, वह सूरत में काम करता था और छुट्टी में घर आया था। सवाल यह है कि जिस गांव की जमीन पर यह विशाल कारखाना बना, वहां के नौजवानों को काम की तलाष में एक हजार किलोमीटर दूर क्यों जाना पड़ रहा है ?
दरअसल आधुनिक कारखानों से रोजगार की समस्या कहीं भी हल नहीं होती। यह एक भ्रम है। उनसे रोजगार का सृजन कम होता है, पारंपरिक आजीविका स्त्रोतों का नाश ज्यादा होता है। यहां तक की औद्योगिक क्रांति के दौर में भी ब्रिटेन और पश्चिमी यूरोप की रोजगार समस्या गोरे लोगों के अमरीका, आस्ट्रेलिया, अफ्रीका और एशिया में फैल जाने तथा बस जाने से हल हुई, कारखानों से नहीं। अब जो नए कारखाने लग रहे हैं उनमें मशीनीकरण, स्वचालन तथा कम्प्यूटरीकरण के चलते तो रोजगार और भी कम मिलता है। मशीनीकरण के कारण खेती में भी रोजगार कम हो रहा है। हारवेस्टरों और ट्रैक्टरों की क्रांति ने भूमिहीन गरीबों और प्रवासी आदिवासी मजदूरों का रोजगार भी छीन लिया है। अब रोजगार की विकराल समस्या खड़ी होती जा रही है। इस समय रोजगार का संकट पूरी दुनिया पर छाया है। लंदन के दंगे हो, वाल स्ट्रीट कब्जे का आंदोलन या अरब देशों की जनक्रांतियाँ – सबके पीछे बेरोजगारी-गरीबी से उपजी कुंठा, अनिश्चितता  व असंतोष है।
क्या कोई ऐसा तरीका नहीं हो सकता है, जिससे लोगों को अपने जिले में, अपने घर के पास या अपने गांव में ही अच्छा रोजगार मिलने लगे ? जरुर हो सकता है, किन्तु इसके लिए हमें राहुल गांधी नहीं, एक दूसरे गांधी की ओर देखना पड़ेगा जिसे हम 2 अक्टूबर तथा 30 जनवरी को रस्म अदायगी के अलावा भूल चुके हैं। हमें आधुनिक विकास की चकाचैंध से अपने को मुक्त करना होगा। शहर के बजाय गांव को, मशीन की जगह इंसान को और कंपनियों की जगह जनता को विकास के केन्द्र में रखना होगा। गांवों को पुनर्जीवित करना होगा। बड़े कारखानों की जगह छोटे उद्योगों व ग्रामोद्योगों को प्राथमिकता देनी होगी। भोग-विलास की जगह सादगीपूर्ण जीवन को आदर्श बनाना होगा। विकास और प्रगति की आधुनिक धारणाओं और मान्यताओं को भी समय तथा जमीनी अनुभवों की कसौटी पर कसना होगा।
यदि हम चाहते हैं कि यह दुनिया ऐसी बने, जिसमें सबको सम्मानजनक रोजगार घर के पास मिले, सबकी बुनियादी जरुरतें पूरी हों, कोई भूखा या कुपोषित न रहे, कोई अनपढ़ न रहे, इलाज के अभाव में कोई तिल-तिल कर न मरे, अमीर-गरीब की खाई चौड़ी होने के बजाय खतम हो, सब चैन से रहे तो हमें विकास की पूरी दिशा बदलना होगा। आधुनिक सभ्यता इस मामले में बुरी तरह असफल हुई है। इसका विकल्प ढूंढना होगा। अफसोस की बात है कि राहुल हो या नीतीश, मायावती हो या मुलायम, किसी के पास इसकी समझ या तैयारी नहीं दिखाई देती।
(ईमेल – sjpsunilATgmailDOTcom)
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(लेखक समाजवादी जन परिषद का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं आर्थिक-राजनीतिक विषयों पर टिप्पणीकार है।)

- सुनील
ग्राम – केसला, तहसील इटारसी, जिला होशंगाबाद (म.प्र.)
पिन कोड: 461 111 मोबाईल 09425040452 


यह २००५ में निर्देशक रॉबर्ट ग्रीनवाल्ड द्वारा बनाया गया वृत्त-चित्र है । इस फिल्म में वॉल मार्ट के व्यावसायिक चरित्र को सामने लाने के लिए पूर्व कर्मचारियों , फुटकर-व्यवसाय करने वाले लोगों से बातचीत है तथा वॉल मार्ट के अधिकारियों के फुटेज भी हैं । जिन समुदायों ने सफलतापूर्वक इस कम्पनी के खिलाफ आन्दोलन चलाए उनके नेताओं से भी बातचीत दिखाई गई है। मजदूरों के हक मारने ,छोटे व्यवसायों को खत्म करने की दुर्नीति तथा पर्यावरण नष्ट करने में इस दानवाकार कम्पनी की भूमिका को भी दिखाया गया है।
भारत का सत्ता-प्रतिष्ठान इस कम्पनी को न्योतने जा रहा है। रोजगार के तमाम अवसरों के संकुचित होने के दौर में फुटकर-व्यवसाय या छोटी दुकानदारी के बारे में यह आश्वस्ति रहती थी कि मध्य वर्ग अपनी संचित निधि से ऐसे काम शुरु कर सकता है। दानवाकार कम्पनियों को फुटकर व्यवसाय करने की छूट देकर करोडों छोटे दुकानदारों को खत्म कर देने का मार्ग कल के कैबिनेट-फैसले से प्रशस्त हो गया है।

दुनिया के १० सर्वाधिक पैसे वाले व्यक्तियों में ५ ‘वॉल्टन’ हैं । वॉल्टन यानि वॉल मार्ट कम्पनी का स्वामित्व और नियन्त्रण रखने वाला परिवार । समूचा वॉल्टन परिवार वॉल मार्ट के ३९ फीसदी शेयरों पर नियन्त्रण रखता है । इस परिवार की आर्थिक हैसियत ९० बिलियन है यानि बिल गेट्स तथा वॉरन बफेट की सम्मिलित हैसियत से ज्यादा और सिंगापुर की राष्ट्रीय आय के बराबर।
समाजवादी जनपरिषद इस देश विरोधी फैसले के खिलाफ तीव्र प्रतिकार आह्वान करती है तथा संकल्प लेती है कि भारत-भूमि पर इन्हें न टिकने देने के लिए सभी प्रयास करेगी।

श्री लालकृष्ण आडवाणी जी के नाम खुला पत्र

आदरणीय आडवाणी जी,

सादर नमस्कार,

भ्र्रष्टाचार के विरोध मे आपकी जनचेतना यात्रा मध्यप्रदेश से गुजर रही है। इसे सफल बनाने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी रात दिन एक कर रही है। खराब सड़कें दुरूस्त की जा रही हैं। स्वागत के लिए बंधनद्वार सजाए जा रहे हैं। सुरक्षा की माकूल व्यवस्था की जा रही है। यात्रा में पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। यह करोडों रूपये कहां से आ रहा है, यह जिज्ञासा हर नागरिक के मन में है।

संघ मुख्यालय पर दण्डवत, प्रणाम और हाजिरी देकर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी छोड़ने का भरोसा देने के बाद इस यात्रा की मंजूरी मिल पाई। पार्टी में जारी अन्र्तकलह को दरकिनार करते हुए अन्ततः यात्रा प्रारंभ हो गई। यह प्रसन्नता का विषय है।

भाजपा शासित राज्यों में भी नीचे से ऊपर तक भ्रष्टाचार का बोलबाला है।

मध्यप्रदेश में ऐसा कोई विभाग नहीं है, जहां बिना पैसे दिए काम होता हो। पटवारी से लेकर अधिकारियो, कर्मचारियों के पास करोड़ों की संपत्ति जब्त होने की खबरों से जाहिर होता है कि यहां नौकरशाही को जनता को लूटने और भ्रष्टाचार की खुली लूट मिली हुई है। मुख्यमंत्री से लेकर कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप पार्टी की अंदरूनी उठापटक में बाहर आते रहते हैं।

मध्यप्रदेश में किसी भी बड़े छोटे पद पर बैठा आपकी पार्टी का व्यक्ति पैसा खाने और कमाने में लगा हुआ है। नेताओं व मंत्रियों के संरक्षण में जंगल माफिया, रेत माफिया, भूमाफिया, शिक्षा माफिया, सहकारी माफिया सक्रिय होकर करोड़ों के वारे-न्यारे कर रहे है। राशन की दुकान हथियाने व राशन की कालाबाजारी करने में आपकी पार्टी पीछे नहीं हैं।

मध्यप्रदेश के किसानों की बड़ी दुर्दशा हो रही है। सरकार के तमाम दावों के बावजूद उन्हें घटिया बीज, नकली खाद, महंगे डीजल और बिजली कटौती की समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। खेती में बढ़ती लागत और खुले बाजार की नीति के कारण किसानी घाटे में जा रही है। प्रदेश में किसानों की आत्महत्याओं का दौर जारी है। आपके सहयोगी सगठन भारतीय किसान संघ खुद किसानों के मुद्दे पर आंदोलन चला रहा है।

मध्यप्रदेश में कुपोषित बच्चों की लगातार मौतों की खबर विकास के सारे दावों की पोल खोल देती है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं अब पैसा कमाने का सबसे बड़ा जरिया बन गई हैं। मध्यप्रदेश के किसानों-मजदूरों को राहत और रियायत देने पर सरकार पैसे का रोना रोती रही है। जबकि देशी-विदेशी उद्योगपतियों को उनकी शर्त पर उ़घोग लगाने के लिए तमाम छूट दी जा रही है।

उत्तराखंड में अभी हाल ही में हुआ नेतृत्व परिवर्तन भ्रष्टाचार का ही परिणाम था। कर्नाटक में रेडडी बंधुओं एवं येदुरप्पा के कारनामों पर पूरी भाजपा उनके बचाव में खड़ी हो गई थी। लोकायुक्त की रिपोर्ट से भाजपा को कर्नाटक में नेतृत्व बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा थां।

भ्रष्टाचार के बारे में भाजपा का इतिहास अच्छा नहीं रहा। भ्रष्टाचार पर दोहरे मापदण्ड अपनाना पार्टी की नीति रही है। कांग्रेस शासन के केन्द्रीय मंत्री सुखराम के मुद्दे पर संसद की कार्यवाही ठप्प करने वाली पार्टी सुखराम के कांग्रेस से निकलने के बाद ही अपना दोस्त बनाने में देर नहीं करती। जब दिल्ली में भाजपा की सरकार थी तब केन्द्रीय मंत्री, वरिष्ठ भाजपा नेता दिलीप सिंह जूदेव टी.वी. कैमरे के सामने सरेआम घूस लेते दिखाए गए और तो और भाजपा के राष्टीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को रिश्वत लेते टी.वी. के माध्यम से पूरे देश ने देखा।

नोट के बदले वोट का मामला हो, पैसे लेकर संसद में सवाल उठाने का मामला हो, कबूतरबाजी का आरोप हो या हवाला का, सभी में आपकी पार्टी के सांसदों ने नाम कमाया है।

नोट के बदले वोट के मामले में तो कुछ सांसद व भाजपा नेता जेल की सलाखों के पीछे हैं।

केन्द्र में लगभग 6 वर्ष तक षासन कर आप महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व निभा चुके हैं, इस अवधि मे आपने विदेशों में जमा काले धन का भारत वापिस लाने के लिए क्या प्रयास किये? भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कोई प्रभावी कानून बनाया क्या? हम इन सवालों के उत्तर जनचेतना यात्रा के माध्यम से जानना चाहते हैं।

आपकी यात्राओं में बड़ी रूचि है। इसके पूर्व राम जन्मभूमि मंदिर के मुद्दे को लेकर आपके नेतृत्व में निकाली गई रथयात्रा का स्मरण आना स्वाभाविक है। सौगंध राम की खाते है-मंदिर वहीं बनायेंगे के उद्घोष के साथ रथयात्रा ने भारत भ्रमण किया था। यात्रा देश में जहां-जहां गई, वहां-वहां नफरत, उन्माद ओर साम्प्रदायिकता फैली। दंगे हुए। यात्रा के उन्माद में भीड़ ने अन्ततः बाबरी मस्जिद ढहा दी। इस यात्रा के बाद भाजपा का राजनैतिक ग्राफ तेजी से बढ़ा। अटल जी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी। आप उपप्रधानमंत्री, गृहमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे। परंतु आपने अपने शासनकाल में राममंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद सुलझाने व राममंदिर बनवाने के लिए कोई कानून नहीं बनाया, और न ही कोई पहल की। हद तो जब हो गई जब शासन में पहुंचकर आपने मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान श्रीराम को अपने एजेंडा से ही बाहर कर दिया। इस संबंध मं आपकी पार्टी का ही एक नारा समर्पित हैः- जो नहीं राम का, वो नहीं किसी के काम का।

मान्यवर, भाजपा की स्थापना 1980 से लेकर आज तक पार्टी के किसी सम्मेलन, समारोह, मीटिंग में लोकनायक जयप्रकाश नारायण न कोई चित्र रखा गया, न उनका नाम लिया गया। न उनकी पुण्यतिथि मनाई गई और न उनकी जयंती मनाई गई। आपके शासनकाल में जे पी का जन्म जताब्दी वर्ष 1902-2002 था। जिस पर आप लोगों ने कोई ध्यान नहीं दिया। आज उन्हीं जे पी का नाम लेकर उनकी जन्मस्थली से यात्रा निकालना एक तरह का राजनैतिक अवसरवाद नही तो क्या है?

केन्द्र सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरोध में आपकी पार्टी ने आज तक प्रभावी और कारगर आंदोलन नहीं किया। संसद में आपका विरोध रस्म-अदायगी जैसा लगता था। क्योंकि आपकी राज्य सरकारों के भ्रष्टाचार के कारण आपके अंदर नैतिक शक्ति नहीं बची थी। हमें लगता है कि गांधीवादी अण्णा हजारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ हुए राष्टव्यापी आंदोलन से पैदा हुई ऊर्जा को समेटकर वोटो में बदलने के लिए, दिल्ली की गद्दी पर कब्जा जमाने व प्रधानमंत्री बनने के राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित होकर यह यात्रा निकाली जा रही है। इसका भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने से कोई लेना-देना नहीं है। जिसमें आप सफल हो सकते हैं पर देश नहीं।

हम आपका ध्यान वर्ष 1991 में लागू की गई उदारीकरण, वैष्वीकरण की उन नीतियों की ओर दिलाना चाहते हैं जिनके चलते घोटालों की बाढ़ आ गई है। अफसोस यही है कि कांग्रेस-भाजपा दोनों प्रमुख पार्टियां इन नीतियों पर पुनर्विचार किए बगैर जोर-शोर से आगे बढ़ा रही हैं। देशी-विदेशी पूंजीपतियों, कंपनियों को लुभाने और उनका समर्थन पाने की दोनों पार्टियों में होड़ लगी है। विदेशी निवेशी के लिए लालायित नेता, मुख्यमंत्री विदेश जाकर उन्हें हर प्रकार की सुविधा देने का वादा कर रहे हैं।

स्थानीय लोगों को बेदखल कर प्राकृतिक संसाधनों जल,जंगल, जमीन, खदान, खेत-खलिहानों का सौदा किया जा रहा है। विश्व बैंक, अन्तरा्ष्ट्रीय मुद्रा कोष और एशियाई विकास बैंक जैसे साम्राज्यवादी अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं हमारे देश और प्रदेश के विकास की प्राथमिकताएं तय कर रही हैं। नीतियों में निहित भ्रष्टाचार कानूनसम्मत भले ही हो, पर यह ज्यादा खतरनाक है।

मौजूदा व्यवस्था गैर बराबरी, शोषण, लूट और मुनाफे पर टिकी हुई है।, जो हमारे संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। इसे बदले बगैर भ्रष्टाचार से मुक्ति पाना असंभव है। इसका एक आयाम भोगवादी संस्कृति है। जिसने हमारा पूरा जीवन दर्शन बदल दिया है। विडंबना यह है कि हमारे मौजूदा राजनैतिक दलों के एजेंडा में यह सब नहीं है।

आदरणीय, जन चेतना यात्रा के बजाय आप इस उम्र में तीर्थयात्रा करते तो ज्यादा पुण्य मिलता। मन निर्मल होता और चित्त को शांति मिलती।

आपके स्वस्थ और दीर्घजीवन की कामना के साथ

गोपाल राठी

समाजवादी जन परिषद

मध्यप्रदेश

फोन संपर्कः 9425408801

पिपरिया, दिनांक-14 अक्टूबर, 2011

“उत्तराधिकारी प्रायः अनुयायी नहीं होता । चाहे वह अपने को विनीत भाव से शिष्य कहलाये । उत्तराधिकारी लकीर का फ़कीर नहीं होता। पूर्वानुवर्ती लोकनेताओं के द्वारा निर्दिष्ट दिशा में वह नए मार्ग प्रशस्त करता है और पगडंडियां खोजता है । “- नारायण देसाई.

इस उद्धरण के पूरी तरह चरितार्थ करने वाला उदाहरण बाबा साहब अम्बेडकर और कांशीराम का है । कांशीराम की उत्तराधिकारी कही जाने वाली सुश्री मायावती इस परिभाषा पर पूरी तरह खरी उतरती नहीं दीखतीं ।

हाल ही में एक बौद्धिक-दलित-युवा से चर्चा हो रही थी । मैंने उससे पूछा कि ‘पृथक निर्वाचन’ की व्यवस्था में पिछड़ी जाति के लोगों को सवर्णों के साथ रखा गया था अथवा अनुसूचित जाति के साथ ? उसने तपाक से जवाब दिया, ‘ पिछड़े ही सब समस्याओं की जड़ में हैं ।’ मैंने उससे कहा कि कांशीराम के सही अनुयायी को ऐसा नहीं कहना चाहिए ।

कांशीराम

कांशीराम

कांशीराम द्वारा प्रतिपादित पचासी फ़ीसदी में अन्दरूनी एकता के लिए जैसे सामाजिक कार्यक्रम लिए जाने चाहिए उससे उलट दिशा में काम हो रहा है । यह काम यदि बसपा-सपा की सरकार के समय शुरु हो जाता तो शायद देश की राजनीति का भी नक्शा सुधर जाता।उस दौर में भी इलाहाबाद जिले में शिवपति नामक दलित महिला को दबंग कुर्मियों ने नग्न कर घुमाया था।जिन जातियों की तादाद ज्यादा है उनकी राजनैतिक सत्ता ज्यादा है । इन ज्यादा तादाद वाली जातियों में ब्राह्मण ,चमार और अहिर के उदाहरण स्पष्टरूप से देखे जा सकते हैं । हजारों शूद्र ( सछूत व अछूत ) जातियां अपनी-अपनी जाति के आधार पर राजनैतिक दल बनाकर सामाजिक न्याय हासिल नहीं कर सकतीं । अपने वोट-आधार की कीमत टिकट देने में वसूलने की बसपाई शैली इन जाति-दलों ने भी अपना ली है ।

कांशीराम के जीवनकाल का एक प्रसंग उल्लेखनीय है । कर्नाटक की दलित संघर्ष समिति का एक धड़े ने बसपा में सशर्त विलय करने का निर्णय लिया था । उस धड़े ने कहा था कि हम मानते हैं कि विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति में दलित हित निहित है इसलिए आप से अनुरोध है कि आप गांधी-निन्दा नहीं करेंगे । कांशीराम ने यह शर्त सार्वजनिक तौर (TOI में खबर छपी थी,खंदन नहीं किया गया) पर कबूली थी।

कर्नाटक दलित संघर्ष समिति की भांति ‘उत्तर बंग आदिवासी ओ तपशिली जाति संगठन’ ने भी अम्बेडकर की सामाजिक नीति और विकेन्द्रीकरण की अर्थनीति मानने के कारण समाजवादी जनपरिषद बनाने में अहम भूमिका अदा की। यह गौरतलब है कि इस समूह को भी बसपा के स्थापना के समय कांशीराम ने निमंत्रित किया था।

कांशीराम के सक्रिय रहते हुए उत्तर प्रदेश के बाहर जिन राज्यों में बसपा का आधार बढ़ा था और बसपा ने राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दल का दरजा हासिल किया था वह अब बहुत तेजी के साथ सिकुड़ रहा है । पंजाब , मध्य प्रदेश , राजस्थान और कर्नाटक में बसपा वास्तविक तीसरी शक्ति के रूप में उभर सकती थी लेकिन उनकी मृत्यु के बाद उत्तर प्रदेश के अलावा अन्य राज्यों में बसपा का आधार छीजता गया है ।

शहीद शंकर गुहानियोगी

उनकी हत्या के सप्ताह भर पहले मैं उनके साथ कुछ समय था । होशंगाबाद जिले में गिरफ़्तार हमारे साथी के समर्थन में वे आए थे। होशंगाबाद स्टेशन पर अपना सीधा-सादा एयर बैग पलिटफार्म पर छोड़कर उन्होंने कहा ,’चलो चाय पीते हैं’।मैंने बैग का ध्यान दिलाया तो बोले कि देश भर में इतना भय फैला रखा है कि कोई उसे नहीं छूएगा। हम चाय पीकर आए, बैग ज्यों का त्यों था। वैसे भी उसमें किताबें और एक जोड़ा कपड़ा था। उन्हें मुख्यमन्त्री सुन्दरलाल पटवा से मिलना था। मुख्यमन्त्री के सचिव ने नाम लिख लेने के बाद कहा,’पद-वद बताइए’। नियोगी ने तत्काल अत्यन्त सहजता से कहा,’बता देना गुहा और नियोगी’। पूंजीपतियों द्वारा कराई गई हत्या के दिन भी इस शेर के कमरे की खि्ड़की खुली थी । दल्ली राजहरा के असंगठित मजदूरों को जब भिलाई स्टील प्लान्ट के मजदूर के बराबर मजदूरी दिलाई तब हड़ताल को मुख्य ताकत किसान संगठन द्वारा दिए गए राशन से मिलती ्थी। वेतन बढ़ा तब दो अक्टूबर के दिन २०-२५ हजार मजदूरों ्की रै्ली में नियोगी ने कहा कि शराब पीने के पक्ष में आकर लोग बोलें। फिर अन्त में समझाया कि बढ़ा वेतन दारू कीमत अदा करने में फिर उन्हीं उद्योगपतियों के पास न चला जाए। उनक यूनियन ने शानदार ’शहीद अस्पताल ’ बनाया । विनायक सेन उसके पहले डाक्टरों में थे। विधायक बनाने वाली पहली यूनियन। शहीद नियोगी- लाल जोहार ।

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