परिचर्चा पर बहस जारी है
September 26, 2006 by अफ़लातून
कृपया इस प्रविष्टि को नीचे से ऊपर पढें
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खालीपीली
आसक्त
सिर्फ एक ही बात कहना चाहुंगा ! मातृभाषा का सम्मान जरूरी है। हिन्दी का सम्मान करना चाहिये ज्यादा से ज्यादा उपयोग करना चाहिये। लेकिन इसकी आड मे किसी और भाषा का विरोध सही नही है।
आमतौर पर हिन्दी समर्थक अंग्रेजी विरोध पर उतर आते है जो कि गलत है। अंग्रेजी एक अंतराष्ट्रीय भाषा है जो एक सत्य है और हमे इसे स्वीकार करना होगा।
अपने बच्चो को आप जिस भाषा मे भी शिक्षा देना चाहे दिजिये लेकिन उसे मातृभाषा की शिक्षा भी दिजीये। उसे अपनी मातृभाषा के साहित्य से परिचित कराईये। हो सके तो उसे कोई तिसरी या चौथी भाषा भी सिखाईये।
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आशीष
खालीपीली
आसक्त
एक बात और : ये एक भ्रम है कि हिन्दी माध्यम के विद्यार्थीयो को पिछडा समझा जाता है। मैने १२ वी तक हिन्दी माध्यम से शिक्षा प्राप्त की है।
मुझे ऐसा कभी महसूस नही किया है।
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आशीष
जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है, मुर्दादिल क्या खाक जिया करते हैं !
amit
अफ़लातून wrote:
अमित भाई,भागना मत,अभी उच्च ग्यान पर भी ‘असला’ का तसला लिए बैठे हैं.
भागना हमने नहीं सीखा, आपकी बात मैं नहीं जानता, लेकिन इतना है कि अभी हम आराम से बैठे मौज से आप लोगों का आलाप सुन/पढ़ रहे हैं, जब हम शुरू होंगे तो भागने की जगह आपको नहीं मिलेगी ऐसा हमारा मानना है।
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अमित गुप्ता –
rachana
सदस्य
From: Nasik
”सिर्फ एक ही बात कहना चाहुंगा ! मातृभाषा का सम्मान जरूरी है। हिन्दी का सम्मान करना चाहिये ज्यादा से ज्यादा उपयोग करना चाहिये। लेकिन इसकी आड मे किसी और भाषा का विरोध सही नही है।”
आशीष जी, मैं आपकी इस बात से पूरी तरह से सहमत हूँ..हिन्दी का सम्मान करने के लिये किसी और भाषा का अपमान करें ये ठीक नही है..और विभीन्न भाषाएँ सीखने की आपने जो बात कही, तो मै समझती हूँ हम भारतीय स्वाभाविक रूप से बहुभाषी होते हैं..आम पढे लिखे भारतीय को सम्भवत: ४ भाषाएँ आती है..हिन्दी,अन्ग्रेजी,अपनी भाषा(घर मे बोली जाने वाली) और जिस प्रदेश मे वह काम करता है..यदि ये सब वह बोल नही पाता तो कम से कम समझ तो लेता ही है..
“एक बात और : ये एक भ्रम है कि हिन्दी माध्यम के विद्यार्थीयो को पिछडा समझा जाता है। “
इस सिलसिले मे पिछ्ले दिनों एक खबर चली थी कि १० वीं मे ९७% अंक मिलने पर भी एक छात्रा को, दिल्ली की एक स्थापित शाला मे प्रवेश से इन्कार कर दिया क्यों कि वो “फर्राटेदार” अन्ग्रेजी बोल पाने मे असमर्थ थी..बाद मे बहुत किरकिरि होने पर उसे प्रवेश दिया गया,,जो शायद उसने ठुकरा दिया..ठीक उसी दिन मैने टी वी पर देखा कि हमारे एक केन्द्रिय मन्त्री “मीडीया” से बात करते हुए कह रहे थे कि उनसे प्रश्न सिर्फ अन्ग्रेजी मे पूछे जाएँ,वो हिन्दी नही समझ पाते!!
और आपने कहा कि आप १२ वी तक हिन्दी मे पढे हैं,मुझे लगता है
कि जिन लोगों कि वजह से भारत मे “बूम” हुई है वे ज्यादातर लोग
१२वी तक हिन्दी मे ही पढे होंगे!
अफ़लातून
भाषा विशेष से चिढने का सवाल नहीं है,न कभी था.शासन और शोषण के औजार के रूप में भाषा के प्रयोग का विरोध है .गांधी और लोहिया भी भाषा के रूप में अंग्रेजी का विरोध नहीं करते थे.उसके स्थान पर जरूर बहस चलाते थे.
“अंग्रेजी आन्तर-राष्ट्रीय व्यापार की भाषा है , वह कूट्नीति की भाषा है,उसका साहित्यिक भंडार बहुत समृद्ध है और वह पश्चिमी विचारों और संस्कृति से हमारा परिचय कराती है .इसलिए हम में से कुछ लोगों के लिए अंग्रेजी भाषा का ग्यान आवश्यक है . वे लोग राष्ट्रीय व्यापार और आन्तर-राष्ट्रीय कूट्नीति के विभाग तथा हमारे राष्ट्र को पश्चिमी साहित्य ,विचार और विग्यान की उत्तम वस्तुएं देने वाला विभाग चला सकते हैं! वह अंग्रेजी का उचित प्रयोग होगा , जब कि आज अंग्रेजी ने हमारे हृदयों में प्रिय सेप्रिय स्थान हडप लिया है और हमारी मतृभाषाओं को अपने अधिकार के स्थान से हता दिया है . अंग्रेजी को जो यह अस्वाभाविक स्थान मिला गया है , उसका कारण है अंग्रेजों के साथ हमारे असमान संबन्ध . अंग्रेजी के ग्यान के बिना भी भारतीयों के दिमाग का ऊंचे से ऊंचा विकास होना चहिए हमारे लडकों और लडकियों को यह सोचने के लिए प्रोत्साहित करना कि अंग्रेजी के ग्यान के बिना उत्तम समाज में प्रवेश नही मिल सकता , भारत के पुरुषत्व और्खास करके स्त्रीत्व की हिंसा करना है. (यंग इंडिया ,२.२.१९२१)
“अंग्रेजी को कहां से हटाना है? इसके बारे में पढे लिखे लोग मजाक कर दिया करते हैं . मैं साफ़ कर देना चाहता हूं कि हमारा यह मक़सद नही है कि इंग्लिस्तान या अमेरिका से अंग्रेजी को हटाया जाए.वहां यह भाषा अच्छी है,बढिया है,कभी कभी मुझे भी वहां बोलने में मज़ा आता है.हिन्दुस्तान में भी इसे पुस्तकालयों से नही हटाना है.पुस्तकालयों में अंग्रेजी भी रहे ,हिन्दुस्तानी के अगल बगल में जर्मन रहे ,रूसी रहे.और ये ही क्यों रहें,चीनी रहे ,अरबी रहे ,फ़ारसी भी रहे.
लेकिन आज सरकार के मालिक बहस को ईमान्दारी से चला नहीं रहे हैं .
…अंग्रेजी को हटाना है अदालत से.अंग्रेजी को हताना है उच्च न्यायालय से,सर्वोच्च न्यायालय से,सरकारी दफ़्तरों से,रेल - तार-पल्टन से,हिन्दुस्तान के हर एक सार्वजनिक काम से-जिसमें कि हिन्दुस्तान का हर एक सार्वजनिक काम अपनी मातृभाषा के माध्यम से हो सके.इस पर बहस करो.” लोहिया,हैदराबाद,१९६२
..”साधारण तौर पर देश में अंग्रेजी हटाओ वालों को यह कहके बदनाम किया जाता है कि ये तो हिन्दी वाले हैं.यह बात अब बिलकुल साफ़ हो गयी है कि हम तेलगु वाले भी हैं , हम तमिल वाले भी हैंहम बंगाली वाले भी हैं..अंग्रेजी हटाने का मतलब है हिन्दी को चलाना,तो मै यह ही कहूंगा कि वे जानबूझकर इस धोखेबाजी को फैला रहे हैं.” लोहिया,हैदराबाद,१९६२(सागर भाई ,इसी प्रचार के कारण जयललिता जैसे चिढते हैं.बहरहाल अंग्रेजी के कारण होने वाले नुकसान को अब दक्षिण मे भी समझा जा रहा है.हैदराबाद में किसी समय चिकित्सा विग्यान की पूरी पढाई उर्दू मे होती थी.महाराष्ट्र के औरंगाबाद या मराठवाडा इलाके में इसीलिए लोग राज्य के अन्य इलाकों से बेहतर हिन्दुस्तानी समझी-बोली जाती है.)
nahar7772
ज्ञानी आत्मा
From: हैदराबाद, भारत
Re: भाषा पर गांधी : एक बहस ,अब ‘परिचर्चा’ पर भीखालीपीली wrote:
एक बात और : ये एक भ्रम है कि हिन्दी माध्यम के विद्यार्थीयो को पिछडा समझा जाता है। मैने १२ वी तक हिन्दी माध्यम से शिक्षा प्राप्त की है।
मुझे ऐसा कभी महसूस नही किया है।
आशीष भाई
“जाके पैर ना फ़टे बिवाई”…….. वाली बात है यह मैने अपनी बात कही थी यह सारे लोगों के लिये लागू नहीं होती और एक घटना तो रचना जी ने बता भी गी है।बाकी अब एक दो घटनाओं का वर्णन चिट्ठे पर करूंगा, जिसमें अंग्रेजी के जानकार किस तरह हिन्दी को दोयम दर्जे की मानते हैं बताने का प्रयास करूंगा।
मैने भी यह नहीं कहा की अंग्रेजी नहीं पढ़ना चाहिये मुझे खुद को अंग्रेजी नहीं जानने का दुख: है, जिसकी वजह मैं आगे लिख भी चुका हुँ, देखें:
कभी कभी यह लगता है कि मुझे अंग्रेजी का सामान्य ज्ञान तो होना ही चाहिये क्यों कि अन्तरजाल पर जो खजाना भरा पड़ा है उसका मैं पूरा लाभ नहीं उठा पाता।
मैने आगे यह लिखा था देखें:
हमारी शिक्षा का माध्यम हमारे देश की भाषा ही होना चाहिये नहीं कि विदेशी भाषा! साथ में अंग्रेजी भी होनी चाहिये परन्तु पूरक के रूप में,नहीं की मुख्य भाषा के रूप में।
पता नहीं अक्सर यह क्यों होता है कि हिन्दी के समर्थन की बात को अंग्रेजी का विरोध मान लिया जाता है।
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सागर चन्द नाहर
nahar7772 wrote:
पता नहीं अक्सर यह क्यों होता है कि हिन्दी के समर्थन की बात को अंग्रेजी का विरोध मान लिया जाता है।
सागर जी, ऐसा नहीं है कि हिन्दी के समर्थन को अंग्रेज़ी का विरोध माना जाता है, परन्तु जब सीधे सीधे कहा जाए कि अंग्रेज़ी क्यों सीखें और “अंग्रेज़ी सीख कौन सा किला फ़तह कर लिया या कर लोगे” तो उसे और क्या समझा जाए? हिन्दी समर्थन ऐसी टुच्ची टिप्पणियों के बगैर भी किया जा सकता है। गांधी के समय की बात करना हर रूप में जायज़ नहीं है। उनके समय में भारत अंग्रेज़ों का गुलाम था और वे लोग अंग्रेज़ों की प्रत्येक चीज़ का विरोध करते थे, भाषा को क्यों छोड़ते भला? उस समय में भारत उतना विकसित नहीं था जितना आज है।
लोग चीन, जापान, रूस, इस्राईल आदि का उदाहरण देते हैं कि उन्होंने अपनी भाषा के द्वारा ही इतनी तरक्की करी और भारत अंग्रेज़ी के चक्कर में पड़ा यह ना कर पाया। इसे सीधे सीधे अंग्रेज़ी पर बेवजह आघात नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे? अंग्रेज़ी भाषा तो नहीं कहती कि हम उसे सीखें और प्रयोग करें, तो उसे उलाहना क्यों? जो लोग इन देशों की तरक्की का ढोल पीटते हुए अपने देश के पिछड़ा होने का दोष अंग्रेज़ी मोह पर लादते हैं क्या उन्हें इतनी समझ नहीं कि चाहे चीन हो या जापान, रूस हो या इस्राईल, इन देशों में जिस कार्य को करने का निर्णय लिया जाता है वह किया जाता है, हमारे देश की तरह लालफ़ीताशाही और नौकरशाही के जाल में फ़ंस वह दम नहीं तोड़ता। चीन तरक्की पर इसलिए है कि वहाँ पर यहाँ की तरह नेता लोग मौज नहीं लेते, हुक्मउदुली की सज़ा वहाँ केवल एक है। चोरी करने जैसे अपराध पर जहाँ गोली मार दी जाती है वहाँ लोग अपना काम करते हैं, टाईमपास नहीं करते। कहने का अर्थ है कि उनकी तरक्की का भाषा से कोई लेना देना नहीं है। यदि ऐसा ही होता तो जापान में लोग आज भी पुराने समय के जैसे किमोनो पहन घूम रहे होते ना कि पश्चिमी कपड़े!!
आसक्त
nahar7772 wrote:
पता नहीं अक्सर यह क्यों होता है कि हिन्दी के समर्थन की बात को अंग्रेजी का विरोध मान लिया जाता है।
नाहरजी मैं आपकी बात से सहमत हूँ ॰॰॰
कोई भाषा प्रेमी नहीं चाहेगा कि अन्य भाषा का विरोध किया जाये परन्तु इसका यह मतलब नहीं कि अपनी भाषा का अस्तीत्व खो रहा हो तो उसे बचाने की चेष्ठा भी ना करे। हिन्दी प्रेमी अगर चाहते हैं कि हिन्दी भाषा को भी उतना ही सम्मान मिलें जितना अंग्रेजी भाषा को मिल रहा है तो इसमें बुरा क्या है???
आखीर अपनी भाषा की उन्नति देखना कौन नहीं चाहता???
grjoshee wrote:
कोई भाषा प्रेमी नहीं चाहेगा कि अन्य भाषा का विरोध किया जाये परन्तु इसका यह मतलब नहीं कि अपनी भाषा का अस्तीत्व खो रहा हो तो उसे बचाने की चेष्ठा भी ना करे। हिन्दी प्रेमी अगर चाहते हैं कि हिन्दी भाषा को भी उतना ही सम्मान मिलें जितना अंग्रेजी भाषा को मिल रहा है तो इसमें बुरा क्या है???
कोई बुराई नहीं है, लेकिन दूसरी भाषा ने आपका क्या बिगाड़ा है जो उसे भला-बुरा कहा जाए? आपकी भाषा को कोई ऐसे भला-बुरा कहे तो कैसा लगेगा? यकीनन अच्छा नहीं लगेगा, क्यों? तो दूसरी भाषा के साथ भी हमें खुद ऐसा नहीं ना करना चाहिए। अपनी भाषा का प्रचार, उसके अस्तित्व को बचाने के लिए किसी दूसरी भाषा को नीचा दिखाना या उसे भला बुरा कहना कहीं से भी उचित नहीं है।
भी अमितजी आपकी बातों से हिन्दी विरोधी होने की बू आ रही है ॰॰॰
हमने कभी यह नहीं कहा कि अंग्रेजी का उपयोग जायज नहीं मगर हिन्दी भाषा को हेय दृष्टि से देखा जाए, यह भी सहन नहीं करेंगे ॰॰॰
अफ़लातून
नवीन सदस्य
From: Varanasi
E-mail PM Website Re: भाषा पर गांधी : एक बहस ,अब ‘परिचर्चा’ पर भी-”गांधी के समय की बात करना हर रूप में जायज़ नहीं है। उनके समय में भारत अंग्रेज़ों का गुलाम था और वे लोग अंग्रेज़ों की प्रत्येक चीज़ का विरोध करते थे, भाषा को क्यों छोड़ते भला?”
–”इसे सीधे सीधे अंग्रेज़ी पर बेवजह आघात नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे? अंग्रेज़ी भाषा तो नहीं कहती कि हम उसे सीखें और प्रयोग करें, तो उसे उलाहना क्यों? जो लोग इन देशों की तरक्की का ढोल पीटते हुए अपने देश के पिछड़ा होने का दोष अंग्रेज़ी मोह पर लादते हैं क्या उन्हें इतनी समझ नहीं कि चाहे चीन हो या जापान, रूस हो या इस्राईल, इन देशों में जिस कार्य को करने का निर्णय लिया जाता है वह किया जाता है, हमारे देश की तरह लालफ़ीताशाही और नौकरशाही के जाल में फ़ंस वह दम नहीं तोड़ता। “
-गांधी अंग्रेज लोगों का विरोध नहीं करते थे.
-उलाहना भाषा को नहीं,भाषा नीति का विरोध होता है जिसकी वजह से किसी देश की शिक्षा का माध्यम,सरकारी और अदालती काम-काज की भाषा आदि गुलाम मानसिकता वाले नीति नियंताओं द्वारा थोपे जाते हैं.
-पिछडेपन का कारण सिर्फ़ भाषा नहीं,विकास-नीति भी है.ज्यादा समय तक गुलाम रहने वाले देशों और कम समय तक या न के बराबर गुलाम रहने वाले देशों के चरित्र मे एक भिन्नता होती है.पहली किस्म के लोग अपने निर्णय से कठिन काम नही कर सकते.गुलाम व्यक्ति आदेश मिलने पर कठिन कार्य करता है,अनिच्छा से करता है,उसमे उसे रस नही मिलता.इस तरह कठिन काम के प्रति अनिच्छा उसका स्वभाव बन जाती है.बाद में जब देश आजाद हो जाता है,तब भी वह कठिन काम,कठोर निर्णय से भागता है.कठिन काम करने में जो रस है तृप्ति है,उसे वह समझ नही पाता.’कठिन’ और ‘असंभव’ को वह कई पर्याय्वाची मानने लगता है.मूल योजना मालिक बनात है.कार्यान्वयन क्र स्तर पर नौकर भी बहुत सारे परिवर्तन और निर्णय करने का अधिकार ले लेता है.सामूहिक गुलामी की आदत सेभी कुछ ऐसा ही स्वभाव पैदा होता है कि योजना की दिशा या मूल सिद्धान्त के बारे में वह सोचना नही चाहता.,उसकी कोशिश भी नही करता.
–गुलामी में एक सुरक्षा है.अनुकरण और निर्भरता में एक सुरक्षा है–खासकर बौद्धिक निर्भरता में.इसलिए उसकी लत लग जाती है.
अमित जैसी गलती करना काफ़ी व्यापक बीमारी है.इसे तर्क्शास्त्र में तर्कदोष या हेत्वाभास (हेतु + आभास ) कहा जाता है.अंग्रेजी में -fallacy. जैसे कुछ भारतीय बुद्धिजीवी कहते हैं कि १८५७ कि क्रान्ति सफल हो जाती तो भारत का बहुत नुकसान हो जाता.
–गुलाम कुशाग्र बुद्धि का हो सकता है जैसे अमित लेकिन जहां विचार से निर्णय निकालना पडता है,वहीं वह आश्चर्यजनक ढंग से तर्क की गलती करता है.
–आखिरकार मानसिक गुलामी एक अस्वाभाविक स्थिति है.
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neerajdiwan
समझदार बंधु
Re: भाषा पर गांधी : एक बहस ,अब ‘परिचर्चा’ पर भीएक सवाल - क्या हिन्दी के दम पर विदेश में रहने वाले हमारे भाई रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं? क्या आप मुझे सिर्फ़ हिन्दी के भरोसे इतनी तनख्वाह दे सकते हैं जो फिलवक़्त मैं कमा रहा हूं?
neerajdiwan wrote:
एक सवाल - क्या हिन्दी के दम पर विदेश में रहने वाले हमारे भाई रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं? क्या आप मुझे सिर्फ़ हिन्दी के भरोसे इतनी तनख्वाह दे सकते हैं जो फिलवक़्त मैं कमा रहा हूं?
आप फिर से बहस को हिन्दी बनाम अंग्रेजी का जामा पहनाने की चेष्ठा कर रहें है, जबकि यह हिन्दी बनाम अंग्रेजी नहीं वरन् भाषा की महता को समझने की चेष्ठा है। कृपया हमें अंग्रेजी विरोधी ना समझें।
हम भाषा प्रेमी है और सभी भाषाओं से प्यार करते है ॰॰॰
Offline
कितने अनिवासी भारतीय वहां अंग्रेजी पढा रहे हैं ?
क्या उनसे कम अंग्रेजी जानने वाले चीनी ,जर्मन,फ्रेन्च उन्हें वहां नहीं मिलते? आपके जितनी तनख्वाह भारत में भी कितनों को मिलती है?और उतनी तनख्वाह का साम्राज्यवादी शोषण से भी कुछ नाता है या नहीं ?अमेरिकी झंडे की कसम खा कर नागरिकता लेने और वहां की अर्थव्यवस्था में अपनी नौकरी से योगदान करने वालोँ को यह नहीँ भूलना चाहिये कि उनकी भारत में उच्च शिक्षा मे सरकारी खजाने से जो राशि खर्च हुई है उसमें हिन्दुस्तान की गरीब जनता का भी योगदान है.
grjoshee wrote:
अमितजी आपकी बातों से हिन्दी विरोधी होने की बू आ रही है ॰॰॰
यहाँ पढ़ें। जो ढोल आप अभी दूसरी भाषाओं को नीचा दिखा के बजा रहे हैं मैं वो पिछले वर्ष बिना किसी दूसरी भाषा को नीचा दिखाए बजा चुका हूँ। टिप्पणियाँ भी पढ़िएगा उस पोस्ट की।
रही बात हिन्दी विरोधी होने की तो मुझे आपके या किसी और के कुछ सोचने अथवा ना सोचने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता, चाहे हिन्दी विरोधी समझो या हिन्दी प्रेमी, हम तो तर्क संगत बात करने वाले बन्दे हैं और ऐसे ही रहेंगे।
grjoshee wrote:
हमने कभी यह नहीं कहा कि अंग्रेजी का उपयोग जायज नहीं मगर हिन्दी भाषा को हेय दृष्टि से देखा जाए, यह भी सहन नहीं करेंगे ॰॰॰
मत करो भाई, किसने कहा है कि करो? आज़ाद देश के आज़ाद नागरिक हैं, कोई पाबन्दी नहीं है कि फ़लां फ़लां चीज़ सहन ही करनी है, लेकिन जिस तरह आप समर्थन कर रहे हैं और जिसका कर रहे हैं वह अन्य भाषा(अंग्रेज़ी) का विरोध ही कर रहे हैं।
neerajdiwan wrote:
एक सवाल - क्या हिन्दी के दम पर विदेश में रहने वाले हमारे भाई रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं? क्या आप मुझे सिर्फ़ हिन्दी के भरोसे इतनी तनख्वाह दे सकते हैं जो फिलवक़्त मैं कमा रहा हूं?
छोड़ो यार, किससे बहस कर रहे हो? ऐसे लोगों की कमी नहीं जो अपनी कही बात का विरोध करने वाले को गलत कह तर्कशास्त्र पढ़ाते हैं!!
अफ़लातून wrote:
अमेरिकी झंडे की कसम खा कर नागरिकता लेने और वहां की अर्थव्यवस्था में अपनी नौकरी से योगदान करने वालोँ को यह नहीँ भूलना चाहिये कि उनकी भारत में उच्च शिक्षा मे सरकारी खजाने से जो राशि खर्च हुई है उसमें हिन्दुस्तान की गरीब जनता का भी योगदान है.
माफ़ करें, आपकी शिक्षा में सरकारी योगदान रहा होगा पर मेरी में नहीं। शुरू से अंत तक निजि संस्थानों में मोटी फ़ीस देकर शिक्षा प्राप्त की है, किसी सरकारी योगदान द्वारा नहीं। यदि अब आप यह कहने की कोशिश करेंगे कि सड़क आदि सरकार बनवाती है जिस पर चल स्कूल कॉलेज गए तो जी उसे बनवाने में भी हमारे घरवालों का सहयोग रहा है जो उन्होंने टैक्स भर कर किया।
अमित गुप्ता
- neerajdiwan
- समझदार बंधु
अफ़लातून wrote:
कितने अनिवासी भारतीय वहां अंग्रेजी पढा रहे हैं ?
क्या उनसे कम अंग्रेजी जानने वाले चीनी ,जर्मन,फ्रेन्च उन्हें वहां नहीं मिलते? आपके जितनी तनख्वाह भारत में भी कितनों को मिलती है?और उतनी तनख्वाह का साम्राज्यवादी शोषण से भी कुछ नाता है या नहीं ?अमेरिकी झंडे की कसम खा कर नागरिकता लेने और वहां की अर्थव्यवस्था में अपनी नौकरी से योगदान करने वालोँ को यह नहीँ भूलना चाहिये कि उनकी भारत में उच्च शिक्षा मे सरकारी खजाने से जो राशि खर्च हुई है उसमें हिन्दुस्तान की गरीब जनता का भी योगदान है.
अनिवासी हो या निवासी भारतीय. जो अंग्रेज़ी में निपुणता के ज़रिए मिल रहा है वो हिन्दी के भरोसे मिलना संभव नहीं हो रहा है. यह व्यवस्था का दोष है. आपने कहा है कि वहां कितने अँग्रेज़ी पढ़ा रहें हैं.. तो अनिवासी भाई वहां तकनीकी दक्षता के चलते और अंग्रेज़ी माध्यम में निपुणता के ज़रिए कमा रहे हैं. अंग्रेजो को अंग्रेज़ी पढ़ाने की ज़रूरत क्या है? बंगाली बच्चा गोद लेने के लिए बंगाली सीखना ज़रूरी थोड़ी है.
दूसरी बात यह है कि तनख्वाह का साम्राज्यवादी शोषण से नाता ज़रूर हो सकता है कितु इस आर्थिक विषमता के लिए राजनीतिक व्यवस्था दोषी है औऱ निजी महत्वाकांक्षा भी. ये सदा से विद्मान रही है जो दुखद है किंतु इसमें भाषा का दोष नहीं है. लगभग वे सारे लेखक और विचारक जो आर्थिक विषमता, साम्राज्यवाद के खिलाफ़ झंडा बुलंद किए हुए हैं उन्हें भाषाओं का भलीभांति ज्ञान है और ऐसा करना ज़रूरी है. भारत में आप या तो हिन्दी या फिर अंग्रेज़ी के दम पर अपनी बात अधिकाधिक लोगों तक पहुंचा सकते हैं. हमारी राजनीतिक लामबंदियों के चलते दक्षिण में हिन्दी को स्वीकार्य बनाने में दिक्कते आती रही हैं. इसी तरह पूर्व में भी यह बीमारी पसरी है. जो विशुद्ध राजनीतिक मसले बन चुके हैं.
शिक्षा प्रणाली पर मेरी मान्यता यह है कि हिन्दी माध्यमों में सामान्य अंग्रेज़ी का स्तर सुधारा जाना चाहिए. अंग्रेज़ी को दरकिनार करना घातक होगा. इसी तरह अंग्रेज़ी माध्यम में सामान्य हिन्दी का स्तर सुधारा जाए. वैसे भी बच्चों के सीखने की क्षमता बहुत अधिक होती है. चीनी-जापानियों से पूछो कि उनको बिना अंग्रेजी के दिक्कतें आनी शुरू हो गई हैं.
अनिवासी भारतीयों के या भारतीय मूल के नागरिकों का योगदान हमारी भी अर्थव्यवस्था में कुछ अहम तो है, विदेशी मुद्रा की बड़ी खेप भारत के विकास पर ही खर्च होती है. यदि यह दुधारू गाय नहीं होती तो सरकारें इतना दुलार-पुचकार नहीं करतीं. कितना खर्च करती है सरकार शिक्षा पर? देश के कुल बजट का ढाई फ़ीसद खर्च होता है शिक्षा पर.. ? फिर वैश्विक ग्राम के नज़रिए को ताकपर रखकर समाजवाद की बात करना व्यवहारिक नहीं है. सब कुछ ज़ीरो से शुरू करना होगा. चैक एंड बैलेंस ज़रूरी है जिसके लिए समाजवादियों की भूमिका उत्प्रेरण का काम करती है किंतु मुख्यधारा तो मध्यमार्गियों की ही रहेगी.. चाहे जो भी वाद की सरकार आ जाए. ये नॉन-रिवर्सेबल (अपलटनीय) हो चुकी है.
पहले लोग शेक्सपीयर, कीटस, शैली को पढ़ने के लिए अंग्रेज़ी सीख लेते थे. चंद्रकांता पढ़ने के लिए कइयों ने हिन्दी सीख ली. यानी अनुवाद से बचिए.. कोशिश करें कि ज़्यादा से ज़्यादा भाषाएं सीखीं जाएं.
जो घर बारै आपना, चले हमारे साथ
भैये कोई मुझे ये समझायेगा कि हिन्दी समर्थक अंग्रेजी विरोध पर क्यों उतर आते है ?
एक रेखा को छोटी करने के लिये उसे मिटा कर छोटा करना बेहतर है या उससे बडी रेखा खिंचकर उसे छोटा बनाना ?
क्या आप अंग्रेजी विरोध कर आप हिन्दी को महान बना पायेंगे ?
क्यो आप अंग्रेजी विरोध कर प्रेमचन्द , मुक्तिबोध, निराला का जिवनस्तर उठा पायेंगे ?
मै हिन्दी मे बात करता हूं, हिन्दी मे लिखता हूं यहां तक कि मैने अमरिका प्रवास के दौरान अमरीकन कंपनी के लोगो को नमस्ते और धन्यवाद भी सीखा दिया। वे मुझसे हाय या थैंक्यु की जगह नमस्ते और धन्यवाद का प्रयोग करते थे। लेकिन ये अंग्रेजी के विरोध से नही हुआ था। ये हुआ था हिन्दी और अंग्रेजी के मध्य एक समन्वय से।
आशीष
खालीपीली wrote:
भैये कोई मुझे ये समझायेगा कि हिन्दी समर्थक अंग्रेजी विरोध पर क्यों उतर आते है?
क्या आप इस थ्रेड में कहीं बता सकते हैं जहाँ परिचर्चा के सदस्यों नें अंग्रेजी का विरोध क्या हो?
amit wrote:
जो ढोल आप अभी दूसरी भाषाओं को नीचा दिखा के बजा रहे हैं…
क्या आप भी बतायेंगे के परिचर्चा के किस सदस्य ने दूसरी भाषा को नीचा दिखाया है, गूगल के फ़ोरम में आपको किसी ने अशिष्ट टिप्पणी की है तो उसका गुस्सा आप यहाँ ना उतारें, आप समझदार है,क्षमा वीरस्य भूषणम।
यह बात अलग है कि परिचर्चा के सदस्य ने भारतीय क्षमताओं पर संदेह किया कि उनकी योग्यता में अंग्रेजी से कस्ट पेस्ट का योगदान नहीं तो और क्या है।
neerajdiwan wrote:
एक सवाल - क्या हिन्दी के दम पर विदेश में रहने वाले हमारे भाई रोज़ी-रोटी कमा रहे हैं? क्या आप मुझे सिर्फ़ हिन्दी के भरोसे इतनी तनख्वाह दे सकते हैं जो फिलवक़्त मैं कमा रहा हूं?
नीरज भाई
इस देश के नागरिक होने के तौर पर क्या यह बुरी बात नहीं है कि सिर्फ़ हिन्दी के भरोसे उतना नहीं कमाया जा रहा, पर क्या उन लोगों की संख्या किसी से कम है जो सिर्फ़ हिन्दी के सहारे अपना पेट भर रहे हैं और उन लोगों से जो अंग्रेजी के सहारे अपना पेट भर रहे हैं, से बेहतर जिंदगी जी रहे हैं।
इसमें दोष क्या उस व्यवस्था का नहीं जो अपने देश की बजाय दूसरे देश की भाषा को बढ़ोतरी दे रहा है।
बात गांधीजी के व्यक्तव्य से शुरु हुई थी पता नहीं कहाँ जा पहुँची, कम से कम मेरा विचार तो किसी भाषा के प्रति अपमान करना नहीं था, फ़िर भी जिनको दुख: हुआ हो तो क्षमा याचना करता हुँ एक बार फ़िर कहुंगा कि “क्षमा वीरस्य भूषणम”
सागर चन्द नाहर
‘अनिवासी हो या निवासी भारतीय. जो अंग्रेज़ी में निपुणता के ज़रिए मिल रहा है वो हिन्दी के भरोसे मिलना संभव नहीं हो रहा है. यह व्यवस्था का दोष है.’– बन्धु की समझदारी के कायल हैं.
‘हमारी राजनीतिक लामबंदियों के चलते दक्षिण में हिन्दी को स्वीकार्य बनाने में दिक्कते आती रही हैं. इसी तरह पूर्व में भी यह बीमारी पसरी है. जो विशुद्ध राजनीतिक मसले बन चुके हैं. ‘ –जब ‘अंग्रेजी की जगह हिन्दी’ की जल्दबाजी दिखाई देगी ,तब दक्षिण में हिन्दी विरोध दिखाई देगा.’अंग्रेजी की जगह भारतीय भाषाओं’ की बात दक्षिण और पूर्वोत्तर में भी स्वीकार्य है.
- grjoshee
- आसक्त
- From: नागौर, राजस्थान
Re: भाषा पर गांधी : एक बहस ,अब ‘परिचर्चा’ पर भी
amit wrote:
जो ढोल आप अभी दिखा के बजा रहे हैं मैं वो पिछले वर्ष बिना किसी दूसरी भाषा को नीचा दिखाए बजा चुका हूँ। टिप्पणियाँ भी पढ़िएगा उस पोस्ट की।
क्या आप बतायेंगे कहाँ मैने दूसरी भाषाओं को नीचा दिखाने का ढोल बजाया है??? मैने तो पहले भी कहा है -
हम भाषा प्रेमी है और सभी भाषाओं से प्यार करते है ॰॰॰
amit wrote:
लेकिन जिस तरह आप समर्थन कर रहे हैं और जिसका कर रहे हैं वह अन्य भाषा(अंग्रेज़ी) का विरोध ही कर रहे हैं।
मैं ना तो किसी व्यक्ति विशेष का समर्थन कर रहा हूँ और ना ही विरोध। हाँ हिन्दी का प्रबल समर्थक जरूर हूँ मगर अंग्रेजी का विरोधी नहीं।

