गुलामी का दर्शन : किशन पटनायक
September 30, 2006 by अफ़लातून
“गुलामी में एक सुरक्षा है.अनुकरण और निर्भरता में एक सुरक्षा है -खासकर बौद्धिक निर्भरता में.इसलिए इसकी लत लग जाती है.जो लोग,व्यक्ति या समूह लम्बे समय तक गुलाम बने रहते हैं,उनके स्वभाव में कुछ परिवर्तन आ जाता है.ज्यादा समय तक गुलाम रहने वाले देशों और कम समय तक या न के बराबर गुलाम रहने वाले देशों के चरित्र में एक भिन्नता होती है.पहली किस्म के लोग अपने निर्णय से कठिन काम नहीं कर सकते.गुलाम व्यक्ति आदेश मिलने पर कठिन काम करता है,अनिच्छा से करता है,उसमें रस नहीं मिलता.इस तरह कठिन काम के प्रति उसका स्वभाव बन जाती है.बाद में जब वह आज़ाद होता है,तब भी वह कठिन काम,कठोर निर्णय से भागता है.कठिन काम करने में जो रस है ,जो तृप्ती है, उसे वह समझ नही पाता.जो कठिन है वह संभव है,दीर्घकालीन हित के लिये हरेक के लिये आवश्यक है -यह भाव उसके आचरण से गायब हो जाता है.”
- किशन पटनायक (विकल्पहीन नहीं है दुनिया,पृष्ट २१,राजकमल प्रकाशन)


वर्ष २००२ में हमने अपने संस्थान में किशन जी का एक व्याख्यान रखा था . विषय था : ‘भूमण्डलीकरण,प्रौद्योगिकी और भारत’ . इस विषय पर किशन जी के विचार सुन कर कुछ अलग तरह से सोचने वाले वैज्ञानिक स्तब्ध रह गये कि वस्तुस्थिति क्या है .मैने कुछ वैज्ञानिकों को उनकी पुस्तक ‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ पढ़ने को दी . वे किशन जी की सोच और विवेचन से चकित थे.