‘ परिचर्चा ‘ की जारी बहस
December 15, 2006 by अफ़लातून
#18 Today 11:31:20
- neerajdiwan
- समझदार बंधु
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Re: अहमदाबाद में प्रेमी युगलों की पिटाई
आंख बन्द कर लेने से मुसीबतें टल नहीं जाती.. संस्कृति के ठेकेदार कल हमारे घर की दीवारें लांघकर हमें धमकाने लगेंगे कि हम अपने जीवनसाथी के साथ भी मुहूर्त देखकर ही हमबिस्तर हों.
प्यार करने के तौर-तरीक़े सीखाने के काम में इनकी कब से माहिरी हो गई जो ब्रह्मचर्य का पालन करने का दंभ भरते फिरते हैं. संघ परिवार के ये चट्टे-बट्टे कभी मुन्ना बजरंगी के तौर पर दिखते हैं तो कभी दारा सिंह के.
इनकी आलोचना करना किसी राज्य की अस्मिता का अपमान नहीं हो सकता. जो कोई इसे अस्मिता से जोड़ने की कुचेष्टा करेगा उसे यह समझना चाहिए कि सारा देश भारतवासियों का है.
घुघुति ने जो विषय उठाया था.. उसका मर्म सिर्फ़ इतना है कि व्यक्तिगत मामलों में हस्तक्षेप सदैव अनुचित होता है. ऊपर से तुक्का यह कि दंगों के आरोपी जब पुलिसिया तेवर अपना लें तो यह ख़तरनाक प्रवृति होती है.. ये हिन्दू-मुसलमान का प्रश्न नहीं है.. जिन बच्चों को मार पड़ रही थी वो भले ही कोई जुर्म कर रहें हों लेकिन सज़ा देना क़ानून का काम है.. मुन्ना बजरंगियों को दुर्गा वाहिनी की सदस्यों को नहीं… विधि का शासन देश में बना रहे.. इसलिए यह अहम विषय है.
इस तरह का बवाल खड़ा हो गया तो अपन को दुष्यंत कुमार जी की एक रचना याद आ गई..
मत कहो आकाश में कुहरा घना है
यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है
सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह से
क्या करोगे सूर्य का क्या देखना है
इस सड़क पर इस कदर कीचड़ बिछी है
हर किसी का पैर घुटनों तक सना है
पक्ष औ प्रतिपक्ष संसद में मुखर है
बात इतनी है कि कोई पुल बना है
रक्त वर्षों में नसों में खौलता है
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है
हो गयी हर घाट पर पूरी व्यवस्था
शौक से डूबे जिसे भी डूबना है
दोस्तों अब मंच पर सुविधा नहीं है
आजकल नेपथ्य में संभावना है
Last edited by neerajdiwan (Today 11:33:2

