[ महानगरों के पास सस्ती जमीन , करों में छूट और बाहर से सीमेंट, इस्पात , लिफ़्ट , बिजली उपकरण आदि नि:शुल्क आयात करने की सुविधा के कारण कई जमीन - जायदाद का धन्धा करने वाली निर्माण कंपनियों के लिए भी ' विशेष आर्थिक क्षेत्रों ' का आकर्षण बढ़ गया है। ]
पिछली प्रविष्टि से आगे :
ये विशेष आर्थिक क्षेत्र १० हेक्टेयर से ले कर हजारों हेक्टेयर के हो सकते हैं। कोई ऊपरी सीमा नहीं है और रिलायन्स के कुछ विशेष आर्थिक क्षेत्र तो १५ हजार हेक्टेयर तक के विशाल भूभाग में बन रहे हैं। ये विशेष आर्थिक क्षेत्र किसी एक वस्तु या सेवा पर केन्द्रित भी हो सकते हैं और अनेक वस्तुओं या सेवाओं के भी हो सकते हैं। भारत सरकार द्वारा तय नियमों के मुताबिक अनेक वस्तुओं के उद्योगों वाले ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ का न्यूनतम क्षेत्रफल १००० हेक्टेयर होना चाहिए। एक वस्तु या सेवा के क्षेत्र ( जैसे हीरा – जवाहरात या जैव – तक्नालाजी या सूचना तकनालाजी ) न्यूनतम १० हेक्टेयर तक भी हो सकते हैं।
भारत सरकार ने यह भी छूट दी है कि इन ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ के कुल क्षेत्रफल में उद्योगों की इकाइयों का क्षेत्रफल ३५ प्रतिशत से ज्यादा करने की बाध्यता नहीं होगी। दूसरे शब्दों में ६५ प्रतिशत तक जमीन पर आवासीय कालोनी , रेस्तराँ , मल्टीप्लेक्स , मनोरंजन केन्द्र , शापिंग माल , गोल्फ़ कोर्स , हवाई अड्डा , स्कूल , अस्पताल आदि बनाये जा सकते हैं। कहने को तो ये सुविधाएं ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्र ‘ के अन्दर के उद्योगों व इकाइयों में कार्यरत मजदूरों व कर्मचारियों के लिए होगी , किन्तु क्षेत्र के बाहर के लोगों को भी इनका इस्तेमाल करने से रोकने का कोई तरीका तो नही होगा। इसका मतलब यह भी है कि निर्यात संवर्धन की आड़ में कई अन्य धन्धे भी यहाँ पनप सकते हैं। महानगरों के पास सस्ती जमीन , करों में छूट और बाहर से सीमेन्ट , इस्पात , लिफ्ट , बिजली उपकरण आदि चीजें निशुल्क आयात करने की सुविधा के कारण कई जमीन – जायदाद का धन्धा करने वालि निर्मान कंपनियों के लिए भी ‘ विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ का आकर्षण बढ़ गया है। राहेजा , यूनिटेक , डीएलेफ़ , युनिवर्सल आदि ऐसी ही कंपनियां हैं जो ‘ विशेष आर्थि क्षेत्र बनाने तथा विकसित करने के लिए आगे आ गयी हैं।

