गत प्रविष्टी से आगे : आन्ध्रप्रदेश में काकिनाडा में तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग के विशेष आर्थिक क्षेत्र एवं तेलशोधक कारखाने के लिए १०,००० एकड़ खेती की उपजाऊ भूमि ली जा रही है , जिसे छोड़ने के लिए किसान तैयार नहीं है। हरियाणा में रिलायन्स का विशेष आर्थिक क्षेत्र भी विवादों से घिर गया है। हरियाणा सरकार ने गुड़गाँव के पास लगभग १००० करोड़ रु. की १७०० एकड़ भूमि मुकेश अंबानी को मात्र ३६० करोड़ रु. में दे दी है। इसी प्रकार , पंजाब में अमृतसर के पास डी.एल.एफ़. कम्पनी के विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए भी सस्ती दरों पर भूमि अर्जित करने के कारण काफी विरोध हो रहा है। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री स्वंय इसमें कम्पनी के पक्ष में जोर लगा रहें है तथा वहाँ जा चुके हैं। विशेष आर्थिक क्षेत्रों के मामलों में जमीन के बड़े-बड़े घोटाले होने की पूरी सम्भावना है। वैश्वीकरण के कई घोटालों में यह एक नया योगदान है। प्रचलित बाजार दरों से काफी कम दरों पर, राज्य सरकारें इन कम्पनियों के हवाले जमीन कर रही है तथा किसानों से बहुत कम दरों पर जमीनें जबरदस्ती ली जा रहीं है। पहले ही बड़े बाँधों,खदानों,कारखानों,फ़ायरिंग रेंजों,राष्ट्रीय उद्यानों व अभ्यारणों से बड़े पैमाने पर गाँवों को उजाड़ा जा रहा है। विशेष आर्थिक क्षेत्र इस विस्थापन की श्रृंखला में एक नई कड़ी बन गए हैं। भारतीय खेती व गाँवों पर वैश्वीकरण का यह एक और हमला है।
विशेष आर्थिक क्षेत्रों का प्रशासन भी इनका विकास करने वाली कम्पनियों के हाथ में होगा। केन्द्र सरकार की तरफ से सिर्फ एक विकास आयुक्त होगा। सम्भवतः कोई ग्राम पंचायत या नगरपालिका जैसी स्थानीय स्वशासन की संस्थाएँ भी नहीं होगी। ये देश के अंदर एक अलग देश होंगे और यहाँ देशी-विदेशी कम्पनियों की ही चलेगी। यह एक विचित्र स्थिति होगी और १९४७ के बाद, गोवा व पांडिचेरी की आजादी के बाद, भारत भूमि पर पहली बार देश की सम्प्रभुता से स्वतंत्र क्षेत्र बनेंगे।
इस बात की पूरी सम्भावना है कि विशेष आर्थिक क्षेत्र काफी बड़े भ्रष्टाचारों और घोटालों के केन्द्र बनेंगे। विकास आयुक्त से लेकर अन्य अफ़सर केन्द्र सरकार के होंगे। विशेष आर्थिक क्षेत्रों में स्थापित होने वाली इकाइयों और इसमें ढाँचा-निर्माण करने वाली कंपनियों को अनुमति व लाइसेन्स देने की एवज में उनकी जम कर कमाई होगी। आखिर करोड़ों - अरबों रुपए की कर -रियायतों के बदले में कुछ कमीशन उन्हें देने में देशी- विदेशी कंपनियों को कोई दिक्कत नहीं होगी।
यदि संप्रभुता, भ्रष्टाचार, विस्थापन और अन्य विवादों को छोटी - मोटी समस्या तथा विरोधियों का प्रचार कहकर नकार दिया जाए, तो भी भारत के विकास और प्रगति में इन ‘विशेष आर्थिक क्षेत्रों ‘ की भूमिका काफी संदिग्ध है। स्वयं उदारीकरण - वैश्वीकरण के समर्थक अर्थशास्त्री भी भारत सरकार की इस योजना पर उंगली उठा रहें हैं। पहली बात तो यह है कि ज्यादा संभावना इस बात की है कि इन विशेष आर्थिक क्षेत्रों में मिलने वाली जबरदस्त कर- छूटों व अन्य सुविधाओं के कारण, नए उद्योग लगने के बजाय देश के अन्य क्षेत्रों से उद्योग यहाँ स्थानान्तरित हो जायेंगे । विशेष आर्थिक क्षेत्रों में तो पूंजी निवेश, उत्पादन, निर्यात और रोजगार के आंकड़े बढ़ते हुए दिखेंगे, किंतु देश के अन्य विशाल भूभाग में उद्योग बंद होते जाएंगे और मंदी व बेरोजगारी फैलती जाएगी। कुल मिलाकर नतीजा शून्य से ज्यादा नहीं होगा।


“जबरदस्त कर- छूटों व अन्य सुविधाओं के कारण, नए उद्योग लगने के बजाय देश के अन्य क्षेत्रों से उद्योग यहाँ स्थानान्तरित हो जायेंगे”
इसकी सम्भावना काफी है, बाकी भविष्य बताएगा. हमें तो अच्छे की कामना करनी चाहिए.