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Archive for January, 2007

करीब ग्यारह घण्टे पहले मुझे यह ई- मेल भेजा गया :
 
श्री अफ़लातून जी;
हम समाचारों से परे, हिन्दी रचनाओं की एक वेबसाईट (www.cafehindi.com)  बना रहें हैं.
क्या हम आपके ब्लोग रचनायें इस वेबसाईट पर उपयोग कर सकते हैं? इस वेबसाईट का उद्देश्य कोई भी लाभ कमाना नहीं है.
मैंने क्या वैश्वीकरण का मानवीय चेहरा संभव है ? की समस्त किश्तें [...]

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   पिछली प्रविष्टी से आगे : कमरे में प्रवेश करते ही सुभाष को थोड़ा झटका लगा । कमरे में चटाई पर बैठे सभी लोग मोटी खादी के कपड़े पहने हुए थे,और वे खुद विलायत से आई.सी.एस. बन कर लौटे युवक की भाँति परदेशी पोशाक में फब रहे थे ।कदम बढ़ाने में उन्हें जो संकोच हो रहा था , [...]

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    मनुष्य की सामाजिक कसौटी,मनुष्य की पारस्परिकता में निहित है , नाते में निहित है । सुभाषचन्द्र बोस के साथ गांधीजी का सम्बन्ध एक ओर तीव्र मतभेदों का तो दूसरी ओर उत्कट प्रेम का , एक तरफ गांधीजी के नेतृत्व को चुनौती देने वाला तो दूसरी तरफ बतौर नेता गांधीजी के प्रति आदरभाव का था [...]

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    वैश्वीकरण के पैरोकार कई बार चीन का उदाहरण देते हैं । चीन ने अब माओ और साम्यवाद का रास्ता लगभग पूरी तरह छोड़ दिया है । ‘ बाजार समाजवाद ‘ की जो बात वह करता है , वह पूंजीवाद और वैश्वीकरण की राह ही है । चीन विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बनने के [...]

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 ६
    अमर्त्य सेन , जोसेफ स्टिगलिट्ज़ आदि कहते हैं कि साक्षरता , शिक्षा , स्वास्थ्य , तकनालाजी आदि पर सरकार पर्याप्त खर्च करे व ध्यान दे तो वैश्वीकरण की इस प्रक्रिया को मानवीय बनाया जा सकता है और सब लोग इसका लाभ उठा सकते हैं । जो लोग इस प्रक्रिया के शिकार होंगे , उनके [...]

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 ५
 गत प्रविष्टी से आगे :  ऊपर विदेशी कंपनियों की लूट के जो उदाहरण दिए हैं , उनका संबंध हमारे दो प्राकृतिक संसाधनों - पानी और खनिज - से है । प्राकृतिक संसाधनों का बाजार बनाना , उन पर से स्थानीय लोगों को बेदखल करना और देशी - विदेशी कंपनियों का नियंत्रण कायम करना , अमीर [...]

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    ” भारतीय अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्र विदेशी पूंजी के लिए खुले हैं । आप आएं और हमारे देश में निवेश करें । ” प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने १० अक्टूबर २००६ को लंदन में कहा । सचमुच ही , देश की अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र के सारे दरवाजे विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिए गए [...]

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    वैश्वीकरण की एक उपलब्धि के तौर पर यह प्रचारित किया जाता है कि भारत की विकास दर ७ - ८ प्रतिशत तक पहुँच गयी है , ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में इसे नौ व दस प्रतिशत तक पहुंचाया जाएगा । लेकिन यह विकास - दर बहुत भ्रामक है ।सबसे बड़ी बात तो यह है कि [...]

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गत प्रविष्टी से आगे :  खेती - किसानी के इस व्यापक तथा गहरे संकट के सन्दर्भ में सरकार की घोषणाएं व पैकेज इसलिए बेकार साबित हो रहे हैं कि वे किसानों की मुसीबत की असली जड़ में नहीं जाते हैं ।असली बात यह है कि भारत का किसान - बढ़ती लागत और उपज के घटते [...]

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    ( सुनील , राष्ट्रीय महामंत्री , समाजवादी जनपरिषद द्वारा लखनऊ विश्वविद्यालय में ‘अर्थ’ और ‘अमिट’ द्वारा आयोजित किशन पटनायक स्मृति व्याख्यान , १७ अक्टूबर २००६ )
    साथी किशन पटनायक आज हमारे बीच नहीं हैं । उनके निधन के दो वर्ष हो चुके हैं । लेकिन वह भारत के उन गिने - चुने चिंतकों में [...]

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