Posted on February 19, 2007 by अफ़लातून
करेक्शन्स कॉर्पोरेशन ऑफ़ अमेरिका (सी सी ए )
पिछली प्रविष्टी से आगे :कुप्रबन्ध और कलंक के इतिहास के बावजूद निजी जेल उद्योग की कंपनियों को नई जेलों के ठेके लगातार मिलते आए हैं। इनसे जुड़ी समस्याएं भी बदस्तूर जारी हैं ।आप्रवासी बन्दियों के वकील अब भी अपने मुवक्किलों से दुर्व्यवहार का मुद्दा उठाते हैं। इन [...]
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Posted on February 17, 2007 by अफ़लातून
[ कम्पनियों द्वारा संचालित जेलें ? जी , हाँ । इसकी कल्पना भी नहीं की थी। पत्रकार दीपा फर्नाण्डीज़ की ताजा किताब 'टार्गेटेड़' में ऐसी जेलों और उन कम्पनियों और जेल-उद्योग का तफ़सील से विवरण हैं । मैंने उनकी किताब के आधार पर लिखे गए एक लेख को हिन्दी में प्रस्तुत करने की उनसे और 'कॉर्पवॉच' नामक जाल-स्थल से [...]
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Posted on February 15, 2007 by अफ़लातून
साभार : -
संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी ने चेतावनी दी है कि अगले बीस वर्षों में दुनिया की दो तिहाई आबादी को पानी की किल्लत का सामना करना पड़ेगा.
संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन का कहना है कि दुनिया की आबादी जिस गति से बढ़ रही है, उससे दोगुनी दर से पानी की खपत बढ़ [...]
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Posted on February 13, 2007 by अफ़लातून
‘ हम निर्यात करेंगे तो हमारा विकास होगा ।’ मीडिया के लिए यह एक मंत्र है । विश्व बैंक से यह मंत्र आया है । हमारे विद्वानों में यह साहस नहीं है कि इस गलत धारणा को देश के दिमाग से हटाने की कोशिश करें । भारतीय अर्थनीति में निर्यात की भूमिका के बारे में [...]
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Posted on February 13, 2007 by अफ़लातून
[ सवालों के लिखित उत्तर जयप्रकाश नारायण ने 'सामयिक वार्ता' के लिए सितम्बर १९७७ के पहले सप्ताह में दिये ।निम्नलिखित सवाल-जवाब का स्रोत - सामयिक वार्ता , १६ सितम्बर,१९७७ है ।]
प्रश्न : आपके आन्दोलन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भारतीय मजदूर संघ ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ के साथ भाग लिया ।जनता पार्टी [...]
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Posted on February 12, 2007 by अफ़लातून
हम कह चुके हैं कि चीन में भारत की तुलना में बहुत ज्यादा विदेशी पूंजी का प्रवेश हो रहा है । चीन के एक निर्धारित इलाके में सघन रूप से पूंजीवादी विकास किया जा रहा है । वहाँ आधुनिक उद्योगों का विकास तीव्रता से हो रहा है । उसको देख कर चीन के औद्योगिक भविष्य के बारे [...]
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Posted on February 11, 2007 by अफ़लातून
राष्ट्र की सारी बचत राशि बैंकों और बीमा के पास जाती है । वहाँ हमारी राष्ट्रीय पूंजी संचित है । उस पर भी विदेशी कंपनियों को वर्चस्व चाहिए । इसलिए भाजपा सरकार कांग्रेस का समर्थन पाकर इससे संबंधित कानूनों को बदल रही है । पेटेंट कानून भी बदल रहा है । दुनिया से सीखकर नयी [...]
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Posted on February 10, 2007 by अफ़लातून
इतिहास की उथल – पुथल से , युद्ध – संधि , विकास और विद्रोह से राष्ट्रों का निर्माण तथा नवनिर्माण होता है । एक बहुत बड़े उथल – पुथल से भारतीय राष्ट्र का नवगठन १५ अगस्त १९४७ को हुआ । बीसवीं सदी के इस काल खण्ड में आज के अधिकांश विकासशील देशों का नये [...]
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Posted on February 9, 2007 by अफ़लातून
सब दल लेकर हैं खड़े , अपने – अपने जाल
हे साधो ! कुछ चेतिए , देश बड़ा बेहाल .(१)
हल्दी ,तुलसी , नीम के , बाद जूट पेटेण्ट
ये भारत की सम्पदा , वो ग्लोबल मर्चेण्ट.(२)
भारत बस बाजार है , विस्तृत और समग्र
सिर्फ मुनाफे के लिए,मल्टीनेशनल व्यग्र.(३)
सम्प्रभुता,गौरव कहाँ,कहाँ आत्मसम्मान
अजी छोड़िए, आइए, करना है उत्थान.(४)
- शिव कुमार ‘पराग’ [...]
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Posted on February 8, 2007 by अफ़लातून
गत प्रविष्टी से आगे : देश – रक्षा में हथियारों का प्रमुख स्थान नहीं । अगर आप राजनीतिमें , कूटनीति में , अर्थनीतिमें सब कुछ समर्पित करते जाएंगे , तो लड़ने के लिए क्या रह जाता है ? आप अपने उद्योगों को , खदानों को , व्यापार को , भूमि और बंदरगाहोंपर अधिकार को , [...]
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