[ रेखांकन- दिलीप चिंचालकर,'हमारा पर्यावरण',गां.शां.प्र. नईदिल्ली से साभार]
शर्मनाक सदी
भारत के सबसे ज्यादा पतन का समय था अठाहरहवीं शताब्दी का ।इसी शताब्दी में भारत की प्रत्यक्ष गुलामी शुरु हुई , और शताब्दी के अंत तक (१७९९, टीपू सुल्तान की पराजय) भारत के बहुत बड़े हिस्से पर अंग्रेजों का वर्चस्व स्थापित हो गया था । इस शर्मनाक [...]
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Posted in corporatisation on February 7, 2007 | 1 Comment »
साभार : BBC Hindi.com
वॉलमार्ट के अमरीका अकेले में 3400 स्टोर्स हैं
बुधवार, 07 फ़रवरी, 2007 को 02:47 GMT तक के समाचार
अमरीका की बड़ी रिटेल कंपनी वॉलमार्ट को लिंगभेद के लिए अपनी 15 लाख महिला कर्मचारियों को अरबों डॉलर के मुआवज़े का भुगतान करना पड़ सकता है.
वॉलमार्ट में काम करने वाली सात महिलाओं ने आरोप लगाया था [...]
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Posted in poem on February 4, 2007 | 2 Comments »
युद्ध : एक
हम चाहते हैं कि युद्ध न हों
मगर फौजें रहें
ताकि वे एक दूसरे से ज्यादा बर्बर
और सक्षम होती जायें कहर बरपाने में
हम चाहते हैं कि युद्ध न हों
मगर दुनिया हुकूमतों में बँटी रहे
जुटी रहे घृणा को महिमामण्डित करने में
हम चाहते हैं कि युद्ध न हों
मगर इस दुनिया को बदलना भी नहीं चाहते
हमारे जैसे लोग
भले [...]
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