Posted in judiciary, obc, reservation on March 29, 2007 | 4 Comments »
योगेन्द्र यादव
समाजशास्त्री
जो लोग आरक्षण को ख़ारिज करते हैं, वो तो हमेशा से सामाजिक न्याय के सवाल को भी ख़ारिज करते रहे हैं. ये वो लोग हैं जो कि हिंदुस्तान के मध्यम वर्ग को अन्य वर्गों के लिए कुछ भी छोड़ना पड़े, इस स्थिति के लिए तैयार नहीं हैं.
ये वे लोग हैं जिन्होंने न तो [...]
Read Full Post »
Technorati tags: sez, nandigram
पश्चिम बंग सरकार की शासक पार्टी के छात्र सँगठन एस.एफ.आई. के एक कार्यक्रम मेँ मुख्यमन्त्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने घोषित किया है कि
(१)नन्दीग्राम मेँ विशेष आर्थिक क्षेत्र नहीँ बनेगा |पश्चिम बंग में कहीं और इसे स्थानान्तरित करने की सम्भावना है |जुल्म और जुल्म का विरोध भी स्थानान्तरित होंगे,उम्मीद है |मुख्यमन्त्री ने अब [...]
Read Full Post »
Technorati tags: india shining, growth, fdi, sez
विकास दर के आँकड़े कितने भ्रामक हो सकते हैं , विकास के दावे कितने खोखले हो सकते हैं , वैश्वीकरण की व्यवस्था कितनी विसंगतिपूर्ण हो सकती है , यह आज जितना स्पष्ट हो गया है , उतना शायद पहले कभी नहीं था । भारत सरकार बड़े गर्व से [...]
Read Full Post »
Technorati tags: sez, nandigram, sjp
[इन्डोनेशिया के सालेम ग्रुप द्वारा नन्दीग्राम में विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाने की योजना का क्षेत्रीय किसान और बटाईदार विरोध कर रहे हैं।नन्दीग्राम का विधान-सभा में प्रतिनिधित्व भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का है।बंगाल में पंचायती राज में दलीय आधार पर चुनाव लड़ा जाता है और नन्दीग्राम के प्रखण्ड स्तर के प्रतिनिधियों में(वार्ड सदस्य,ग्राम-प्रधान,ब्लॉक [...]
Read Full Post »
Posted in consumerism on March 22, 2007 | 1 Comment »
पिछली प्रविष्टी से आगे
Technorati tags: consumerist culture, sachchidanand sinha
कम्युनिस्ट देश और उपभोक्तावाद
उपभोक्तावादी संस्कृति का कुछ ऐसा ही प्रभाव कम्युनिस्ट देशों पर भी पड़ रहा है । बोल्शेविक क्रान्ति के प्रारम्भिक दिनों में जब गृहयुद्ध चल रहा था , रूस में समता की एक जबरदस्त धारा थी जिसे ‘युद्ध साम्यवाद’ के नाम से सम्बोधित किया [...]
Read Full Post »
Posted in consumerism on March 20, 2007 | No Comments »
Technorati tags: consumerist culture, sachchidanand sinha
गत प्रविष्टी से आगे :
भारत और उपभोक्तावादी संस्कृति
विकसित पूँजीवादी देशों में , जैसा कि ऊपर कहा गया है , उपभोक्तावादी संस्कृति उत्पादन प्रक्रिया को बिना पूँजीवादी मूल्यों और ढाँचे को तोड़े चालू रखने और विकसित करने में सहायक होती है । लेकिन तीसरी दुनिया के देशों में इस [...]
Read Full Post »
Posted in consumerism on March 14, 2007 | No Comments »
पिछली प्रविष्टी से आगे :
Technorati tags: consumerist culture, sachchidanand sinha
इस उपभोक्तावादी दबाव ने मानव भविष्य की समाजवादी कल्पना की जड़ ही खतम कर दी है। मार्क्स तथा अन्य समाजवादियों की यह अवधारणा थी कि भविष्य में समाज में उत्पादन का स्तर इतना ऊँचा उठ जायेगा कि मानव आवश्यकता की वस्तुएँ उसी तरह उपलब्ध हो [...]
Read Full Post »
Posted in consumerism on March 12, 2007 | No Comments »
Technorati tags: consumerist culture, sachchidanand sinha
गत प्रविष्टी से आगे :
पूँजीवाद के संकट को टालने का औजार
पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली से उपजी यह उपभोक्तावादी संस्कृति पूँजीवाद के संकट को टालने का भी सबसे कारगर औजार है । ऊपर इस बात की चर्चा की गयी है कि कैसे यह संस्कृति मजदूर वर्ग की वर्ग - चेतना [...]
Read Full Post »
Posted in consumerism on March 11, 2007 | No Comments »
Technorati tags: consumerist culture, sachchidanand sinha
पिछली प्रविष्टी से आगे
आदमी का अकेलापन
आदमी के अस्तित्व की सबसे बड़ी असलियत संसार में उसका अकेलापन है । हमारा क्या होता है , हम जीते हैं या मरते हैं , खुशियाँ मनाते हैं या पीड़ा में कराहते हैं इसका कोई प्रभाव सृष्टि पर नहीं पड़ता । सूरज , तारे [...]
Read Full Post »
Posted in consumerism on March 10, 2007 | 2 Comments »
Technorati tags: consumerist culture, sachchidanand sinha
पिछली प्रविष्टी से आगे :
वस्तुओं को जमा करने की लत
पहले उत्सवों में आनन्द के लिए शराब पी जाती थी । अब जीवन की नीरसता और ऊब से छुटकारे के लिए शराब पी जाती है । इस तरह उन समूहों में जिनका काम सबसे नीरस है या जिन्दगी अर्थहीन बन [...]
Read Full Post »