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	<title>Comments on: मेरी चिट्ठाकारी और उसका भविष्य</title>
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	<description>वैश्वीकरण विरोध हेतु</description>
	<pubDate>Fri, 16 May 2008 20:05:02 +0000</pubDate>
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		<title>By: Jitu</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/03/02/hindi-blogging-alternative-media/#comment-102</link>
		<dc:creator>Jitu</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 05 Mar 2007 17:16:48 +0000</pubDate>
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		<description>आपके सवालों के जवाब तो बहुत अच्छे लगे भई।

मेरे विचार से अफलातून जी से मेरी पहचान शायद परिचर्चा के दौरान हुई थी, अव्वल तो अमित ने मेरे से पूछा भई ये अफलातून है कोई रजिस्टर किए है, क्या करें, हमने कहा, कि भई आने दो, अभी तो बहुत सारे अफ़लातून आएंगे, बहुत हातिमताई आएंगे।

धीरे धीरे पता चले कि आपका ब्लॉग भी है, अनूप को हमने पता दिया, अनूप बोले नारद पर जोड़ो, हमारे बचपन के मित्र है। फिर एक दिन अचानक, गूगल चैट पर अफलातून जी को पाया। उसके बाद से आज तक, ऐसा कोई दिन नही गुज़रता, जिसमे एक बार बात ना हो। अफलातून जी एक बात मै कहना चाहूंगा कि इतने बुजुर्गवार होने के बावजूद भी उनमे नयी चीजे सीखने की ललक है, कुछ नया करने का उत्साह है। इनकी टिप्पणियां भी काफी प्रेरणादायक होती है। कुल मिलाकर अफलातून जी के रुप मे हिन्दी चिट्ठाजगत को एक मैच्योर चिट्ठाकार मिला है, जिसकी विषय पर मजबूत पकड़ है और जो मुद्दों को गम्भीरता से उठाता है।

हिन्दी चिट्ठाजगत मे जितने भी नए नए लोग जुड़ते जाएंगे, उतना ही इसका रुप विस्तृत होता जाएगा। हर विचारधारा के लोग आएंगे, तब शायद हम सभी के नाम भी ना याद रख सकें, लेकिन हाँ कम से कम पुराने चिट्ठों को पढकर जरुर कहा करेंगे, कितना सामन्जस्य और सहजता थी इन पुराने चिट्ठाकारों में।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपके सवालों के जवाब तो बहुत अच्छे लगे भई।</p>
<p>मेरे विचार से अफलातून जी से मेरी पहचान शायद परिचर्चा के दौरान हुई थी, अव्वल तो अमित ने मेरे से पूछा भई ये अफलातून है कोई रजिस्टर किए है, क्या करें, हमने कहा, कि भई आने दो, अभी तो बहुत सारे अफ़लातून आएंगे, बहुत हातिमताई आएंगे।</p>
<p>धीरे धीरे पता चले कि आपका ब्लॉग भी है, अनूप को हमने पता दिया, अनूप बोले नारद पर जोड़ो, हमारे बचपन के मित्र है। फिर एक दिन अचानक, गूगल चैट पर अफलातून जी को पाया। उसके बाद से आज तक, ऐसा कोई दिन नही गुज़रता, जिसमे एक बार बात ना हो। अफलातून जी एक बात मै कहना चाहूंगा कि इतने बुजुर्गवार होने के बावजूद भी उनमे नयी चीजे सीखने की ललक है, कुछ नया करने का उत्साह है। इनकी टिप्पणियां भी काफी प्रेरणादायक होती है। कुल मिलाकर अफलातून जी के रुप मे हिन्दी चिट्ठाजगत को एक मैच्योर चिट्ठाकार मिला है, जिसकी विषय पर मजबूत पकड़ है और जो मुद्दों को गम्भीरता से उठाता है।</p>
<p>हिन्दी चिट्ठाजगत मे जितने भी नए नए लोग जुड़ते जाएंगे, उतना ही इसका रुप विस्तृत होता जाएगा। हर विचारधारा के लोग आएंगे, तब शायद हम सभी के नाम भी ना याद रख सकें, लेकिन हाँ कम से कम पुराने चिट्ठों को पढकर जरुर कहा करेंगे, कितना सामन्जस्य और सहजता थी इन पुराने चिट्ठाकारों में।</p>
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		<title>By: Debashish</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/03/02/hindi-blogging-alternative-media/#comment-98</link>
		<dc:creator>Debashish</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 04 Mar 2007 17:34:05 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत अच्छा लगा पढ़कर! संजाल का पाठक-वर्ग अभी वाकई अभिजात्य है और यह असत्य तभीस ाबित होगा जब हिन्दी के मुख्यधारा के मीडिया की नज़र में चिट्ठाकारी को महत्व मिलेगा और यहाँ उठाये मुद्दे वहाँ भी कुछ लहर पैदा करेंगे। कम से कम शुरुवाती दौर में तो यह ज़रूरी है ताकि नये लोग इस विधा से जुड़ें। जब क्रिटिकल मास बनेगा और चिट्ठाकारी क्लासेस से मासेस तक पहुँचेगी। पर सच कहूं तो अब भी लगता है कि दिल्ली काफी दूर है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत अच्छा लगा पढ़कर! संजाल का पाठक-वर्ग अभी वाकई अभिजात्य है और यह असत्य तभीस ाबित होगा जब हिन्दी के मुख्यधारा के मीडिया की नज़र में चिट्ठाकारी को महत्व मिलेगा और यहाँ उठाये मुद्दे वहाँ भी कुछ लहर पैदा करेंगे। कम से कम शुरुवाती दौर में तो यह ज़रूरी है ताकि नये लोग इस विधा से जुड़ें। जब क्रिटिकल मास बनेगा और चिट्ठाकारी क्लासेस से मासेस तक पहुँचेगी। पर सच कहूं तो अब भी लगता है कि दिल्ली काफी दूर है।</p>
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	<item>
		<title>By: DR PRABHAT TANDON</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/03/02/hindi-blogging-alternative-media/#comment-97</link>
		<dc:creator>DR PRABHAT TANDON</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 04 Mar 2007 15:58:49 +0000</pubDate>
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		<description>हाँ, चिट्ठाकारी और सामान्य जीवन मे संतुलन बनाना बहुत ही आवशयक है, मुझे भी अब लगने लगा है कि चिट्ठाकारी का एक निशिचित समय सीमा ही रख कर संतुलन बना सकते हैं,।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हाँ, चिट्ठाकारी और सामान्य जीवन मे संतुलन बनाना बहुत ही आवशयक है, मुझे भी अब लगने लगा है कि चिट्ठाकारी का एक निशिचित समय सीमा ही रख कर संतुलन बना सकते हैं,।</p>
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		<title>By: श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/03/02/hindi-blogging-alternative-media/#comment-96</link>
		<dc:creator>श्रीश शर्मा 'ई-पंडित'</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 03 Mar 2007 06:08:18 +0000</pubDate>
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		<description>हिन्दी टाइपिंग संबंधी आपके बातों से सहमत हूँ। लोगों के मन से यह वहम निकालना बड़ा मुश्किल है कि हिन्दी पढ़ना लिखना मुश्किल काम है। इसीलिए मैं इस बारे में सरल से सरल लेख लिखता रहता हूँ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हिन्दी टाइपिंग संबंधी आपके बातों से सहमत हूँ। लोगों के मन से यह वहम निकालना बड़ा मुश्किल है कि हिन्दी पढ़ना लिखना मुश्किल काम है। इसीलिए मैं इस बारे में सरल से सरल लेख लिखता रहता हूँ।</p>
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		<title>By: मनीष</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/03/02/hindi-blogging-alternative-media/#comment-95</link>
		<dc:creator>मनीष</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 Mar 2007 18:54:29 +0000</pubDate>
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		<description>अच्छा लगा आपके बारे में जानकर !</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अच्छा लगा आपके बारे में जानकर !</p>
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	<item>
		<title>By: PRAMENDRA PRATAP SINGH</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/03/02/hindi-blogging-alternative-media/#comment-93</link>
		<dc:creator>PRAMENDRA PRATAP SINGH</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 Mar 2007 13:10:27 +0000</pubDate>
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		<description>सब कुछ पढ़कर बहुत अच्‍छा लगा, आपकी टिप्‍पणी प्राप्‍त हुई, आप मेरे सम्‍माननीय है, मैने ही आपको सूचना नही दिया था, अन्‍यथा आप मेरे प्रश्‍नों के भी उत्‍तर देते मै भी आपका क्षमा प्रार्थी हूँ। 

एक दो दिन पूर्व मै अत्‍यनत व्‍यस्‍त कार्यक्रम से वाराणसी गया था, शायद भाग्‍य मे नही था आपसे मिलना, फिर कभी आना हुआ तो जरूर आपसे मिलूँगा। आप भी प्रयाग आइयेगा तो जरूर मिलियेगा, मुझे आपसे मिलने की हार्दिक इच्छा है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सब कुछ पढ़कर बहुत अच्‍छा लगा, आपकी टिप्‍पणी प्राप्‍त हुई, आप मेरे सम्‍माननीय है, मैने ही आपको सूचना नही दिया था, अन्‍यथा आप मेरे प्रश्‍नों के भी उत्‍तर देते मै भी आपका क्षमा प्रार्थी हूँ। </p>
<p>एक दो दिन पूर्व मै अत्‍यनत व्‍यस्‍त कार्यक्रम से वाराणसी गया था, शायद भाग्‍य मे नही था आपसे मिलना, फिर कभी आना हुआ तो जरूर आपसे मिलूँगा। आप भी प्रयाग आइयेगा तो जरूर मिलियेगा, मुझे आपसे मिलने की हार्दिक इच्छा है।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: anunad</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/03/02/hindi-blogging-alternative-media/#comment-92</link>
		<dc:creator>anunad</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 Mar 2007 12:37:35 +0000</pubDate>
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		<description>आपके बारे में कुछ विस्तार से जानकर मन में फिर वही पुराना सवाल जाग उठा, "आप इतनी सारी चीजें कैसे कर पाते हैं? शायद गांधीजी और लोहिया जी की प्रेरणा से? अपने विचार इसी तरह व्यक्त करते रहिये; बहुत से विचारों के टक्कर (सम्मिश्रण) से ही उत्कृष्ट विचार जन्म लेते हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपके बारे में कुछ विस्तार से जानकर मन में फिर वही पुराना सवाल जाग उठा, &#8220;आप इतनी सारी चीजें कैसे कर पाते हैं? शायद गांधीजी और लोहिया जी की प्रेरणा से? अपने विचार इसी तरह व्यक्त करते रहिये; बहुत से विचारों के टक्कर (सम्मिश्रण) से ही उत्कृष्ट विचार जन्म लेते हैं।</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/03/02/hindi-blogging-alternative-media/#comment-91</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 Mar 2007 11:44:15 +0000</pubDate>
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		<description>"अपने खेतों में जो निपटते हैं,वे दूसरे के खेतॊं में भी जैविक खाद छोड़ने के माहिर हैं ।" 

अद्भुत वाक्य है. यह आप ही लिख सकते थे. 

जिन लेखकों का आपने जिक्र किया उनमें सभी को पढ़ने का सौभाग्य मिला है.पर राजेन्द्र राजन को मैंने आपके माध्यम से जाना. इतने अच्छे कवि हैं और आश्चर्य कि मैं अब तक उनसे अपरिचित था. 

मैं समझता था चूंकि कविता में रुचि है और अधिकांश पत्रिकाएं खंगालता रहता हूं अतः लगभग-लगभग सभी महत्वपूर्ण हिंदी कवियों से थोड़ा-बहुत परिचित हूं. मेरी अहमन्यता दूर हुई है. और यह स्वीकारने में कोई शर्म नहीं है कि इतने बेहतरीन कवि को मैंने आपके जरिये जाना है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;अपने खेतों में जो निपटते हैं,वे दूसरे के खेतॊं में भी जैविक खाद छोड़ने के माहिर हैं ।&#8221; </p>
<p>अद्भुत वाक्य है. यह आप ही लिख सकते थे. </p>
<p>जिन लेखकों का आपने जिक्र किया उनमें सभी को पढ़ने का सौभाग्य मिला है.पर राजेन्द्र राजन को मैंने आपके माध्यम से जाना. इतने अच्छे कवि हैं और आश्चर्य कि मैं अब तक उनसे अपरिचित था. </p>
<p>मैं समझता था चूंकि कविता में रुचि है और अधिकांश पत्रिकाएं खंगालता रहता हूं अतः लगभग-लगभग सभी महत्वपूर्ण हिंदी कवियों से थोड़ा-बहुत परिचित हूं. मेरी अहमन्यता दूर हुई है. और यह स्वीकारने में कोई शर्म नहीं है कि इतने बेहतरीन कवि को मैंने आपके जरिये जाना है.</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: अनूप शुक्ला</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/03/02/hindi-blogging-alternative-media/#comment-90</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 Mar 2007 10:44:50 +0000</pubDate>
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		<description>अरे हां कविता की तारीफ़ करना हम भूल ही गये। अच्छी लगी खासकर ये लाइनें:-

&lt;b&gt;कमजोरी है-/ कविता को,/ प्यार को / अघोषित काले पैसे की तरह-/ दबाने में, छिपाने में ।&lt;/b&gt;</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अरे हां कविता की तारीफ़ करना हम भूल ही गये। अच्छी लगी खासकर ये लाइनें:-</p>
<p><b>कमजोरी है-/ कविता को,/ प्यार को / अघोषित काले पैसे की तरह-/ दबाने में, छिपाने में ।</b></p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: गिरिराज जोशी "कविराज"</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/03/02/hindi-blogging-alternative-media/#comment-89</link>
		<dc:creator>गिरिराज जोशी "कविराज"</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 Mar 2007 10:43:07 +0000</pubDate>
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		<description>अफ़लातूनजी, आपकी यह उत्तर पुस्तिका शानदार हैं...

पता नहीं क्यूँ मगर आपकी इस पुस्तिका से आभास हो रहा है कि आपका परिवार (पत्नि और बेटी के अलावा आपके साथीगण भी) आपके चिट्ठालेखन से खुश नहीं है, फिर भी आपका चिट्ठालेखन निरंतर जारी है।

चिट्ठा-प्रेम का काव्य-रूप भी अच्छा लगा और आपका वृतचित्रों को 'डाकू मंत्री' बताने वाला वाक्य मजेदार लगा...</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अफ़लातूनजी, आपकी यह उत्तर पुस्तिका शानदार हैं&#8230;</p>
<p>पता नहीं क्यूँ मगर आपकी इस पुस्तिका से आभास हो रहा है कि आपका परिवार (पत्नि और बेटी के अलावा आपके साथीगण भी) आपके चिट्ठालेखन से खुश नहीं है, फिर भी आपका चिट्ठालेखन निरंतर जारी है।</p>
<p>चिट्ठा-प्रेम का काव्य-रूप भी अच्छा लगा और आपका वृतचित्रों को &#8216;डाकू मंत्री&#8217; बताने वाला वाक्य मजेदार लगा&#8230;</p>
]]></content:encoded>
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