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	<title>Comments on: राजनीति में मूल्य : किशन पटनायक</title>
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	<description>वैश्वीकरण विरोध हेतु</description>
	<pubDate>Wed, 23 Jul 2008 17:14:58 +0000</pubDate>
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		<title>By: ghughutibasuti</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/02/value_basedpoliticskishan-patanayak/#comment-159</link>
		<dc:creator>ghughutibasuti</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Apr 2007 19:25:11 +0000</pubDate>
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		<description>लेख बहुत अच्छा लगा। मैं आम तौर पर राजनैतिक लेख नहीं पढ़ती। क्योंकि समाचार पत्रों में भी वही पढ़ती हूँ । 
सत्ता हो या किसी भी अन्य प्रकार की शक्ति, उस पर कोई न कोई लगाम आवश्यक है। पूर्ण शक्ति अच्छे से अच्छे व्यक्ति को अंधा बना देती है। शायद अमेरिका की तरह भारत में भी एक अवधि तक ही किसी भी राजनेता को शासन करने की अनुमति होनी चाहिये।
घुघूती बासूती</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>लेख बहुत अच्छा लगा। मैं आम तौर पर राजनैतिक लेख नहीं पढ़ती। क्योंकि समाचार पत्रों में भी वही पढ़ती हूँ ।<br />
सत्ता हो या किसी भी अन्य प्रकार की शक्ति, उस पर कोई न कोई लगाम आवश्यक है। पूर्ण शक्ति अच्छे से अच्छे व्यक्ति को अंधा बना देती है। शायद अमेरिका की तरह भारत में भी एक अवधि तक ही किसी भी राजनेता को शासन करने की अनुमति होनी चाहिये।<br />
घुघूती बासूती</p>
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		<title>By: PRAMENDRA PRATAP SIN</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/02/value_basedpoliticskishan-patanayak/#comment-156</link>
		<dc:creator>PRAMENDRA PRATAP SIN</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Apr 2007 03:04:02 +0000</pubDate>
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		<description>आपका यह लेख सत्‍य मे बहुत ही प्रेरण प्रद रहा है। मैने इसे पढने मे देरी की इसके लिये क्षमा चाहता हूँ। 

आपने इस लेख मे जो बाते प्रकट की है वह वास्‍तव मे सही है। यह त्‍थ्‍य राजनीति के ही सम्‍बल्‍ध मे नही अपितु सभी क्षेत्रों मे लागू होती है। 

सत्‍य मे सत्‍ता का सुख एक सीमित समय तक भोग कर इसकी बाग डोर नये हाथों मे दे देना उचित है। आपके इस लेख के प्रति कोई दो राय नही है। 

पर आपसे आशा है कि आप अपने कथन 
यहाँ तक कि भारतीय जनता  पार्टी ( जनसंघ ) ने एक बार अपने को ‘ गांधीवादी समाजवादी ‘ घोषित कर दिया था ।

की विवेचना अगले लेख मे करेंगें।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आपका यह लेख सत्‍य मे बहुत ही प्रेरण प्रद रहा है। मैने इसे पढने मे देरी की इसके लिये क्षमा चाहता हूँ। </p>
<p>आपने इस लेख मे जो बाते प्रकट की है वह वास्‍तव मे सही है। यह त्‍थ्‍य राजनीति के ही सम्‍बल्‍ध मे नही अपितु सभी क्षेत्रों मे लागू होती है। </p>
<p>सत्‍य मे सत्‍ता का सुख एक सीमित समय तक भोग कर इसकी बाग डोर नये हाथों मे दे देना उचित है। आपके इस लेख के प्रति कोई दो राय नही है। </p>
<p>पर आपसे आशा है कि आप अपने कथन<br />
यहाँ तक कि भारतीय जनता  पार्टी ( जनसंघ ) ने एक बार अपने को ‘ गांधीवादी समाजवादी ‘ घोषित कर दिया था ।</p>
<p>की विवेचना अगले लेख मे करेंगें।</p>
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	<item>
		<title>By: अभय तिवारी</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/02/value_basedpoliticskishan-patanayak/#comment-155</link>
		<dc:creator>अभय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 03 Apr 2007 11:42:21 +0000</pubDate>
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		<description>अच्छा विचारोत्तेजक लेख है.. अगर लेखक किशन पटनायक के बारे में एक छोटा परिचय स्केच भी होता तो अच्छा रहता.. लेख पढ़ते पढ़ते उनके बारे में और जानने की जिज्ञासा हुई.. खोजूंगा अन्तरजाल पर.. शायद मिल जाय..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अच्छा विचारोत्तेजक लेख है.. अगर लेखक किशन पटनायक के बारे में एक छोटा परिचय स्केच भी होता तो अच्छा रहता.. लेख पढ़ते पढ़ते उनके बारे में और जानने की जिज्ञासा हुई.. खोजूंगा अन्तरजाल पर.. शायद मिल जाय..</p>
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	<item>
		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/02/value_basedpoliticskishan-patanayak/#comment-154</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 03 Apr 2007 08:36:20 +0000</pubDate>
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		<description>देशज भाव-भूमि पर मज़बूती से कदम जमाए कितने विचारशील,ईमानदार और खरे चिंतक थे किशन जी . कितने सहज और सरल ढंग से उन्होंने देश की राजनीति के स्खलन को समझाया है . मूल्यहीनता के इस युग में भी वे पराक्रम और मानवीय मूल्यों के संयोग की बात कर सकते थे . शायद इसलिए कि वे स्वयं उसके मूर्तिमान उदाहरण थे . मूल्यहीनता के इस धुंधलके और अंधियारे समय में 'सैनिटी' और 'एथिक्स' की आवाज़ बन कर -- मज़लूमों की समझदारी और उनकी नैतिक शक्ति पर भरोसा जता कर आप किशन जी की परम्परा को ही आगे बढ़ा रहे हैं .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>देशज भाव-भूमि पर मज़बूती से कदम जमाए कितने विचारशील,ईमानदार और खरे चिंतक थे किशन जी . कितने सहज और सरल ढंग से उन्होंने देश की राजनीति के स्खलन को समझाया है . मूल्यहीनता के इस युग में भी वे पराक्रम और मानवीय मूल्यों के संयोग की बात कर सकते थे . शायद इसलिए कि वे स्वयं उसके मूर्तिमान उदाहरण थे . मूल्यहीनता के इस धुंधलके और अंधियारे समय में &#8216;सैनिटी&#8217; और &#8216;एथिक्स&#8217; की आवाज़ बन कर &#8212; मज़लूमों की समझदारी और उनकी नैतिक शक्ति पर भरोसा जता कर आप किशन जी की परम्परा को ही आगे बढ़ा रहे हैं .</p>
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		<title>By: अनूप शुक्ला</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/02/value_basedpoliticskishan-patanayak/#comment-153</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 03 Apr 2007 02:07:28 +0000</pubDate>
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		<description>यह लेख बहुत अच्छा लगा! धन्यवाद इसे पढ़ाने के लिये!&lt;b&gt;जनसाधारण पहले पराक्रम को देखता है , बाद में नैतिकता को । &lt;/b&gt; सही लगा!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>यह लेख बहुत अच्छा लगा! धन्यवाद इसे पढ़ाने के लिये!<b>जनसाधारण पहले पराक्रम को देखता है , बाद में नैतिकता को । </b> सही लगा!</p>
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