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	<title>Comments on: राजनीति में मूल्य (शेष भाग) : किशन पटनायक</title>
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	<description>वैश्वीकरण विरोध हेतु</description>
	<pubDate>Sat, 11 Oct 2008 23:10:24 +0000</pubDate>
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		<title>By: सृजन शिल्पी</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/04/value-based-politics-kishan-patanayak/#comment-160</link>
		<dc:creator>सृजन शिल्पी</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 06 Apr 2007 07:21:43 +0000</pubDate>
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		<description>इस लेख के दोनों भाग बहुत ध्यान से पढ़े। फ्रांसिस बेकन के शब्दों में कहें तो एक-एक शब्द चबा-चबा कर पचा गया। राजनीतिक यथार्थ का इतना स्पष्ट और सटीक विश्लेषण बहुत कम देखने को मिला है। किशन जी ही इतनी सूक्ष्मता और स्पष्टता से चीजों को समझ और परख सकते थे। 

समकालीन बुद्धिजीवियों में से कइयों को करीब से जानता हूं जो चुनावों के दौरान चैनलों पर पैनल चर्चा के लिए शोभायमान रहते हैं। किशन जी ने बहुत सही कहा है कि &lt;blockquote&gt;"मूल्यों और दिशाओं का प्रवर्तन बुद्धिजीवी करते हैं - तब करते हैं जब वे या तो सत्य की खोज करते हैं या लोक के प्रति अपने को उत्तरदायी समझते हैं । एक छोटे समूह के द्वारा संगठित-प्रचार होकर ये मूल्य जनसाधारण का समर्थन प्राप्त करते हैं और व्यापक समाज में हलचल पैदा करते हैं।"&lt;/blockquote&gt;

जिन्हें आधुनिक शब्दावली में बुद्धिजीवी कहा जाता है, प्राचीन शब्दावली में उसे 'ब्राह्मण' कहा जाता था। चाणक्य कहते थे कि जिस देश में एक भी ब्राह्मण जीवित हो, वह देश कभी गुलाम नहीं हो सकता। और इस बात को उन्होंने साबित करके दिखा दिया। उन्होंने अकेले सिकंदर के मनसूबों पर पानी फेर दिया और भारत को यूनान का गुलाम होने से बचा लिया। वरना भारत सवा दो हजार साल पहले ही गुलाम बन चुका होता। उनके बाद उस अर्थ में भारत में अब तक मुश्किल से गिने-चुने 'ब्राह्मण' हुए। यदि एक भी ब्राह्मण देश में रहा होता तो निश्चय ही भारत मुगलों और अंग्रेजों का गुलाम नहीं बना होता। यह भारत माता का सौभाग्य रहा कि इस देश में हजारों वर्षों के बाद एक साथ कई ब्राह्मण पैदा हुए। जैसा कि गांधीजी के बारे में ओशो कहते थे, &lt;b&gt;"धरती जब हजार वर्ष तपश्चर्या करती है तो गांधी जैसा एक इन्सान पैदा होता है"।&lt;/b&gt;
चाणक्य जिसे 'ब्राह्मण' कहते थे और किशन जी जिसे 'बुद्धिजीवी' कहते हैं, यदि उसमें स्वार्थपरता और सुविधाजीविता का जंग न लगे तो वाकई वह राजनीति, धर्म, शासन, अर्थ आदि सभी क्षेत्रों में अभूतपूर्व परिवर्तन लाने में सफल हो सकता है। लेकिन ऐसे ब्राह्मण या बुद्धिजीवी कितने हैं आज? ऐसा कौन है जो आज बाजार, सत्ता या लोकेषणा के दबाव में झुकने को तैयार नहीं है, जो चाणक्य या गांधी जैसा निस्पृह और निरीह निजी जीवन को तैयार है? शायद कुछ हैं अब भी, लेकिन उनमें भी वह पराक्रम दिखाई नहीं देता जिसके बिना ब्राह्मण या बुद्धिजीवी नपुंसक जैसा होता है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इस लेख के दोनों भाग बहुत ध्यान से पढ़े। फ्रांसिस बेकन के शब्दों में कहें तो एक-एक शब्द चबा-चबा कर पचा गया। राजनीतिक यथार्थ का इतना स्पष्ट और सटीक विश्लेषण बहुत कम देखने को मिला है। किशन जी ही इतनी सूक्ष्मता और स्पष्टता से चीजों को समझ और परख सकते थे। </p>
<p>समकालीन बुद्धिजीवियों में से कइयों को करीब से जानता हूं जो चुनावों के दौरान चैनलों पर पैनल चर्चा के लिए शोभायमान रहते हैं। किशन जी ने बहुत सही कहा है कि<br />
<blockquote>&#8220;मूल्यों और दिशाओं का प्रवर्तन बुद्धिजीवी करते हैं - तब करते हैं जब वे या तो सत्य की खोज करते हैं या लोक के प्रति अपने को उत्तरदायी समझते हैं । एक छोटे समूह के द्वारा संगठित-प्रचार होकर ये मूल्य जनसाधारण का समर्थन प्राप्त करते हैं और व्यापक समाज में हलचल पैदा करते हैं।&#8221;</p></blockquote>
<p>जिन्हें आधुनिक शब्दावली में बुद्धिजीवी कहा जाता है, प्राचीन शब्दावली में उसे &#8216;ब्राह्मण&#8217; कहा जाता था। चाणक्य कहते थे कि जिस देश में एक भी ब्राह्मण जीवित हो, वह देश कभी गुलाम नहीं हो सकता। और इस बात को उन्होंने साबित करके दिखा दिया। उन्होंने अकेले सिकंदर के मनसूबों पर पानी फेर दिया और भारत को यूनान का गुलाम होने से बचा लिया। वरना भारत सवा दो हजार साल पहले ही गुलाम बन चुका होता। उनके बाद उस अर्थ में भारत में अब तक मुश्किल से गिने-चुने &#8216;ब्राह्मण&#8217; हुए। यदि एक भी ब्राह्मण देश में रहा होता तो निश्चय ही भारत मुगलों और अंग्रेजों का गुलाम नहीं बना होता। यह भारत माता का सौभाग्य रहा कि इस देश में हजारों वर्षों के बाद एक साथ कई ब्राह्मण पैदा हुए। जैसा कि गांधीजी के बारे में ओशो कहते थे, <b>&#8220;धरती जब हजार वर्ष तपश्चर्या करती है तो गांधी जैसा एक इन्सान पैदा होता है&#8221;।</b><br />
चाणक्य जिसे &#8216;ब्राह्मण&#8217; कहते थे और किशन जी जिसे &#8216;बुद्धिजीवी&#8217; कहते हैं, यदि उसमें स्वार्थपरता और सुविधाजीविता का जंग न लगे तो वाकई वह राजनीति, धर्म, शासन, अर्थ आदि सभी क्षेत्रों में अभूतपूर्व परिवर्तन लाने में सफल हो सकता है। लेकिन ऐसे ब्राह्मण या बुद्धिजीवी कितने हैं आज? ऐसा कौन है जो आज बाजार, सत्ता या लोकेषणा के दबाव में झुकने को तैयार नहीं है, जो चाणक्य या गांधी जैसा निस्पृह और निरीह निजी जीवन को तैयार है? शायद कुछ हैं अब भी, लेकिन उनमें भी वह पराक्रम दिखाई नहीं देता जिसके बिना ब्राह्मण या बुद्धिजीवी नपुंसक जैसा होता है।</p>
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		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/04/value-based-politics-kishan-patanayak/#comment-158</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Apr 2007 07:20:35 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत सही लिखा है कि १९६७ से १९९७ के बीच समाजवादी जहां सत्ता-भोग के चक्कर में जनाधार बढ़ाने की बात भूल गए वहीं भाजपा ने इस समय का इस्तेमाल जनाधार बढाने में किया . नतीज़ा सामने है .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत सही लिखा है कि १९६७ से १९९७ के बीच समाजवादी जहां सत्ता-भोग के चक्कर में जनाधार बढ़ाने की बात भूल गए वहीं भाजपा ने इस समय का इस्तेमाल जनाधार बढाने में किया . नतीज़ा सामने है .</p>
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		<title>By: PRAMENDRA PRATAP SINGH</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/04/04/value-based-politics-kishan-patanayak/#comment-157</link>
		<dc:creator>PRAMENDRA PRATAP SINGH</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 04 Apr 2007 06:42:09 +0000</pubDate>
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		<description>जनसाधारण से आपका तात्‍पर्य अगर आम आदमी है तो मै आपके इस इस राय स सहमत नही हूँ कि जन साधारण को अस्थितरता पंसद नही है। 
अगर ऐसा होता तो देश की जनता 840 से ज्‍यादा राजनैतिक दलों के बीच न नाच रही होती। आज की जनता स्‍थाईत्‍व नही अपितु अपनी महत्‍वाकांक्षा को लेकर चलती है। 
इसी पाटियों को वोट देने से क्‍या लाभ जो 403 सीटों मे 10 से लेकर 50 सीटों से भी कम लड़ते है उनके जीतने से क्‍या स्‍थाईत्‍व आयेगी? पर जनता यह समझने को तैयार नही है। 1991 के कल्‍याण सिंह की सरकार के बाद कोई सरकार स्‍वा बहुमत प्राप्‍त करके नही बनी है। जब जनता स्‍वयं इस प्रकार का जनादेश देती है तो राजनैतिक दलों को दोष देना कहॉं तक उचित है।

बात रही भा ज पा के चुनाव धोषण पत्र की तो क्‍या आज तक जिनती सरकारे आई है उन्‍होने ने जनता से किये वायदे पूरे किये है। जब अन्‍य पार्टियों के साथ यह प्रश्‍न नही तो भाजपा से ही क्‍यों?

जनता ने 1998 मे जो खण्डित जनादेश दिया था उसमे सरकार ने कार्यकल पूरा किया वही सरकार की सबसे बड़ी उपलब्‍धी थी। जिस प्रकार आम आदमी अपनी मत्‍वकांक्षा लेकर वोट करता है उसी प्रकार छोटी पार्टियॉं समर्थन देती है। अपने एक सांसद या विधायक के वोट की कीमत ले कर।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जनसाधारण से आपका तात्‍पर्य अगर आम आदमी है तो मै आपके इस इस राय स सहमत नही हूँ कि जन साधारण को अस्थितरता पंसद नही है।<br />
अगर ऐसा होता तो देश की जनता 840 से ज्‍यादा राजनैतिक दलों के बीच न नाच रही होती। आज की जनता स्‍थाईत्‍व नही अपितु अपनी महत्‍वाकांक्षा को लेकर चलती है।<br />
इसी पाटियों को वोट देने से क्‍या लाभ जो 403 सीटों मे 10 से लेकर 50 सीटों से भी कम लड़ते है उनके जीतने से क्‍या स्‍थाईत्‍व आयेगी? पर जनता यह समझने को तैयार नही है। 1991 के कल्‍याण सिंह की सरकार के बाद कोई सरकार स्‍वा बहुमत प्राप्‍त करके नही बनी है। जब जनता स्‍वयं इस प्रकार का जनादेश देती है तो राजनैतिक दलों को दोष देना कहॉं तक उचित है।</p>
<p>बात रही भा ज पा के चुनाव धोषण पत्र की तो क्‍या आज तक जिनती सरकारे आई है उन्‍होने ने जनता से किये वायदे पूरे किये है। जब अन्‍य पार्टियों के साथ यह प्रश्‍न नही तो भाजपा से ही क्‍यों?</p>
<p>जनता ने 1998 मे जो खण्डित जनादेश दिया था उसमे सरकार ने कार्यकल पूरा किया वही सरकार की सबसे बड़ी उपलब्‍धी थी। जिस प्रकार आम आदमी अपनी मत्‍वकांक्षा लेकर वोट करता है उसी प्रकार छोटी पार्टियॉं समर्थन देती है। अपने एक सांसद या विधायक के वोट की कीमत ले कर।</p>
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