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	<title>Comments on: गांधी से प्रभावित किसान नेता के बहाने</title>
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	<description>वैश्वीकरण विरोध हेतु</description>
	<pubDate>Sun, 20 Jul 2008 08:01:25 +0000</pubDate>
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		<title>By: Aabid Surti</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/05/31/kose-bove-anti-globalisation/#comment-630</link>
		<dc:creator>Aabid Surti</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 12 Jun 2007 05:40:30 +0000</pubDate>
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		<description>An eye opener, KEEP IT UP...AABID</description>
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		<title>By: ghughutibasuti</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/05/31/kose-bove-anti-globalisation/#comment-627</link>
		<dc:creator>ghughutibasuti</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 10 Jun 2007 13:54:04 +0000</pubDate>
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		<description>एक बहुत अच्छा लेख जो एक ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाता है जिससे लोगों के जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ेगा । किन्तु मैं इस पर कोई राय नहीं बना सकी हूँ ।
घुघूती बासूती</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>एक बहुत अच्छा लेख जो एक ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाता है जिससे लोगों के जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ेगा । किन्तु मैं इस पर कोई राय नहीं बना सकी हूँ ।<br />
घुघूती बासूती</p>
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		<title>By: bhaskar</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/05/31/kose-bove-anti-globalisation/#comment-548</link>
		<dc:creator>bhaskar</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 31 May 2007 16:27:19 +0000</pubDate>
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		<description>नहीं जानता कि ये रास्ता जो चुना है हमें कहाँ ले जा रहा है? कृषि एक व्यवसाय तो कभी नहीं बन सकी मगर अब ये एक मजबूरी क्यूँ बनती जा रही है? 
हमारा विरोध मूलतः इस भावना के कारण है कि इससे कई कई लोगों के रोज़गार पर फ़र्क पड़ेगा बिल्कुल पड़ेगा. यह भौतिक विकास और दक्षता का चिर डायलेमा है/ इस बारे में हालाँकि मेरा तर्क है कि हम यह अरण्यरोदन किनके लिए कर रहे हैं क्या किसान के लिए जो अपना अच्छे से अच्छा उत्पाद सस्ते से सस्ते में बेचने पर विवश हैं या फ़िर उन बिचौलियों के लिए जो सिर्फ़ उस बड़ी सप्लाइ चेन में जुड़े होने की वजह से पैसे काटते हैं? इन लोगों के लिए रोने का कोई अर्थ नहीं क्योंकि रिलायन्स या कोई और बड़ी कम्पनी जो कर रही है रिटेल क्षेत्र में कमोबेश वैसे ही काम ये बिचौलिये और आढ़तिए करते हैं किसानों की लूट-खसोट यहाँ भी बहुत है..सही कहूँ तो कम से कम ITC वाले समय पर पैसा तो चुकाते हैं किसान का ये मण्डी वाले तो आधा तौलते हैं और उनका पैसा भी उधार रख लेते हैं/ निश्चित रूप से इस तर्क की अपनी सीमाएं हैं कई प्रतितर्क हो सकते हैं और इस बारे में कोई अन्तिम निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते/ नहीं जानता सही रास्ता क्या हो सकता है मगर वही रास्ता सही होगा जो उत्पादक को लाभ पहुँचाए न कि सिर्फ़ बिचौलियों को/ कृषि के प्रति सम्वेदनशील होने की ज़रूरत है. डॉलर्स से पेट नहीं भरता/ मुझे लगता है रिलायन्स से ज़्यादा कोक और पेप्सी के बॉट्लिंग प्लाण्ट्स खतरनाक हैं इन्होंने तो पानी ही खरीद लिया/ मोन्सेन्टो बीज़ कम्पनी पर भी सोचना होगा जिन्होंने किसानों को आर्थिक रूप से गुलाम बनाने की ठान ली है/</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>नहीं जानता कि ये रास्ता जो चुना है हमें कहाँ ले जा रहा है? कृषि एक व्यवसाय तो कभी नहीं बन सकी मगर अब ये एक मजबूरी क्यूँ बनती जा रही है?<br />
हमारा विरोध मूलतः इस भावना के कारण है कि इससे कई कई लोगों के रोज़गार पर फ़र्क पड़ेगा बिल्कुल पड़ेगा. यह भौतिक विकास और दक्षता का चिर डायलेमा है/ इस बारे में हालाँकि मेरा तर्क है कि हम यह अरण्यरोदन किनके लिए कर रहे हैं क्या किसान के लिए जो अपना अच्छे से अच्छा उत्पाद सस्ते से सस्ते में बेचने पर विवश हैं या फ़िर उन बिचौलियों के लिए जो सिर्फ़ उस बड़ी सप्लाइ चेन में जुड़े होने की वजह से पैसे काटते हैं? इन लोगों के लिए रोने का कोई अर्थ नहीं क्योंकि रिलायन्स या कोई और बड़ी कम्पनी जो कर रही है रिटेल क्षेत्र में कमोबेश वैसे ही काम ये बिचौलिये और आढ़तिए करते हैं किसानों की लूट-खसोट यहाँ भी बहुत है..सही कहूँ तो कम से कम ITC वाले समय पर पैसा तो चुकाते हैं किसान का ये मण्डी वाले तो आधा तौलते हैं और उनका पैसा भी उधार रख लेते हैं/ निश्चित रूप से इस तर्क की अपनी सीमाएं हैं कई प्रतितर्क हो सकते हैं और इस बारे में कोई अन्तिम निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते/ नहीं जानता सही रास्ता क्या हो सकता है मगर वही रास्ता सही होगा जो उत्पादक को लाभ पहुँचाए न कि सिर्फ़ बिचौलियों को/ कृषि के प्रति सम्वेदनशील होने की ज़रूरत है. डॉलर्स से पेट नहीं भरता/ मुझे लगता है रिलायन्स से ज़्यादा कोक और पेप्सी के बॉट्लिंग प्लाण्ट्स खतरनाक हैं इन्होंने तो पानी ही खरीद लिया/ मोन्सेन्टो बीज़ कम्पनी पर भी सोचना होगा जिन्होंने किसानों को आर्थिक रूप से गुलाम बनाने की ठान ली है/</p>
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		<title>By: कमल शर्मा</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/05/31/kose-bove-anti-globalisation/#comment-545</link>
		<dc:creator>कमल शर्मा</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 31 May 2007 11:25:47 +0000</pubDate>
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		<description>बेहद शानदार रिपोर्ट। राजनेताओं को इसकी कॉपी भेजिए। खासकर लोकसभा और राज्‍यसभा के सभी सांसदों के ई मेल पते संसद की वेबसाइट से लेकर उन्‍हें भेजिए। बातें करते हैं गरीबी हटाने और रोजगार के अवसर बढ़ाने की। इस तरह की दुकानें खुलती रही तो भारत जो कि एक बड़ी आबादी वाला देश है, वहां का आम नागरिक या तो आत्‍महत्‍या करेगा या फिर लूटपाट। सरकार वैसे जागेगी नहीं, वह केवल आम आदमी को वोट देने के बेवकूफ बनाती रहती है। हर दल का यही नारा है मुझे जिताओं मैं तुम्‍हारे दुख दर्द दूर कर दूंगा लेकिन हरेक को जिताकर देख लिया नतीजा तो सिफर रहा ना। फ्रांस में किसान वैसे भी इतने ज्‍यादा मजबूत हैं कि वे चाहे तो किसी भी सरकार को उल्‍ट दें लेकिन अपने यहां स्थिति विपरीत है। यहां किसानों को पुलिस पीट पीटकर अधमरा कर देगा और पूंजीपतियों के कहने पर उनके खिलाफ ऐसे ऐसे मुकदमें दायर करेगी कि कम से कम पांच पीढियां बाप बाप कर उठेगी। इस दिशा में समान विचार धारा के लोगों को मिलकर गांधीवादी आंदोलन करना चाहिए। यदि आपकी ऐसी योजना बनती है तो मैं अपना घर द्धार छोड़ने को तैयार हूं और आपके साथ रहूंगा।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बेहद शानदार रिपोर्ट। राजनेताओं को इसकी कॉपी भेजिए। खासकर लोकसभा और राज्‍यसभा के सभी सांसदों के ई मेल पते संसद की वेबसाइट से लेकर उन्‍हें भेजिए। बातें करते हैं गरीबी हटाने और रोजगार के अवसर बढ़ाने की। इस तरह की दुकानें खुलती रही तो भारत जो कि एक बड़ी आबादी वाला देश है, वहां का आम नागरिक या तो आत्‍महत्‍या करेगा या फिर लूटपाट। सरकार वैसे जागेगी नहीं, वह केवल आम आदमी को वोट देने के बेवकूफ बनाती रहती है। हर दल का यही नारा है मुझे जिताओं मैं तुम्‍हारे दुख दर्द दूर कर दूंगा लेकिन हरेक को जिताकर देख लिया नतीजा तो सिफर रहा ना। फ्रांस में किसान वैसे भी इतने ज्‍यादा मजबूत हैं कि वे चाहे तो किसी भी सरकार को उल्‍ट दें लेकिन अपने यहां स्थिति विपरीत है। यहां किसानों को पुलिस पीट पीटकर अधमरा कर देगा और पूंजीपतियों के कहने पर उनके खिलाफ ऐसे ऐसे मुकदमें दायर करेगी कि कम से कम पांच पीढियां बाप बाप कर उठेगी। इस दिशा में समान विचार धारा के लोगों को मिलकर गांधीवादी आंदोलन करना चाहिए। यदि आपकी ऐसी योजना बनती है तो मैं अपना घर द्धार छोड़ने को तैयार हूं और आपके साथ रहूंगा।</p>
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		<title>By: वि‍ष्णु बैरागी</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/05/31/kose-bove-anti-globalisation/#comment-543</link>
		<dc:creator>वि‍ष्णु बैरागी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 31 May 2007 10:43:31 +0000</pubDate>
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		<description>'एलपीजी जनि‍त संकट की भयावहता का अनुमान अभी भी लोगों को हो नहीं पा रहा है । लोगों को अवलिम्‍ब लामबन्‍द  हो सक्रिय होने वाली दशा है । सर्वाधकि प्रभावति आम आदमी दो वक्‍त की रोटी की जुगाड में ऐसा फंसा है क‍ि इस भयावहता की ओर देखने की फुरसत नहीं नकिाल पा रहा है । ऐसे में किसी न किसी को इस मामले में पहल करन की जवाबदारी लेनी पडेगी । आशाजनक बात यह है कि अनुकूल वातावरण तेजी से बन रहा है, लोग समझने भी लगे हैं लेकिन मैदान में कब और कैसे आएं, अगुवाई कौन करे यह समझ नहीं पड रहा है । इन्‍दौर और रांची में लोग इसलिए लामबन्‍द हो गए क्‍योंक‍ि रि‍लायन्‍स ने उन पर सीधा प्रभाव डाला था । एमएनसी की गति‍व‍ि‍‍धि‍यां सामान्‍यत: ऐसा सीधा प्रभाव नहीं डालतीं । रि‍लायन्‍स ने प्रत्‍यक्ष प्रभाव डाला और लोग उद्वेलि‍त तथा आन्‍दोलि‍त हो उठे । इन्‍दौर रांची‍ की जन प्रतिक्रियाओं का विश्‍लेषण कर ऐसे अभियान चलाए जाने पर विचार क्‍यों नहीं किया जाना चाहिए ।‍</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8216;एलपीजी जनि‍त संकट की भयावहता का अनुमान अभी भी लोगों को हो नहीं पा रहा है । लोगों को अवलिम्‍ब लामबन्‍द  हो सक्रिय होने वाली दशा है । सर्वाधकि प्रभावति आम आदमी दो वक्‍त की रोटी की जुगाड में ऐसा फंसा है क‍ि इस भयावहता की ओर देखने की फुरसत नहीं नकिाल पा रहा है । ऐसे में किसी न किसी को इस मामले में पहल करन की जवाबदारी लेनी पडेगी । आशाजनक बात यह है कि अनुकूल वातावरण तेजी से बन रहा है, लोग समझने भी लगे हैं लेकिन मैदान में कब और कैसे आएं, अगुवाई कौन करे यह समझ नहीं पड रहा है । इन्‍दौर और रांची में लोग इसलिए लामबन्‍द हो गए क्‍योंक‍ि रि‍लायन्‍स ने उन पर सीधा प्रभाव डाला था । एमएनसी की गति‍व‍ि‍‍धि‍यां सामान्‍यत: ऐसा सीधा प्रभाव नहीं डालतीं । रि‍लायन्‍स ने प्रत्‍यक्ष प्रभाव डाला और लोग उद्वेलि‍त तथा आन्‍दोलि‍त हो उठे । इन्‍दौर रांची‍ की जन प्रतिक्रियाओं का विश्‍लेषण कर ऐसे अभियान चलाए जाने पर विचार क्‍यों नहीं किया जाना चाहिए ।‍</p>
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	<item>
		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/05/31/kose-bove-anti-globalisation/#comment-541</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 31 May 2007 09:16:26 +0000</pubDate>
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		<description>अफ़लातून भाई!
                   मन में बहुत बेचैनी है . कुछ करना चाहिए . क्या  अब कुछ नहीं हो सकता ?  कोई तो रास्ता होगा . क्या जन प्रतिरोध के ज़रिए इसे रोकना संभव नहीं है . क्या अब सिर्फ़ अमीर को ही ज़िंदा रहने का हक होगा .  कुछ करना चाहिए . कुछ होना चाहिए .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अफ़लातून भाई!<br />
                   मन में बहुत बेचैनी है . कुछ करना चाहिए . क्या  अब कुछ नहीं हो सकता ?  कोई तो रास्ता होगा . क्या जन प्रतिरोध के ज़रिए इसे रोकना संभव नहीं है . क्या अब सिर्फ़ अमीर को ही ज़िंदा रहने का हक होगा .  कुछ करना चाहिए . कुछ होना चाहिए .</p>
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		<title>By: डॉ.सुभाष भदौरिया.अहमदाबाद.</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/05/31/kose-bove-anti-globalisation/#comment-540</link>
		<dc:creator>डॉ.सुभाष भदौरिया.अहमदाबाद.</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 31 May 2007 08:58:58 +0000</pubDate>
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		<description>श्रीमान
     रिलायन्स फ्रेश सब्जी के बाद मुकेश अंबानी जैसे उद्योग पति रिलायन्स फ्रेश चाइल्ड की योजना भी शीघ्र लेकर आने वाले हैं. ये योजना अमीरों के लिए काम की होगी सो वे अभी से जश्न मनायें.
        गरीब वहाँ भी विरोध करने वाले हैं क्योंकि उन्हें अभी वियाग्रा नहीं लेनी पड़ती. ये टठकर्म अमीरों के हैं. उन से कुछ तो खुद होता नहीं. इधर उधर मुँह मार कर.
छोटे मोटे रोज़गार से आजीविका चलाने वालों को बेरोजगार बना देना. ये बड़ी शाज़िश है. इसमें सब शामिल हैं नेता,लेता, विक्रेता मीठी छुरी से हलाल किया जा रहा है . 
बड़े शहरों में और हो क्या रहा है एक के साथ एक फ्री की स्कीम .छोटे दुकानदार मुँह ताक रहे हैं. और अब ठेले वालों  को धर रगेड़ा.
 भाई हमारा तो सुझाव है ठेले वाले आग जलाकर उसमें मिर्च डालकर धुआँ करें तब ये प्रेत भागेंगे. मिर्च न मिले तो इन्हीं को झोंके उसमें तब ये मानेंगे.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>श्रीमान<br />
     रिलायन्स फ्रेश सब्जी के बाद मुकेश अंबानी जैसे उद्योग पति रिलायन्स फ्रेश चाइल्ड की योजना भी शीघ्र लेकर आने वाले हैं. ये योजना अमीरों के लिए काम की होगी सो वे अभी से जश्न मनायें.<br />
        गरीब वहाँ भी विरोध करने वाले हैं क्योंकि उन्हें अभी वियाग्रा नहीं लेनी पड़ती. ये टठकर्म अमीरों के हैं. उन से कुछ तो खुद होता नहीं. इधर उधर मुँह मार कर.<br />
छोटे मोटे रोज़गार से आजीविका चलाने वालों को बेरोजगार बना देना. ये बड़ी शाज़िश है. इसमें सब शामिल हैं नेता,लेता, विक्रेता मीठी छुरी से हलाल किया जा रहा है .<br />
बड़े शहरों में और हो क्या रहा है एक के साथ एक फ्री की स्कीम .छोटे दुकानदार मुँह ताक रहे हैं. और अब ठेले वालों  को धर रगेड़ा.<br />
 भाई हमारा तो सुझाव है ठेले वाले आग जलाकर उसमें मिर्च डालकर धुआँ करें तब ये प्रेत भागेंगे. मिर्च न मिले तो इन्हीं को झोंके उसमें तब ये मानेंगे.</p>
]]></content:encoded>
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