Posted in poem on June 27, 2007 | 5 Comments »
दौलत की तलबगार है अखबार नवीसी |
इस दौर मेँ व्यापार है अखबार नवीसी ||
कल तक तो बात और थी लेकिन ए दोस्त आज
सत्ता की चाटुकार है अखबार नवीसी ||
फैशन ,फसाद,फिलम ,फूश और फजूलियात
इन सबकी तरफदार है अखबार नवीसी | |
मिल जायेगी दुनिया की हर एक चीज इसी मेँ |
यारोँ खुला बाजार है अखबार नवीसी ||
रुतबा [...]
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Posted in poem on June 25, 2007 | 6 Comments »
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बड़ा अफ़सर
इस विषय पर विचार का कोई प्रश्न नहीं
निर्णय का प्रश्न नहीं
फिर से समीक्षा का प्रश्न नहीं
प्रश्न से भागता गया
उत्तर देते हुए इस तरह बड़ा अफ़सर ।
प्रश्न
आमने सामने बैठे थे
रामदास मनुष्य और मानवेन्द्र मंत्री
रामदास बोले आप लोगों को मार क्यों रहे हैं ?
मानवेन्द्र भौंचक सुनते रहे
थोड़ी देर बाद रामदास को लगा
कि [...]
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चिट्ठकार राहुल जन्मना भारतीय है । उस पर भारत का संविधान लागू होता है । भारत के किस्से , कहानियाँ और कहावतें भी । एक किस्सा चर्चित है जिसमें असामी से सजा देने वाले पूछते हैं , ‘ पाँच किलो प्याज खाओगे या पचास चप्पल ? ‘ इसमें असामी [...]
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Posted in emergency on June 20, 2007 | No Comments »
यह तीन पुस्तिकायें लिखी गयीं थीं , ’दु:शासन पर्व’ के दौरान । ’तानाशाही को कैसे समझें’ पुस्तिका छपी, बार-बार छपी , तीन भाषाओं (गुजराती,हिन्दी,अंग्रेजी) में छपी । पुस्तिका के लेखक की गिरफ़्तारी के लिए तीन शहरों में गिरफ़्तारी वॉरण्ट जारी हुए । ’सुरुचि छापशाला’ , बारडोली के संस्थापक मोहन परीख ने बहादुरी से सरकारी दबावों का [...]
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Posted in Uncategorized on June 19, 2007 | 2 Comments »
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पिछले दिनों देबाशीष ने निरंतर पत्रिका के पुराने अंकों के बारे में एक अपील जारी की थी।अगर किसी पाठक ने संभाल कर रखे हों तो उन्हें देबाशीष ने माँगा था । अभी हाल में रविजी ने उन तरीकों के बारे में सूचना दी (कई लोग सूचना को ज्ञान का पर्यायवाची मान लेते हैं) [...]
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हत्यारों के गिरोह का
एक सदस्य हत्या करता है
दूसरा उसे दुर्भाग्यपूर्ण बताता है
तीसरा मारे गए आदमी के दोष गिनाता है
चौथा हत्या का औचित्य ठहराता है
पाँचवाँ समर्थन में सिर हिलाता है
और अन्त में सब मिलकर
बैठक करते हैं
अगली हत्या की योजना के सम्बन्ध में ।
- राजेन्द्र राजन .
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डेरा सच्चा सौदा की माफ़ी अकाल-तख्त ने नामंजूर की । गुरु गोविन्दसिंह से क्यों माँगी माफी ? हमसे क्यों नहीं माँगी ? लगता है ‘नारद पर प्रतिबन्धित चिट्ठे’ के लेखक द्वारा सभी आहत चिट्ठेकारों से खेद प्रकट करने और नारद के फैसले से विरोध जारी रखने में ऐसी ही कोई जिच फँस गयी [...]
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,
[ चिट्ठाकारी पर पिछली पोस्ट से कुछ अनुदित सामग्री सम्पादित कर प्रस्तुत की जा रही है। हिन्दी चिट्ठेकारों ने विषय में रस लिया और बहस भी चलायी । आज निकोलस कार्र के चिट्ठे से यह बहुचर्चित वक्तव्य यहाँ दिया जा रहा है । ]
मंगलाचरण
किसी जमाने की बात है चिट्ठालोक नामक एक टापू था [...]
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[ ' बम और पिस्तौल इन्कलाब नहीं लाते '- शहीदे आजम भगत सिंह का यह बयान जैसे कइयों के गले नहीं उतरता वैसे ही कुंजी-पटल के योद्धा यह सुनना नहीं चाहेंगे कि ' चिट्ठे इन्कलाब नहीं लाते ' । ऐसा मानने वाले कुछ स्थापित चिट्ठेकारों के विचार यहाँ दिए जा रहे हैं । सेथ [...]
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