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Archive for जून 10th, 2007

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   [ ' बम और पिस्तौल इन्कलाब नहीं लाते '-  शहीदे आजम भगत सिंह का यह बयान जैसे कइयों के गले नहीं उतरता वैसे ही कुंजी-पटल के योद्धा यह सुनना नहीं चाहेंगे कि          ' चिट्ठे इन्कलाब नहीं लाते ' । ऐसा मानने वाले कुछ स्थापित चिट्ठेकारों के विचार यहाँ दिए जा रहे हैं । सेथ फिंकल्स्टीनकेन्ट न्यूसम , निकोलस कार आदि कई प्रमुख चि्ट्ठेकार इस मत के हैं । ]

     सेथ फिंकलस्टीन

    दमनकारी सरकारों द्वारा सेन्सरवेयर ( सेन्सर हेतु इस्तेमाल किए जाने वाले सॉफ़्टवेयर ) का इस्तेमाल अब वैधानिक नीति का हिस्सा बन चुका है । इस बाबत संगोष्ठियाँ आयोजित हो रही हैं , सिफ़ारिशें दी जा रही हैं तथा लेख लिखे जा रहे हैं । वैश्विक – सेन्सरशिप के विरुद्ध लड़ाई में हमारा क्या योगदान हो सकता है ? – इसका जवाब लोग जानना चाहते हैं ।

    दुर्भाग्यवश मेरे उत्तर लुभावने नहीं हैं । गैर सरकारी संस्थाओं , थिंक टैंक्स और शैक्षणिक संस्थाओं में श्रेणी बद्धता है तथा इनमें प्रवेश-पूर्व बाधायें भी होती हैं , जिन्हें पार करना पड़ता है । बरसों पहले जब इन्टरनेट का विस्तार कम था तब किसी व्यक्ति द्वारा खुद को सुनाने का मकसद ज्यादा विस्तृत तौर पर पूरा होता था । इन्टरनेट के व्यापक समाज का हिस्सा बन जाने के बाद एक अदद व्यक्ति की हैसियत और असर उसी तरह हाशिए पर पहुँच गया है जितना समाज में व्यक्ति का होता है । ऐसा नहीं कि किसी भी व्यक्ति की आवाज बिलकुल ही न सुनी गई हो – परन्तु यहाँ भी स्थापित सामाजिक संगठनों के ढ़ाँचे की सत्ता आम तौर पर हावी हो जाती है ।

    ब्लॉग कोई हल नहीं हैं । धार्मिक सुसमाचारों की तरह ब्लॉगिंग- निष्ठा रखने वालों (Blog evangelists ) की आस्था के विपरीत कई बार ब्लॉग असर डालने में बाधक बन जाते हैं । अत्यन्त विरले जो ब्लॉग्स के जरिए ठोस असर डालने में कामयाब हो जाते हैं – उनकी कहानी को व्यापक तौर पर ‘सक्सेस स्टोरी’ के तौर पर प्रचार मिलता है । इस परिणाम के दूसरे बाजू की व्यापक चर्चा नहीं हो पाती है – सभी लोग जो अपने हृदय उड़ेल कर चिट्ठे लिखते हैं , एक छोटे से प्रशंसक पाठक वर्ग की दायरे के बाहर कभी पढ़े नहीं जाते हैं ।

     ब्लॉग सुसमाचारी इस स्थिति पर आम तौर पर यह कहते पाए जाएँगे कि इन सीमित भक्तों से खुश रहना मुमकिन है । अमूमन वे यह नहीं कहना चाहते कि एक सीमा से आगे न पढ़ा जाना दु:ख का कारण भी हो सकता है । एक चुनिन्दा छोटे समूह की बीच ही अपनी बात कहते रहने के कारण अपने विचारों की पहुँच की बाबत उनके दिमाग में भ्रामक धारणा भी बन सकती है।

    केन न्यूसम

    किन के लिए लिखते हैं चिट्ठेकार ? आपने खुद से कभी यह सवाल किया है? मैंने कुछ दिनों से इस पर गहराई से सोचना शुरु किया है ।

    झटके में इसका जवाब देने वाले कहेंगे – अलग – अलग लोग अलग-अलग कारणों से लिखते हैं । कुछ अपने व्यवसाय के हित में लिखते हैं और कुछ स्वान्त:सुखाय ।

   यह सवाल मैं कुछ बुनियादी तौर पर पूछता हूँ । हमारे चिट्ठों के पाठक कौन हैं ? हमने जिन पाठकों को ध्यान में रख कर लिखा है वे नहीं , वास्तविक पढ़ने वाले कौन हैं ?

    मेरा जवाब है हम (चिट्ठेकार)  अमूमन एक – दूसरे के लिए ही लिखते हैं । हमारे पाठक ज्यादातर चिट्ठेकार ही होते हैं , कभी-कदाच मित्र और रिश्तेदार पढ़ लेते हैं ।

    मुझे गलत मत समझिएगा -  लिखने में मुझे रस मिलता है । कभी – कभी जब हम कुछ लिख कर चिट्ठे पर डाल देते हैं और प्रतीक्षा करते हैं कि कोई टिप्पणी आएगी अथवा कोई उस पोस्ट की कड़ी उद्धृत कर देगा , तब एक अजीब  अवसाद-सा तिरता है , माहौल में।

    चिट्ठालोक की क्रिया – प्रतिक्रिया देने की विशिष्टता को अक्सर हम लोग कुछ ज्यादा बढ़ा- चढ़ा कर पेश करते हैं । यह सही है कि चिट्ठे कुछ हद तक क्रिया – प्रतिक्रिया देते हैं लेकिन संवाद स्थापित करने के लिए यहाँ भी आप को कुछ बाधायें पार करनी पड़ती हैं । आप को टिप्पणियाँ देने और असरकारी पोस्ट लिखने के लिए समय  लगाना पड़ता है और कोशिश भी करनी पड़ती है । और जब ढेर सारे लोग एक विषय पर अपनी ढ़पली अपने राग में बजाने लगते हैं तब कई बातें इस शोर में गुम भी हो जाती हैं ।

    चिट्ठालोक में चिट्ठेकारों के बीच ध्यान खींचने की ऐसी होड़ लगी रहती है कि आभास होता है कि यह एक बहुत बड़ी-सी जगह है , मानो मछली बाजार । यह केवल आभास है दरअसल एक बड़े हॉल के आखिरी छोर पर बने एक छोटे से कमरे में हम सब पहुँच जाते हैं। जब लोग संवाद बनाने से इन्कार करते हैं किन्तु किसी हद को पार कर अपने चिट्ठे की कड़ी लगवाना चाहते हैं तब थोड़ा कष्ट जरूर होता है । यह कष्ट तब तक जारी रहता है जब तक मुझे इस बात का अहसास नहीं हो जाता कि , ‘ चलो मेरी बात न सुने भले , वास्तविक जगत में कोई उन्हें भी तो नहीं सुन रहा ‘ ।

( जारी )

   

       

   

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