अपठित महान : महा अपठित
June 12, 2007 by अफ़लातून
Technorati tags: blogs, online journalism
,
[ चिट्ठाकारी पर पिछली पोस्ट से कुछ अनुदित सामग्री सम्पादित कर प्रस्तुत की जा रही है। हिन्दी चिट्ठेकारों ने विषय में रस लिया और बहस भी चलायी । आज निकोलस कार्र के चिट्ठे से यह बहुचर्चित वक्तव्य यहाँ दिया जा रहा है । ]
मंगलाचरण
किसी जमाने की बात है चिट्ठालोक नामक एक टापू था जिसके बीचोबीच पत्थर का एक विशाल किला था । किले के चारों ओर मीलों तक टीन , गत्ते और फूस की मड़इयों में रहने वाले किसानों की बस्तियाँ थीं ।
भाग एक
निरीह कपट का स्वरूप
मैं जॉन केनेथ गालब्रेथ की लिखी एक छोटी किताब पढ़ रहा था,यूँ कह सकते हैं कि यह एक निबन्ध है - ‘ निरीह कपट का अर्थशास्त्र ‘ ( Economics of Innocent Fraud ) . यह उनकी आखिरी किताब है जिसे उन्होंने अपनी जिन्दगी के नौवें दशक में , मरने के कुछ समय पहले ही पूरा किया । ( गालब्रेथ पूँजीवाद के प्रबल प्रवक्ता , पुरोधा और झण्डाबरदार रहे हैं । - अफ़लातून )। किताब में उन्होंने समझाया है कि अमेरिकी समाज कैसे ‘पूँजीवाद’ के लिए अब ‘बाजार अर्थव्यवस्था’ शब्द का इस्तेमाल करने लगा है । नया नाम पहले वाले से कुछ मृदु और नम्र है , मानो यह अन्तर्निहित हो कि अब आर्थिक सत्ता उपभोक्ता की हाथों में आ गयी है बनिस्पत पूँजी के मालिकों या उनका काम करने वाले प्रबन्धकों के । गालब्रेथ इसे निरीह कपट का सटीक उदाहरण मानते हैं ।
निरीह कपट भी एक झूठ है जो काला नहीं सफ़ेद होता है । यह सभी को खुशफ़हमी में रखता है । यह एक ओर ताकतवर लोगों के मन माफ़िक होता है क्योंकि यह उनकी पूरी सत्ता को ढँक देता है , वहीं सत्ता विहीन लोगों के मन माफ़िक इसलिए होता है कि उनकी सत्ताहीनता को भी आवृत कर देता है ।
चिट्ठालोक के बारे में हम खुद को कहते हैं कि - नियन्त्रित और नियन्ता जन-सम्प्रेषण माध्यम के मुकाबले यह माध्यम खुला , लोकतांत्रिक और समतामूलक है । ऐसा कहना निरीह कपट है ।
भाग दो
लम्बी पूँछ वाले चिट्ठाकारों का अकेलापन
निरीह कपट की विशेषता हाँलाकि यह है कि इसके आर - पार दिखाई पड़ता है , परन्तु अक्सर लोग आर - पार न देखने की कोशिश करते हैं , और कुछ लोगों के लिए कभी - यह कोशिश भी व्यर्थ रह जाती है । कुछ दिनों पहले चिट्ठाकार केन न्यूसम ने सवाल खड़ा किया : ” हमारे चिट्ठों के पाठक कौन हैं ? ” उसके जवाब में अवसाद की झलक थी :
चिट्ठालोक में चिट्ठेकारों के बीच ध्यान खींचने की ऐसी होड़ लगी रहती है कि आभास होता है कि यह एक बहुत बड़ी-सी जगह है , मानो मछली बाजार । यह केवल आभास है दरअसल एक बड़े हॉल के आखिरी छोर पर बने एक छोटे से कमरे में हम सब पहुँच जाते हैं। जब लोग संवाद बनाने से इन्कार करते हैं किन्तु किसी हद को पार कर अपने चिट्ठे की कड़ी लगवाना चाहते हैं तब थोड़ा कष्ट जरूर होता है । यह कष्ट तब तक जारी रहता है जब तक मुझे इस बात का अहसास नहीं हो जाता कि , ‘ चलो मेरी बात न सुने भले , वास्तविक जगत में कोई उन्हें भी तो नहीं सुन रहा ‘ ।
मुझे गलत मत समझिएगा - लिखने में मुझे रस मिलता है । कभी - कभी जब हम कुछ लिख कर चिट्ठे पर डाल देते हैं और प्रतीक्षा करते हैं कि कोई टिप्पणी आएगी अथवा कोई उस पोस्ट की कड़ी उद्धृत कर देगा , तब एक अजीब अवसाद-सा तिरता है , माहौल में।
मूष्टिमेय लोगों ने इस प्रविष्टि पर अपनी राय प्रकट की जिनमें लम्बे समय से चिट्ठाकारी कर रहे सेथ फ़िन्कल्स्टीन भी थे । फ़िन्कल्स्टीन के स्वर में कहीं अधिक निराशा का पुट था।उनकी प्रतिक्रिया में तथ्य को स्वीकार कर लेने के साथ एक कटुता भी देखी जा सकती है जो किसी कपट की पोल खुलने पर प्रकट होती है :
व्यक्तिगत तौर पर बताऊँ तो यह कह सकता हूँ कि मैं इन कारणों से लिखता था :
- मुझे यह कर मूर्ख बनाया गया कि चिट्ठे खुद की आवाज सुनाने के लिए तथा मीडिया का विकल्प के रूप में होते हैं ।
- मुझे भ्रम था कि यह प्रभावशाली है ।
- कभी-कदाच ध्यान खींच लेने पर यह बहुत असरकारक साधन लगने लगता है , यथार्थ से बढ़कर ।
- यह स्वीकृति कष्टपूर्ण है कि आपने इतना समय और प्रयत्न जाया किया लेकिन कोई आप की सुनता नहीं ।
चिट्ठाकारी को धार्मिक सुसमाचार (Blog Evangelist) मानने की निष्ठा अत्यन्त क्रूर होती है चूँकि वह लोगों की कुण्ठित उम्मीदों और ख्वाबों का शिकार करती है ।
मेरा चिट्ठा कुछ दर्जन प्रशंसकों द्वारा पढ़ा जाता है । कई बार बन्द करने की नौबत आई है और आखिरकार वह चरम-बिन्दु भी आ ही जाएगा ।
किसी निरीह कपट के स्थायी हो जाने पर ताकतवर लोगों का बड़ा दाँव लगा होता है, ताकतहीन लोगों की बनिस्पत । ताकतहीन लोगों द्वारा इस कपट के प्रति अविश्वास को टालते रहने को निलम्बित करने के काफ़ी समय बाद तक ताकतवर इस कपट से लिपटे रहेंगे , सच के विकल्प की अनुगूँज सुनाने वाले एक कक्ष में एक दूसरे को अन्तहीन समय तक यह सुनाते हुए ।
उपसंहार
एक दिन एक चिट्ठा-किसान लड़के को अपनी मड़ई के निकट धूल के ढेर में एक स्फटिक का गोला पड़ा मिला । उस गोले में झाँकने पर वह चकित हो गया , उसने एक चलचित्र देखा । व्यापारिक पोतों का एक बेड़ा चिट्ठालोक के बन्दरगाह में प्रवेश कर रहा था।जहाजों पर वे नाम अंकित थे जो टापू भर में हमेशा से घृणा की दृष्टि से देखे जाते थे । टाइम-वॉर्नर और न्यूज कॉर्प और पियरसन और न्यू यॉर्क टाइम्स और वॉल स्ट्रीट जर्नल और कोन्डे नोस्ट और मैक्ग्रॉ हिल । चिट्ठा -किसान तट पर जुट गए , जहाजों पर ताने मारते हुए ,आक्रमणकारियों को ललकारा कि हमारे बड़े किले के ठाकुरों द्वारा तुम्हारा बेड़ा शीघ्र गर्क कर दिया जाएगा । व्यापारिक पोतों के जहाजों के कप्तान सोने से भरे टोकरे ले कर जब किले के द्वार तक पहुँचे , तब उन्हें ठाकुरों की तोपों का सामना करने के बजाए तुरही-नाद सहित स्वागत मिला । चिट्ठा - किसानों को रात भर महाभोज से आने वाली ध्वनियाँ सुनाई देती रहीं ।


आपने एकदम यथार्थ परक लिखा है.
यह यक्षप्रश्न मेरे आगे भी बार बार खड़ा हो जाता है कि हमारे चिठ्ठों का पाठक कौन है? क्या हम सभी ब्लागर आपस में लठ्ठमलठ्ठा कर रहे हैं? हिन्दी में सर्वाधिक पढ़ी गयी पोस्ट नारद में सिर्फ 250 हिट्स दिखाती है. इतनी हिट्स भी सिर्फ आपस की टिप्पणी को बार बार पढ़ने पर हुईं हैं. यथार्थ में तो हमारे ब्लाग्स के पाठक एक अर्धशतक पर भी नहीं पहुंचते.
कल मुझे श्री चौपटस्वामी के ब्लाग पर ब्लाग के बारे में व्याख्या मिली कि चिठ्ठा हमारा एक ‘स्वकथन’ है, बिलकुल रंगमंच की तरह, जिस पर हमें तुरन्त फुरन्त तालियां या गालियां मिल जाती हैं.
धुर विरोधी जी से सहमती के स्वर निकालने वाला बाजा बजाने के अलावा और कोई चारा हमारे पास नही है
सही है!
सही समय पर यह लेख पढ़्वाया है अफ़लातून भाई… धन्यवाद.