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	<title>Comments on: &#8216;चिट्ठाजगत&#8217; का प्रतिदावा</title>
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	<description>वैश्वीकरण विरोध हेतु</description>
	<pubDate>Sun, 20 Jul 2008 07:56:52 +0000</pubDate>
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		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/07/12/chitthajagatdisclaimer/#comment-726</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Jul 2007 07:02:43 +0000</pubDate>
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		<description>प्रेम और स्वतंत्रता का कोई विकल्प नहीं है . 

देबाशीष की यह बात भी ठीक है कि हमें 'सेंसर'  नहीं  'नियामक' चाहिए .पर इनकी प्रकृति और क्षेत्राधिकार में थोड़ी बहुत 'ओवरलैपिंग' है . अपने बचाव  में 'सेंसर' अपने को 'रेगुलेटर' कहता है और कई बार 'नियामक' ही 'सेंसर' की भूमिका में उतर आता है .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>प्रेम और स्वतंत्रता का कोई विकल्प नहीं है . </p>
<p>देबाशीष की यह बात भी ठीक है कि हमें &#8216;सेंसर&#8217;  नहीं  &#8216;नियामक&#8217; चाहिए .पर इनकी प्रकृति और क्षेत्राधिकार में थोड़ी बहुत &#8216;ओवरलैपिंग&#8217; है . अपने बचाव  में &#8216;सेंसर&#8217; अपने को &#8216;रेगुलेटर&#8217; कहता है और कई बार &#8216;नियामक&#8217; ही &#8216;सेंसर&#8217; की भूमिका में उतर आता है .</p>
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		<title>By: afloo</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/07/12/chitthajagatdisclaimer/#comment-725</link>
		<dc:creator>afloo</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Jul 2007 01:39:15 +0000</pubDate>
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		<description>हैरत क्यों होगी, देबाशीष?नारद का प्रतिदावा आपने लिखा है इसीलिए तो आप 'एक व्यक्ति के विरोध' का प्रतिवाद करने की कोशिश कर रहे हैं। 'नारद प्रतिदावा' के इस वाक्य पर गौर करें - 'नारद को यह अधिकार है कि वह अपने स्वविवेक से किसी भी पोस्ट को नारद के पन्नों से हटा दे. ' हमें नारद के स्वविवेक पर भरोसा नहीं है । राहुल द्वारा संजय बेंगाणी द्वारा आपत्तिजनक पृष्ट हटा लेने तथा भाषा पर खेद प्रकट कर लेने के बावजूद पुनर्विचार न करना बचकाना अहम है । कोई 'नारद' पर अपना चिट्ठा न चाहे यह तो उसका फैसला होगा।

मुझे उम्मीद नहीं थी कि आप प्रतिष्ठित महिला चिट्ठेकारों का नाम दे कर अपने दिमाग में मौजूद चिट्ठेकारों में फर्क को यहाँ प्रदर्शित करेंगे। 
स्वतंत्रता 'दी' नहीं जाती है , वह या तो होती है अथवा नहीं होती।
इस बहस की शुरुआत में वरिष्ट चिट्ठेकार रवि रतलामी ने याद दिलाया था कि मैंने एक पोस्ट पर आपत्ति कर उसे हटवाया था।जीतेन्द्र के सुझाव पर वह पोस्ट मैम्ने बचा कर रख ली है,ताकि सनद रहे। चिट्ठेकार ने अपने चिट्ठे से पोस्ट हटा ली थी। सेंसर और रेगुलेशन में जो फर्क आप मानते हैं , वह नारद भी समझे। इस मुल्क के कानूनों के उल्लंघन करने पर न्याय व्यवस्था के पास उसका हल है- एक ही 'सत्ता-केन्द्र' पुलिस ,जज और जल्लाद तीनों बन जाए तब निरंकुशता जन्म लेती है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>हैरत क्यों होगी, देबाशीष?नारद का प्रतिदावा आपने लिखा है इसीलिए तो आप &#8216;एक व्यक्ति के विरोध&#8217; का प्रतिवाद करने की कोशिश कर रहे हैं। &#8216;नारद प्रतिदावा&#8217; के इस वाक्य पर गौर करें - &#8216;नारद को यह अधिकार है कि वह अपने स्वविवेक से किसी भी पोस्ट को नारद के पन्नों से हटा दे. &#8216; हमें नारद के स्वविवेक पर भरोसा नहीं है । राहुल द्वारा संजय बेंगाणी द्वारा आपत्तिजनक पृष्ट हटा लेने तथा भाषा पर खेद प्रकट कर लेने के बावजूद पुनर्विचार न करना बचकाना अहम है । कोई &#8216;नारद&#8217; पर अपना चिट्ठा न चाहे यह तो उसका फैसला होगा।</p>
<p>मुझे उम्मीद नहीं थी कि आप प्रतिष्ठित महिला चिट्ठेकारों का नाम दे कर अपने दिमाग में मौजूद चिट्ठेकारों में फर्क को यहाँ प्रदर्शित करेंगे।<br />
स्वतंत्रता &#8216;दी&#8217; नहीं जाती है , वह या तो होती है अथवा नहीं होती।<br />
इस बहस की शुरुआत में वरिष्ट चिट्ठेकार रवि रतलामी ने याद दिलाया था कि मैंने एक पोस्ट पर आपत्ति कर उसे हटवाया था।जीतेन्द्र के सुझाव पर वह पोस्ट मैम्ने बचा कर रख ली है,ताकि सनद रहे। चिट्ठेकार ने अपने चिट्ठे से पोस्ट हटा ली थी। सेंसर और रेगुलेशन में जो फर्क आप मानते हैं , वह नारद भी समझे। इस मुल्क के कानूनों के उल्लंघन करने पर न्याय व्यवस्था के पास उसका हल है- एक ही &#8216;सत्ता-केन्द्र&#8217; पुलिस ,जज और जल्लाद तीनों बन जाए तब निरंकुशता जन्म लेती है।</p>
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		<title>By: अनूप शुक्ल</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/07/12/chitthajagatdisclaimer/#comment-724</link>
		<dc:creator>अनूप शुक्ल</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 13 Jul 2007 00:43:26 +0000</pubDate>
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		<description>बलिहारी है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बलिहारी है।</p>
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		<title>By: debashish</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/07/12/chitthajagatdisclaimer/#comment-723</link>
		<dc:creator>debashish</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jul 2007 16:37:42 +0000</pubDate>
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		<description>वैसे ये रोग मुझे भी है पर प्रिजुडिस बहुत सताती हैं। अब दुनिया जीतू के पीछे हाथ धो कर पड़ी है तो आपको उसका हर काम खराब लग रहा है और हर खराब काम जीतू का किया लग रहा है। अभय को उसकी रामचरितमानस को नेट पर लाने का काम तक ओछा लगा। 

अब स्पष्टिकरणः नारद का डिस्क्लेमर, हैरत होगी, पर मैंने लिखा था मूल अंग्रेज़ी में, जिस का जीतू ने अनुवाद भर किया और अगर आप तुलना करें तो चिट्ठाजगत का डिस्क्लेमर कोई खास अलग नहीं है। सच कहा जाय तो नारद के डिस्कक्लेमर पर ही आधारित है।

"चिट्ठाजगत का उद्देश्य है मुक्त रूप से निज अभिव्यक्ति को जालस्थल पर प्रस्तुत करने की स्वतन्त्रता का सम्मान करते हुए", ड्रामेबाजी तो मैं इसे मानूंगा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान के रूप ये blog देखियेगा जो चिट्ठाजगत पर दिखी, लगता है अंतर्विरोध के कारण कल चटखारे लेकर छापी गई रसीली कविता हटा दी गई है जिसमें मुन्नी और मुन्ने के यौनांगों का मधुर वार्तालाप था। मेरे बेटे को मैं ऐसी जगह जाने दुंगा क्या? 

पुनः कहना चाहुंगा कि अभिव्यक्ति का गला घोंटने की बात मैं नहीं कर रहा हूँ बात समुचित वर्गीकरण की है ताकि सही पाठकवर्ग तक सामग्री पहुंचे। अपनी पिछली पोस्ट मेंमैंने यूट्यूब का उदाहरण दिया। आज से २ ३ साल पहले मस्तराम किस्म का एक ब्लॉग मिला था, मैं डीमॉज़ पर हिन्दी चिट्ठों में उसको शामिल नहीं करना चाहता था, फिर आलोक ने सुझाव दिया और हमनें उसे हिन्दी अडल्ट वर्ग में शामिल किया। ये उचित बात है, जो वयस्क सामग्री खोज रहा है उसे ये कड़ी मिल जायेगी। क्या हम चाहेंगे की नीलिमा, बेजी या प्रत्यक्षा भड़ास चिट्ठे के पोस्ट पर क्लिक कर लें? आप चाहेंगे ये स्वतंत्रता?

जाल पर संयम की ज्यादा ज़रूरत है, भाषा हमारी अपनी है। सेंसर ग़लत है रेगुलेशन ज़रूरी है सभ्य समाज में। मुझे मालूम है कि सहमत आप भी है पर एक व्यक्ति का विरोध करने के पीछे आप लोग इस कदर आमादा है कि यथार्थ से मुँह मोड़कर चलना गवारा हो रहा है। आपसे ये उम्मीद नहीं थी।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>वैसे ये रोग मुझे भी है पर प्रिजुडिस बहुत सताती हैं। अब दुनिया जीतू के पीछे हाथ धो कर पड़ी है तो आपको उसका हर काम खराब लग रहा है और हर खराब काम जीतू का किया लग रहा है। अभय को उसकी रामचरितमानस को नेट पर लाने का काम तक ओछा लगा। </p>
<p>अब स्पष्टिकरणः नारद का डिस्क्लेमर, हैरत होगी, पर मैंने लिखा था मूल अंग्रेज़ी में, जिस का जीतू ने अनुवाद भर किया और अगर आप तुलना करें तो चिट्ठाजगत का डिस्क्लेमर कोई खास अलग नहीं है। सच कहा जाय तो नारद के डिस्कक्लेमर पर ही आधारित है।</p>
<p>&#8220;चिट्ठाजगत का उद्देश्य है मुक्त रूप से निज अभिव्यक्ति को जालस्थल पर प्रस्तुत करने की स्वतन्त्रता का सम्मान करते हुए&#8221;, ड्रामेबाजी तो मैं इसे मानूंगा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान के रूप ये blog देखियेगा जो चिट्ठाजगत पर दिखी, लगता है अंतर्विरोध के कारण कल चटखारे लेकर छापी गई रसीली कविता हटा दी गई है जिसमें मुन्नी और मुन्ने के यौनांगों का मधुर वार्तालाप था। मेरे बेटे को मैं ऐसी जगह जाने दुंगा क्या? </p>
<p>पुनः कहना चाहुंगा कि अभिव्यक्ति का गला घोंटने की बात मैं नहीं कर रहा हूँ बात समुचित वर्गीकरण की है ताकि सही पाठकवर्ग तक सामग्री पहुंचे। अपनी पिछली पोस्ट मेंमैंने यूट्यूब का उदाहरण दिया। आज से २ ३ साल पहले मस्तराम किस्म का एक ब्लॉग मिला था, मैं डीमॉज़ पर हिन्दी चिट्ठों में उसको शामिल नहीं करना चाहता था, फिर आलोक ने सुझाव दिया और हमनें उसे हिन्दी अडल्ट वर्ग में शामिल किया। ये उचित बात है, जो वयस्क सामग्री खोज रहा है उसे ये कड़ी मिल जायेगी। क्या हम चाहेंगे की नीलिमा, बेजी या प्रत्यक्षा भड़ास चिट्ठे के पोस्ट पर क्लिक कर लें? आप चाहेंगे ये स्वतंत्रता?</p>
<p>जाल पर संयम की ज्यादा ज़रूरत है, भाषा हमारी अपनी है। सेंसर ग़लत है रेगुलेशन ज़रूरी है सभ्य समाज में। मुझे मालूम है कि सहमत आप भी है पर एक व्यक्ति का विरोध करने के पीछे आप लोग इस कदर आमादा है कि यथार्थ से मुँह मोड़कर चलना गवारा हो रहा है। आपसे ये उम्मीद नहीं थी।</p>
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		<title>By: arun</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/07/12/chitthajagatdisclaimer/#comment-722</link>
		<dc:creator>arun</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jul 2007 04:10:01 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत अच्छा प्रतिवेदन है,साफ़ सुथरा राजनीती से दूर.न महान बनने की कोशिश,न ही कोई ड्रामेबाजिया,बस यू ही चलता रहे कारवा,बेपरवा मदमस्त चुपवाप ,वक्त की तहो मे अपने पदचिन्ह छोडते हुये,यही अभिलाषा है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत अच्छा प्रतिवेदन है,साफ़ सुथरा राजनीती से दूर.न महान बनने की कोशिश,न ही कोई ड्रामेबाजिया,बस यू ही चलता रहे कारवा,बेपरवा मदमस्त चुपवाप ,वक्त की तहो मे अपने पदचिन्ह छोडते हुये,यही अभिलाषा है.</p>
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		<title>By: अभय तिवारी</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/07/12/chitthajagatdisclaimer/#comment-721</link>
		<dc:creator>अभय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 12 Jul 2007 02:52:15 +0000</pubDate>
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		<description>अन्तर समझा गया..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अन्तर समझा गया..</p>
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