<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	>
<channel>
	<title>Comments on: गोस्वामी तुलसीदास का छद्म सेक्युलरवाद</title>
	<atom:link href="http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/tulsidas-pseudo-half-panti/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/tulsidas-pseudo-half-panti/</link>
	<description>वैश्वीकरण विरोध हेतु</description>
	<pubDate>Sun, 20 Jul 2008 08:03:01 +0000</pubDate>
	<generator>http://wordpress.org/?v=MU</generator>
		<item>
		<title>By: नीरज दीवान</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/tulsidas-pseudo-half-panti/#comment-852</link>
		<dc:creator>नीरज दीवान</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 16 Sep 2007 14:07:17 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9b%e0%a4%a6%e0%a5%8d/#comment-852</guid>
		<description>प्रियंकर के विचार सत्य हैं इसलिए कड़वे लगेंगे। मानस के हंस पढ़नी होगी तभी हम समझ सकेंगे।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>प्रियंकर के विचार सत्य हैं इसलिए कड़वे लगेंगे। मानस के हंस पढ़नी होगी तभी हम समझ सकेंगे।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Isht Deo Sankrityaayan</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/tulsidas-pseudo-half-panti/#comment-764</link>
		<dc:creator>Isht Deo Sankrityaayan</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 07 Aug 2007 09:10:34 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9b%e0%a4%a6%e0%a5%8d/#comment-764</guid>
		<description>भाई अफलातून जी और सुरेश जी 
भारत में राजनीतिक पार्टियों से जुडे लोग आज तक मुझे किसी चीज का सदुपयोग करते दिखे नहीं. वह चाहे वामपंथी हों या समाजवादी या फिर संघी. अपने मूल रुप में सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं. तुलसी से इनमें से किसी को कुछ नहीं लेना-देना है. और हाँ एक बात और कहूं, संघियों में तो इतना नैतिक साहस भी नहीं है कि वे यह मान सकें कि वे राजनीतिक संगठन हैं. यह अलग बात है कि काम सारे राजनैतिक उद्देश्यों से और राजनैतिक गुणा-भाग के साथ ही करते हैं. थोडा उलट-पलट कर यही बात वामपंथियों-समाजवादियों और धर्मानिरपेक्षतावादियों के साथ भी है. अव्वल तो बात यह है कि जिसे भी सत्ता का नशा चढ़ा और जिसने भी संसद के कोठे की ओर रुख किया, वह किसी के विश्वास के काबिल नहीं रह जाता. बाक़ी तुलसी से सम्बंधित सवालों के जवाब भाई बोधिसत्व और प्रियंकर ने दे ही दिया है.     
एक आग्रह और है. इस पद को पूरा पढ़ें. ठीक-ठीक याद तो नहीं. लेकिन जैसा याद आता है यह पद कुछ इस तरह है:
धूत कहो, अवधूत कहो, जोलहा कहो कोऊ 
काहू की  बेटी से बेटा न ब्याहब 
काहू की जात बिगारब न सोऊ 
हौं तौ सरनाम गुलाम हौं राम कौ 
माँग के खैहो, मसीत में सोइहौं 
लेबे को एक न देबे को दोऊ. 
बेहतर होगा कि 'कवितावली' देख लें. इस पद को इसके पूरे संदर्भों समेत पढ़ लें और फिर इसके सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक संदर्भों पर कोई राय बनाएं. तुलसी किसी पार्टी द्वारा भाडे पर रखे गए गवैये या नचनिये नहीं हैं, जिन्हे जैसे चाहो नचा लो. जो चाहो गवा लो. इनका यह पद अपने समय के ब्राह्मणवाद  के खिलाफ है. जालिम शासन के खिलाफ है. इसी का एक और पद है: 
खेती न किसान को बनिक को बनिज नहिं 
भिखारी को न भीख बलि चाकर को न चाकरी 
सीद्यमान सोच बस कहै एक एकन सो 
कहॉ जाइ का करी. 
यह सच है अकबर के शासन का. लेकिन संघ इसे नहीं  उठाएगा. क्योंकि सत्ता में आने के बाद वह भी यही देगा. अपने लिए मुश्किल क्यों खडी करे? चाहिए तो अभी देख लीजिए. हिंद महासागर में हजारों साल पहले बने जिस सेतु (उसे राम या आदम जिसने भी बनाया हो) को नष्ट करने से भारत का अरबों डॉलर का नुकसान उठाना पड़ेगा, उसे ये श्रध्दा का मामला बाना रहे हैं. समझ में नहीं आता भारत के सारे राजनेता जनता को इतना मूर्ख क्यों समझते हैं!</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भाई अफलातून जी और सुरेश जी<br />
भारत में राजनीतिक पार्टियों से जुडे लोग आज तक मुझे किसी चीज का सदुपयोग करते दिखे नहीं. वह चाहे वामपंथी हों या समाजवादी या फिर संघी. अपने मूल रुप में सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं. तुलसी से इनमें से किसी को कुछ नहीं लेना-देना है. और हाँ एक बात और कहूं, संघियों में तो इतना नैतिक साहस भी नहीं है कि वे यह मान सकें कि वे राजनीतिक संगठन हैं. यह अलग बात है कि काम सारे राजनैतिक उद्देश्यों से और राजनैतिक गुणा-भाग के साथ ही करते हैं. थोडा उलट-पलट कर यही बात वामपंथियों-समाजवादियों और धर्मानिरपेक्षतावादियों के साथ भी है. अव्वल तो बात यह है कि जिसे भी सत्ता का नशा चढ़ा और जिसने भी संसद के कोठे की ओर रुख किया, वह किसी के विश्वास के काबिल नहीं रह जाता. बाक़ी तुलसी से सम्बंधित सवालों के जवाब भाई बोधिसत्व और प्रियंकर ने दे ही दिया है.<br />
एक आग्रह और है. इस पद को पूरा पढ़ें. ठीक-ठीक याद तो नहीं. लेकिन जैसा याद आता है यह पद कुछ इस तरह है:<br />
धूत कहो, अवधूत कहो, जोलहा कहो कोऊ<br />
काहू की  बेटी से बेटा न ब्याहब<br />
काहू की जात बिगारब न सोऊ<br />
हौं तौ सरनाम गुलाम हौं राम कौ<br />
माँग के खैहो, मसीत में सोइहौं<br />
लेबे को एक न देबे को दोऊ.<br />
बेहतर होगा कि &#8216;कवितावली&#8217; देख लें. इस पद को इसके पूरे संदर्भों समेत पढ़ लें और फिर इसके सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक संदर्भों पर कोई राय बनाएं. तुलसी किसी पार्टी द्वारा भाडे पर रखे गए गवैये या नचनिये नहीं हैं, जिन्हे जैसे चाहो नचा लो. जो चाहो गवा लो. इनका यह पद अपने समय के ब्राह्मणवाद  के खिलाफ है. जालिम शासन के खिलाफ है. इसी का एक और पद है:<br />
खेती न किसान को बनिक को बनिज नहिं<br />
भिखारी को न भीख बलि चाकर को न चाकरी<br />
सीद्यमान सोच बस कहै एक एकन सो<br />
कहॉ जाइ का करी.<br />
यह सच है अकबर के शासन का. लेकिन संघ इसे नहीं  उठाएगा. क्योंकि सत्ता में आने के बाद वह भी यही देगा. अपने लिए मुश्किल क्यों खडी करे? चाहिए तो अभी देख लीजिए. हिंद महासागर में हजारों साल पहले बने जिस सेतु (उसे राम या आदम जिसने भी बनाया हो) को नष्ट करने से भारत का अरबों डॉलर का नुकसान उठाना पड़ेगा, उसे ये श्रध्दा का मामला बाना रहे हैं. समझ में नहीं आता भारत के सारे राजनेता जनता को इतना मूर्ख क्यों समझते हैं!</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/tulsidas-pseudo-half-panti/#comment-763</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Mon, 06 Aug 2007 05:44:07 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9b%e0%a4%a6%e0%a5%8d/#comment-763</guid>
		<description>जो 'मांग के खाइबो, मसीद में सोइबो' में अपने संकीर्ण अर्थ घुसेड़ रहे हैं वे न काव्य को समझते हैं और न करुणा को . धर्म की समझ के बारे में तो जितना कम बोला जाये उतना अच्छा है . वे एक बार 'मानस का हंस' पढें तो शायद कुछ जान पाएं तुलसी को और तुलसी होने की पीड़ा को . पर उन्हें तुलसी की पीड़ा से क्या लेना-देना . तुलसी उनके लिए वहीं तक उपयोगी हैं जहां तक वे उनकी कार्यसूची में काम आते हैं . तुलसी उनके लिए एक धार्मिक झंडा हैं जिसे वे काम पूरा होने पर लपेट कर रख देते हैं .

तुलसी के समय में भी उनके पीड़क ऐसे ही रहे होंगे --  धर्मांध और जड़ . मसीद का अर्थ 'मस्जिद' ही है और हो सकता है . जिसका अभिप्राय यही है उनका कोई ठौर-ठिकाना नहीं था . इसके ध्वन्यार्थ को समझने की ज़रूरत है . जो मांग कर खा रहा है वह किसी राजमहल में रुकने तो जाने से रहा . मस्जिद में सोने का अर्थ यही है कि वे कहीं भी रुक सकते या रुक जाते थे . वह जाहे खानकाह हो या मस्जिद या मठ या मंदिर . वह एक भिक्षुक-परिव्राजक की मजबूरी और उससे कहीं अधिक उसकी चेतना के उदात्त स्तर की ओर भी इंगित करता है .

जो  मसीद का अर्थ नहीं  समझ पा रहे हैं ,  उन्हें तुलसी के  'गरीबनिवाज़' या 'गरीबनवाज़' राम कैसे समझ में आते हैं यह मेरी समझ के बाहर है . करुणानिधान,कृपालु,दीनदयाल राम के लिए यह शब्द तुलसी ने कई बार प्रयोग किया है,अब इसका क्या किया जाय पूछिये इन व्याख्याचार्यों से . क्या इसे निकाल फेंकें ? 

तुलसी के धर्मांध और संकीर्ण समर्थक तथा तुलसी के दलितवादी-महिलावादी विरोधी दोनों ही जड़ता के चलते-फिरते स्तूप प्रतीत होते हैं . विगत समय को आंख-मूंद कर समझने के खतरे तो जगजाहिर हैं पर उसे पश्चिम से आई आधुनिक संकल्पनाओं की जकड़बंदी और हदबंदी में समझने-समझाने के अपने खतरे हैं .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>जो &#8216;मांग के खाइबो, मसीद में सोइबो&#8217; में अपने संकीर्ण अर्थ घुसेड़ रहे हैं वे न काव्य को समझते हैं और न करुणा को . धर्म की समझ के बारे में तो जितना कम बोला जाये उतना अच्छा है . वे एक बार &#8216;मानस का हंस&#8217; पढें तो शायद कुछ जान पाएं तुलसी को और तुलसी होने की पीड़ा को . पर उन्हें तुलसी की पीड़ा से क्या लेना-देना . तुलसी उनके लिए वहीं तक उपयोगी हैं जहां तक वे उनकी कार्यसूची में काम आते हैं . तुलसी उनके लिए एक धार्मिक झंडा हैं जिसे वे काम पूरा होने पर लपेट कर रख देते हैं .</p>
<p>तुलसी के समय में भी उनके पीड़क ऐसे ही रहे होंगे &#8212;  धर्मांध और जड़ . मसीद का अर्थ &#8216;मस्जिद&#8217; ही है और हो सकता है . जिसका अभिप्राय यही है उनका कोई ठौर-ठिकाना नहीं था . इसके ध्वन्यार्थ को समझने की ज़रूरत है . जो मांग कर खा रहा है वह किसी राजमहल में रुकने तो जाने से रहा . मस्जिद में सोने का अर्थ यही है कि वे कहीं भी रुक सकते या रुक जाते थे . वह जाहे खानकाह हो या मस्जिद या मठ या मंदिर . वह एक भिक्षुक-परिव्राजक की मजबूरी और उससे कहीं अधिक उसकी चेतना के उदात्त स्तर की ओर भी इंगित करता है .</p>
<p>जो  मसीद का अर्थ नहीं  समझ पा रहे हैं ,  उन्हें तुलसी के  &#8216;गरीबनिवाज़&#8217; या &#8216;गरीबनवाज़&#8217; राम कैसे समझ में आते हैं यह मेरी समझ के बाहर है . करुणानिधान,कृपालु,दीनदयाल राम के लिए यह शब्द तुलसी ने कई बार प्रयोग किया है,अब इसका क्या किया जाय पूछिये इन व्याख्याचार्यों से . क्या इसे निकाल फेंकें ? </p>
<p>तुलसी के धर्मांध और संकीर्ण समर्थक तथा तुलसी के दलितवादी-महिलावादी विरोधी दोनों ही जड़ता के चलते-फिरते स्तूप प्रतीत होते हैं . विगत समय को आंख-मूंद कर समझने के खतरे तो जगजाहिर हैं पर उसे पश्चिम से आई आधुनिक संकल्पनाओं की जकड़बंदी और हदबंदी में समझने-समझाने के अपने खतरे हैं .</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: नीरज दीवान</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/tulsidas-pseudo-half-panti/#comment-761</link>
		<dc:creator>नीरज दीवान</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 05 Aug 2007 13:42:53 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9b%e0%a4%a6%e0%a5%8d/#comment-761</guid>
		<description>इस विषय पर मेरी कोई दो राय नहीं। मैं अफ़लातून की बात से सहमत हूं। सुरेश चिपलूनकर, पंगेबाज़ भैया यह मानते हैं कि वे संघी है। ये उनकी स्पष्टवादिता है जिसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं। बाक़ी रहा कौन जिसे बधाई दूं?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>इस विषय पर मेरी कोई दो राय नहीं। मैं अफ़लातून की बात से सहमत हूं। सुरेश चिपलूनकर, पंगेबाज़ भैया यह मानते हैं कि वे संघी है। ये उनकी स्पष्टवादिता है जिसके लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं। बाक़ी रहा कौन जिसे बधाई दूं?</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: बोधिसत्व</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/tulsidas-pseudo-half-panti/#comment-760</link>
		<dc:creator>बोधिसत्व</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 05 Aug 2007 08:27:36 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9b%e0%a4%a6%e0%a5%8d/#comment-760</guid>
		<description>भाई अलख निरंजन जी
शव्दों के अर्थ में श्रद्धा की दखल नहीं चलती। यहाँ मसीद का और कोई अर्थ निकालना बाबा की कविता की ऐसी-तैसी करना है। और तुलसी दास कोई भूले -बिसरे गीत नहीं हैं कि उन्हे याद करने के लिए बहाना चाहिए।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>भाई अलख निरंजन जी<br />
शव्दों के अर्थ में श्रद्धा की दखल नहीं चलती। यहाँ मसीद का और कोई अर्थ निकालना बाबा की कविता की ऐसी-तैसी करना है। और तुलसी दास कोई भूले -बिसरे गीत नहीं हैं कि उन्हे याद करने के लिए बहाना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: masijeevi</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/tulsidas-pseudo-half-panti/#comment-759</link>
		<dc:creator>masijeevi</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 05 Aug 2007 07:15:15 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9b%e0%a4%a6%e0%a5%8d/#comment-759</guid>
		<description>लीजिए अब आपको किसी 'छद्म' जैसे शब्‍द को लिखने की जरूरत भी नहीं रह गई- यूँ भी इसे लिखने में काफी मुश्किल होती है, कीबोर्ड पर-
मामला सीधे संघियों व सेक्‍यूलरवादियों के बीच हो गया</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>लीजिए अब आपको किसी &#8216;छद्म&#8217; जैसे शब्‍द को लिखने की जरूरत भी नहीं रह गई- यूँ भी इसे लिखने में काफी मुश्किल होती है, कीबोर्ड पर-<br />
मामला सीधे संघियों व सेक्‍यूलरवादियों के बीच हो गया</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: सुरेश चिपलूनकर</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/tulsidas-pseudo-half-panti/#comment-758</link>
		<dc:creator>सुरेश चिपलूनकर</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 05 Aug 2007 06:00:47 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9b%e0%a4%a6%e0%a5%8d/#comment-758</guid>
		<description>"ईष्ट देव" और "अलख निरंजन" दोनो भाईयों ने बिलकुल सही बात कही है, इन "कथित धर्मनिरपेक्षतावादियों" का यह एक प्रिय शगल है, कैसे तथ्यों को तोड़मरोड़ कर उसे हिन्दू विरोधी बताया जाये, फ़िर संस्कृति विरोधी बताया जाये और आरएसएस को कैसे गरियाया जाये... हालांकि इससे संघ को कोई फ़र्क नहीं पड़ता, क्योंकि जैसे-जैसे इनका गुर्राना बढेगा, संघ की ताकत उसी अनुपात में बढती जायेगी । तुलसीदास हों या सरस्वती वन्दना, चाहे वन्देमातरम, इन लोगों को सिर्फ़ गलत अर्थ निकालना ही आता है... इनके विचार में भारतीय संस्कृति नाम की कोई चीज है ही नहीं, भारत का इतिहास मुगलों के शासन से शुरु हुआ और अंग्रेजों पर खत्म हो गया, ऐसा इनका मानना होता है... इसलिये इनसे बहस में उलझने का मतलब होता है अपना ही दिमाग खराब करना... और इनको लगता है कि गरीबों, दलितों और आदिवासियों के भले का ठेका एकमात्र इन्होंने ही ले रखा है... संघ कुछ भी बोले उसे सांप्रदायिक ठहराओ और सेकुलर एनजीओ खडे़ करके बाहरी माल कूटो...कहने को तो बहुत कुछ है, लेकिन लगता है कहीं यह कीचड़ में खींचने की साजिश तो नहीं ?</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>&#8220;ईष्ट देव&#8221; और &#8220;अलख निरंजन&#8221; दोनो भाईयों ने बिलकुल सही बात कही है, इन &#8220;कथित धर्मनिरपेक्षतावादियों&#8221; का यह एक प्रिय शगल है, कैसे तथ्यों को तोड़मरोड़ कर उसे हिन्दू विरोधी बताया जाये, फ़िर संस्कृति विरोधी बताया जाये और आरएसएस को कैसे गरियाया जाये&#8230; हालांकि इससे संघ को कोई फ़र्क नहीं पड़ता, क्योंकि जैसे-जैसे इनका गुर्राना बढेगा, संघ की ताकत उसी अनुपात में बढती जायेगी । तुलसीदास हों या सरस्वती वन्दना, चाहे वन्देमातरम, इन लोगों को सिर्फ़ गलत अर्थ निकालना ही आता है&#8230; इनके विचार में भारतीय संस्कृति नाम की कोई चीज है ही नहीं, भारत का इतिहास मुगलों के शासन से शुरु हुआ और अंग्रेजों पर खत्म हो गया, ऐसा इनका मानना होता है&#8230; इसलिये इनसे बहस में उलझने का मतलब होता है अपना ही दिमाग खराब करना&#8230; और इनको लगता है कि गरीबों, दलितों और आदिवासियों के भले का ठेका एकमात्र इन्होंने ही ले रखा है&#8230; संघ कुछ भी बोले उसे सांप्रदायिक ठहराओ और सेकुलर एनजीओ खडे़ करके बाहरी माल कूटो&#8230;कहने को तो बहुत कुछ है, लेकिन लगता है कहीं यह कीचड़ में खींचने की साजिश तो नहीं ?</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: Isht Deo Sankrityaayan</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/tulsidas-pseudo-half-panti/#comment-757</link>
		<dc:creator>Isht Deo Sankrityaayan</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 04 Aug 2007 17:28:29 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9b%e0%a4%a6%e0%a5%8d/#comment-757</guid>
		<description>किसी भी मनीषी के विचारों में से अपने काम भर की बात निकलना तो सबकी आदत होती है, लेकिन राजनेताओं के साथ संकट यह है कि वे उसे मूल संदर्भों से तोड़ भी देते हैं. यह बात कबीर और तुलसी दोनों के साथ हुई. दोनों समाजचेता क्रन्तिधर्मी कवियों  को चमत्कारी बाबा बना दिया गया.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>किसी भी मनीषी के विचारों में से अपने काम भर की बात निकलना तो सबकी आदत होती है, लेकिन राजनेताओं के साथ संकट यह है कि वे उसे मूल संदर्भों से तोड़ भी देते हैं. यह बात कबीर और तुलसी दोनों के साथ हुई. दोनों समाजचेता क्रन्तिधर्मी कवियों  को चमत्कारी बाबा बना दिया गया.</p>
]]></content:encoded>
	</item>
	<item>
		<title>By: अलख निरंजन</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/tulsidas-pseudo-half-panti/#comment-756</link>
		<dc:creator>अलख निरंजन</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 04 Aug 2007 15:26:00 +0000</pubDate>
		<guid isPermaLink="false">http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/04/%e0%a4%97%e0%a5%8b%e0%a4%b8%e0%a5%8d%e0%a4%b5%e0%a4%be%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%81%e0%a4%b2%e0%a4%b8%e0%a5%80%e0%a4%a6%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%be-%e0%a4%9b%e0%a4%a6%e0%a5%8d/#comment-756</guid>
		<description>प्रिय मित्र,
तुलसी बहती गंगा हैं जो जैसा चाहे वैसा उपयोग कर ले. आप इन शब्दों का जैसा मतलब निकाल रहे हैं उन्हीं शब्दों से मोरारी बापू कुछ और मतलब निकालते हैं और स्वर्गीय विश्वनाथ कुछ और मतलब निकालते थे. जिसको जो समझ में आ जाए. 

तुलसी के ही शब्दों में
भवानी शंकरौ बन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ,
याभ्या बिना न पश्यंति सिद्धास्वान्तस्थमीश्वरम् ।।

अपनी समझ के अनुरूप हर कोई संसार देखने और भगवान की अवधारणा तय करने के लिए स्वतंत्र है. आपने अच्छा विषय उठाया है. इसी बहाने लोग तुलसी को याद तो करेंगे. पुन: आपका धन्यवाद.
।। अलख निरंजन ।।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>प्रिय मित्र,<br />
तुलसी बहती गंगा हैं जो जैसा चाहे वैसा उपयोग कर ले. आप इन शब्दों का जैसा मतलब निकाल रहे हैं उन्हीं शब्दों से मोरारी बापू कुछ और मतलब निकालते हैं और स्वर्गीय विश्वनाथ कुछ और मतलब निकालते थे. जिसको जो समझ में आ जाए. </p>
<p>तुलसी के ही शब्दों में<br />
भवानी शंकरौ बन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ,<br />
याभ्या बिना न पश्यंति सिद्धास्वान्तस्थमीश्वरम् ।।</p>
<p>अपनी समझ के अनुरूप हर कोई संसार देखने और भगवान की अवधारणा तय करने के लिए स्वतंत्र है. आपने अच्छा विषय उठाया है. इसी बहाने लोग तुलसी को याद तो करेंगे. पुन: आपका धन्यवाद.<br />
।। अलख निरंजन ।।</p>
]]></content:encoded>
	</item>
</channel>
</rss>
