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	<title>Comments on: औद्योगीकरण का अन्धविश्वास : ले. सुनील</title>
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	<description>वैश्वीकरण विरोध हेतु</description>
	<pubDate>Wed, 14 May 2008 04:54:11 +0000</pubDate>
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		<title>By: aatmadarshi</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/28/superstition-industarlaisationmarxgandhi/#comment-850</link>
		<dc:creator>aatmadarshi</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 14 Sep 2007 12:21:25 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत दुख होता है, या कहिये कि क्रोध आता है अपनी बुद्धि बेच चुके सन्सद मे बैठने वाले तथाकथित कर्णधारो पर... ठीक है कि ज़मीन की मालिक सरकार होती है, पर वे यह क्यो भूल जाते है कि सरकार का काम प्रजा का पालन भी है. आज़ादी के बाद से जिस तरह दलालो ने विधान सभाओ और सन्सद की कुर्सियो पर कब्ज़ा कर लिया है.. सिन्गूर जैसी घटनाये तो होन्गी ही... उडीसा मे पोस्को को पैर जमाने देने मे ना केवल सरकार, बल्कि सरकारी मिडिआ जिस तरह से लगी है, वह भौन्चक्का कर देने के लिये काफ़ी है... अर्थ मैटर्स नाम का पर्यावरण पर आधारित कर्यक्रम प्रस्तुत करने वाले माइक एच पान्डे कोरिआ के रिवरबैन्क स्तूडिओ से जुडे है तथा रवीवार को रात ८.३० बजे डीडी नैशनल पर घर का चिराग नाम का जो कोरिआयी धारावाहिक आता है, उसको पोस्को प्रायोजित करता है तथा वह भी उसी स्टूदिओ की प्रस्तुति है... इसके बाद भुबनेश्वर दूरदर्शन ने भी उसी धारावाहिक का ओडिया भाशान्तर रविवार को शाम ७.०० बजे दिखाना शुरू किया है.... यानि डीडी नैशनल के साथ साथ डी डी नैशनल-ओडिया भी पोस्को के हित मे हवा बनाने मे लगा है... और तो और, अर्थ मैटर्स मे माइक पान्डे बताते है कि पोस्को के पास ऐसी तेक्नीक है कि प्रदूशण मे ५०% तक कमी आ जायेगी....यानी सरकार, मीडिया, धनपति, विदेशी कम्पनिया, उनके दिल्लीवासी दलाल... सब मिलकर किसानो को भूमिहीन बना देना चाहते है.. 
यही आत्मदर्शी का विचार है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत दुख होता है, या कहिये कि क्रोध आता है अपनी बुद्धि बेच चुके सन्सद मे बैठने वाले तथाकथित कर्णधारो पर&#8230; ठीक है कि ज़मीन की मालिक सरकार होती है, पर वे यह क्यो भूल जाते है कि सरकार का काम प्रजा का पालन भी है. आज़ादी के बाद से जिस तरह दलालो ने विधान सभाओ और सन्सद की कुर्सियो पर कब्ज़ा कर लिया है.. सिन्गूर जैसी घटनाये तो होन्गी ही&#8230; उडीसा मे पोस्को को पैर जमाने देने मे ना केवल सरकार, बल्कि सरकारी मिडिआ जिस तरह से लगी है, वह भौन्चक्का कर देने के लिये काफ़ी है&#8230; अर्थ मैटर्स नाम का पर्यावरण पर आधारित कर्यक्रम प्रस्तुत करने वाले माइक एच पान्डे कोरिआ के रिवरबैन्क स्तूडिओ से जुडे है तथा रवीवार को रात ८.३० बजे डीडी नैशनल पर घर का चिराग नाम का जो कोरिआयी धारावाहिक आता है, उसको पोस्को प्रायोजित करता है तथा वह भी उसी स्टूदिओ की प्रस्तुति है&#8230; इसके बाद भुबनेश्वर दूरदर्शन ने भी उसी धारावाहिक का ओडिया भाशान्तर रविवार को शाम ७.०० बजे दिखाना शुरू किया है&#8230;. यानि डीडी नैशनल के साथ साथ डी डी नैशनल-ओडिया भी पोस्को के हित मे हवा बनाने मे लगा है&#8230; और तो और, अर्थ मैटर्स मे माइक पान्डे बताते है कि पोस्को के पास ऐसी तेक्नीक है कि प्रदूशण मे ५०% तक कमी आ जायेगी&#8230;.यानी सरकार, मीडिया, धनपति, विदेशी कम्पनिया, उनके दिल्लीवासी दलाल&#8230; सब मिलकर किसानो को भूमिहीन बना देना चाहते है..<br />
यही आत्मदर्शी का विचार है.</p>
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		<title>By: किसलय</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/28/superstition-industarlaisationmarxgandhi/#comment-844</link>
		<dc:creator>किसलय</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 09 Sep 2007 18:19:46 +0000</pubDate>
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		<description>साधुवाद!! लेख के अगले हिस्‍से का इंतजार करूंगा. इस लेख पर एक समीक्षा मैं अपने न्‍यूज-वेबसाइट पर रखने वाला हूं. visit: http://newswing.com</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>साधुवाद!! लेख के अगले हिस्‍से का इंतजार करूंगा. इस लेख पर एक समीक्षा मैं अपने न्‍यूज-वेबसाइट पर रखने वाला हूं. visit: <a href="http://newswing.com" rel="nofollow">http://newswing.com</a></p>
]]></content:encoded>
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		<title>By: प्रभात टन्डन</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/28/superstition-industarlaisationmarxgandhi/#comment-825</link>
		<dc:creator>प्रभात टन्डन</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 02 Sep 2007 08:22:04 +0000</pubDate>
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		<description>बिल्कुल जरुरी बहस है और आगे इसको जरी रहना चाहिये । और  हम यह सिर्फ़ नन्दीग्राम तक ही इसको सीमित कर के न देखें , पीछे के दिनों मे ऊत्तर प्रदेश मे भी रिलायसं फ़ेश क बाजार मे प्रवेश आने वाले दिनों मे छोटी पूँजी वालों के लिये जो समस्या बनने जा रहा है , वह किसी से छुपा नही है ।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बिल्कुल जरुरी बहस है और आगे इसको जरी रहना चाहिये । और  हम यह सिर्फ़ नन्दीग्राम तक ही इसको सीमित कर के न देखें , पीछे के दिनों मे ऊत्तर प्रदेश मे भी रिलायसं फ़ेश क बाजार मे प्रवेश आने वाले दिनों मे छोटी पूँजी वालों के लिये जो समस्या बनने जा रहा है , वह किसी से छुपा नही है ।</p>
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	<item>
		<title>By: प्रियंकर</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/28/superstition-industarlaisationmarxgandhi/#comment-820</link>
		<dc:creator>प्रियंकर</dc:creator>
		<pubDate>Fri, 31 Aug 2007 10:25:22 +0000</pubDate>
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		<description>बेहद ज़रूरी और गंभीर विवेचन .

 कैसा आश्चर्य है कि किसानों और आदिवासियों के विस्थापन के दुख असंवेदनशील शहरी मध्य और उच्च-मध्यवर्ग को दिखाई ही नहीं देते .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बेहद ज़रूरी और गंभीर विवेचन .</p>
<p> कैसा आश्चर्य है कि किसानों और आदिवासियों के विस्थापन के दुख असंवेदनशील शहरी मध्य और उच्च-मध्यवर्ग को दिखाई ही नहीं देते .</p>
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	<item>
		<title>By: aroonarora</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/28/superstition-industarlaisationmarxgandhi/#comment-819</link>
		<dc:creator>aroonarora</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 29 Aug 2007 00:40:37 +0000</pubDate>
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		<description>कहा नही है ये सोच..जहा देखिये बस जरा ध्यान से देखने की जरूरत है मिल जायेगी..हर कही ..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कहा नही है ये सोच..जहा देखिये बस जरा ध्यान से देखने की जरूरत है मिल जायेगी..हर कही ..</p>
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	<item>
		<title>By: ghughutibasuti</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/28/superstition-industarlaisationmarxgandhi/#comment-818</link>
		<dc:creator>ghughutibasuti</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 28 Aug 2007 20:33:32 +0000</pubDate>
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		<description>बहुत ही कठिन विषय पढ़ने को दिया है । अपने विचार बताने से पहले यह बता दूँ कि किसी अन्य के लिए क्या अच्छा है यह कहने, सोचने से पहले ही मुझे लगता है कि मैं यह निर्णय लेने में अक्षम हूँ । किन्तु टिप्पणी न करना यह भी दर्शाता है कि हम इस विषय को महत्वपूर्ण नहीं मानते ।
इस पर कुछ कहने से पहले हमें स्वयं से कुछ प्रश्न करने होंगे । 
क्या आज औसत किसान के पास इतनी जमीन है कि वह भरपेट खा सके, अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य दे सके ? 
क्या उसकी जमीन इतनी उपजाऊ है कि कोई और काम किये बिना उसे अच्छी आमदनी मिल सके ?
क्या कारखानों की सच में कोई आवश्यकता नहीं है ?
यदि है तो वे कहाँ लगाये जाएँ ?
यदि लगाए जाएँ तो विस्थापितों का क्या किया जाए ?
यह सच है कि किसी को जबर्दस्ती उसकी भूमि से हटाना गलत है । औने पौने पैसे देकर हटाना और भी गलत है । क्या कोई ऐसा तरीका नहीं बनाया जा सकता कि एक तालुके, जिले और राज्य के सब जमीन बेचने के इच्छुक लोगों की एक सूची(data bank ) तैयार कर ली जाए । जिस इलाके के अधिक लोग जमीन बेचने के इच्छुक हों और यदि वहाँ कोई कारखाना लगाना सम्भव हो और कोई कम्पनी वहाँ आना चाहती हो तो वह किसानों से बात कर कोई ऐसा मूल्य तय करें जो किसानों को स्वीकार हो । आमतौर पर यह मूल्य आसपास के इलाके की कीमतों से काफी अधिक होगा । अब जो लोग खेती ही करने के इच्छुक हों वे अपने आस पास या जिस भी इलाके में लोग जमीन बेचने के इच्छुक हों ( data bank यहाँ फिर काम आएगा ।) उनसे जमीन खरीद कर खेती में फिर से लग सकते हैं । बहुत से लोग तो नए कारखाने में रोजगार पा सकेंगे । बड़े कारखानों से ट्रेनिन्ग इन्सटिट्यूट चलाने की शर्त भी रखी जा सकती है । बहुत सी कम्पनियाँ ये करती भी हैं । इससे आस पास के युवाओं को नौकरी भी मिलेगी और कारखानों को बेहतर ट्रेन्ड कामगार ।
आमतौर पर एक बड़े कारखाने के खुलने से जितनी नौकरियाँ प्रत्यक्ष में मिलती है उससे अधिक अप्रत्यक्ष रूप से । नई दुकाने खुलती हैं । चाय नाश्ते के ढाबे खुलते हैं । ट्रक की आवाजाही से कुछ लोग ट्रक खरीदते हैं व बहुत से लोग ट्रक चलाने का काम करते हैं । आस पास के गाँवों के बहुत से लोगों को, जब वे खेती का काम नहीं कर रहे होते, तब अस्थाई काम मिलता है । किसानों को अपनी सब्जी ,फल आदि बेचने के लिए एक नई मार्केट मिलती है । बहुत से लोग दूध बेचने का कारोबार करने लगते हैं । कोई अखबार बेचने की एजेन्सी ले लेता है तो कोई कपड़े प्रेस करने का काम करने लगता है । माली, महरी आदि का काम कर बहुत से लोग खेती से भी अधिक कमाई कर लेते हैं । 
यदि नई कम्पनी से आस पास के गाँव के बच्चों को अपने स्कूलों में पढ़ाने की शर्त रखी जाए , अपने दवाखाने में उपचार व डॉक्टर की सुविधा देने को कहा जाए ( चाहे दवाई मरीज खुद खरीदें )तो इन इलाकों के जीवन स्तर में सुधार आयेगा । वे बाहर के संसार से अवगत होंगे व जुड़ेंगे । 
जिस स्कूल में मैं पढ़ाती हूँ वहाँ हमारे ही स्कूल का पढ़ा पास के गाँव का एक विद्यार्थी आज अध्यापक है । और अच्छा अध्यापक है । कल हमारा पढ़ाया ही कोई विद्यार्थी हमारे यहाँ इन्जीनियर होगा, क्लर्क होगा, डॉक्टर होगा । सबसे बड़ी बात है, वह यहाँ टिक कर काम करेगा क्योंकि उसका घर, गाँव पास में 
है । 
एक और लाभ जिसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती, वह है वहाँ के लोगो की सोच रहन सहन में बदलाव । हमारी महरियाँ भी परिवार नियोजन को समझती जानती हैं । हमारी देखादेखी वे भी अपने बच्चों से काम करवाने के बजाए उन्हें स्कूल भेजती हैं । 
आमतौर पर कोई भी विपदा आने पर अधिकतर कम्पनियाँ मदद के लिए आगे आती हैं । जैसे पानी की कमी होने पर पानी का प्रबंध किया जाता है ।
रास्ता तो कोई निकालना ही होगा । क्यों न ऐसा रास्ता निकालें जिससे लाभ अधिक हो हानि कम । जिससे कम से कम लोगों को कष्ट हो, बल्कि कष्ट हो ही ना । 'तेरी भी जय हो मेरी भी जय हो' जैसा कुछ हो सके । आवश्यकता है तो खुले दिमाक से सोचने की और दिल को दिमाक पर हावी न होने देने की ।
घुघूती बासूती</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>बहुत ही कठिन विषय पढ़ने को दिया है । अपने विचार बताने से पहले यह बता दूँ कि किसी अन्य के लिए क्या अच्छा है यह कहने, सोचने से पहले ही मुझे लगता है कि मैं यह निर्णय लेने में अक्षम हूँ । किन्तु टिप्पणी न करना यह भी दर्शाता है कि हम इस विषय को महत्वपूर्ण नहीं मानते ।<br />
इस पर कुछ कहने से पहले हमें स्वयं से कुछ प्रश्न करने होंगे ।<br />
क्या आज औसत किसान के पास इतनी जमीन है कि वह भरपेट खा सके, अपने बच्चों को एक बेहतर भविष्य दे सके ?<br />
क्या उसकी जमीन इतनी उपजाऊ है कि कोई और काम किये बिना उसे अच्छी आमदनी मिल सके ?<br />
क्या कारखानों की सच में कोई आवश्यकता नहीं है ?<br />
यदि है तो वे कहाँ लगाये जाएँ ?<br />
यदि लगाए जाएँ तो विस्थापितों का क्या किया जाए ?<br />
यह सच है कि किसी को जबर्दस्ती उसकी भूमि से हटाना गलत है । औने पौने पैसे देकर हटाना और भी गलत है । क्या कोई ऐसा तरीका नहीं बनाया जा सकता कि एक तालुके, जिले और राज्य के सब जमीन बेचने के इच्छुक लोगों की एक सूची(data bank ) तैयार कर ली जाए । जिस इलाके के अधिक लोग जमीन बेचने के इच्छुक हों और यदि वहाँ कोई कारखाना लगाना सम्भव हो और कोई कम्पनी वहाँ आना चाहती हो तो वह किसानों से बात कर कोई ऐसा मूल्य तय करें जो किसानों को स्वीकार हो । आमतौर पर यह मूल्य आसपास के इलाके की कीमतों से काफी अधिक होगा । अब जो लोग खेती ही करने के इच्छुक हों वे अपने आस पास या जिस भी इलाके में लोग जमीन बेचने के इच्छुक हों ( data bank यहाँ फिर काम आएगा ।) उनसे जमीन खरीद कर खेती में फिर से लग सकते हैं । बहुत से लोग तो नए कारखाने में रोजगार पा सकेंगे । बड़े कारखानों से ट्रेनिन्ग इन्सटिट्यूट चलाने की शर्त भी रखी जा सकती है । बहुत सी कम्पनियाँ ये करती भी हैं । इससे आस पास के युवाओं को नौकरी भी मिलेगी और कारखानों को बेहतर ट्रेन्ड कामगार ।<br />
आमतौर पर एक बड़े कारखाने के खुलने से जितनी नौकरियाँ प्रत्यक्ष में मिलती है उससे अधिक अप्रत्यक्ष रूप से । नई दुकाने खुलती हैं । चाय नाश्ते के ढाबे खुलते हैं । ट्रक की आवाजाही से कुछ लोग ट्रक खरीदते हैं व बहुत से लोग ट्रक चलाने का काम करते हैं । आस पास के गाँवों के बहुत से लोगों को, जब वे खेती का काम नहीं कर रहे होते, तब अस्थाई काम मिलता है । किसानों को अपनी सब्जी ,फल आदि बेचने के लिए एक नई मार्केट मिलती है । बहुत से लोग दूध बेचने का कारोबार करने लगते हैं । कोई अखबार बेचने की एजेन्सी ले लेता है तो कोई कपड़े प्रेस करने का काम करने लगता है । माली, महरी आदि का काम कर बहुत से लोग खेती से भी अधिक कमाई कर लेते हैं ।<br />
यदि नई कम्पनी से आस पास के गाँव के बच्चों को अपने स्कूलों में पढ़ाने की शर्त रखी जाए , अपने दवाखाने में उपचार व डॉक्टर की सुविधा देने को कहा जाए ( चाहे दवाई मरीज खुद खरीदें )तो इन इलाकों के जीवन स्तर में सुधार आयेगा । वे बाहर के संसार से अवगत होंगे व जुड़ेंगे ।<br />
जिस स्कूल में मैं पढ़ाती हूँ वहाँ हमारे ही स्कूल का पढ़ा पास के गाँव का एक विद्यार्थी आज अध्यापक है । और अच्छा अध्यापक है । कल हमारा पढ़ाया ही कोई विद्यार्थी हमारे यहाँ इन्जीनियर होगा, क्लर्क होगा, डॉक्टर होगा । सबसे बड़ी बात है, वह यहाँ टिक कर काम करेगा क्योंकि उसका घर, गाँव पास में<br />
है ।<br />
एक और लाभ जिसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती, वह है वहाँ के लोगो की सोच रहन सहन में बदलाव । हमारी महरियाँ भी परिवार नियोजन को समझती जानती हैं । हमारी देखादेखी वे भी अपने बच्चों से काम करवाने के बजाए उन्हें स्कूल भेजती हैं ।<br />
आमतौर पर कोई भी विपदा आने पर अधिकतर कम्पनियाँ मदद के लिए आगे आती हैं । जैसे पानी की कमी होने पर पानी का प्रबंध किया जाता है ।<br />
रास्ता तो कोई निकालना ही होगा । क्यों न ऐसा रास्ता निकालें जिससे लाभ अधिक हो हानि कम । जिससे कम से कम लोगों को कष्ट हो, बल्कि कष्ट हो ही ना । &#8216;तेरी भी जय हो मेरी भी जय हो&#8217; जैसा कुछ हो सके । आवश्यकता है तो खुले दिमाक से सोचने की और दिल को दिमाक पर हावी न होने देने की ।<br />
घुघूती बासूती</p>
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	</item>
	<item>
		<title>By: संजय तिवारी</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/08/28/superstition-industarlaisationmarxgandhi/#comment-817</link>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 28 Aug 2007 19:40:16 +0000</pubDate>
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		<description>अच्छे लेख की शुरूआत. जारी रखें.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अच्छे लेख की शुरूआत. जारी रखें.</p>
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