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दरअसल मार्क्सवादी और पूंजीवादी दोनों प्रकार के चिंतन में खेती व गांव एक पुरानी , पिछड़ी और दकियानूसी चीज है , एक पुरानी सभ्यता के अवशेष हैं । संयुक्त राज्य अमेरिका , कनाडा और पश्चिमी यूरोप में राष्ट्रीय आय में और कार्यशील आबादी में खेती का हिस्सा दो – तीन प्रतिशत से ज्यादा नहीं रह गया है । वहाँ तेजी से नगरीकरण हो रहा है । यूरोप के कुछ हिस्सों में तो कई गांव उजड़ चुके हैं या वहां कुछ बूढ़ों के अतिरिक्त कोई नहीं रहता है । हमारे अनेक नेताओं और बुद्धिजीवियों की दृष्टि में यही हमारी भी मंजिल है और इस दिशा में बढ़ने को वे स्वाभाविक व वांछनीय मानते हैं ।
गांवों और खेती से विस्थापन की शुरुआत पश्चिम यूरोप में पूंजीवाद के आगमन के साथ ही हो गई थी । वहां बड़े पैमाने पर किसानों को जमीन से बेदखल किया गया था । इंग्लैंड में खेतों की जगह वस्त्र उद्योग के लिए बड़े पैमाने पर भेड़ पालन के लिए चारागाह बनाए गए थे । इससे , नवोदित बड़े उद्योगों के लिए सस्ते बेरोजगार मजदूरों की विशाल फौज भी उपलब्ध हुई । औद्योगिक क्रांति की प्रक्रिया का यह एक अनिवार्य व महत्वपूर्ण हिस्सा था । मार्क्स ने बताया कि जमीन से बेदखल इन मजदूरों ने ” श्रम की सुरक्षित औद्योगिक फौज ” को बढ़ाने का काम किया । मार्क्स ने इस प्रक्रिया को ” प्राथमिक पूंजी संचय ” का नाम दिया। भारत में आज जो कुछ हो रहा है उसकी तुलना इससे की जा सकती है । क्या सिंगूर
[चायकोवस्की (प्रमुख नारोदनिक) ]
नन्दीग्राम भी भारत का ‘ प्राथमिक पूंजी संचय ‘ है और पूंजीवाद के आगे बढ़ने की निशानी है ? क्या इसीलिए बंगाल की वामपंथी सरकार इस प्रक्रिया को ‘कष्टदायक किन्तु अनिवार्य’ मानकर चल रही है ?
कार्ल मार्क्स की खूबी यह थी कि पूंजीवाद के विकास के पीछे की इन सारी प्रक्रियाओं को उन्होंने उधेड़कर रख दिया था , और उनका निर्मम विश्लेषण किया था।किन्तु उनकी एक कमी यह थी कि पश्चिम यूरोप की इन तत्कालीन प्रक्रियाओं को उन्होंने इतिहास की अनिवार्य गति माना और यह मान लिया कि पूरी दुनिया में देर-सबेर इन्हीं प्रक्रियाओं को दोहराया जाना है।सांमंतवाद से पूंजीवाद में प्रवेश , फिर पूंजीवाद के अन्तर्विरोधों के परिपक्व होते हुए संकट आना और तब श्रमिक क्रांति के साथ समाजवाद का आगमन , यह इतिहास की अनिवार्य गति है । दुनिया के हर हिस्से को इस प्रक्रिया से गुजरना होगा तथा इसी पूंजीवादी औद्योगीकरण को बायपास करके कोई भी देश सीधे समाजवाद की ओर नहीं जा सकता । रूस के नारोदनिकों के साथ कम्युनिस्टों की बहस का प्रमुख मुद्दा यही था । नारोदनिक सोचते थे कि जार को हटाकर रूस की पारम्परिक गांव आधारित सामुदायिक व्यवस्था से सीधे समाजवाद की ओर जाया जा सकता है । आज माकपा के महासचिव प्रकाश करात कह रहे हैं कि नन्दीग्राम - सिंगूर मसले पर बंगाल सरकार की आलोचना करने वाले वामपंथी नारोदनिकों की ही तरह बात कर रहे हैं और सच्चे मार्क्सवादी नहीं हैं ।पूंजीवाद का विकास भी पश्चिम यूरोप की तरह होगा जिसमें बड़े – बड़े उद्योग होंगे तथा उनमें हजारों – हजारों की संख्या में मजदूर काम करेंगे । इन्हीं करखनिया मजदूरों के बढ़ते संगठन तथा उनकी बढ़ती वर्ग चेतना की बदौलत साम्यवादी क्रांति होगी और वे ही क्रांति के हरावल दस्ते होंगे ।
इस सिद्धान्त में मार्क्स के अनुयायियों का विश्वास इतना गहरा था कि दुनिया के गैर-यूरोपीय हिस्सों में भी वे मानते रहे हैं कि पूंजीवाद का आगमन एवं विकास इतिहास का एक अनिवार्य और प्रगतिशील कदम है तथा औद्योगिक मजदूर ही क्रान्ति के अग्रदूत होंगे । भारत सहित तमाम देशों वहां की जमीनी असलियतों को नजरअन्दाज करते हुए , वे संगठित क्षेत्रों के मजदूरों को ही संगठित करने में लगे रहे । जाहिर है कि इस विचार में किसानों का कोई स्थान नहीं था । जमीन से चिपके होने के कारण किसान ‘ सर्वहारा ‘ नहीं हो सकते । सोवियत क्रांति में बोल्शेविकों ने किसानों का समर्थन हासिल किया था और बोल्शेविकों की जीत में इस समर्थन की महत्वपूर्ण भूमिका थी । लेकिन बाद में सोवियत रूस में औद्योगीकरण के एक अनिवार्य कदम के रूप में कृषि उपज की कीमतों में कमी की गयी , तब किसानों ने अपना अनाज बेचने से इंकार कर दिया । तब किसानों से जमीन छीनकर जबरदस्ती सामूहिक फार्म बना दिये गये और विरोध करने वाले लाखों किसानों को स्टालिन राज में मौत के घाट उतार दिया गया या दूरदराज के इलाकों में निष्कासित करके निर्माण कार्यों में मजदूरी पर लगा दिया गया । तभी से किसानों को ‘ कुलक ‘ कहकर मार्क्सवादी दुनिया में तुच्छ नजरों से देखा जाता है और आम तौर पर , उन्हें क्रांति-विरोधी माना जाता है । भारत में भी कई बार वामपंथियों द्वारा किसान आन्दोलनों को कुलक आंदोलन कह कर तिरस्कृत किया गया है ।
चीन की परिस्थितियाँ अलग थीं और रूस जितना सीमित औद्योगीकरण भी वहां नहीं हुआ था । इसलिए माओ के नेतृत्व में चीन की साम्यवादी क्रांति पूरी तरह किसान क्रांति थी । इसलिए प्रारंभ में साम्यवादी चीन का रास्ता अलग भी दिखायी देता है । घर के पिछवाड़े इस्पात भट्टी , नंगे पैर डॉक्टरों और साईकिलों का चीन विकास की एक अलग राह पकड़ता मालूम होता है । लेकिन संभवत: पश्चिमी ढंग के औद्योगीकरण की श्रेष्ठता व अनिवार्यता का विश्वास मार्क्सवादी दर्शन में इतना गहरा था कि चीन के साम्यवादी शासकों ने भी यह मान लिया कि ये सब तो संक्रमणकालीन व्यस्थाएं हैं , अंतत: चीन को भी उसी तरह का औद्योगीकरण करना है , जैसा यूरोप-अमरीका में हुआ । इसी विश्वास और विकास की इसी राह की मजबूरियों आखिरकार साम्यवादी चीन को भी पूरी तरह पूंजीवादी पथ का अनुगामी बना दिया । यहाँ नोट करने लायक बात यह है कि सोवियत संघ के पतन के बाद चीन ही भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों का मॉ्डल है । बुद्धदेव भट्टाचार्य और मनमोहन सिंह , दोनों चीन का गुणगान और अनुकरण करते नजर आते हैं । विशेष आर्थिक क्षेत्र की अवधारणा भी चीन से ही आई है ।चीन से जो खबरें आ रही हैं , उनसे मालूम होता है कि वहाँ बड़े पैमाने पर विस्थापन , बेदखली , प्रवास और बेरोजगारी का बोलबाला है । कई नन्दीग्राम वहाँ पर भी हो रहे हैं ।
तो मार्क्सवाद की धारा में पूंजीवाद और ( पश्चिम यूरोप की तरह के) औद्योगीकरण से कोई छुटकारा नहीं है । समाजवाद के पहले पूंजीवाद को आना ही होगा । मार्क्स ने जिन्हें उत्पादन की शक्तियां कहा है , जिन्हें प्रचलित भाषा तकनालाजी कहा जा सकता है , जब तक उनका विकास नहीं होगा तब तक समाजवाद के आने के लिए स्थिति परिपक्व नहीं होगी। पूरी दुनिया को इसी रास्ते से गुजरना होगा। आधुनिक औद्योगिक विकास का एक वैकल्पिक रास्ता सोवियत संघ का था , जिसमें पूंजी संचय और बड़े उद्योगों के विकास का काम सरकार करती है । किन्तु सोवियत मॉडल के फेल हो जाने के बाद , अब कोई दूसरा रास्ता नहीं है। इसीलिए बंगाल की वामपंथी सरकार ने टाटा और सालेम समूह को आमंत्रित करके ही बंगाल के औद्योगीकरण की योजना बनाई है । देश के अन्य राज्यों के मुख्यमन्त्रियों की तरह ज्योति बसु और बुद्धदेव भट्टाचार्य भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आमंत्रित करने के लिए विदेश यात्राएं करते हैं । जिस टाटा – बिड़ला को कोसे बगैर भारतीय साम्यवादियों का कोई कार्यक्रम पूरा नहीं होता था , उसी टाटा से आज उनकी दोस्ती व प्रतिबद्धता इतनी गहरी हो गयी है कि वे अपने किसानों पर लाठी-गोली चला सकते हैं, लेकिन उनका साथ नहीं छोड़ सकते हैं । यह सब वे बंगाल के औद्योगीकरण के लिए कर रहे हैं । जाहिर है कि औद्योगीकरण में यह आस्था अंधविश्वास की हद तक पहुंच गयी है ।
दरअसल , उदारवादी या नव उदारवादी तथा मार्क्सवादी दोनों विचारधाराओं में पूंजीवाद के विकास के एक महत्वपूर्ण आयाम को नजरअन्दाज करने से यह गड़बड़ी पैदा हुइ है। वह यह है कि पूंजीवाद के विकास में औपनिवेशिक लूट व शोषण की एक महत्वपूर्ण तथा अनिवार्य भूमिका थी । पूंजी संचय का स्रोत सिर्फ देश के अन्दर किसानों का विस्थापन और मजदूरों का शोषण नहीं था । पूरी दुनिया के किसानों , मजदूरों, करीगरों और पारम्परिक धंधों के शोषण व विनाश पर यूरोप की औद्योगिक क्रांति आधारित थी । यदि इंग्लैंड , फ्रान्स , जर्मनी , स्पेन , हालैन्ड , आदि के पास पूरी दुनिया के उपनिवेश नहीं होते , तो औद्योगिक क्रांति हो ही नहीं सकती थी । असली सर्वहारा तो इन उपनिवेशों के किसान, बुनकर ,करीगर और आदिवासी थे। आज भी नव-औपनिवेशिक तरीकों से पूरी दुनिया को लूटकर व चूसकर ही यूरोप-अमरीका में पूंजीवाद फला-फूल रहा है । भूमंडलीकरण इसी प्रक्रिया का नवीनतम और व्यापकतम रूप है। अमेरिका यूरोप की समृद्धि और एशिया-अफ़्रीका-लातिनी अमेरिका की कंगाली व बदहाली एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ।
( जारी )

अगली कड़ी की प्रतीक्षा है ।
घुघूती बासूती
सर अगली कड़ी आज ही नहीं चिपका सकते क्या।
तार्किक और बेहतरीन लेख. पढ़वाने के लिए शुक्रिया.
लेख रखने के लिए धन्यवाद.
achcha hai. sunil ji ko main janta to tha lekin unke lekhan se parichit hona sukhad laga.
vipin
सुनील जी अच्छा लेख था, पर गुजारिश इतनी ही है कि चीजों कों एक दूसरे से मिलायें न, मसलन आपने एक श्ब्द ‘कुलक’ का जिक्र करा है, कुलक का रूसी में मतलब होता है, उच्च मध्यम वर्गीय किसान, जो जमींदारों की श्रेणी मे ही आते थे, जब उनसे जमीने छीन कर बहुसंख्यक गरीब किसानों मे बांटी जा रही थीं, तो उन्होने इसका विरोध करा था, आखिर कौन पूंजीपती अपनी सोने के अंडे देने वाली मुर्गी यानि कि जमीने को गरीबों में बंटते हुए देख सकता था।
जहां तक नन्दीग्राम का प्रश्न है, ख्बरें ठीक से मिल ही नहीँ पा रही हैं, मीडिया आज जिस खबर को ‘वामपंथी झूठ’ कह्कर नकार देता है, कल को उसी खबर को सच बना देता है, जब वामपंथी कह्ते थे कि नन्दीग्राम काण्ड में माओवादी नक्सल का हाथ है, तो मीडिया और ममता दोनओ एक सुर में बोले इक ‘वामपंथियों की सरकार अपना पल्ला झाड रही है’ पर अब तो ग्रहमंत्री ‘शिवराज पाटिल’ ने भी इस बात को माना है। सिर्फ खेती पर निर्भर र्ह कर सबका पेट नही पल सकता, बेरोजगारों के लिये नौकरियां काहियें, और नौकरियों के लिये कारखाने, शायद इसी लिये वामपंथियों की सरकार किसानो को 8.5 लाख रुपये प्रति एकड मूल्य दे जमीन ले रहे थे।
शेष फिर, आखिर आप कहेंगे तय्ह कमेंट दे रहा है या पूरी कमेण्ट्री कर रहा है।
आपका
विप्लव
Sunil ji,
It is a matter of great pleasure that some serious debate is going on this site. I came across this site 4 days ago. Let me have some time to understand and assimilate the content available on this site.
From Marx to till date, there have been and are sharp differences of opinions on the term ‘ socialism’. Socialism has been and is of many hues and colors- of the petty bourgeoisie, of the proletariat,Stalion, Nehruvion, that of Gandhi or Lohia- the list is exasperating. From Utopian Socialism to that of Marx,Lenin,Stalin,Castro,Mao etc. socialism has completed one full circle. The next circle at its higher level is destined to taking place in the 21st century.One must keep in one’s mind that the term ‘socialism’ is not something pious fallen directly from heaven or the something that a genius brain designs in his/her mind.And it is not static but transition to the next stage ‘communism’. It is very easy to criticize the events and phenomenon that took place in the past and we must do that because the things become more clear and their good and evil can be easily understood and assimilated. Marx tried his best to analysis the historical phases of class stages from pre class society to capitalism and tried to foretell the form of socialism. And his method was not mechanical but that of dialectical materialism. This does not mean that he could not make mistakes in foretelling the future. He was not an idealistic prophet. The same is true to his successors like Lenin, Stalin, Mao and Castro. They all made mistakes but it must not be taken as they tried their fanatic ideas to be implemented at the lands they had to do experiments. They preferred matter to ideology. There mistakes were the mistakes of great scientists. We do not have any doubt that Stalin’s approach was more mechanical then dialectical in implementing the theory of the advancement of the forces of productions that led in developing bourgeois elements in communist party and state apparatus owing to the very nature of production of surplus value at collective farms and factories. But how can we ignore Mao who fought against this tendency and presented the theory of continuous struggle against such elements ? Who says that there is no class struggle in socialism ? And in class struggle any class can win. This happened even in Mao’s China and other parts of the world. It is also true that above 90 percent of the communist parties have turned to their opposite.These parties have lost the very Bolshevik character in content. But why should the working class feel sorry for this phenomenon as Hegel says ‘ things are destined to turn to their opposites.’
Secondly, your claim that Marxists were unable to understand the role of the exploitation from the colonial world in developing imperialism. Lenin was aware of this new change in world and he found that the axis of revolution was moving from the west to the east. And Russia was between the east and the west.
[...] नारोदनिक,मार्क्स,माओ और गाँव-खेती : ले. [...]
[...] नारोदनिक,मार्क्स,माओ और गाँव-खेती : ले. [...]
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