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Archive for September, 2007

   [ प्रथम भाग यहाँ ]   
अपनी लंडन निवास के दौरान ही गांधीजी ने ६२ वर्ष पूरे किये। दो अक्टूबर को उनके मित्रों द्वारा आयोजित दो कार्यक्रम इंग्लैण्ड में गांधीजी द्वारा की गयी प्रवृत्तियों, परन्तु परस्पर विरोधी लगने वाले थे। उस दिन वेस्टमिनिस्टर पैलेस रूम में इन्डिपेन्डेन्ट लेबर पार्टी, गांधी समाज तथा हिंदी महासभा संघ द्वारा दिये [...]

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Technorati tags: अमृत घूंट, गोलमेज परिषद, गांधीजी, मारू जीवन एज मारी वाणी, roundtable conference, gandhi, london, narayan desai
[नारायण देसाई की गुजराती पुस्तक मारू जीवन एज मारी वाणी के तृतीय खण्ड से लेखक द्वारा स्वयं अनुदित अंश]यदि गोलमेज परिषद का परिणाम गांधीजी के जीवन की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक था, तो उन्हीं तीन महीनों [...]

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    मानव समाज में खेती का स्थान तीन कारणों से महत्वपूर्ण रहा है और रहेगा ।
    एक , अमरीका-यूरोप में खेती का स्थान गौण हो सकता है , लेकिन तमाम औद्योगीकरण और विकास के बावजूद आज भी मानव जाति का बड़ा हिस्सा गांवों में रहता है और अपनी जीविका के लिए खेती , पशु - [...]

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    भारत की खेती और भारत के किसान  ,आज इस औद्योगिक सभ्यता के प्रमुख निशाने पर हैं । बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इसमें अपने मुनाफों की नयी संभावनाएं दिखाई दे रही हैं । भूमण्डलीकरण का जो चौतरफा हमला भारत के किसानों पर हो रहा है, सीधे जमीन का अधिग्रहण और विस्थापन उस हमले का सिर्फ एक हिस्सा है ।आम किसानों [...]

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    पूंजीवादी और औद्योगिक सभ्यता के इस विनाशकारी पहलू का अहसास उन्नीसवीं शताब्दी में मार्क्स सहित यूरोपीय विचारकों को नहीं होना स्वाभाविक था ,लेकिन गांधी ने इसे बहुत पहले ताड़ लिया था ।इसीलिए गांधी ने इसे राक्षसी सभ्यता कहा था । यूरोप - अमेरिका में हाल में दो - तीन दशक पहले , जब प्रदूषण [...]

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Technorati tags: पूंजी, रोज़ा लक्समबर्ग, लोहिया, capital, rosa luxemberg, lohia
निश्चित रूप से कार्ल मार्क्स का ध्यान इस ओर गया था और उन्होंने अपने ग्रन्थ ‘पूंजी’ में औपनिवेशिक लूट का विस्तृत वर्णन किया है । लेकिन इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक तथ्य को उन्होंने अपने विश्लेषण का अंग नहीं बनाया । बाद में रोज़ा लक्ज़मबर्ग ने कुछ हद [...]

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