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	<title>Comments on: &#8216;पूंजी&#8217;,रोज़ा लक्ज़मबर्ग,लोहिया : ले. सुनील (3)</title>
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	<description>वैश्वीकरण विरोध हेतु</description>
	<pubDate>Mon, 12 May 2008 08:28:05 +0000</pubDate>
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		<title>By: अभय तिवारी</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/09/01/rosa-luxemberglohiacapital/#comment-840</link>
		<dc:creator>अभय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Sun, 09 Sep 2007 03:35:11 +0000</pubDate>
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		<description>मित्रवर, अपनी सुविधा से सारे लेखों को इकट्ठा पढ़ने के लिए क्षमा चाहता हूँ.. 
अब तक तो तर्क सही चल रहा था पर यहाँ एक बात गले नहीं उतरी.. "मार्क्सवादी विचार की एक प्रमुख कमी यह है कि एक कारखाने के अंदर मजदूरों के शोषण को ही उसने , अतिरिक्त मूल्य का प्रमुख स्रोत मान लिया लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार , विनिमय एवं पूंजी के जरिये अन्य देशों का शोषण तथा देश के अन्दर अर्थव्यवस्था के अन्य हिस्सों का शोषण इसका ज्यादा बड़ा स्रोत साबित हुआ है ।"
परन्तु क्या यह दूसरे किस्म का शोषण- अन्य देशों का और अर्थ्व्यवस्था के अन्य हिस्सों का - अन्तत: मजदूर का ही शोषण नहीं है? जब नाइके इटली के बजाय इंडोनेशिया में टी-शर्ट बनवाता है तो इस का मूल कारण मजदूर की मजदूरी नहीं होती?

प्रकृति के साथ मनुष्य के अन्तरविरोध की मार्क्स चर्चा जरूर करते हैं किन्तु एक सामाजिक संरचना के आन्तरिक अन्तर्विरोध में प्रकृति की भूमिका नहीं.. और निश्चित ही प्रकृति व पर्यावरण इस तरह खतरे में पड़ जाएगा.. इसका अन्दाज़ा मार्क्स को नहीं था..</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>मित्रवर, अपनी सुविधा से सारे लेखों को इकट्ठा पढ़ने के लिए क्षमा चाहता हूँ..<br />
अब तक तो तर्क सही चल रहा था पर यहाँ एक बात गले नहीं उतरी.. &#8220;मार्क्सवादी विचार की एक प्रमुख कमी यह है कि एक कारखाने के अंदर मजदूरों के शोषण को ही उसने , अतिरिक्त मूल्य का प्रमुख स्रोत मान लिया लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार , विनिमय एवं पूंजी के जरिये अन्य देशों का शोषण तथा देश के अन्दर अर्थव्यवस्था के अन्य हिस्सों का शोषण इसका ज्यादा बड़ा स्रोत साबित हुआ है ।&#8221;<br />
परन्तु क्या यह दूसरे किस्म का शोषण- अन्य देशों का और अर्थ्व्यवस्था के अन्य हिस्सों का - अन्तत: मजदूर का ही शोषण नहीं है? जब नाइके इटली के बजाय इंडोनेशिया में टी-शर्ट बनवाता है तो इस का मूल कारण मजदूर की मजदूरी नहीं होती?</p>
<p>प्रकृति के साथ मनुष्य के अन्तरविरोध की मार्क्स चर्चा जरूर करते हैं किन्तु एक सामाजिक संरचना के आन्तरिक अन्तर्विरोध में प्रकृति की भूमिका नहीं.. और निश्चित ही प्रकृति व पर्यावरण इस तरह खतरे में पड़ जाएगा.. इसका अन्दाज़ा मार्क्स को नहीं था..</p>
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