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[नारायण देसाई की गुजराती पुस्तक मारू जीवन एज मारी वाणी के तृतीय खण्ड से लेखक द्वारा स्वयं अनुदित अंश]यदि गोलमेज परिषद का परिणाम गांधीजी के जीवन की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक था, तो उन्हीं तीन महीनों के दौरान उन्होंने अंग्रेज प्रजा के सामूहिक चित्त पर जो छाप डाली वह उनके जीवन की सबसे बड़ी सफलताओं में एक थी।
इस मुलाकात के समय उन्होंने प्रजा के आबालवृद्ध स्त्री पुरुषों पर अपनी सच्चाई और हिंद की मांग की न्यायसंगतता के बारे में ऐसी अमिट छाप डाली थी कि जिन्होंने उस समय उन्हें देखा था वे बरसों तक उन्हें भूल नहीं पाये थे।
इंग्लैण्ड ही से उन्होंने सरदार पटेल को लिखा था: “मेरा सारा काम परिषद के बाहर ही हो रहा है। उसका उपयोग आज कम होगा , लेकिन बाद में बहुत होगा, ऐसा मेरा विश्वास है। कुछ लेकर आने की आशा कम है, मगर नाक कटा कर नहीं आऊँगा।“गांधी का लोकशिक्षण का सबसे बडा साधन उनका जीवन ही था। लंडन में गरीब मुहल्ले में टिकने का निर्णय किया उसी से कई भाषणों का काम अनायास और अकृत्रिम ढंग से हो गया। जिस दिन किंग्सले हॉल में आये, वहाँ के और आसपास के लोगों ने स्वागत किया। गांधीजी ने जो जवाब दिया वह लघ्वाकार, सरल हृदय से सीधा निकला और इसीलिए सीधा हृदय में पैंठने वाला था। “मैं अपने देश के करोड़ों भूखे लोगों का प्रतिनिधित्व करने इंग्लैण्ड आया हूँ। ईस्ट एन्ड के लोगों के बीच टिका हूँ इससे मुझे बहुत आनंद हुआ है। यहाँ मेरी जिस प्रेम से अगुवाई हुई वह मेरे लिये हमेशा एक निधि बनकर रहेगी।”स्वाभाविक रूप से पडोस में पहली मैत्री हुई बालकों से। जिस जिज्ञासा ने उनको प्यारेलाल या देवदास से प्रश्नोत्तरी करवाई , उसी ने उन्हें मुँह अंधेरे उठकर गांधीजी जब मीराबहन के साथ टहलने निकलते थे तब उनसे ‘गुड मॉर्निंग’ करने के लिए बड़े तडके उठाया। कुछ ने इस मौके के लाभ उठाने के लिए अपने अभिवावकों को आम दिनों से दो-दो तीन-तीन घंटे जल्दी जगाया था।बच्चों ने पूछा, ‘मि. गांधी आपकी भाषा कौन सी है?’ गांधी ने ‘मातृ’, ‘पितृ’, ‘भ्रातृ’ के साथ मदर, फादर और ब्रदर का सादृश्य दिखाकर इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया कि आखिर हम सब एक माता-पिता की संतान हैं।लंडन निवास के ये दिन यों ही सारा दिन काम में व्यस्त रहने वाले गांधीजी के लिए और अधिक काम के दिन थे। उन्हें प्रतिदिन औसतन चार घंटे नींद मिल पाती थी। ईस्ट एन्ड से वेस्ट एन्ड के अलग-अलग स्थलों पर किसी से मिलने या मीटिंगों के लिए जाते समय वे गाड़ी के शोफर से पूछ लेते कि पहुंचने के लिए आज कितने मिनट लगने का अंदाज है। अगर बीस मिनट का अंदाज हो, तो नींद के लिए उन्नीस मिनट छांट कर बीसवें मिनट पर सीधे हो कर बैठ जाते।महत्व की भेंट तो पडोस की ही होगी न? ऐसी एक भेंट का वर्णन मेजबान म्यूरिएल लेस्टर अपनी अनलंकृत शैली में बड़े अचूक शब्दों में करती हैं। इंगलिंग रोड नामक एक रास्ता है। उसके एक सिरे पर बालमंदिर है। एक दिन गांधीजी को इस गली का अनुसंधान करने का विचार आया। वे कहीं भी जाएँ तो लोग चौकन्ने हो कर दौड़-धूप करने लग जाते। हमारे इंगलिंग रोड की ओर मुडते ही लोगों की एक बड़ी भीड़ हमारे साथ हो गयी। गांधीजी ने सड़क के दोनों ओर घरों में जाकर देखना शुरु किया। उन घरों की स्त्रियों के गर्व की तो कोई सीमा नहीं रही। उन्हें यह कल्पना ही नहीं थी कि गांधीजी आनेवाले हैं। उनमें से कुछ कपड़ों को लोहा करती थीं। कुछ झाड़-झूड़ करती थीं। लेकिन गांधीजी के पहुँचते ही उन्होंने अपने छोटे-से गृहराज्यों का कोना-कोना गांधीजी को दिखाया। उनके सवालों के जवाब दिए, उनकी प्रशंसा को सुना। आसपास रहनेवाले लोग क्या काम करते हैं, घर का किराया कितना देना पड़ता है, सरकारी सफाई वाले गटरों और सड़कों की सफाई कैसे करवाते हैं, बेरोजगारी के समय परिवार को सम्भाल रखने की क्या व्यवस्था की जा रही है इत्यादि। गांधीजी बहुत कुछ जानना चाहते थे। स्त्रियों ने घर की मेडी दिखायी, उन्हें अपने बाड़े में भी फिराया, अपने पाले हुए खरगोश और मुर्गियाँ दिखायीं। कहीं किसी घर में पियानो होने का घर के लोगों को गर्व था। इस जाँच से यह तो पता चल गया कि हरेक चीज़ का उत्तम उपयोग होता था और सुन्दरता के अंशवाली हर चीज़ को बड़ी सावधानी से रखा गया था। गांधीजी के लिए लंडन में बिताये हर सवेरे से यह सवेरा अधिक आनंददायक सिद्ध हुआ। जिनके घरों में गांधीजी गये वे तो इस प्रसंग को हमेशा याद करेंगे।
[ जारी ]

यह पहली किस्त है या इससे पहले भी दिया है. क्योकि यह तीसरा खन्ड है
किताब के तीसरे खण्ड के एक अध्याय से लिया गया अंश है।आज शुरु हुआ।कुल ४ खण्डों में २००० पृष्टों का ग्रन्थ है।
क्या पुरे ग्रंथ का अनुवाद यहाँ रखा जाएगा?
@ संजय , ‘अमृत घूँट’ शीर्षक के अध्याय का अनुवाद नारायण देसाई ने खुद किया है,वह चिट्ठों पर दिया जा रहा है। पूरे ग्रन्थ का हिन्दी अनुवाद नहीं हुआ है,अंग्रेजी हो चुका है,प्रकाशन (अंग्रेजी) हो रहा है ।
नेताजी और गांधीजी विषयक अध्याय का अनुवाद मैंने किया था ,दो भाग में चिट्ठे पर है।
बाकी हिस्सों का इंतजार रहेगा। हो सके तो इस किताब के लिए एक अलग ब्लॉग बना दें।
अदभुत वर्णन है, गाँधी जी की लंदन यात्रा का. आगे वाली कड़ियों का इंतज़ार रहेगा.
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