मायावती और चरखा
October 6, 2007 by अफ़लातून
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२ अक्टूबर २००७ को उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सुश्री मायावती ने अम्बर चरखा चलाते हुए फोटो खिंचवायी , खादी पर राज्य सरकार की तरफ़ से १० फीसदी छूट का ऐलान किया और ‘गांधी के सपनों के भारत’ की भी चर्चा की।
कुछ वर्ष पहले ‘हरिजन’ शब्द पर रोक लगाने की मांग के साथ मायावती ने सवाल उठाया था कि,‘क्या गांधी शैतान की औलाद है ?’
मैथिलीशरण गुप्त की पंक्तियाँ ली जाँए,
‘उस समय से , इस समय की, कुछ दशा ही और है। पलटता रहता समय , संसार में सब ठौर है ।’
इस सन्दर्भ में क्या ठौर है ? और क्या पलट गया ?
पूना करार के तहत पृथक निर्वाचन क्षेत्र नहीं माना गया था। बाबासाहब अनुसूचित जाति के लिए जितनी सीटें चाहते थे उससे ज्यादा सीटें निर्धारित हुई लेकिन सिर्फ़ अनुसूचित जाति के मतदाताओं के वोट से प्रतिनिधी चुने जाने की प्रस्तावित व्यवस्था नहीं मानी गयी। इस व्यवस्था के तहत हुए चुनावों में कांग्रेस को ही ज्यादा सफलता मिली।बाबासाहब ने अनुसूचित जाति तथा अंग्रेज पाठकों को ध्यान में रख कर किताब लिखी ,‘कांग्रेस और मि. गांधी ने अछूतों के लिए क्या किया?’
पुणे वार्ताओं के फलस्वरूप बाबासाहब और गांधीजी एक दूसरे से काफ़ी हद तक प्रभावित हुए थे ।यरवड़ा जेल में हुई वार्ता से पहले गांधी अस्पृश्यता की जड़ धर्म में मानते थे जबकि बाबासाहब चाहते थे कि सामाजिक-आर्थिक सहूलियतें बढ़ने से ये दिक्कत दूर हो जाएगी। समझौते के बाद गांधी ने सामाजिक - आर्थिक सहूलियतों के लिए ‘हरिजन सेवक संघ’ बनाया और बाबासाहब धर्म - चिकित्सा और धर्मान्तरण तक गए ।
गांधी और जयप्रकाश के जीवन और विचार यात्राओं के क्रम को नजरअन्दाज करके ऐसे उद्धरन प्रस्तुत किए जा सकते हैं जिनके सहारे जेपी को मार्क्सवादी तथा गांधीजी को जाति प्रथा का पक्षधर बताया जा सकता है । गांधी को ऐसी सम्भावित विसंगतियों की परवाह नहीं थी।इसके लिए उन्होंने उपाय कर लिया था- हर मौलिक पुस्तक में ‘पाठकों से’ यह स्पष्ट कहा जाता है कि ‘सत्य की खोज’ में मैंने कई विचारों का त्याग किया है और नयी चीजें सीखीं हैं।सुधी पाठक , यदि उन्हें मेरी दिमागी दुरुस्ती पर भरोसा हो तो एक ही विषय पर बाद में कही गयी बात को ग्रहण करेंगे । ‘मेरी विचार यात्रा में’ जेपी इस प्रकार की सावधानी बरतने का पाठकों से आग्रह करते हैं ।
वर्तमान समय में बुद्धिवादियों का एक समूह सती-प्रथा और वर्ण व्यवस्था का पक्षधर है । कुछ राजनैतिक हलकों में इस समूह को हिन्दू नक्सलाइट नाम दिया गया है। इन हिन्दू नक्सलाइटों द्वारा वर्ण व्यवस्था के पक्ष में गांधी के उद्धरणों का बौद्धिक बेइमानी के तहत इस्तेमाल किया गया।
जाति प्रथा के सन्दर्भ में १९४६ के आस-पास गांधी ने नियम बना लिया था कि वे अन्तर्जातीय विवाह में ही भाग लेंगे।अन्तर्जातीय में एक पक्ष दलित हो,यह भी शर्त थी।
संविधान बनाते वक्त विशेशज्ञों के बारे में विचार विमर्श हो रहा था।जवाहरलाल ने अपनी प्रकृति के अनुसार कहा था कि पश्चिम से किसी विशेषज्ञ को बुलाना चाहिए।गांधीजी ने पूछा ,’विदेश से क्यों? देश में क्या ऐसे विशेषज्ञ नहीं हैं?’ जवाहरलाल ने कहा ,’मुझे तो कोई नहीं दीखता।’तब गांधीजी ने कहा’ अम्बेदकर हैं ! उन्हें बुलाओ।’ नेहरू ने कहा,’बापू! वे तो कांग्रेस के विरोधी हैं।’ तब गांधीजी ने जो प्रश्न किया वह कभी भुलाया नहीं जा सकता है।उन्होंने नेहरू से पूछा , ‘ तुम संविधान कांग्रेस का बनाना चाहते हो या देश का ?’ संविधान प्रारूपण समिति की अध्यक्षता के लिए जब अम्बेडकर के पास निमन्त्रण पहुँचा तब उन्होंने कहा ,’मैंने इतनी ज्यादा अपेक्षा नहीं रखी थी।’


बहुत रोचक और ऐतिहासिक प्रसंग. डायरी के पांचवी किस्त का क्या हुआ.
अतुल
मायावती वाला लेख अधूरा दिख रहा है.
पल-२ रंग बदलते यह नेता , वाह रे भारत के सपूतॊं हम को तुमपर नाज है
जीवन में बापू का विचार उतारने का विचार अपने में ही एक विचार है…..गाँधी जयंती के दिन ऐसी औपचारिकता में नया कुछ नहीं है। बल्कि आपका यहाँ अंबेडकर के संदर्भ में बापू का कथन आँख खोलने वाला है …
इन नेताओं से आप वैचारिक इमानदारी की आशा करतें है?
मायावती जैसे लोग चाहे कथनी-करनी में जो भी भेद करें, गाँधी हमेशा प्रासंगिक रहेंगें।
आज आकर सभी बिना पढी पोस्ट पढ गया : मायावती और चरखा, अमृत घूंट - एक से चार और सुनील जी के लेख के बाद वाले हिस्से . बेहद ज़रूरी पाठ्य सामग्री दे रहे हैं आप . बहुत ज़रूरी मानसिक खुराक . यह खुराक आप नहीं देंगे तो कौन देगा ?
गांधी को ज्यादा पढना उनके रंग में रंगते चले जाना है . आभारी हूं .
cngress ne kabhi bhi dalito ka bhala nahi kiya. Sirf Dikhava karti rahi hai. Mayavati dunia ki pahli Iron Lady hai Jisne dalito ko rajnitik Satta ko apna lakshya bataya. Great Mayavati live Long !
arun kumar gautam