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	<title>Comments on: तेलुगु कहानी : मैं कौन हूँ : पी. सत्यवती :अनुवाद- जे.एल.रेड्डी</title>
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	<description>वैश्वीकरण विरोध हेतु</description>
	<pubDate>Sun, 20 Jul 2008 08:03:49 +0000</pubDate>
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		<title>By: अभय तिवारी</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/11/17/telugu-strorysatyavati/#comment-1008</link>
		<dc:creator>अभय तिवारी</dc:creator>
		<pubDate>Wed, 21 Nov 2007 15:20:48 +0000</pubDate>
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		<description>कई जगह ऐसा भी होता है कि शादी के बाद लड़्की का नाम बदल कर नया नाम दिया जाता है..</description>
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		<title>By: मीनाक्षी</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/11/17/telugu-strorysatyavati/#comment-999</link>
		<dc:creator>मीनाक्षी</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 17 Nov 2007 14:25:07 +0000</pubDate>
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		<description>कहानी पढकर आशा की किरण जागी है ,,,आज गृहिणी को अपने नाम की याद आई...कल अपनी पहचान को भी बनाने की कोशिश करेगी... 
आज ही फोन काउंसिल के दौरान श्रीमती 'न' ने फिर से एक घंटा बस यही बात की कि वह दस साल से नौकरी कर रही है और घर, पति और बच्ची की देखभाल करने में जी-जान से जुटी है लेकिन प्यार या सम्मान के दो शब्द नसीब नही होते.  फिर से मुझे कहना पड़ा कि सम्मान पाने के लिए उसे खुद उठना है.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>कहानी पढकर आशा की किरण जागी है ,,,आज गृहिणी को अपने नाम की याद आई&#8230;कल अपनी पहचान को भी बनाने की कोशिश करेगी&#8230;<br />
आज ही फोन काउंसिल के दौरान श्रीमती &#8216;न&#8217; ने फिर से एक घंटा बस यही बात की कि वह दस साल से नौकरी कर रही है और घर, पति और बच्ची की देखभाल करने में जी-जान से जुटी है लेकिन प्यार या सम्मान के दो शब्द नसीब नही होते.  फिर से मुझे कहना पड़ा कि सम्मान पाने के लिए उसे खुद उठना है.</p>
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		<title>By: ghughutibasuti</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/11/17/telugu-strorysatyavati/#comment-998</link>
		<dc:creator>ghughutibasuti</dc:creator>
		<pubDate>Sat, 17 Nov 2007 08:16:45 +0000</pubDate>
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		<description>यह कहानी तो बहुत सी स्त्रियों के जीवन का सच है । वे किसी की पत्नी, किसी की माँ के नाम से ही जानी जाती हैं । उनकी स्वयं की पहचान संसार तो क्या वे स्वयं खो देती हैं । फिर पुरानी पहचान में लौटना भी इतना सरल नहीं है क्योंकि वह भी उन्हें अपनी नहीं लगती । 
यदि मैं अपने ३० वर्ष से खोए नाम से लिखती तो भी मुझे लगता कि यह मैं नहीं कोई और है । 
इसीलिए मुझे अपने लिए एक नाम गढ़ना पड़ा । कम से कम यह मेरे द्वारा मुझे दिया मेरा अपना नाम 
है । सो इससे लगाव तो हो गया है । और अब कुछ लोगों के बीच ही सही मेरी अपनी पहचान तो है । 
घुघूती बासूती</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>यह कहानी तो बहुत सी स्त्रियों के जीवन का सच है । वे किसी की पत्नी, किसी की माँ के नाम से ही जानी जाती हैं । उनकी स्वयं की पहचान संसार तो क्या वे स्वयं खो देती हैं । फिर पुरानी पहचान में लौटना भी इतना सरल नहीं है क्योंकि वह भी उन्हें अपनी नहीं लगती ।<br />
यदि मैं अपने ३० वर्ष से खोए नाम से लिखती तो भी मुझे लगता कि यह मैं नहीं कोई और है ।<br />
इसीलिए मुझे अपने लिए एक नाम गढ़ना पड़ा । कम से कम यह मेरे द्वारा मुझे दिया मेरा अपना नाम<br />
है । सो इससे लगाव तो हो गया है । और अब कुछ लोगों के बीच ही सही मेरी अपनी पहचान तो है ।<br />
घुघूती बासूती</p>
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