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	<title>Comments on: भारत का कुलीकरण : लेखक - गंगन प्रताप</title>
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	<description>वैश्वीकरण विरोध हेतु</description>
	<pubDate>Sat, 11 Oct 2008 23:28:10 +0000</pubDate>
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		<title>By: चौपटस्वामी</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/12/06/braindrain/#comment-1077</link>
		<dc:creator>चौपटस्वामी</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 06 Dec 2007 12:57:31 +0000</pubDate>
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		<description>सही चिंता और वाज़िब चिंतन . देश को तो घाटा ही घाटा है . पर विडम्बना यह है कि इसे प्रगति कह कर समझाया जा रहा है और लोग इसे प्रगति समझ रहे हैं .</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सही चिंता और वाज़िब चिंतन . देश को तो घाटा ही घाटा है . पर विडम्बना यह है कि इसे प्रगति कह कर समझाया जा रहा है और लोग इसे प्रगति समझ रहे हैं .</p>
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		<title>By: ghughutibasuti</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/12/06/braindrain/#comment-1076</link>
		<dc:creator>ghughutibasuti</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 06 Dec 2007 12:24:31 +0000</pubDate>
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		<description>यह लेख बहुत एक बहुत ही विचारणीय मुद्दे को लेकर है । ठीक है कि हमारी सबसे अच्छी प्रतिभा विदेश चली जाती है । उसमें से भी जो आइ आइ टी या किसी सरकारी खर्च से चलते कॉलेज से कम फीस देकर पढ़कर विदेश चलते बनते हैं, वे हमारी शिक्षा प्रणाली को ही असफल कर देते हैं । किन्तु जो विदेश नहीं जाते क्या हमारा देश उनका वैसे ही उपयोग कर पाता है , वैसे ही अवसर प्रदान करा पाता है जो उन्हें विदेशों में मिलते ? यहाँ तो कोई समाजवादी उनके वेतन को लेकर परेशान होगा तो कोई उन्हें मिली सुख सुविधाओं से । ना कभी काम करने के लिए उपयुक्त वातावरण मिलेगा । यहाँ काम से अधिक जी हजूरी की कीमत है । सरकारी तंत्र में जो कोई निर्णय लेता है वही कहीं ना कहीं से फंस जाता है । सो इनरशिया को ही सबसे उपयुक्त नीति मानकर चला जाता है । वेतन को लेकर यह सोचना चाहिये कि उस व्यक्ति पर कंपनी कितना खर्च कर रही है और वह कंपनी के लिए कितना कमा रहा है। किन्तु इसे तो पूँजीवाद कहकर नकार दिया जाएगा ।
जो युवा यहाँ वहाँ कुकुरमुत्ते से खुले इन्जीनियरिंग कॉलेज से आते हैं उनका ग्यान आमतौर पर इतना कम होता है कि उन्हें ट्रेनिंग देना एक बहुत मेहनत का काम हो जाता है ।
आज स्थिति ऐसी होती जा रही है कि यदि भारतीय कंपनियाँ स्वयं ही छात्रों को लेकर अपने हिसाब से बनाए संस्थानों में ट्रेन करें और एक लम्बी अवधि का बॉन्ड भरवाएँ तभी देश की तकनीकी ग्यान रखने वालों की आवश्यकता पूरी हो सकेगी ।
घुघूती बासूती</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>यह लेख बहुत एक बहुत ही विचारणीय मुद्दे को लेकर है । ठीक है कि हमारी सबसे अच्छी प्रतिभा विदेश चली जाती है । उसमें से भी जो आइ आइ टी या किसी सरकारी खर्च से चलते कॉलेज से कम फीस देकर पढ़कर विदेश चलते बनते हैं, वे हमारी शिक्षा प्रणाली को ही असफल कर देते हैं । किन्तु जो विदेश नहीं जाते क्या हमारा देश उनका वैसे ही उपयोग कर पाता है , वैसे ही अवसर प्रदान करा पाता है जो उन्हें विदेशों में मिलते ? यहाँ तो कोई समाजवादी उनके वेतन को लेकर परेशान होगा तो कोई उन्हें मिली सुख सुविधाओं से । ना कभी काम करने के लिए उपयुक्त वातावरण मिलेगा । यहाँ काम से अधिक जी हजूरी की कीमत है । सरकारी तंत्र में जो कोई निर्णय लेता है वही कहीं ना कहीं से फंस जाता है । सो इनरशिया को ही सबसे उपयुक्त नीति मानकर चला जाता है । वेतन को लेकर यह सोचना चाहिये कि उस व्यक्ति पर कंपनी कितना खर्च कर रही है और वह कंपनी के लिए कितना कमा रहा है। किन्तु इसे तो पूँजीवाद कहकर नकार दिया जाएगा ।<br />
जो युवा यहाँ वहाँ कुकुरमुत्ते से खुले इन्जीनियरिंग कॉलेज से आते हैं उनका ग्यान आमतौर पर इतना कम होता है कि उन्हें ट्रेनिंग देना एक बहुत मेहनत का काम हो जाता है ।<br />
आज स्थिति ऐसी होती जा रही है कि यदि भारतीय कंपनियाँ स्वयं ही छात्रों को लेकर अपने हिसाब से बनाए संस्थानों में ट्रेन करें और एक लम्बी अवधि का बॉन्ड भरवाएँ तभी देश की तकनीकी ग्यान रखने वालों की आवश्यकता पूरी हो सकेगी ।<br />
घुघूती बासूती</p>
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		<title>By: mamta</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/12/06/braindrain/#comment-1074</link>
		<dc:creator>mamta</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 06 Dec 2007 10:05:06 +0000</pubDate>
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		<description>सही फरमाया है आपने। प्रतिभा पलायन हो या प्रतिभा प्रसार नुकसान तो देश का ही है।
और शायद इसी पलायन की वजह से ऐसे शिक्षण  संस्थानों मे अच्छे लोगों की कमी होती जा रही है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>सही फरमाया है आपने। प्रतिभा पलायन हो या प्रतिभा प्रसार नुकसान तो देश का ही है।<br />
और शायद इसी पलायन की वजह से ऐसे शिक्षण  संस्थानों मे अच्छे लोगों की कमी होती जा रही है।</p>
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		<title>By: हरिराम</title>
		<link>http://samatavadi.wordpress.com/2007/12/06/braindrain/#comment-1073</link>
		<dc:creator>हरिराम</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 06 Dec 2007 07:17:59 +0000</pubDate>
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		<description>आजकल प्रतिभा "पलायन" को नया सुन्दर जामा पहनाया जाने लगा है "प्रतिभा प्रसार" का। इसकी व्याख्या यों की जाने लगी है -- भारतीय प्रतिभाएँ विश्वभर में प्रसारित हो रही हैं तथा देश का नाम रोशन कर रही हैं।

दूसरी ओर भारत में विदेशी युवा - विशेषकर बॉलीवुड में - रोजी-रोटी कमाने आ रहे हैं। विदेशी युवतियाँ भारतीय अभिनेत्रियों की तुलना में काफी कम पारिश्रमिक पर काम करती हैं, नखरे नहीं दिखाती और निर्देश के निर्देश पर हर तरह के दृश्य देने को तैयार हो जाती हैं।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>आजकल प्रतिभा &#8220;पलायन&#8221; को नया सुन्दर जामा पहनाया जाने लगा है &#8220;प्रतिभा प्रसार&#8221; का। इसकी व्याख्या यों की जाने लगी है &#8212; भारतीय प्रतिभाएँ विश्वभर में प्रसारित हो रही हैं तथा देश का नाम रोशन कर रही हैं।</p>
<p>दूसरी ओर भारत में विदेशी युवा - विशेषकर बॉलीवुड में - रोजी-रोटी कमाने आ रहे हैं। विदेशी युवतियाँ भारतीय अभिनेत्रियों की तुलना में काफी कम पारिश्रमिक पर काम करती हैं, नखरे नहीं दिखाती और निर्देश के निर्देश पर हर तरह के दृश्य देने को तैयार हो जाती हैं।</p>
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