सर्वत्र भारतीय - कुली,भाड़े पर,
December 9, 2007 by अफ़लातून
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२४ x ७ का सम्बन्ध
भारत में यू.एस. के पूर्व राजदूत रिचर्ड सेलेस्ट ने कहा था, ” भारत-यू.एस. सम्बन्ध आज सबसे बढ़िया स्थिति में हैं । सूचना व कम्यूटर उद्योग भारत व यू.एस. के सम्बन्धों को बेहतर बना रहे हैं क्योंकि आज की अर्थव्यवस्था को दिन-रात कामगार चाहिए । यह २४x७ का रिश्ता है।इसका मतलब है जब आप यू.एस. में जाग रहे हैं,तो आपको एक ऐसा पार्तनर चाहिए जो सो रहा हो और जब आप सोएं तो वह काम करने को तैयार हो । ऐसे पार्तनर पाने के लिए स्वाभाविक स्थान भारत है । मगर यह सवाल कौन पूछेगा : ” जब हम सो जाते हैं,तब भारत के लिए कौन काम करता है? हमारा स्वाभाविक पार्टनर कौन हैं? “
सर्वत्र भारतीय , सर्वत्र कुली
इण्डिया टुडे के एक लेख में जयराम रमेश ने भारत से बाहर प्रवास के पांच चरण गिनवाये थे -- उन्नीसवीं सदी के मध्य और बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रिटिश लोग भारतीय मजदूरों को दक्षिण अफ्रीका , मॉरिशस ,त्रिनिदाद , जमैका , गुयाना , फिजी वगैरह के गन्ना प्लान्टेशन्स में ले गए थे ।- दूसरा चरण मजदूरों को श्रीलंका , मलेशिया , और मयांमार ले गया ।- तीसरे चरण में गुजरात से लोग कीन्या, तंजानिया, ज़ाम्बिया पहुँचे ।- एक और लहर में मजदूर सऊदी अरब , यू.ए.ई., ओमान , कुवैत , बाहरीन , कतार और अन्य पश्चिम एशियाई देशों को गये ।- पांचवीं लहर में आर्थिक आप्रवासी यू.एस. , यू.के. , कनाडा , ऑस्ट्रेलिया और पश्चिमी देशों में पहुँचे। सूचना टेक्नॉलॉजी का काफिला छठी लहर है । इसमें सशरीर प्रवास का तत्व तो है ही , आउट-सोर्सिंग का घटक भी है । आज पूरी दुनिया में तारों का जाल इस तरह फैला है कि देश के सर्वोत्तम प्रतिभावान लोग अपने देश की सरहदों में बैठे-बैठे सूचना टेक्नॉलॉजी की वैश्विक कम्पनियों के लिए रात भर में साफ-सफाई का काम करने लगे हैं । अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ( या यों कहें कि पश्चिमी देशों में पूँजी का स्टॉक अत्यंत परिष्कृत होता जा रहा है और आज पश्चिमी देश अपने कामकाज के लिए जरूरी अत्यन्त कुशल कामगार पर्याप्त संख्या में तैयार नहीं कर रहे हैं । मिशिगन के रिपब्लिकन प्रतिनिधि वर्नर एहलर ने राष्ट्रीय विज्ञान शिक्षा समृद्धिकरण कानून का मसौदा प्रस्तुत करते हुए कहा था - ” हम अपने छात्रों को इस नई अर्थ व्यवस्था में जीने व काम करने के लिए सही ढंग से तैयार नहीं कर रहे हैं ।” उन्होंने आगे कहा था कि “कुशल कामगारों की पूर्ति करने हेतु नियोक्ता एच-१ बी वीसा के सहारे बाहर से ज्ञान का आयात कर रहे हैं । यह मात्र एक तात्कालिक उपाय है ।“
सर्वोत्तम भारतीय , भाड़े पर
नेचर पत्रिका में के.एस. जयरामन ने पूछा है-”पश्चिमी देशों के साथ सहयोग करते समय क्या भारत के शोध संस्थान अपनी स्थिति सुदृढ़ कर रहे हैं या अपने युवा वैज्ञानिकों का शोषण सस्ते वैज्ञानिक मजदूरों के रूप में करने की छूट दे रहे हैं ?” उन्होंने भारत के कई लोगों की चिंताओ को इन शब्दों में व्यक्त किया - “देश के अत्यन्त प्रतिभावान युवा शोधकर्ताओं- देश के सबसे कीमती वैज्ञानिक संसाधन- का उपयोग बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की समस्याओं का समाधान करने में सस्ते श्रम के रूप में हो रहा है, न कि भारत की विकासशील अर्थव्यवस्था की समस्याओं का सामना करने में ।” एक लाख डॉलर की रकम के एवज में एक प्रमुख भारतीय शोध संस्था ने अपने आठ पीएचडी और १२ एम.एससी छात्रों को एक वर्ष के लिए तैनात किया था जबकि इस रकम से यू.एस. में एक वैज्ञानिक की तनख्वाह और प्रयोगशाला का खर्च भी नहीं निकलेगा। इस वक्त हर क्षेत्र में इसी तरह काम चल रहा है।[ अगला ; टेक्नो बाबू का उदय ]

