हमने मोदी को वोट क्यों दिया : त्रिदिप सुहृद
December 27, 2007 by अफ़लातून
हमने मोदी को वोट क्यों दिया : त्रिदिप सुहृद का यह लेख आज ‘हिन्दुस्तान’ में प्रकाशित हुआ है तथा यहाँ उसकी पी.डी.एफ़. फ़ाइल साभार प्रस्तुत है ।
इस लेख को यहाँ प्रस्तुत करते वक्त कुछ टिप्पणियाँ की जा रही हैं ।
चिट्ठेकार संजय बेंगाणी और सागरचन्द नाहर मुख्यमन्त्री नरेन्द्र मोदी से बेहतर गुजराती बोलते हैं । दोनों चिट्ठेकारों को सुना है अथवा गुजराती में चैटियाया है । मुख्यमन्त्रीश्री की ‘गुजराती’ को भी सुना है । इससे क्या फर्क पड़ता है? ओड़िसा के मुख्यमन्त्री नवीन पटनायक से मैं बेहतर ओड़िया बोल लेता हूँ और मुमकिन है कि चिट्ठेकार प्रमोद सिंह भी । अब आती है गुजरात-गौरव की बात ! त्रिदिप सुहृद के गुजरात के प्रति गौरव और मोदी की जीत पर अमेरिका में शैम्पेन की बोतलें खोलने वाले अनिवासी गुजरातियों और गुजु नवधनाढ्यों के गौरव में जो फर्क है वह इस सुन्दर आलेख से स्पष्ट है ।
त्रिदिप जी गुजरात के एक प्रमुख प्रबन्ध संस्थान में प्रोफ़ेसर हैं और गाँधी प्रेमी हैं। केन्द्र में राजग की सरकार के शासन काल में सम्पूर्ण गांधी वांग्मय के इलेक्ट्रॉनिक संस्करण को ‘सम्पादित ‘ कर दिया गया था, तब त्रिदिप जी ने इकॉनॉमिक एण्ड पॉलिटिकल वीकली में लिखे लेख में एक तालिका बना कर इस कुकृत्य के बेनकाब करने में अहम भूमिका निभाई थी । गुजरात के त्रिदिप सुहृद सरीखे सम्मानित नागरिकों से उस सूबे की लाज बचती है !


मेरी गुजराती की प्रशंसा के लिए आभार आपका. पढ़ कर अच्छा लगा.
लेख बहुत अच्छा है । यह भी सच है कि आज के गुजरात में गाँधी जी का वही स्थान है जो अन्य राज्यों में है । पोरबंदर में मैंने जब भी कोई भाषण या कार्यक्रम में सुना तो केवल यही कि हम पोरबंदर की इस पावन सुदामानगरी में इकट्ठे हुए हैं ।
गाँधी जी के प्रति इस उदासीनता का एक कारण यह भी हो सकता है कि उन्होंने गुजरात के प्रिय नेता सरदार पटेल के स्थान पर नेहरू को प्रधानमंत्री बनाया । सरदार पटेल वे व्यक्ति जो नहीं होते तो आज जहाँ मैं बैठी हूँ वह पाकिस्तान का भाग होता ।
घुघूती बासूती
क्या गुजराती बोलना गुनाह है
ईमानदारी और स्थितियों के यथातथ्य विश्लेषण से युक्त सुहृद जी का यह आलेख गुजरात में मोदीत्व के उभार की परिघटना का आईना प्रस्तुत करता है।