वामपंथ का व्यामोह : ले. सुनील
December 30, 2007 by अफ़लातून
‘ वामपंथी अर्थशास्त्री जमीन से नहीं जुड़े हैं और असलियत को नहीं जानते हैं । प्रभात पटनायक ने जो लिखा है , उसे मैंने पढ़ा है । मैं उससे सहमत नहीं हूँ।’
पश्चिम बंगाल के मुख्यमन्त्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने एक टीवी साक्षात्कार में यह बात कही । प्रभात पटनायक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्राध्यापक हैं और देश के एक बड़े वामपंथी अर्थशास्त्री और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख वैचारिक सूत्रधार माने जाते हैं। केरल में वाम मोर्चा की सरकार बनने के बाद उन्हें केरल योजना मंडल का उपाध्यक्ष भी बनाया गया है । वे माकपा के एक प्रमुख नेता व पोलितब्यूरो के सदस्य सीताराम येचुरी के शिक्षक भी रहे हैं । माकपा के नजदीक माने जाने वाली जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की दो अन्य प्राध्यापक अर्थशास्त्री उत्सा पटनायक एवं जयति घोष के बारे में भी पश्चिम बंगाल के मुख्यमन्त्री ने इसी तरह की बातें कहीं । बुद्धदेव भट्टाचार्य का स्पष्ट कहना है कि उन्हें औद्योगीकरण के लिए पिछले चुनाव में भारी जनादेश मिला है और वे इससे पीछे नहीं हटेंगे।
वामपंथी दलों से जुड़े बुद्धिजीवी दुविधा में हैं । वे जानते हैं कि पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा सरकार गलत राह पर चल पड़ी है । वे इस सरकार के खिलाफ़ बाहर खुलकर बोलना नहीं चाहते । जब सिंगूर का संघर्ष सामने आया , तो सुमित सरकार के अपवाद को छोड़कर चुप रहे। जब नन्दीग्राम में सरकार ने गोली चलाई , कई लोग मारे गए और पूरे देश में बवाल मच गया , तो उन्होंने एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया । इस वक्तव्य में उन्होंने नंदीग्राम की घटनाओं पर अफसोस जारी किया,इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया , किंतु पश्चिम बंगाल सरकार और उसकी औद्योगीकरण की नीति के खिलाफ कुछ नहीं कहा ।
लेकिन नंदीग्राम शान्त नहीं हुआ। आज पूरे देश में औद्योगीकरण , विस्थापन,विशेष आर्थिक क्षेत्रों , वैश्वीकरण आदि पर जो बहस छिड़ी है,उसे इन घटनाओं ने और तेज कर दिया ।ऐसे समय में एक ईमानदार बुद्धिजीवी चुप नहीं रह सकता। प्रभात पटनायक ने भी आखिरकार प्रमुख अर्थशास्त्रीय पत्रिका ‘इकॉनॉमिक एण्ड पॉलिटिकल वीकली’ में एक लेख लिखा । इस पत्रिका के २६ मई-१ जून २००७ के अंक में ‘नंदीग्राम के बाद’ शीर्षक से यह लेख छपा है। अभी तक प्रकाश करत , वृन्दा करत , विमान बुस आदि ने पश्चिम बंगाल सरकार के बचाव में फूहड़ ढ़ंग से तर्क देते हुए जो लेख लिखे हैं , उनसे यह अलग है। इस साहसपूर्ण लेख के लिए प्रभात पटनायक बधाई के पात्र हैं । शायद इसी लेख की प्रतिक्रिया में बुद्धदेव भट्टाचार्य ने यह टिप्पणी की है ।
इस लेख में पहले तो प्रभात पटनायक ने उन लोगों की आलोचना की है और उनके अन्तर्विरोध बताये हैं , जो सिर्फ माकपा को और इसके ‘स्टालिनवादी’ तरीकों को गाली देने का मौका ढूंढते रहते हैं। फिर पटनायक ने कहा है कि अभी जो नवउदारवादी नीतियां चल रही हैं , उनमें नंदीग्राम जैसी त्रासदियां तो होंगी हीं । नवउदारवादी व्यवस्था में जो एकमात्र किस्म का औद्योगीकरण संभव है , वह ‘कॉर्परेट औद्योगीकरण’ ही है और यह अनिवार्य रूप से जनविरोधी होगा । इससे देश में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दोनों तरीकों से रोजगार बढ़ाने की उम्मीद नहीं की जा सकती। ये बड़े उद्योग स्वयं बहुत कम रोजगार पैदा करेंगे तथा ये जिन छोटे उद्योगों की जगह लेंगे , उनमें रोजगार खतम होगा। साथ ही,तकनालाजी की प्रगति के साथ भविष्य में रोजगार और कम होंगे। इसलिए किसान अपनी जमीन उद्योगों के लिए नहीं देना चाहते हैं । वे जानते हैं कि उन्हें चाहे जैसा मुआवजा मिले , उन्हें वैकल्पिक रोजगार मिलने की उम्मीद बहुत कम है ।
प्रभात पटनायक कहते हैं कि इसी कारण से औद्योगीकरण के लिए यह तर्क बिल्कुल निराधार है कि इससे रोजगार की समस्या हल होगी या खेती का अतिरिक्त श्रम इसमें खप जाएगा । यह सही है कि आज के विकसित पूंजीवादी देशों में औद्योगीकरण की प्रक्रिया और खेती से अतिरिक्त श्रम बाहर निकलने की प्रक्रिया साथ चली थी , किंतु वास्तव में वह श्रम अमरीका- ऑस्ट्रेलिया की ‘नयी दुनिया’ में चला गया था । साथ ही उपनिवेशों में औद्योगिक विनाश और बेरोजगारी भी इसी के साथ जुड़ी थी । इसलिए ‘ यह विश्वास करना पूरी तरह गलत है कि आज के पूंजीवाद के अंतर्गत , हमारे जैसे देश में , आबादी के बड़े हिस्से को खेती से निकालकर बड़े उद्योगों में खपाया जा सकता है।”
[ जारी ]


सही आलेख है, अगली कड़ी का इंतजार रहेगा।