‘ विचारधारा और इतिहास के अंत की ‘ घोषणाओं का वैश्वीकरण के हक़ में एक निश्चित बौद्धिक सहयोग है । फोर्ड फाउन्डेशन पोषित एक शोध में पुराने राष्ट्र-राज्य की अवधारणा के स्थान पर राज्य-राष्ट्र और ‘मल्टीनेशनल स्टेट’ जैसी अवधारणा प्रस्तुत करते हुए कस्मीर और उत्तर-पूर्वी भारत के उदाहरण दिए गए हैं । ऐसे विद्वानों द्वारा तमिलनाडु के [...]
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‘बौद्धिक साम्राज्यवाद की शिनाख्त’ शीर्षक से ७ दिसम्बर २००५ को जनसत्ता के सम्पादकीय पृष्ट पर छपे लेख का प्रथम भाग ‘मोहल्ला’ में छपा था । आज दूसरा भाग प्रस्तुत है ।
जिनका भाँडा फूट चुका है
फोर्ड फाउन्डेशन और सीआईए के अधिकारी रिचर्ड बिसेल ने परराष्ट्र संबंध परिषद के एक चर्चा समूह से मुखातिब होते हुए कहा [...]
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Posted in Uncategorized on February 17, 2008 | 2 Comments »
[ मित्रों , मेरे एक प्रिय चिट्ठाकार को एक अन्य प्रिय चिट्ठेकार (और पत्रकार) ने एक ऐसी जगह बोलने के लिए न्यौता दिया था कि मुझे एक बुनियादी बहस को शुरु करने की गुंजाइश दिखी। मैंने यह घोषित कर दिया था कि मैं ७ दिसम्बर , २००५ को ‘जनसत्ता’ में सम्पादकीय पृष्ट पर छपे मुख्य [...]
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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने पिछले साल नवम्बर की छह तारीख को पश्चिम बंगाल के नन्दीग्राम में हुई मौतों के लिए राज्य की बुद्धदेव सरकार की ढील को जिम्मेदार ठहराया है। इस सम्बन्ध में अपनी रिपोर्ट जारी करते हुए एनएचआरसी ने कहा है कि राज्य सरकार को खुद उस हिंसा की जिम्मेदरी लेनी चाहिए और [...]
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नीचे प्रस्तुत पुस्तिकाएँ मैंने अपने चिट्ठों समाजवादी जनपरिषद , तथा यही है वह जगह पर समय-समय पर धारावाहिक तौर पर पेश की थीं। यहाँ इनमें से नौ पुस्तिकाओं को पी.डी.एफ़ फाइल के तौर पर प्रस्तुत करते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है । पुस्तिकाओं और प्रस्तुति पर सुझाव और प्रतिक्रिया का स्वागत है ।
विदेशी पूँजी [...]
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[लेखक परिचय : मॉड बार्लो - कैनेडा के सबसे बडे जनसंगठन ‘काउन्सिल ऑफ़ कैनेडियन्स’ की अध्यक्षा.वैनकूवर ,टोरेन्टो तथा हेलिफैक्स शहरों में पानी के निजीकरण के विरुद्ध यह संगठन सक्रिय है.पानी के निगमीकरण पर टोनी क्लार्क के साथ लिखी गयी चर्चित पुस्तक ‘ब्लू गोल्ड’ की लेखिका.
टोनी क्लार्क - लोकतांत्रिक समाज परिवर्तन के संघर्ष हेतु जन आन्दोलनों को [...]
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किन्हीं उपभोक्तावादी उत्पाद की निर्माता कम्पनी की मंशा यदि पूरी दुनिया के बाजार पर छा जाने की हो तब क्या वे रंगभेद का पालन कर सकती हैं ? सरसरी तौर पर सोचने पर लगेगा कि वे किसी भी समूह से भेद-भाव करने से बचने का प्रयास करेंगी . लेकिन ऐसा सोचना सच्चाई से परे है.कोका [...]
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Posted in gandhi on February 3, 2008 | 4 Comments »
गांधी जी पंडित नेहरू को (अक्टूबर,१९४५) :
हमारे दृष्टिकोणमें जो भेद है उसके बारे में मैं लिखना चाहता हूं . यदि वह भेद बुनियादी है तब तो जनता को वह मालूम हो जाना चाहिए . उसे (जनताको) अन्धकारमें रखने से हमारे स्वराज्य के कार्य को हानि पहुंचेगी .
गांधी जी नेहरू को (स्वाधीनता के बाद) :
मेरा [...]
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Posted in colas, corporatisation, water on February 2, 2008 | 4 Comments »
Technorati tags: कोला कम्पनियाँ, कोकाकोला, पेप्सी, श्रमिक हत्या
इन दोनों बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा गरीब देशों की इकाइयों में मजदूरों के साथ अत्यन्त अमानवीय कृत्य किए जाते हैं . दक्षिण अमेरिकी देश कोलोम्बिया में कोका - कोला कम्पनी द्वारा अपने मजदूरों पर दमन और अत्याचार सर्वाधिक चर्चित है . कोलोम्बिया की राष्ट्रीय खाद्य - पेय कामगार यूनियन [...]
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”उपभोग जीवन की बुनियादी जरूरत है . इसके बगैर न जीवन सम्भव है और न वह सब जिससे हम जीवन में आनन्द का अनुभव करते हैं.
इसके विपरीत ऐसी वस्तुएं , जो वास्तव में मनुष्य की किसी मूल जरूरत या कला और ग्यान की वृत्तियों की दृष्टि से उपयोगी नहीं हैं लेकिन व्यावसायिक दृष्टि से प्रचार [...]
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