कोला कम्पनियाँ - रँगभेद अौर खाद्य मानकोँ मेँ दखल
February 4, 2008 by अफ़लातून
किन्हीं उपभोक्तावादी उत्पाद की निर्माता कम्पनी की मंशा यदि पूरी दुनिया के बाजार पर छा जाने की हो तब क्या वे रंगभेद का पालन कर सकती हैं ? सरसरी तौर पर सोचने पर लगेगा कि वे किसी भी समूह से भेद-भाव करने से बचने का प्रयास करेंगी . लेकिन ऐसा सोचना सच्चाई से परे है.कोका - कोला कम्पनी के अटलान्टा , अमेरिका स्थित मुख्यालय के काले कर्मचारियों ने १९९९ में कम्पनी के ख़िलाफ़ रंग भेद का मुकदमा दाखिल किया . अपने दावे को साबित करने के लिए इन कर्मचारियों ने दमदार आंकडे और किस्से प्रस्तुत किए . मसलन १९९८ में अफ़्रीकी - अमेरिकी कर्मचारियों की औसत तनख्वाह ४५,२१५ डॊलर थी जबकि गोरे कर्मचारियों की औसत तनख्वाह ७२,०४५ डॊलर थी . हांलाकि अफ़्रीकी-अमेरिकी कर्मचारी कुल संख्या का १५ फ़ीसदी हैं पर्न्तु सर्वोच्च वेतनमान में उनका प्रतिनिधित्व नगण्य है . कोका - कोला कम्पनी में पदोन्नति के लिए मूल्यांकन में व्यवस्थापकों के व्यक्तिपरक विवेक की अत्यधिक गुंजाइश की छूट है , जिसके फलस्वरूप मूल्यांकन में रंगभेद प्रकट होता है . इस मूल्यांकन पद्धति के कारण ही ऊपर के वेतनमानों में काले लोगों का प्रतिनिधित्व नहीं हो पाता है . कोका - कोला के अधिकारी कई महीनों तक इन आरोपों को नकारते रहे .अप्रैल , २००० में तीस मौजूदा व पूर्व कर्मचारियों ने अपने मुकदमे के प्रचार तथा विवाद के न्यायपूर्ण निपटारे की मांग के साथ कम्पनी के अटलांटा स्थित मुख्यालय से एक बस पर सवार हो कर ‘ न्याय - यात्रा ‘ निकाली .यात्रा विलिमिंग्टन तक की थी जहां कम्पनी के शेयरधारकों की वार्षिक बैठक होने वाली थी . कोका - कोला कम्पनी ने अन्तत:
१९ करोड ३० लाख डॊलर पर समझौता कर लिया . अमेरिकी रंगभेद - मुकदमों के इतिहास में यह सबसे बडी समझौता राशि है . समझौते के तहत पीडित कर्मचारियों को ११ करोड ३० लाख डॊलर , काले कर्मचारियों के वेतन बढाने के लिए ४ करोड ३५ लाख डॊलर , कम्पनी के नियुक्ति एवं पदोन्नति कार्यक्रम के मूल्यांकन व नियंत्रण के मद में ३ करोड ६० लाख डॊलर तथा वादी के कानूनी खर्च के मद में दो करोड डॊलर देने पडे .
दक्षिण अफ़्रीका में जब रंगभेद चरम पर था तथा उस पर दुनिया के सभी देशों ने ‘ व्यापारिक प्रतिबन्ध ‘ लगा दिए थे तब भी पेप्सीको व कोका - कोला द्वारा अपने पेय वहां भेजे जा रहे थे . बर्मा में लोकतंत्र बहाली आन्दोलन की नेता आंग सांग सू की द्वारा तानाशाही शासन का व्यावसायिक बहिष्कार करने की अपील के तहत कुछ संगठनों ने अभियान चलाया था . पेप्सीको द्वारा लम्बे समय तक बर्मा में व्यवसाय जारी रखने को मुद्दा बना कर उसके उत्पादों के बहिष्कार का अभियान भी इन संगठनों ने चलाया था . कम्पनी ने बदनामी से बचने के लिए अमेरिकी विदेश नीति का हवाला दे कर बर्मा से अन्ततोगत्वा कामकाज समेट लिया .
अन्तरराष्ट्रीय खाद्य मानकों में कचरा खाद्य खेमे की दख़ल
कचरा खाद्य उत्पादों को दुनिया भर में बेचते रहने के लिए कोला कम्पनियों के लिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि उनकी दखल और साँठ गाँठ राजनीति , विश्व स्वास्थ्य संगठन , विग्यापन और टेलीविजन कम्पनियों , विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों , बैंकों , कोडेक्स जैसी खाद्य मानक निर्धारित करने वाली अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं , रसायन कम्पनियों तथा अन्य बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से हो . कोका - कोला और पेप्सीको ने अपनी करतूतों को बदस्तूर जारी रखने के लिए ऐसी संस्थाओं से औपचारिक सम्बन्ध बनाए हैं . मनुष्य और प्रकृति के शोषण व दोहन की प्रक्रिया में इन गठजोड़ों का परस्पर सहयोग रहता है . इस मिलीभगत के परिणाम आखिरकार आम आदमी के अहित में होते हैं तथा इनसे कम्पनियों के मुनाफ़े का इजाफ़ा होता है . कुछ उदाहरणों से यह स्पष्ट हो जाएगा . विश्व स्वास्थ्य संसद ( विश्व स्वास्थ्य संगठन की आम सभा ) ने १९ अप्रैल २००४ को ‘ आहार , शारीरिक गतिविधि और स्वास्थ्य पर अन्तर्राष्ट्रीय रणनीति का मसविदा ‘ पेश किया है . कचरा - खाद्य और पेय उद्योग तथा विग्यापन कम्पनियाँ इस लचर मसविदे से खुश हैँ क्योंकि यह सदस्य देशों के बच्चों को लक्ष्य कर बनाए गए कचरा खाद्य के विग्यापनों पर प्रतिबन्ध लगाने की नीति की सिफ़ारिश नहीं करता है . टेलिविजन कम्पनियाँ इस बात पर गदगद होंगी कि इस नीति में मोटापा बढ़ाने में टेलिविजन की भूमिका का जिक्र नही है . प्रतिदिन खुराक में चीनी की खपत कुल कैलोरी खपत का दस फ़ीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए , यह कहने से बचा गया है . फलों और सब्जियों के उत्पादन और बिक्री को बढ़ावा देने की बात अमेरिका और कचरा खाद्य उद्योग के विरोध के चलते इस नीति में शामिल नहीं की गयी है . अंतर्राष्ट्रीय रणनीति में यह जरूर शामिल करना पड़ा है कि
खाद्य और पेय विग्यापनों द्वारा बच्चों की अनुभवहीनता और भोलेपन का दोहन नहीं होना चाहिए तथा अस्वास्थ्यकर खुराक - आदतों को प्रोत्साहित करने वाले विग्यापन-संदेशों को बढ़ावा न दिया जाए . सदस्य देशों की सरकारों से यह जरूर कहा गया है कि
‘ स्कूलों में ज्यादा चीनी , ज्यादा नमक और ज्यादा वसा वाले खाद्यों की उपलब्धता को सीमित किया चाहिए ‘ .खाद्य मानकों के अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारण हेतु गठित संगठन ‘
कोडेक्स एलिमेन्टारियस ‘ में यह कम्पनियाँ अमेरिका का प्रतिनिधित्व करती रही हैं . नतीजन इन पेयों में प्रयुक्त अखाद्य फॊस्फोरिक एसिड को अनुमति मिली हुई है .कशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भूभौतिकी विभाग को कोका - कोला कम्पनी ने एक शोध अनुदान दिया है . इस ‘ शोध ‘ द्वारा कम्पनी पूर्वी उत्तर प्रदेश में भूगर्भ जल की उपलब्धता और पानी की विभिन्न सतहों की गहराइयों की जानकारी प्राप्त करेगी . भारत में लगभग पूरी तरह मुफ़्त पानी प्राप्त करने वाली कम्पनियाँ इस प्रकार की शोध योजनाओं की सूचनाओं के आधार पर नए संयंत्र लगा कर विस्तार करती हैं . प्लाचीमाड़ा और मेंहदीगंज में शुरु हुए आन्दोलनों के कारण भूगर्भ जल के दोहन का मुद्दा चर्चा का विषय बना है तथा संयुक्त संसदीय समिती तथा सर्वोच्च न्यायालय में भी यह चर्चा का मसला है .
इन दोनों कम्पनियों की करतूतें विश्वव्यापी हैं . यह कम्पनियाँ उपभोक्तावादी संस्कृति की प्रतीक बन चुकी हैं . गरीब देशों में प्राकृतिक संसाधन के दोहन और श्रम के शोषण द्वारा यह अपनी लूट की मात्रा को बढ़ा लेती हैं .
इनके विरोध का वैश्वीकरण हो , यह वक्त का तकाजा है .
Posted in colas | Tagged codex, colas, food standards, racial discrimination | 1 Comment
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हम और हमारे बच्चे तो कचरा भोजन व पेयों से अपने बचपन में बच गए । आज के शहरी बच्चों को देख अपने स्कूल के दुबले पतले, दौड़ते भागते बच्चों को देख खुशी होती है कि ये शहरों में नहीं हैं । ये आज भी पारम्परिक नाश्ता कर स्कूल आते हैं । कभी कभार कुछ भी खाया जा सकता है परन्तु उसे जीवन प्रणाली बनाने के परिणाम शहरी बच्चों में मोटापे, उच्च रक्तचाप व बढ़ते हुए मधुमेह के रूप में हमारे सामने आ रहे हैं ।
घुघूती बासूती