बौद्धिक साम्राज्यवाद की शिनाख्त : अफ़लातून
February 17, 2008 by अफ़लातून
[ मित्रों , मेरे एक प्रिय चिट्ठाकार को एक अन्य प्रिय चिट्ठेकार (और पत्रकार) ने एक ऐसी जगह बोलने के लिए न्यौता दिया था कि मुझे एक बुनियादी बहस को शुरु करने की गुंजाइश दिखी। मैंने यह घोषित कर दिया था कि मैं ७ दिसम्बर , २००५ को ‘जनसत्ता’ में सम्पादकीय पृष्ट पर छपे मुख्य लेख ‘बौद्धिक साम्राज्यवाद की शिनाख्त’ को चिट्ठे पर दूँगा। मित्र अविनाश से पूछा कि क्या यह ‘मोहल्ले’ पर दिया जा सकता है,तो उन्होंने खुशी से सहमती जतायीऔर यह भी बता दिया कि इस बाबत उन्हें जानकारी का अभाव है। मैंने इस चर्चा को शुरु करते वक्त दो प्रिय व्यक्तियों डॉ. सुनील दीपक और आदरणीय मैथिलीजी से इस बाबत प्रश्न किया। मैथिलीजी ने पत्र लिख कर अपने विचार बहुत स्पष्ट कर दिए :
आदरणीय अफलातून जी;
सादर प्रणाम
आपका मेरे प्रति पश्न ही मुझे यह बताता है कि आप मेरे कार्यों के लिये कितने संवेदनशील हैं.
श्री सुनील दीपक के आगमन की सूचना एक माह पूर्व थी और हम सब उनसे बातचीत के लिये कहीं मिलना चाहते थे.
मैं सराय में श्री अविनाश जी के निमंत्रण पर गया था, लेकिन सिर्फ ब्लागर्स से मिलन हेतु. मैं व्यक्तिगत रूप से किसी भी विदेशी संस्था से धन लेकर बौद्धिक गतिविधि में भाग लेना उचित नहीं समझता. मेरा तो यही विश्वास है. सराय से हमारा कैसा भी संपर्क नहीं है.
मुझे इससे पहले सराय के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी. बस एक दो संदर्भों में नाम भर सुना था. श्री रवि रतलामी के ब्लाग पर जिसमें उन्होंने फैलोशिप के बारे में लिखा था उस पर मैंने टिप्पणी की थी कि हम ये काम करेंगे लेकिन किसी फैलोशिप के लिये नहीं, मुक्त स्रोत के लिये.
मुझ में आप अपना विश्वास कायम रखिये.
सादर आपका
मैथिली
युवा चिट्ठेकार मसिजीवी ने ‘सराय’ से नाता रखने वाले कई चिट्ठेकार/साहित्यकार आदि के नाम दिए हैं । मैंने एक बार नीलिमा और सुजाता में भेद नहीं किया था और इसके लिए माफ़ी माँगी थी,उसके बाद से अन्तर स्पष्ट है। प्रगतिशील दिखने वाले विदेशी धन पर चलने काम के बारे में जिन्हें सफाई की आवश्यकता होगी उन्हें इस लेख को पूरा देने के बाद ही नजीर पेश कर सकूँगा। बौद्धिक साम्राज्यवाद की शिनाख्त
मानव जीवन की तमाम गतिविधियों को अलग-अलग खांचों में बांट कर देखने पर हम अंधों के समूह की भांति अलग - अलग और आंशिक हकीकत को ही जान पाते हैं। यही नहीं , हम उसे संपूर्ण मान बैठते हैं । इसलिए सामाजिक , राजनीतिक , आर्थिक या बौद्धिक-शैक्षिक गतिविधियों को बांट कर नहीं देखा जाना चाहिए। शिक्षा की जहां अपनी एक दुनिया है वहीं उसमें व्यापक विश्व का प्रतिबिम्ब भी दिखाई देता है । अब तक अलग अलग दौर की जो भी समाज व्यवस्थाएं रहीं हैं उनके स्थापित मूल्यों और शक्ति-सन्तुलन को टिकाए रखने का चुनिंदा औजार उस जमाने की शिक्षा व्यवस्था होती है। जमाने के अच्छे-बुरे मूल्यों और मुल्क और इतिहास की दिशा में इस लिहाज से शिक्षा व्यवस्था की भूमिका अहम हो जाती है ।
यथास्थिति को बरकरार रखने की प्रक्रिया में हर जमाने की शिक्षा व्यवस्था में मौजूद एक बुनियादी गुण की महत्वपूर्ण भूमिका होती है । यह गुण ‘अभिजात्यीकरण’ के रूप में देखा जा सकता है ।अभिजात्यीकरण एक क्रमिक ‘मलाई’ निकालने की एक प्रक्रिया होती है।इस क्रम की शुरुआत प्राथमिक स्कूल से ही हो जाती है । अभिजात्य वर्ग द्वारा परिभाषित उत्कृष्टता के मानकों पर भविष्य के अभिजात्य वर्ग के लिए मुट्ठी भर लोग बाकी समाज से अलग छांट लिए जाते हैं । यह सर्वथा मुमकिन है कि वंचित तबकों के कुछ बच्चे भी अलग न किए जाएं। अभिजात्यीकरण की छलनी शैक्षिक आरोहण की इस प्रक्रिया में क्रमश: महीन होती जाती है।चूंकि शिक्षा समाज की एक उपव्यवस्था है इसलिए उस समाज की सभी विशिष्टताओं का प्रतिबिम्ब उसमें देखा जा सकता है।
इस दौर में मौजूदा ‘विश्व आभिजात्य वर्ग’ नवऔपनिवेशिक षडयन्त्रों और अपसंस्कृति से परे हटता नहीं दिखाई देता।दूसरे विश्वयुद्ध के बाद सबसे बड़ी ताकत के रूप में अमेरिका स्थापित हुआ और तब से ही गवेषणा की अंतर्राष्ट्रीय दानदाता संस्थाओं से सत्ता-प्रतिष्ठान के नुमाइंदों का सम्बन्ध ‘मौसेरे भाइयों’ का रहा है । छठे दशक के मध्य में शोध सहायक इन दानदात्री संस्थाओं और अमेरिकी गुप्तचर एजेंसियों के गठजोड़ का पर्दा हुआ जिसके फलस्वरूप उनकी कूटनीति बदनाम हुई,उसे धक्का पहुँचा। इस खुलासे में कई भारतीय विभूतियों और शोध संस्थाओं के नाम भी चर्चा में आए थे। विदेशी धन का मूल स्रोत स्वयं इन लोगों के लिए अचरज का विषय था और कुछ ने उक्त अनुदानों को लेना बन्द कर दिया। लेकिन इस खुलासे से ऐसे अनुदान देने वाली अजेंसियों का हृदय परिवर्तन हो गया हो यह मानना शेर के शाकाहारी बन जाने की कल्पना करना होगा ।
फोर्ड , रॉकफेलर,और कार्नगी फाउन्डेशन जैसे दानदाता प्रतिष्ठानों और अमेरिकी शासन तंत्र के बीच का सेतु उनकी ‘परराष्ट्र संबंध परिषद’ है जो अंतर्राष्ट्रीय मामलों में सर्वाधिक प्रभावशाली नीति निर्धारक समूह के तौर पर प्रतिष्ठित है। इस संस्था के अभिजात्यवादी स्वरूप के अनुरूप इसकी नियमवाली में उन्नीस सौ व्यक्तियों की अधिकतम सदस्यता निर्धारित है।नई सदस्यता मौजूदा सदस्यों की सिफारिश पर ही होती है।परिषद के सदस्यों की फेहरिस्त में अमेरिकी विदेश नीति को प्रभावित करने की योग्यता वाले तमाम नाम मिल जाएंगे।
परिषद की बैठकें गुप्त होती हैं।इसकी बहुराष्ट्रीय शाखा - त्रिपक्षीय आयोग ( ट्राइलैटरल कमीशन) - का संदर्भ परिषद की बैठकों में चर्चा का विषय बना रहता है। परिषद के तत्कालीन अध्यक्ष डेविड रॉकफेलर द्वारा १९७२ में त्रिपक्षीय आयोग की स्थापना की गई। रॉकफेलर फाउन्डेशन का सहयोग भी इस पहल को प्रप्प्त था।यह परिषद सीधी सरकारी सहायता से मुक्त है, पर प्रमुख दानदाता प्रतिष्ठान इसे भरपूर आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं। राजनैतिक , सैन्य,व्यापारिक और शैक्षणिक हलकों की चोटी विभूतियाँ परिषद को सुशोभित करती हैं। अमेरिकी जनताअ के बीच गुप्तचर एजेंसी सीआईए की प्रमुख पहल के रूप में इसकी पहचान है। ( जारी )


संभव है कि शोध-उत्साही हमारे बुद्धिजीवी इस तरह की फेलोशिप का वित्तपोषण करने वाले मूल स्रोतों के चरित्र और नीयत से अनभिज्ञ रहते हों या फिर अपनी शोधपरकता को केवल आम खाने तक केन्द्रित रखते हों और गुठली की परवाह करना जरूरी न मानते हों। परंतु यदि उन्हें सबकुछ साफ-साफ पता हो तब भी शायद ही उन्हें कोई फर्क पड़ेगा। जिन शोध चेष्टाओं का प्रयोजन अपनी बौद्धिकता के लिए मंडी तलाशना और उसके जरिए अपनी छिछली महत्वाकांक्षा को संतुष्ट करना भर हो, उससे यह उम्मीद करना बेमानी है कि वे अपनी शुचिता के लिए अतिरिक्त रूप से सचेत रहें और अपने निष्कर्षों को कर्म, चरित्र और व्यवहार में भी उतारने की दिशा में भी सचेष्ट हों।
आपकी टिप्पणी एक दूरगामी बहस को छेड़ने का निमित्त बनी, इसके लिए साधुवाद.
ज्ञानवर्धक — अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी