बौद्धिक साम्राज्यवाद..(२) : जिनका भाँडा फूट चुका है- अफ़लातून
February 18, 2008 by अफ़लातून
‘बौद्धिक साम्राज्यवाद की शिनाख्त’ शीर्षक से ७ दिसम्बर २००५ को जनसत्ता के सम्पादकीय पृष्ट पर छपे लेख का
प्रथम भाग ‘मोहल्ला’ में छपा था । आज दूसरा भाग प्रस्तुत है ।
जिनका भाँडा फूट चुका है
फोर्ड फाउन्डेशन और सीआईए के अधिकारी रिचर्ड बिसेल ने परराष्ट्र संबंध परिषद के एक चर्चा समूह से मुखातिब होते हुए कहा –
यदि एजेंसी को असरकारक बनना है तो उसे निजी संस्थाओं का प्रयोग और व्यापक स्तर पर करना होगा ,हालांकि जिन संबंधों का भांडा फूट चुका है उन्हें फिर से गढ़ना नामुमकिन है । हमें अपने क्रियाकलापों को गहरे आवरण के नीचे संचालित करना होगा। और ‘मध्यस्थों’ के इस्तेमाल को बढ़ाना होगा। यदि ये समूह अपनी आमदनी के मूल स्रोत के बारे में अवगत नहीं होते तब भांडा फूटने के फलस्वरूप हुआ नुकसान काफ़ी कम होता । “
जी विलियम डॉमहॉक की पुस्तक ‘ द हायर सर्कल्स’ में ‘हाउ द पावर इलीट मेक फॉरेन पॉलिसी’ शीर्षक से एक अध्याय है। फोर्ड फाउन्डेशन द्वारा वित्त पोषित पररा्ष्ट्र संबंध परिषद की कार्य प्रणाली की बाबत इस अध्याय में प्रकाश डाला गया है -
” राजनीतिशास्त्री लेस्टर मिलब्रैथ कहते हैं सरकार से सहायता प्राप्त न किए जाने के बावजूद परिषद की स्वायत्त कार्रवाइयों और सरकार प्रेरित कार्रवाई में फर्क कर पाना बहुत कठिन है । अपनी शोध पत्रिका फॉरेन एफ़ेयर्स से प्राप्त आमदनी और निवेश से प्राप्त लाभांश के अलावा परिषद की आय का प्रमुख स्रोत विभिन्न बहुराष्ट्रीय कंपनियां और फोर्ड , रॉकफ़ेलर जैसे प्रतिष्ठान होते हैं ।” परिषद के साथ संबंधों का वृत्त पूरा होता है इन प्रतिष्ठानों के ट्रस्टियों-पदाधिकारियों के परिषद के सदस्य होने से ।एक अध्ययन के अनुसार रॉकफेलर फाउन्डेशन के बीस में बारह , फोर्ड फाउन्डेशन के पन्द्रह में दस और कार्नेगी फाउन्देशन के चौदह में दस ट्रस्टी इस परराष्ट्र परिषद में भी थे ।
परिषद और प्रतिष्ठानों के अलावा शुद्ध शैक्षणिक समूहों की प्रवृत्तियाँ भी गौरतलब हैं । १९४२ में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के रजत जयन्ती समारोह के अवसर पर महात्मा गांधी ने कहा था कि ” हमारे देश के विश्वविद्यालय पश्चिम के विश्विद्यालयों के ‘सोख़्ता’ हैं । पूर्व के हार्वर्ड ,एमाईटी अथवा पूर्व के ऑक्स्फॉर्ड ,कैम्ब्रिज कहलाना उपनिवेश रह चुके देशों के विश्वविद्यालयों द्वारा मौजूदा दौर में भी फख्र के साथ होता है। विश्वविद्यालय की योग्यता का मूल्यांकन पश्चिमी देशों के विद्वानों से करवाने की होड़ लग जाती है।’गुणवत्ता’ के ऐसे प्रमाणपत्र प्राप्त करने के बाद ही वे ‘विश्व स्तरीय’ माने जाते हैं।
जाहिर है , विश्व स्तरीय संस्थाओं से ही इन देशों के उच्च शैक्षणिक संस्थानों का गठजोड़ होता है । विदेश जाने के वजीफे , शोध-परियोजनाएं इस गठजोड़ को पुख़्ता करने के प्रमुख साधन हैं । पश्चिम की अंधी नकल और पश्चिमी देशों की शोध-पत्रिकाओं में परचों के प्रकाशन के साथ जुड़ी प्रतिष्ठा बौद्धिक गुलामी का आम लक्षण है।
तीसरी दुनिया में अमेरिकीकरण का एक बड़ा प्रयास नाइजीरिया में चल रहा है । यूएसएआईडी ( USAID ) से मुख्यत: धन प्राप्त करने वाली इस परियोजना को अनुपूरक सहायता फोर्ड और कार्नेगी फाउन्डेशन से प्राप्त होती है । परियोजना का घोषित लक्ष्य नाइजीरिया के भावी नेताओं को निर्णय प्रक्रिया के संदर्भ में ‘ वैचारिक प्रशिक्षण ‘ प्रदान करना है । नाइजीरिया की शैक्षणिक संस्थाओं के लिए बाहरी मदद के स्रोत और असर को निश्चित करने के साथ-साथ इस परियोजना द्वारा अमेरिकी अन्वेषकों को नाइजीरिया में अनुप्रवेश भी मिलता है । दानदाताओं को विश्वविद्यालय केन्द्रित तकनीकी शोध विशेषज्ञों की सूची प्रदान करना भी एक उद्देश्य से इन दूरगामी मनोवैज्ञानिक कार्रवाइयों पर अरबों डॉलर खर्च किए जा रहे हैं ।
राजनीतिशास्त्रियों का अमेरिकी एसोशियेशन गंभीरतापूर्वक अपना अंतर्राष्ट्रीयकरण करने की दिशा में पहल कर चुका है । एसोशियेशन की अंतर्राष्ट्रीय कमेटी के अध्यक्ष आशुतोष वार्ष्णेय (अनिवासी भारतीय और CSDS के साथ फोर्ड फाउन्डेशन की एक परियोजना के प्रमुख) इस पहल की प्रासंगिकता को समझाते हुए चीन और भारत की मौजूदा दौर की प्रगति का उल्लेख करते हैं। एसोशियेशन की अध्यक्ष मार्गरेट लेबी के साथ वार्ष्णेय ने हाल ही में भारत का दौरा किया था। दौरे के मद्देनजर युवा भारतीय राजनीतिशास्त्रियों की बंगलूर में बैठक आयोजित की गई(भारत में इसकी पहलकदमी सीएसडीएस से जुड़े एक व्यक्ती ने की) । यह गौरतलब है कि वार्ष्णेय ‘परराष्ट्र नीति परिषद’ की एशिया प्रकोष्ठ का प्रमुख भी है ।फोर्ड फाउन्डेशन की छोटी मोटी परियोजनाओं का प्रमुख होने के अलावा अमेरिकी शिक्षा विभाग की दसियों लाख डॉलर की परियोजना उसके पास हैं। तीसरी दुनिया के देशों में शैक्षणिक सम्पर्क सूत्र बनाने के अलावा ऐसे लोगों द्वारा विदेश सेवा के अफसरों को भी जो्ड़ने के तत्परता से प्रयास होते हैं। इन प्रयासों के अंतर्गत विदेश में भारी वित्तीय मदद और सुविधाओं के साथ ‘अध्ययन अवकाश’ के मौके प्रदान किए जाते हैं।(वार्षणेय द्वारा श्रीलंका में पोस्टेड एक भारतीय राजनयिक को ऐसा ऑफ़र देने की बात मुझे उक्त राजनयिक ने बतायी) [अगली(अन्तिम) कड़ी में विचारधारा और इतिहास का अन्त और बौद्धिक साम्राज्यवाद]
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एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ में काम करनेवाले हमारे एक परिचित ने आज ही बातचीत में कहा कि उनके यहां काम करेंगे तो एजण्डा तो उन्हीं का ढोना पड़ेगा.
सही है, अफ़लातून भाई. हमारा भी ज्ञानवर्द्धन हुआ.
हालांकि अख़बार के लिए तैयार की गई सामग्री थोड़ा और सरस होकर यहां रहती तो ज़्यादा अच्छा होता. आगे-पीछे लौटकर बच्चे देखते, विचारधारा और इतिहास के अंत जैसी अभिव्यक्ति का मतलब क्या है, कुछ गुनते. वैसे, सही है.
अफलातूनजी
आपकी बात एकदम सही है। मुझे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान सबसे ज्यादा कोफ्त इसी बात से होती थी कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय पूर्व का ऑक्सफोर्ड कहा जाता था। और, ये फॉर्मूला तो साफ ही है कि किसी के भी पीछे-पीछे चलने से आप उससे आगे कभी नहीं निकल सकते।
दूसरी बात आप तो विदेशों से आए धन की बात कर रहे हैं। ये संदर्भ थोड़ा अलग हो सकता है लेकिन, मैं तो 9-10 साल के पत्रकारीय अनुभव और चार साल की टीवी की जिंदगी में ये समझ पाया हूं कि टीवी में मिल रहा मौटा पैसा तक लोगों की रीढ़ की हड्डी धीरे-धीरे या तो गायब कर देता है या उसे इतना लचीला बना देता है कि पहला मौका मिलते ही आदमी (पता नहीं रह जाता हो तो) अपने को थोड़ी सी ज्यादा मुद्रा देने का जुगाड़ कराने वाले आदमी के चरणों में होता है।
अफलातून जी , मोहल्ला पर आपके दादाजी की टिपण्णी है। जय हो अविनाश की।
अफलातूनजी, आपका ये लेख पढ़कर मुझे सीएनएन के न्यूज एंकर लू डॉब की याद आ गयी जैसे विचार आपके विदेशी फंड से होने वाले बौद्धिक विकास के लिये हैं कुछ कुछ वैसी ही टोन में लू डॉब इमीग्रेशन और आउटसोर्सिंग के बारे में चर्चा करते हैं। लेकिन उससे आउटसोर्सिंग और इमीग्रेशन दोनों ही नही रूका बल्कि ये जरूर बन गया।
आंखों में उंगली डाल कर सच दिखलाने वाली लेख-श्रंखला . शायद इससे उन भोले साथियों को कुछ संकेत मिलें जो यह मानते हैं कि विदेशी पैसा देने वाली एजेंसियों का कोई एजेंडा नहीं होता या उनके काम पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है .
जिसका पैसा उसका एजेंडा.
इस पर मैं अल़ग से पोस्ट लिख कर उदाहरण दे रहा हूं. कृपया वहां देखें.
अतुल
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