‘शेक्सपियर गुजर गए ,कीट्स नहीं रहे,मेरी तबीयत भी कुछ नासाज़-सी है’-मार्क ट्वेन
March 11, 2008 by अफ़लातून
आपात-काल के आखिरी दौर में लोकनायक जयप्रकाश के गुर्दों के बिगड़ने के बाद उन्हें कुछ दिन चंडीगढ़ के स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में रखा गया फिर मुम्बई ले आया गया ।जसलोक अस्पताल में डाइलिसिस होती और गैर-डाइलिसिस दिनों में वे अपने मित्र अखबार मालिक रामनाथ गोयनका के एक अतिथि गृह में आराम करते । दोनों ही स्थानों पर खूफिया निगरानी रहती । बनारस के रामभूषण जेपी से जसलोक में मिलकर निकले तब बन्दा वहाँ मौजूद था। लाल जूता पहने व्यक्ति ने उनसे नाम पूछा तो घबड़ा कर बोले -’मैं भूषण राम।’
उसी प्रवास में अतिथि गृह में जेपी के पाँव दबाने का मौका मिला था।इस कोटि का सुख १९६९ में सरहदी गाँधी बादशाह ख़ान के ०० नम्बर के विशाल पाँवों को दबाने में मिला था।बहरहाल जेपी ने खबर लेनी शुरु की तब मैंने उन्हें बताया कि उनके मित्र नवकृष्ण चौधरी नजरबन्दी के दौरान पक्षाघात के शिकार हुए तब उन्हें पेरोल के कागजात पर खुद के दस्तख़त करने में २५ मिनट लग गए थे।यह सुनकर जेपी उद्वेलित हो गए थे और जानकी बहन से बोले,
‘जरा डायरी निकाल कर,वह तारीख तो बताना’। जानकी बहन को वह तारीख बताने के लिए जेपी की जेल डायरी खोलने की जरूरत नहीं थी क्योंकि उन्हें वह तिथि याद हो चुकी थी। वह तिथि जब जेपी को अपनी सेहत बिगाड़ने का पहले पहल संशय हुआ था ।
चंडीगढ़ के पी जी आई से जेपी की सेहत की पहली ठोस खबर संस्थान से स्नातोकत्तर उपाधि पाने वाले तरुण शान्ति सेना के युवा नेता डॉ. अभय बंग ला चुके थे। उनसे प्रत्यक्ष मिल कर ।
देश की चिकित्सा व्यवस्था का शीर्ष इन ३०-३२ वर्षों में काफ़ी बदला है। हेलिकॉप्टर से मरीज ढोने वाले पाँच सितारा डीलक्स अस्पतालों को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है । शिवकुमार ‘पराग’ के दोहे को याद करें तो-
नर्सिंग होमों की दशा , देख दिया दिल रोए।
लाश तभी मिल पाएगी , बिल चुकता जब होए।
सार्वजनिक खजाने से निजी डीलक्स अस्पताल को तरह तरह के ऋण - अनुदान दिए जाते हैं तब आम जनता पर यह दोहरी मार होती है ।एक तरफ़ जनता की जेब से टैक्स निचोड़ना , दूसरी तरफ उस धन को ऐसी निजी सेवाओं के लिए लगाना जिसे पाना आम आदमी की सामर्थ्य से परे हो । गरीब से गरीब आदमी से भी सरकार को राजस्व मिलता है,यह अक्सर नजर अन्दाज कर दिया जाता है।मैं अक्सर दियासलाई का उदाहरण देता हूँ-इससे वसूले जाने वाले ‘टिकस’ की चिप्पी हर डिब्बे पर चिपकी रहती है।
मेरे शहर बनारस के सबसे बड़े निजी अस्पताल का मालिक एक भ्रष्ट पूर्व आबकारी कमीशनर है जिसे प्रदेश की सरकारी वित्तीय संस्था ‘पिकप’ ने आसान शर्तों पर १२ करोड़ ऋण दिया था तथा जिसकी’एम आर आई’ सेवा का उद्घाटन तकालीन मुख्यमन्त्री कल्याण सिंह ने किया था। इस अस्पताल में भर्ती हो कर इलाज करवाना आम जनता के पहुँच के बाहर है।
लखनऊ स्थित स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान में १० दिन गुजार कर मेरा यह यकीन पुख्ता हुआ है कि इस देश की जनता की विशिष्ट चिकित्सकीय से वा हेतु सरकारी क्षेत्र में ऐसे संस्थानों का बने रहना जरूरी है। जहाँ तक इस संस्थान के ‘नाम’ का सवाल है - उसके बारे में यह कहा जा सकता है कि इस मुहावरे का विलोम उस पर लागू होगा-”आँख का अन्धा नाम नैन सुख”।इस मुल्क की सियासत में एक लफंगे का संविधानेतर सत्ता के रूप में स्थापित होने का वह पहला उदाहरण था।ऐसा युवा जो मो्टर चुराने के आरोप में पॉलिटेकनीक से निकाला गया हो,जिसकी चप्पलें सूबे का दिग्गज मुख्यमंत्री उठाता हो और जो बगैर लाइसेंस के हवाई जहाज उड़ाने में ‘टें’ बोल गया हो।
ऐसे संस्थानों की चिकित्सा-सेवा का मेरुदण्ड उसके आवासीय चिकित्सक होते हैं। एक हफ़्ते में सर्वाधिक घण्टों की सेवा करने वाले ” कर्मठ,जुझारू,युवा,चिकित्सक”। ” ” के बीच आए अल्फ़ाज़ मैंने हृदय-शल्य के गहन चिकित्सा कक्ष में लगे आवासीय चिकित्सक डॉ. महेन्द्र कुमार के मुँह से सुने थे। चिदम्बरम के बजट भाषण में निजी चिकित्सालयों को बढ़ावा देने की बात है- यह बात वे नर्सों को समझाने की कोशिश कर रहे थे।
इस गहन चिकित्सा कक्ष के ग्यारह बिस्तरों पर मुझसे कमजोर आर्थिक स्थिति के मरीजों की बहुलता रही।उसमें कुछ को भले ही खेती लायक जमीन बेचनी पड़ी हो (यह मजबूरी नहीं होनी चाहिए) लेकिन उसके बाद इलाज पाना ऐसे सरकारी संस्थानों में ही मुमकिन है। यहाँ तीन धमनियों की बाई-पास शल्य में ७१,००० रुपए लगे । दिल्ली के डीलक्स पाँच सितारा अस्पताल में साढ़े सात लाख रुपए लगते और लखनऊ के ही छत्रपति साहू महाराज चिकत्सकीय विश्वविद्यालय में मात्र ४५,००० रुपए लगते।
इस मुल्क के गरीब मरीजों के प्रति आवासीय चिकित्सकों की सहानुभूति प्रकट करने वाली घटनाएं मैंने गहन चिकित्सा में पड़े-पड़े देखी -
* इस कक्ष के शीशे के बड़े दरवाजों के पार गलियारा दिखाई देता है।एक रात इस कक्ष में तैनात डॉ. अमित कुमार अचानक दौड़ कर बाहर निकल कर भागे।लौटे एक बुजुर्ग दम्पति को साथ ले कर।शीशे के इस पार से डॉ. अमित ने वृद्धा को रोते हुए और उसके पति को सहारा दे कर ले जाते हुए देखा था।डॉ. अमित ने महिला को भर्ती किया,रात भर सुश्रुषा हुई,अगले दिन महिला ने स्वयं जाने की इच्छा जताई तब उसे आवश्यक निर्देश दे कर उसे विदा किया।
** दाढ़ी-मूँछ और सिर के बाल छिलवाए , छरहरे शरीर का डॉक्टर मयंक आठ-दस वर्ष की जरीना खान को गोद में लिए दौड़ते हुए गहन चिकित्सा कक्ष में दाखिल हुआ।बच्ची छ: महीने पहले भर्ती हुई थी तब कमजोरी और दस्त के कारण उसका ऑपरेशन न हो सका था। इस बार दाखिला पाने के पहले संस्थान परिसर के बाहर आर एस एस द्वारा स्थापित ‘माधव-आश्रम’ में वह परिवार टिका था जहाँ उस सुबह बच्ची को दौरा आया।बहरहाल,सही हाथों में पहुँचने के पहले गुजर चुकी थी।
*** इन तमाम मौतों के बाद कानूनी लिखाई-पढ़ाई के काम को अत्यन्त दायित्वबोध से सम्पन्न करने वाले अक्सर डॉ. राम उर्फ़ डॉ. रामकृष्ण शुक्ल होते थे।
**** गहन चिकित्सा कक्ष के पाँच नम्बर बिस्तरे पर मैं भरती था और छ: नम्बर पर मऊ जिले के घोसी का एक दुबला-पतला युवा को लाया गया। रक्त में हीमोग्लोबिन का प्रतिशत पाँच से कम था और किसी अन्य विभाग में उसका सीना चीरा जा चुका था। पर्याप्त रक्त और प्लाज़्मा चढ़ाने के बाद यह फैसला लिया गया कि आई.सी.यू में ही उसकी शल्य क्रिया की जाएगी।यह क्रिया सफल रही।इसके तीन बाद उस तरुण के बारे में डॉ. उद्गीत धीर को इस बात की सन्तुष्टि थी कि ‘रक्तादि से अस्पताल में इस युवा को जो ताकत मिल जा रही है वह अस्पताल के बाहर शायद मुमकिन नहीं होती।’
पाँच सितारा-निजी-डीलक्स अस्पतालों में मूल मकसद(मुनाफ़ा कमाना) अलग होता है ।इस वजह से ऐसी घटनाएं वहाँ सम्भव नहीं हो सकतीं।
(हृदय-शल्य के गहन चिकित्सा कक्ष में ‘पाँच दिन’ पर अन्यत्र पोस्ट करूँगा।)
सभी मित्रों की शुभ कामना के लिए आभार।


आप जल्दी स्वस्थ होकर लौटें और आपकी लेखनी इसी तरह लोगों की खबर लेती रहे इसी उम्मीद में हैं.
अरे वाह ! स्वास्थ्य-लाभ के बाद मोटा भाई पुनः सक्रिय . आपकी कमी बहुत खल रही थी .
शिक्षा और स्वास्थ्य की सरकारी व्यवस्था के बचे-खुचे महत्व की उपेक्षा करने वाला, उसको दुरुस्त करने की सभी संभावनाओं को नकारने वाला और अन्ततः निजी फ़ाइव स्टार अस्पतालों की वकालत करने वाला उच्च-मध्य और उच्च वर्ग इस देश का दुश्मन है . उसे देश की ज़मीनी सच्चाई का कुछ पता नहीं है .
आपके अनुभव मेरी धारणा को पुष्ट करते हैं .
जल्दी स्वस्थ होकर लौटो अफलू दा। संजय गांधी पीजीआई में करीब दस साल पहले अपनी बहन के ऑपरेशन के सिलसिले में मेरे तजुर्बे भी आप से काफी मिलते-जुलते थे। वाकई शानदार और संवेदनशील स्टाफ है। सरकारी चिकित्सा नीतियां कल को इस संस्थान का न जाने क्या हाल करें। यहां दिल्ली में तो पांच सितारा निजी अस्पतालों के चर्चे सुन-सुनकर ही चक्कर आ जाते हैं। शीघ्र स्वास्थ्य की शुभकामनाओं सहित- आपका चंद्रभूषण
देख कर अच्छा लग रहा है की आप स्वस्थ हो कर लौट आयें है.
अच्छा लगा कि आप न केवल स्वस्थ हो रहे हैं और लिखना भी शुरु!!
जल्द ही पूर्ण स्वस्थ हों यही कामना है!
सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों की जिस संवेदनशीलता का आप जिक्र कर रहे हैं, उसे और ऐसे संस्थानों को एक सुनियोजित नीति के तहत खत्म किया जा रहा है. कुछ सालों बाद ऐसी बातें शायद कहने- सुनने के लिए ही बचें.
स्वागत है जी हमे आपकी सेहत की बहुत चिंता है अत: आराम का भी ध्यान दे
बीते दिनों आपकी सेहत की चिंता बनी रही, सफल शल्य चिकित्सा के बाद आप स्वस्थ होकर लौट आए और फिर से ब्लॉगिंग में सक्रिय हो रहे हैं, यह देखकर खुशी हो रही है।
विशेषज्ञ चिकित्सा के क्षेत्र में चुनिंदा सरकारी संस्थानों की मौजूदगी अब भी कम आमदनी वाले मरीजों के लिए राहत की बात है, वरना पूरी तरह बाजार और व्यवसाय में तब्दील हो चुके निजी चिकित्सा क्षेत्र में किसी गंभीर रोग से ग्रसित गरीब आदमी के लिए इलाज करवाना बहुत दुष्कर हो गया है।
आप अपने अनुभव लिखें, खासकर डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ की संवेदनशीलता के बारे में सुनना अच्छा लगेगा, क्योंकि आजकल डॉक्टरों में यह गुण दुर्लभ होता जा रहा है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की बढ़ती भीड़ को देखते हुए उन पर बहुत दबाव बढ़ रहा है और सरकार उस अनुपात में संसाधन बढ़ा नहीं रही है।
स्वास्थ्य और चिकित्सा क्षेत्र के बारे में मेरे भी कुछ अनुभव हैं जो मैं कभी लिखना चाहूंगा। अभी तो आपकी इस यादगार लेख श्रृंखला को पढ़ने का मन है।
आपके स्वास्थ्य के लिये सच्ची हार्दिक शुभकामनायें…हमारे समय मे आपका सक्रिय और स्वस्थ होना अब और भी ज़रूरी है….
लौटें अपने काम पर …लम्बी सान्स खीन्च कर….!
अनन्त..अनन्त…मन्गल कामनाये..