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Archive for अप्रैल 10th, 2008

गांधी जी पंडित नेहरू को (अक्टूबर,१९४५) :

हमारे दृष्टिकोणमें जो भेद है उसके बारे में मैं लिखना चाहता हूं . यदि वह भेद बुनियादी है तब तो जनता को वह मालूम हो जाना चाहिए . उसे (जनताको) अन्धकारमें रखने से हमारे स्वराज्य के कार्य को हानि पहुंचेगी .

गांधी जी नेहरू को (स्वाधीनता के बाद) :

मेरा विश्वास है कि यदि भारतको सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त करनी है और भारतके द्वारा संसारको भी प्राप्त करनी है,तो आगे-पीछे हमें यह तथ्य स्वीकार करना ही पडेगा कि लोगोंको गांवोंमें न कि शहरोंमें,झोपडोंमें न कि महलोंमें रहना होगा .

— तुम्हे यह नहीं सोचना चाहिए कि मेरी कल्पनामें वही ग्रामीण जीवन है जो आज हम देख रहे हैं.मेरे सपनोंका गांव अभी तक मेरे विचारोंमें ही है.मेरे आदर्श गांवमें बुद्धीमान मानव होंगे. वे जानवरोंकी तरह,गंदगी और अंधकारमें नहीं रहेंगे.उसके नर-नारी स्वतंत्र होंगे और संसारमें किसीके भी सामने डटे रहनेकी क्षमतावाले होंगे.वहां न प्लेग होगा,न हैजा,न चेचक;वहां कोई बेकार नहीं रहेगा,कोई ऐश आराममें डूबा नहीं रहेगा.सबको अपने हिस्सेका शरीर श्रम करना होगा.

—- अगर आज दुनिया ग़लत रास्ते पर जा रही है,तो मुझे उससे डरना नहीं चाहिए. यह हो सकता है कि भारत भी उसी रास्ते पर जाए और कहावतके पतंगेकी तरह अन्तमें उसी दीपककी आगमें जल मरे,जिसके आस-पास वह तांडव-नृत्य करता है.परन्तु मेरा जीवन के अंतिम क्षण तक यह परमधर्म है कि मैं ऐसे सर्वनाशसे भारतकी और भारतके द्वारा समस्त संसारकी रक्षा करने का प्रयत्न करूं.

पंडित नेहरूने उत्तरमें लिखा :

  हमारे सामने प्रश्न सत्य बनाम असत्यका या अहिंसा बनाम हिंसा का नहीं है.

मेरी समझमें नहीं आता कि गांव आवश्यक तौर पर सत्य और अहिन्सा का साकार रूप क्यों होना चाहिए.सामान्यत: गांव बुद्धि और संस्कृतिकी की दृष्टि से पिछडा हुआ होता है और पिछडे हुए वातावरणमें कोई प्रगति नही की जा सकती.संकीर्ण विचारोंके लोगोंके लिए(गांव के) असत्यपूर्ण और हिंसक होनेकी बहुत ज्यादा संभावना रहती है.हमें गांवको शहरकी संस्कृतिके अधिक निकट पहुंचनेके लिए प्रोत्साहन देना पडेगा.

 

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