शिक्षा की अपनी एक दुनिया है । वहीं शिक्षा-जगत व्यापक विश्व का एक हिस्सा भी है – एक उप व्यवस्था । उप व्यवस्था होने के कारण व्यापक विश्व के- मूल्य , विषमतायें , सत्ता सन्तुलन आदि के प्रतिबिम्ब आप यहाँ भी देख सकते/सकती हैं । हर जमाने की शिक्षा व्यवस्था उस जमाने के मूल्य , विषमताओं , सत्ता सन्तुलन को बरकरार रखने का एक औजार होती है । हमारी तालीम में एक छलनी-करण की प्रक्रिया अन्तर्निहित है । लगातार छाँटते जाना । मलाई बनाते हुए, छाँटते जाना। उनको बचाए रखना जो व्यवस्था को टिकाए रखने के औजार बनने ‘लायक’ हों । इस छँटनी-छलनी वाली तालीम का स्वरूप बदले इसलिए एक नारा युवा आन्दोलन में चला था – ‘खुला दाखिला ,सस्ती शिक्षा । लोकतंत्र की यही परीक्षा’ यानि जो भी पिछली परीक्षा पास कर चुका हो और आगे भी पढ़ना चाहता हो , उसे यह मौका मिले। १९७७ में यही नारा लगा कर हमारे विश्वविद्यालय में ‘खुला दाखिला’ हुआ था । इस नारे को मानने वाले उच्च शिक्षा में आरक्षण के विरोधी थे और नौकरियों में विशेष अवसर के पक्षधर । इस नारे की विफलता के कारण शिक्षा में आरक्षण की आवश्यकता आन पड़ी ।
न्यायपालिका (जहाँ आरक्षण नहीं लागू है) ने सांसद-विधायकों के बच्चों को क्रीमी लेयर मान कर आरक्षण से वंचित रखने की बात कही है । क्रीमी लेयर के कारण वास्तविक जरूरतमंद आरक्षण से वंचित हो जाते हैं यह माना जाता है। अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति में क्रेमी लेयर के rider से न्यायपालिका ने इन्कार किया है । तीसरे तबके में क्रीमी लेयर की बाबत जज चुप हैं। क्या अनारक्षित वर्ग में मलाईदार परतें नहीं हैं ? क्या विश्वविद्यालयों में इस तबके मास्टरों के बच्चे उन्हीं विभागों में टॉप करने के बाद वहीं मास्टर नहीं बनते ? क्या अनारक्षित वर्ग के अफ़सरों के बच्चे अफ़सर नहीं बनते ? नेता के बच्चे नेता भी हर वर्ग में बनते हैं । गैर मलाईदार वर्गों के साथ उन्हें स्पर्धा में क्यों रखा जाता है ? गैर आरक्षित वर्ग के क्रीमी लेयर पर भी rider लगाने की बहस भी अब शुरु होनी चाहिए ।
पिछड़े वर्गों के कुछ अभ्यर्थी खुली स्पर्धा से भी चुने जाते हैं और अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के भी । हर साल लोक सेवा आयोग द्वारा अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति के अभ्यर्थियों के सामान्य वर्ग में चुने जाने की तादाद बढ़ने की स्वस्थ सूचना प्रेस कॉन्फ़रेन्स द्वारा दी जाती है। सामान्य सीटों पर उत्तीर्ण होने वाले पिछड़े वर्गों के अभ्यर्थियों की गिनती ‘कोटे’ के तहत क्यों नहीं की जाती इसे मण्डल कमीशन की रपट में बहुत अच्छी तरह समझाया गया है ।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कल दिए गए फैसले के बाद हमारे समाज की यथास्थिति ताकतें ( जैसे मनुवादी मीडिया और फिक्की , एसोकेम जैसे पूंजीपतियों के संगठन ) फिर खदबदायेंगी , यह लाजमी है ।

सबसे पहले तो आरक्षण की इन दिनों वकालत करने वाले कांग्रेस में नेतृत्वकर्ता के आरक्षण को ख़त्म करें. क्या कांग्रेस का मुखिया कोई दलित-पिछड़ा नहीं हो सकता? क्या ऎसी कोई अनिवार्य ज़रूरतहै कि यह पार्टी दस जनपथ का कब्जा ख़त्म हो. यह बात केवल कांग्रेस के ही बारे में नहीं है उन सभी पार्टियों के बारे में है जहाँ आतंरिक लोक तंत्र का सख्त अभाव है. बाकी जहाँ तक सवाल आरक्षण के प्रभाव का है, इस बारे में मैं अपने ही एक पोस्ट का लिंक आपको भेज रहा हूँ. हो सके तो देख लें.
http://iyatta.blogspot.com/2007/06/blog-post.html
पिछड़ों को आगे लाने का यह तरीका सही नहीं लगता, पिछड़ों का फायदा हो ना हो नेताओं ने तो अपनी फसलें तैयार करली।
बहुत जल्दी इसके दुषपरिणाम सामने आयेंगे।
बात सही है – उम्मीद कम है – सस्ती शिक्षा का अधिकार सही है लेकिन काफी नहीं है समता के सही माने बनाने की ज़रूरत प्राथमिक स्तर से है पर विवाद स्नातक, स्नातकोत्तर है – गरीब बच्चा (हमारे देश में) अपना समय कमाने में डालता है – शिक्षा लेने के पैसे दीजिये उसे पूरा परिवार चलाने के – तब शायद आए – सीताराम का वाकया याद आता है – बीस एक साल पहले का – परिवार चलाने के लिए सपरिवार करीब सारे दिन मशक्कत करने के साथ साथ कॉलेज करना चाहता था – आरक्षण भी मिला – कुछ छात्रवृत्ति भी – (जिसका हिस्सा दफ्तर के बाबू को देना पड़ता था) – परिवार को भी मनाया – लेकिन गुरुजनों ने पास ही नहीं होने दिया – शायद सच कहा कि कमज़ोर है – सहपाठी हीन बनाते रहे – पर बताएं वह मेधावी, हुसियार होता तो होता कैसे ? जैसे पला बढ़ा – उसे रत्ती भर मौका नहीं था – ऐसे कुछ बनने का समझने का – जो जहाँ तक पहुंचा जिउ जान लगा कर – अंत में सारे सपने बुहार कर बहुत टूटा – ऐसे बहुत सारे होंगे – इसमें सरकार का दोष था पर कम – हम जैसे पढे लिखे सामाजिक जागरूक लोगों को यह समझ नहीं थी – तर्क ही करते रहे अपने मध्यमवर्गीय मंसूबों को खाद देते कि इट्स नॉट फेयर, ही इज नॉट कॉम्पीटेंट – शिक्षा के साथ साथ और पहले अवसर की समानता दे समाज, सरकार – समझे समझाये मद मुग्धा सरंचना को कि आरक्षित कहाँ से आता है, और क्यों है – (- और ये भी कि कुछ अपवाद हर जगह होंगे) – पहल के लिए कोई सामाजिक संरचना है बची ? – कौन नेता चुनाव और पद छोड़ कर समाज बदलने निकलेगा ? सस्ती शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सड़कें, कानून सुरक्षा व्यवस्था और बिजली पानी -इसके अलावा सरकारी पैसे का उपयोग व्यवसायिक उपक्रमों के कामों में कम करें तो बेहतर है
सादर – मनीष
आरक्षण केवल रास्ता हो सकता है …मंज़िल नही । लेकिन आरक्षण उस मंज़िल तक ले जा भी पायेगा या ले जा पा रहा है ?सवाल ही सवाल हैं अभी तो मन में । बहुत जल्दबाज़ी में आरक्षण पर राय भी नही कायम की जा सकती ।
कृपया इस विषय पर विस्तार से लिखिये कुछ !
आप अपनी स्पष्ट राय नहीं रख पाए या मैं समझा नहीं.
दीपक भारतदीप
आरक्षण लागू करने को लेकर सरकार के इरादे कभी नेक नहीं रहे, इसलिए वह उसके लाभ से वंचित वर्गों में सदभाव और भरोसा नहीं जगा सकी। दलितों, आदिवासियों और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण के मानदंड अलग-अलग हैं। क्रीमीलेयर की परिभाषा त्रुटिपूर्ण है और उसके दायरा अत्यंत अयथार्थवादी।
इस संबंध में मेरी विस्तृत टिप्पणी कृपया निम्न लिंक पर देखें -
http://srijanshilpi.com/?p=160
अफलातून जी
‘खुला दाखिला ,सस्ती शिक्षा । लोकतंत्र की यही परीक्षा’
यानी कम से कम इस परीक्षा में तो लोकतंत्र पास नहीं हो पाया है। वैसे सुप्रीमकोर्ट ने क्रीमीलेयर को बाहर निकालकर आरक्षण की विसंगति और जरूरत को धीरे धीरे खत्म करने का रास्ता दिखाया है। बस सवाल यही है कि कहीं सरकारें और नेता इसका भी इस्तेमाल आगे आरक्षण को जिंदा रखने में न कर लें।
कृपया इस विषय पर बहुत विस्तार से लिखिये । तभी शायद आप मुझ जैसे लोगों को समझा पाएँगे कि ओ बी सी आरक्षण सही है, विशेषकर दूसरी, तीसरी पीढ़ी व अच्छे पदों पर आसीन लोगों व रूपये पैसे वाले लोगों के बच्चों के लिए । अन्यथा हम जैसों के मन में कड़ुवाहट भरी रहेगी, जो कि समाज के लिए सही नहीं है ।
घुघूती बासूती
bahut badhiyaa
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