[ आज बाबासाहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की जन्म तिथि है । १९३२ में पुणे के यरवड़ा जेल में उनकी और गाँधीजी की अंग्रेजों द्वारा घोषित पृथक निर्वाचन मन्डल पर वार्ता चली जिसके फलस्वरूप प्रसिद्ध पूना समझौता हुआ । इसी दौर में बाबासाहब ने अपने जीवन की आपबीती गांधीजी के सचिव और 'हरिजन' पत्र के सम्पादक महादेव देसाई को सुनाई । गांधीजी के गुजराती पत्र 'हरिजनबन्धु' में महादेव देसाई १९३२ में यह 'कथा' लिखी । अनुवाद मेरा है : अफ़लातून ]

डॉ. अम्बेडकर की गांधीजी के साथ भेंट के बारे में अखबारों में ” गप्पगोले ” चलने लगे हैं । नागपुर से किसी ने लिखा है कि वे दस वर्ष तक धर्मान्तरण न करने का गाम्धी जी को वचन दे आए हैं । ये सब बैठे ठाले हांकी गई गप्पें ही हैं । धर्मान्तरण करने या न करने के सन्दर्भ में गांधी जी की राय की डॉ. अम्बेडकर को आवश्यकता लगी ही नहीं है । उन्होंने जो बातें की वे मैं यहाँ प्रकट नहीं कर सकता हूं, परन्तु भेंट के दरमियान उनका मानस समझने का जो सुयोग मिला उसका लाभ ” हरिजनबन्धु ” के पाठकों को मुझे देना चाहिए । हिन्दू धर्म से ऊबने के कौन से कारण हैं यह मैंने उनसे नहीं पूछा , परन्तु कुछ हिन्दू धर्मियों के उन्हें जो अनुभव हुए हैं उनके कारण उनके जीवन में एक असाध्य कड़वाहट भर गई है । डॉ. अम्बेडकर के अनेक आलोचक गांधी जी से मिलने आते हैं । ये लोग गांधी जी के बारे में उनकी कड़वाहट की याद गांधी जी को दिलाते हैं , परन्तु गांधी जी उन्हें उलट कर कहते हैं , ” यह रोष और क्रोध करने का डॉ. अम्बेडकर को अधिकार है । यह उनकी भलमनसाहत है कि वे अधिक प्रहार नहीं कर रहे हैं ।उन पर क्या बीती है यह हमें जानना चाहिए ।” यह आपबीती उन्होंने मुझे सुनाई ।
” दापोली रत्नागिरी जिले की एक तहसील है । दापोली की पाठशाला में मैंने पढ़ाई की शुरुआत की थी । मेरे अपमानित जीवन के अध्ययन की शुरुआत भी तब से ही शुरु हुई । पाठशाला में हमारे बैठने की व्यवस्था क्यों होती ? बाहर बरान्दे में अथवा आंगन में कक्षा एक से अन्तिम दरजे तक के महार लड़कों के साथ बैठना पड़ता था । शिक्षक की कृपा हो जाती तब एक बार पूछ लेते , ” क्यों बे , कायदे से पढ़ रहे हो , न ?” इस सब में मेरा कल्याण नहीं है , यह समझ कर मेरे पिता मुझे सतारा ले गए । मेरे बाप दादा फौज में थे। मेरे पिताजी को फौज की पेंशन मिलती थी , इसलिए उनका दरजा नीचा तो नहीं कहा जाता था। परन्तु हमें हजाम नहीं मिलता था। मेरी एक बहन छ: भाइयों की हजामत करती थी । सतारा हाईस्कूल में भी अलग बेच पर बैठना था । मुझे संस्कृत सीखने की इच्छा थी , लेकिन संस्कृत शिक्षक मुझे कक्षा में बैठने नहीं देता था । इसलिए मुझे फारसी लेनी पड़ी और बम्बई गया । बम्बई के एक स्कूल से मैट्रिक करके मैं एल्फिन्स्टन कॉलेज में गया । वहाँ से बी.ए. किया उसकी पहले की मेरी तकलीफ़ों की कथा श्री सायाजीराव गायकवाड़ तक किसी मित्र ने पहुंचाई। उन्होंने मुझे वजीफ़ा दिया औए बी.ए. कर लेने पर बडौदा बुलाया। वहाँ फौज में लेफ्टिनेन्ट जगह दी और फिर वजीफा दे कर अमेरिका भेजा । इन कुछ महीनों में बडौदा में फौजी छावनी के मकान में रहता था । “
” आपको रहने का स्थान नहीं मिला था, वह इसके बाद की बात है ? ” ” हां , वह तो अमेरिका से मैं डाक्टरेट करके लौटा तब की है । मैं डिग्री ले कर आ तो गया , पर रहने के लिए घर नहीं मिल रहा था । गायकवाड़ सरकार से कहा कि मुझे कॉलेज में प्रोफेसर नामित कीजिए तो अच्छा हो ,रहने की जगह तो मिल जाएगी । परन्तु वे मेरे अर्थशास्त्रीय ज्ञान का उपयोग करना चाहते थे इसलिए मुझे उन्होंने वित्त विभाग में रखा । मेरी विडम्बना का पार न था । घर की तलाश में भटकते भटकते थक गया पर घर न मिला । एक पारसी धर्मशाला थी , उसके सामने पहुंचा। मैं पारसी नहीं हूं इसलिए राजी खुशी क्यों रहने देंगे ? परन्तु धर्मशाला में कोई और नहीं था ।उसके चौकीदार ने मुझे तरकीब बतायी। पारसी नाम धारण कर लें तब रह सकते हैं , ऐसा उसने कहा । मैं पारसी नाम धारण करके रहने लगा। कुछ दिन ऐसे ही चला। पहले फौज की छावनी में रहता था तब मुझे जिन लोगों ने देखा था , वे पहचान गए। पारसी युवकों की एक टोली एक दिन लाठी लेकर आई और मुझसे कहा , ‘निकल नहीं तो तुम्हारी जान चली जाएगी।” मैंने उनसे शाम तक की मोहलत मांगी और शाम को ही निकल गया। एक बार मिस्टर सैम्युअल जोशी ने मुझसे अपने घर रहने का आग्रह किया था ,उस प्रस्ताव का लाभ उठाने का मन हुआ। मैं वहां गया जरूर लेकिन मिस्टर सैम्युअल जोशी का मन परख न सका। फिर स्वर्गीय कुडालकर के यहां गया। वे मेरे मित्र थे ,अच्छा सम्बन्ध रखते थे। उन्होंने मुझे रहने के लिए कहा जरूर, साथ यह भी जना दिया कि नौकर जान जाएंगे तो सब भाग जाएंगे, रसोइया भी नहीं रहेगा। मैं उन्हें इतनी कठिनाइयों में क्यों डालता ? मैंने बडौदा से विदा ली और बम्बई से महाराज साहब को पत्र लिखकर अपनी दिक्कतों का वर्णन किया । उन्होंने मुझे बडौदा लौटने को कहा। मैं गया । राज्य के अतिथि गृह में टिका। रोज के छ: रुपये बीस दिन तक भरे लेकिन गायकवाड़ सरकार से मुलाकात नसीब न हुई । मैं लौट आया । “
