बाबा साहब डॉ . भीमराव अम्बेडकर की चेताने वाली कथा (२) : ले. महादेव देसाई
April 15, 2008 by अफ़लातून
” आप कहेंगे यह कहानी तो पुरानी है । पन्द्रह दिन पहले की घटना बताऊँ ? सोपाला में हमारा एक सम्मेलन था । हमने एक टैक्सीवाले को रोका था , उसे पेशगी भी दी थी । उसने पैसे हजम कर लिए और दर्शन ही नहीं दिए । टांगे वालों की खुशामद की लेकिन कोई सुन ही नहीं रहा था । हम सब का बहिष्कार किया जा रहा था । बचपन में हजाम नहीं मिला था , यह तो मैं आप को बता चुका हूँ , परन्तु आज भी हम लोगों को सिवा मुसलमान के अन्य हजाम मिलते हैं क्या ? कोई अन्य नहीं होते इसलिए मुसलमान हजाम मनमाना वसूलते हैं । क्या कोई होटल हमारे लिए खुला है ?
” इस प्रकार जहां घुट - घुट कर रहना पड़ता है ,वहां रहने का लाभ ही क्या है ? बडौदा में मुझ पर जो बीती उसकी याद में आँखें भर आती हैं । बडौदा छोड़ते वक्त तो मैं जार जार रोया ही था। महाराज साहेब ने मेरे लिए जितना बन पड़ा किया । मैं इनका कृतज्ञ हूँ , लेकिन दर-दर दुतकारा जाना किसे भाता है । “
जमनालालजी , वालचन्द भाई और मैं इन बातों को सुन रहे थे । हमने उनसे कहा कि इन बातों से हम शर्मिन्दा हैं , हमें दुख है , परन्तु परिस्थिति बदली है और तेजी से बदलती जा रही है । आप दुखित हुए तो उतना ही दुखी होने के लिए कथित सवर्ण तैयार हैं , कई सनातनी सवर्ण भयंकर त्रासदी अनुभव त्रासदी कर रहे हैं । आज आपको सैकड़ों हिन्दू घरों में आवभगत न मिले क्या यह संभव है ?”
” मैं कोई परिवर्तन नहीं देख पा रहा हूँ । महाड़ में क्या हुआ?(महाड़ में एक सार्वजनिक तालाब में दलितों के इस्तेमाल के लिए बाबासाहब के नेतृत्व में हुए सत्याग्रह पर हमला हुआ था।) आप हमारे साथ दुखी होंगे उसमें हमारा क्या भला हुआ ? जमनालालजी ने उन पर बीती बातें सुनाई लेकिन उसका मुझ पर उल्टा असर पड़ा। मुझे लगा कि जब आप लोगों को इतना कष्ट सहना पड़ रहा है , तब हमारा बेड़ा पार तो कभी होगा हे नहीं । “
डॉ . अम्बेडकर के साथ इन बातों पर बहस नहीं होती है । संकट सहन कर दूसरे का दिल पलटने की नीति उन्हें पसन्द नहीं है। उन्होंने कहा हमारे पक्ष में कितने हिन्दू हैं ? मुझे सम्मान मिले तो उससे क्या फरक पड़ता है ? बाकी लोगों की क्या स्थिति होगी ? मुट्ठी भर सुधारकों की कौन सुनता है ? आपको परिवर्तन दीख रहा है, आप आशावादी लगते हैं । लेकिन आशावादी की व्याख्या जानते हैं , न ? खुद के दुख को तो नहीं लेकिन दूसरे के दुख को सुख मानने वाला आशावादी होता है । “
इस अंतिम वाक्य में उनकी कडुवाहट प्रकट हो रही थी । इस कडुवाहट के सामने दलील काम नहीं करती , कडुवाहट ही कडुवाहट की काट तो नहीं होती। हम अधिक आत्म शुद्धि करें, कडुवाहट के बावजूद मीठेपन से जीतने के प्रयत्न जारी रक्खें, अधिक से अधिक हरिजनों को अपनाते जाएँ , यही उपाय है । आत्मशुद्धि और प्रेममय सेवा , हमारे लिए यही आज के घुटन भरे अंधकार में ध्रुव तारे के समान है ।
[ 'हरिजनबन्धु' में प्रकाशित यह लेख श्री म्हादेव देसाई जन्मशताब्दी समिति,गांधी स्मारक संग्रहालय,हरिजन आश्रम ,अहमदाबाद द्वारा प्रकाशित स्मारक ग्रन्थ 'शुक्रतारक समा : महादेवभाई' में संकलित है( पृ. ३३०-३३२ )। ]
मूल गुजराती से अनुवाद : अफ़लातून.


अफलातून जी,
इसका पिछला भाग छूट गया था, आज दोनों पढे | उस समय के समाज की कल्पना करना हमारी शहरों में बढ़ी हुयी पीढ़ी के लिए कल्पनालोक सा है | दुःख इस बात का है की अभी भी हमारे समाज में छुआ-छूत व्याप्त है, शायद इसके लिए हर किसी को स्वयम प्रतिज्ञा लेनी पड़े कि किसी भी स्थिति में वे इसका समर्थन नहीं करेंगे, तभी कुछ उम्मीद दिखे |
पढ़कर अपने समाज पर लज्जित हूँ । यदि भीमराव जी की जगह मैं होती तो ? इस देश का काम एक गाँधी से पूरा नहीं हुआ । और मामलों में तो पता नहीं परन्तु जातिवाद, अलगाववाद व छुआछूत से निबटने को तो हमें अनेक गाँधी चाहियें । ऐसे लेख हमें पढ़ाते रहिए । धन्यवाद ।
घुघूती बासूती
पर आज भी समाज मे छुआ-छूत बहुत अधिक है। बस कहने को ही हम प्रगतिशील है।
vaakai chetaane vaali katha hai.
अफलातून दा, आपके द्वारा अनूदित महादेव जी के ये लेखांश हमारे समाज की कई परतें खोलते हैं। दुर्भाग्यवश, ये सारी परतें आज भी कायम हैं लेकिन लोकतांत्रिक लफ्फाजी ने इस अंगारे के ऊपर राख की बहुत सारी नई परतें खड़ी कर दी हैं। असली संकट यह है कि आज का बौद्धिक वर्ग यह मानने को तैयार ही नहीं है कि अपने समाज का मनोविज्ञान कितनी सारी रोगग्रंथियों से ग्रस्त है। उसके पास पलायन के तमाम रास्ते हैं। कभी वह विदेश जाकर खुद को लोकतांत्रिक घोषित कर देता है, कभी मार्क्सवादी शब्दावली की आड़ लेकर, तो कभी हिंदुत्व का चोला ओढ़कर। इस वैचारिक ऊर्जाहीनता ने समाज के कथित उच्च वर्ग को ही नहीं, दलित तबके तक को निगल लिया है, जिसके मुखर जन अपने बीच के कुछ अधिकार प्राप्त हिस्सों के हितों से आगे नहीं सोच पाते। हम एक ऐसे दौर में हैं, जब विचार पेट के दायरे से आगे बढ़ ही नहीं पा रहे हैं। ऐसी और भी कुछ चीजें यहां प्रकाशित कर सकें तो कम से कम मेरे ऊपर बड़ी कृपा होगी।
उस समय की जडता की कथा पढकर रोंगटे खड़े हो जाते है. शायद उत्तर भारत में इतना जुल्म कभी नहीं रहा जितना महाराष्ट्र और दक्षिण में.