गांधी , अम्बेडकर और मिट्टी की पट्टियाँ (२) : अफ़लातून
April 17, 2008 by अफ़लातून
गांधीजी पर कांशीराम ने कानपुर में हुए एक पिछड़ी जाति सम्मेलन में एक आरोप लगाया था कि उन्होंने सरदार पटेल की उपेक्षा करके पंडित जवाहरलाल नेहरू को प्रधानमन्त्री की कुर्सी दिलवाई थी । इस आरोप की छानबीन करना गैरजरूरी है लेकिन इस आरोप के पीछे जो मक़सद छिपा है उसे जान लेना जरूरी है । इससे ब्राह्मणवाद की बसपाई समझ और सोच का पता चलता है । उत्तर प्रदेश और बिहार के कुर्मी सरदार पटेल को स्वजातीय मानते हैं । कुर्मी समाज के लोग सरदार पटेल के नाम से शिक्षण संस्थाएं चलाते हैं । उन्हें यह जानकर अत्यन्त आश्चर्य होता है कि गुजरात में पिछड़ों के लिए आरक्षण के विरोध की कमान पटेलों के हाथ में ही थी ।(यहाँ, मण्डल लागू होने के पूर्व गुजरात के बक्षी-आयोग की संस्तुतियों के विरोध का सन्दर्भ है ।) ‘ महात्मा गांधी और कांग्रेस ने अछूतों के साथ क्या किया ‘ डॉ. अम्बेडकर ने अपनी इस चर्चित पुस्तक में सरदार पटेल के ‘सत्ताधारी वर्ग’ का होने के ‘ब्राह्मणवादी गुमान’ का वर्णन किया है । ( पृ. २०९ , डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेस , खण्ड-१,प्रकाशक : शिक्षा विभाग , महाराष्ट्र शासन)।
लेकिन कांशीराम ऐसे उद्धरण देने की मूर्खता क्यों करें ? बाबा साहब के विचारों को ऐसे चालाक संशोधनों के साथ न ग्रहण करने पर घाटा हो जाएगा , इसलिए बसपा के प्रशिक्षण शिविरों में गांधी-नेहरू-पटेल पर ये नये ‘तथ्य’ धड़ल्ले से चलाये जाते हैं ।
गांधी जी के राष्ट्रीय पटल पर आने के बाद कांग्रेस एक अभिजात समूह से सर्वसाधारण का जन संगठन बनी । डॉ. अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक में इस बात का पूरा श्रेय गांधी जी को दिया है ( वही , पृ. १९ , १६२ ) । दलितों के प्रश्न के सन्दर्भ में गांधी जी के आगमन के बाद जो तब्दीली आई , वह गौरतलब है । दलितों के बीच बड़प्पन दिखा कर नसीहत देने की वृत्ति गांधी जी के गले नहीं उतरती थी और उन्होंने कांग्रेस की इस कार्यशैली को बदला। इस महत्वपूर्ण परिवर्तन की चर्चा गांधी जी ने सरदार पटेल और महादेव देसाई से यरवदा जेल में इस प्रकार की थी , ‘ आज इस प्रश्न ने जो स्वरूप ग्रहण किया है , उस के लिए शुरु से ही इस विषय की वृत्ति जिम्मेदार है । जब १९१५ में गोखले गुजर गये और मैं पूना के सर्वेन्ट ऑफ इण्डिया सोसाइटी के हॉल में रहा था, तभी मैंने यह देख लिया था ।वह प्रसंग मुझे अच्छी तरह याद है । मैंने देवधर से उनकी प्रवृत्तियों का संक्षिप्त विवरण मांगा , जिससे मुझे पता चले कि मुझे क्या काम हाथ में लेना है : इस विवरण में यह था कि ‘उनके पास जाकर भाषण देना , उन पर कैसे अन्याय होते हैं इस बारे में उनमें जागृति लाना वगैरा’ ।मैंने देवधर से कह दिया था कि मैंने मांगी रोटी और उसके बदले पत्थर मिलता है । इस ढंग से अस्पृश्यों का काम कैसे हो सकता है ? यह सेवा नहीं है । यह तो हमारा मुरब्बीपन है। अछूतों का उद्धार करने वाले हम कौन हैं? हमें तो इन लोगों के प्रति किये पाप का प्रायश्चित करना है , कर्ज लौटाना है । यह काम इन लोगों को अपनाने से होगा,इनके सामने भाषण करने से नहीं होगा। शास्त्री घबराये और बोले , ‘ मुझे यह उम्मीद नहीं थी कि आप इस तरह न्यायासन पर बैठ कर बात करेंगे ।’ हरिनारायण आपटे भी बहुत चिढ़े । हरिनारायण को मैंने कहा - ‘ मालूम होता है आप लोग तो समाज में विद्रोह करायेंगे।’…….इस तरह बड़ी बहस हुई थी । मैंने दूसरे दिन शास्त्री , देवधर , आपटे सबसे कह दिया - ‘ मुझे कल्पना नहीं थी कि मैं आपको दुख दूंगा।’ मैंने माफी मांगी और इन लोगों पर अच्छा असर पड़ा।बाद में तो हम लोगों की बन गयी। ‘
वल्लभ भाई - ” आपकी तो सभी के साथ बन जाती है ।आपको क्या है ? बनिये की मूँछ नीची।’
बापू बोले - ‘ देखो इसलिए मैं काट डालता हूँ न ?’


क्या बात है अफलातून दा, कैसे-कैसे रतन ला रहे हो!
जानकारी परक लेख
चन्द्रभूषण जी से सहमति
आंबेडकर जी से संबंधित पिछले कई लेख एक साथ पढ़े। इन बातों को यहाँ सिलसिलेवार ढ़ंग से रखने के लिए आप बधाई के पात्र हैं।
गांधी जी के राष्ट्रीय पटल पर आने के बाद कांग्रेस एक अभिजात समूह से सर्वसाधारण का जन संगठन बनी । डॉ. अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक में इस बात का पूरा श्रेय गांधी जी को दिया है
ध्यान देने की बात है.
सर आपको लगातार पढ़ता हूँ लेकिन टीप नहीं दे पाता
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