गांधी , अम्बेडकर और मिट्टी की पट्टियाँ (4 ): मनु स्मृति , गीता आदि:अफ़लातून
April 19, 2008 by अफ़लातून
जहाँ तक मनुस्मृति , गीता आदि ग्रन्थों के दलित विरोध को पुष्ट करने का प्रश्न है , गांधी जी का दृष्टिकोण स्पष्ट है ।उन्हें यह विश्वास था कि वे हिन्दू धर्म का एक सुधरा स्वरूप भारतीय समाज से ग्रहण करवा लेंगे । उनके दृष्टिकोण को प्रकट करने वाला निम्नलिखित पत्र अलीगढ़ विश्वविद्यालय के संस्कृत के प्रोफेसर हबीबुर रहमान को लिखा गया है । इस पत्र में उन्होंने लिखा , ” हिन्दू धर्म की खसूसियत यह है कि उसमें काफी विचार स्वातंत्र्य है । और उसमें हर एक धर्म के प्रति उदार भाव होने के कारण उसमें जो कुछ अच्छी बातें रहतीं हैं , उनको हिन्दूधर्मी मान सकता है । इतना ही नहीं , परन्तु मानने का उसका कर्तव्य है ।ऐसा होने के कारण धर्म ग्रन्थों के अर्थ का दिन-प्रतिदिन विकास होता रहा है । हिन्दू धर्म के नाम से प्रचलित ग्रन्थों में जो कुछ लिखा गया है , वह सबके सब धर्मवचन हैं , ऐसा नहीं है । वेदपाठ सुननेवाले शूद्र के कान में गरम सीसा डालने की बात अगर ऐतिहासिक मानी जाए , तो मैं उस धर्म को मानने के लिए हरगिज तैयार नहीं हूँ और ऐसे असंख्य हिन्दू हैं ,जो उसे धर्म वचन नहीं मानते हैं । हिन्दू धर्म के लिए एक कसौटी रखी गयी है , जिसको एक बालक भी समझ सकता है । जो बुद्धिग्राह्य वस्तु नहीं है और बुद्धि से विपरीत है , वह कभी धर्म नहीं हो सकती है । और जो सत्य और अहिंसा के विपरीत है , वह भी धर्म नहीं हो सकती ।” ( महादेवभाई की डायरी , खण्ड दो , पृ. १७३ - १७४ )
यरवदा जेल में मथुरादास नामक कार्यकर्ता को समझाते हुए गांधी जी ने कहा , “ गुलामों से बदतर - इन लोगों को जानवर बनाया और इनका हमने यह धर्म बना दिया कि ये लोग अपने कर्मों का कुफल भोगते हैं । यह तो धर्म का राक्षसी स्वरूप है । हिन्दू धर्म का अगर यह अर्थ हो तो मैं भी गीता , मनुस्मृति सबको जला डालूँ । ( महादेवभाई की डायरी , खण्ड तीन , पृ. २६९ )
अस्पृश्यता को पाप का फल माननेवाले लोग कर्म मार्ग का सबसे बद़्आ अनर्थ करते हैं , ऐसा गांधी जी मानते थे । २५ जुलाई १९३४ को लखनऊ में एक आम सभा में गांधी जी ने कहा , ” धर्म के नाम पर दुनिया भर में अस्पृश्यता नहीं देखी है । अमरीका और दक्षिण अफ़्रीका में गोरे काले के बीच इस प्रकार का तिरस्कार और घृणा है लेकिन उसे वे धर्म कार्य नहीं कहते । हिन्दुओं ने ठेका ले रखा है । चाहे जैसा शौचाचार का पालन करने वाले छह करोड़ लोगों के साथ अस्पृश्यता और घृणा का बर्ताव किया जाता है , जैसे डॉ. अम्बेडकर ।सवर्ण अकिंचन का जो स्थान समाज में है वह अम्बेदकर का नहीं है । सवर्णों के बुद्धिमान के साथ अम्बेडकर बैठ सकते हैं । वे बुद्धि से इतने तीव्र हैं कि किसी से कम नहीं । हरिजन सेवा के लिए उनमें त्याग और बहादुरी भी है । इतना आपको सुनाना चाहता हूँ कि हमारे बीच इस सेवाकार्य में मतभेद होने पर भी उनकी बुद्धि , त्याग व बहादुरी के बारे में मुझे कोई शंका नहीं है । उनके विषय में कहना कि उनका पापी योनि में जन्म है ? चाहे जितना प्रायश्चित करें वे अस्पृश्य रहेंगे , पाप धुलेंगे नहीं ? इससे बड़ा कोई पाप नहीं है , कर्ममार्ग का इससे बड़ा अनर्थ मेरी नजर में कोई नहीं है । ” ( महादेवभाई की डायरी (गुजराती),खण्ड-२०, पृ ६३-६४ ) ।
डॉ . अम्बेडकर और महात्मा गांधी के बीच दलितों के नेतृत्व को लेकर संघर्ष था । फरवरी १९३७ में हुए प्रान्तीय विधान सभाओं के निर्वाचन परिणामों के फलस्वरूप डॉ. अम्बेडकर ने ” कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के साथ क्या किया ” नामक पुस्तक दलित और विदेशी पाठकों के लिए लिखी । इन चुनावों में अनुसूचित जाति के लिए निर्धारित १५१ सीटों में से कांग्रेस ने ७३ सीटें जीतीं ।इन ७३ सीटों में से अनुसूचित जाति के बहुमत से जीती गयीं ३८ सीटें थीं । डॉ. अम्बे्डकर ने चुनाव के कुछ माह पूर्व ही इन्डिपेण्डेण्ट लेबर पार्टी का गठन किया था । इस पार्टी ने सिर्फ महाराष्ट्र में चुनाव लड़ा जहाँ १५ सुरक्षित सीटों में से १३ पर उसकी जीत हुई तथा २ सामान्य सीटें भी इसने हासिल कीं थीं । सिवा एक गाली के इस पुस्तक के निष्कर्षों को ही सुश्री मायावती दोहरा रही हैं ।” जाति तोड़ो : समाज जोड़ो ” का “आन्दोलन ” चला रहे श्री कांशीराम जाति तोड़ने के डॉ. अम्बेदकर द्वारा सुझाये गये चार कार्यक्रमों के सन्दर्भ में क्या कर पाए हैं ? यह उन्हें बताना चाहिए । डॉ. अम्बेडकर के अनुसार जाति-प्रथा के नाश के लिए १. अन्तर्जातीय विवाह - सवर्ण-अवर्ण ,२. धर्म की चिकित्सा ( विषमता बढ़ाने वाले तत्वों की आलोचना) ,धर्मान्तरण तथा ४. दलितों की सामाजिक-आर्थिक उन्नति - ये चार कार्यक्रम बताये गए थे ।
[ जारी ]


अच्छा मसाला खोज निकाला है. शायद गांधी वाड.मय में भी यह सामग्री न मिले.
हिन्दू धर्म का अगर यह अर्थ हो तो मैं भी गीता , मनुस्मृति सबको जला डालूँ । ( महादेवभाई की डायरी , खण्ड तीन , पृ. २६९ )
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आप स्वयं पुष्टि कर लें कि श्री गीता के बारे में भी उन्होने ऐसा कहा था कि नहीं. श्रीगीता जा पढने वाला कोई भी व्यक्ति जानता है कि उसमें भगवान् श्री कृष्ण ने मनुष्य की पहचान चार रूपों में की है-योगी, सात्विक, राजस और तामस. चारों वर्णों का उल्लेख उन्होने केवल एक-दो बार किया है वह भी यह बताने के लिए मुझे जो भजेगा वह मुझे प्राप्त होगा. उन्होने कर्म और बुद्धि का आधार पर मनुष्य की पहचान बताई है और भेदात्मक बुद्धि को तामसी प्रुवृति बताया है. मनु स्मृति की बात मानी जा सकती है पर उसकी बातों का श्री गीता के संदेशों से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है. जिस जातिवाद की गांधी जी बात कर रहे हैं वह मनु स्मृति में हैं श्रीगीता में नहीं. अगर गांधी जी कहा है तो ताज्जुब का विषय है दीपक भारतदीप
” हिन्दू धर्म का अगर यह अर्थ हो तो “- दीपक भाई, गांधी यह अर्थ कत्तई नहीं करते । त्रुटिपूर्ण अर्थ का जिक्र करने के बाद वे कहते हैं कि “अगर” यह अर्थ है तो ……
आशा है अनासक्तियोग के भक्त की बाबत गलतफ़हमी दूर हो गयी होगी।
गांधी जी का नज़रिया शक्तिसम्पन्न वर्ग और आम्बेडकर का विपन्न वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है. उसीके अनुरूप गांधी जी जहाँ समाजसुधारक के रूप में, वहीं आम्बेडकर रेडिकल तत्व के रूप में नज़र आते हैं. गांधी जी बड़े भाई की तरह वंचित वर्ग को कुछ दिलवा पाने की हैसियत में थे, जबकि आम्बेडकर ‘खोने को कुछ नहीं’ वाली स्थिति में थे. बावजूद इसके आम्बेडकर आखिरकार सुधारक की भूमिका में ही ज़्यादा सफल होते दिखते हैं.
वैसे भी अफलातून जी, आप लोगों की आँख में कितना भी उंगली घुसेड़ कर सत्य दिखा दें, लेकिन उन्हें तो श्रीमदभगवदगीता में ही सारी सभ्यता की चाबी नज़र आती है. आख़िर समाज के किस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं गीता के विचार? क्या शूद्रों (यह मात्र वर्ण व्यवस्था के सन्दर्भ में है) के लिए भी उसमें कोई जगह है? या उनके सन्दर्भ में कर्मयोग सिर्फ़ मैला उठाने के लिए ही था? और ऐसा कर्म करके भी फल की चिंता न करने की नसीहत? धन्य है वह समाज व्यवस्था, जहाँ ऐसे विचारों को संस्थागत रूप दे दिया गया था! किसी को पूछने की स्वतंत्रता नहीं थी कि वर्ण- व्यवस्था जिसे इतना हीन कर्म मानती है, उसे संपन्न करके अगले जन्म में अच्छा फल कैसे मिलेगा? फिर यह कर्मफल वाला सिद्धांत क्यों लागू किया गया था, इसकी पुष्टि उत्तर वैदिककालीन समाज का अध्ययन करने से स्वतः स्पष्ट हो जाती है.
तथागत की सिखाई बौद्ध दर्शन की विशिष्ट शैली में आलोचना का महत्व है , आत्मालोचना का महत्व तो अनुपम है . सामयिक दलित आन्दोलन के वजूद में बाबासाहब का योगदान पितृतुल्य है . आज के दलित आन्दोलन के संकट को समझने के लिए उनकी और गांधी जी की राजनैतिक व दार्शनिक यात्रा की आलोचना मददगार होगी .
गांधी और अम्बेडकर की साफ़ तौर पर अलग अलग दिशा थी . दोनों महापुरुष उत्कट सृजनात्मक व्यग्रता के साथ भारतीय समाज- पटल पर उतरे थे . इतिहास की एक सम्मोहक खूबसूरती होती है कि खण्ड दृष्टि के हम इतने कायल हो जाते हैं कि उसे ही पूर्ण मानने लगते हैं . इन दोनों की उत्कट सामाजिक व्यग्रता के साथ भिडन्त भी हुई थी .
यह गौरतलब है कि तीसरे दशक के प्रारम्भ में हुई इस भिडन्त के फलस्वरूप दोनों की अपनी-अपनी सोच और कार्यक्रमों पर बुनियादी असर पड़ा . इस प्रचन्ड मुठभेड़ के बाद दोनों बदले हुए थे . यह सही है कि अन्त तक एक दूसरे के लिए तीखे शब्दों का प्रयोग दोनों ने नही छोड़ा . एक दूसरे पर पड़े प्रभाव की यहां सांकेतिक चर्चा की जा रही है .
गांधी जी के लिए अस्पृश्यता चिन्ता के विषयों में प्रमुख थी. उनके पहले भी कई योगियों और सामाजिक आन्दोलनों की इसपर समझदारी थी लेकिन यह तथ्य है कि भारत की राजनीति में मुद्दे के तौर पर यह गांधी के कारण स्थापित हुआ . राष्ट्रीय - संघर्ष के बडे लक्ष्य के साथ अस्पृष्यता को धार्मिक और आध्यात्मिक तौर पर उन्होंने लिया . अम्बेड़कर ने बातचीत के शुरुआती दौर में ही गांधी को यह स्पष्ट कर दिया था दलित-वर्गों के आर्थिक - शैक्षणिक उत्थान को वे ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं .
अम्बेडकर से मुलाकात के पहले गांधी जाति - प्रथा के रोटी - बेटी के बन्धनों को ‘आध्यामिक प्रगति’ में बाधक नहीं मानते थे .अम्बेडकर से चले संवाद के बाद उन्होंने दलितों के शैक्षणिक - आर्थिक उत्थान के लिए उन्होंने ‘हरिजन सेवक संघ’ बनाया और जाति - प्रथा चोट करने के लिए यह निर्णय लिया कि वे सिर्फ़ सवर्ण - अवर्ण विवाहों में ही भाग लेंगे .
सामाजिक प्रश्न के धार्मिक महत्व को नजर-अन्दाज करने वाले बाबा साहब ने गांधी से संवाद के दौर के बाद इसे अहमियत दी . जाति - प्रथा के नाश हेतु ‘धर्म-चिकित्सा’ और ‘धर्मान्तरण’ को भी जरूरी माना . इस प्रकार दोनों महापुरुष एक दूसरे के दृष्टिकोण से संवाद के फलस्वरूप प्रभावित हुए.
भारतीय समाज में सवर्णों में ‘आत्म-शुद्धि’ तथा दलितों में ‘आत्म-सम्मान’-इन दोनों प्रयासों की आवश्यकता है तथा यह परस्पर पूरक हैं .
गांधी के मॊडल से पनपे कांग्रेसी-हरिजन नेतृत्व में एक राष्ट्रवादी राजनैतिक अभिव्यक्ति और प्रयत्न था लेकिन सामाजिक - सांस्कृतिक प्रश्नों पर चुप्पी रहती थी . साठ और सत्तर के दशक में उभरे दलित नेतृत्व ने माना कि कांग्रेस का हरिजन नेतृत्व सामाजिक ढ़ाचे में अन्तर्निहित गैर-बराबरी को ढक-छुपा कर रखता है . इस सांस्कृतिक चुप्पी को नए दलित नेतृत्व ने कायरतापूर्ण और असमानता के वातावरण को अपना लेने वाला माना .
दलित आन्दोलन की कमजोरियों को समझने के लिए १९४४ में जस्टिस पार्टी की मद्रास में हार के बाद एक रात्रि भोज में दिए गए बाबासाहब के भाषण पर गौर करना काफी होगा . लम्बे समय तक सत्ता में रहने के बाद जस्टिस पार्टी बुरी तरह हारी थी .गैर-ब्राह्मणों में भी कईयों ने उसका साथ छोड़ दिया था .
” मेरी दृष्टि में इस हार के लिए दो बातें मुख्यत: जिम्मेदार थीं .
पहला,ब्राह्मणवादी तबकों से उनमें कौन से अन्तर हैं यह वे समझ नही पाये . हांलाकि ब्राह्मणों की विषाक्त आलोचना वे करते थे लेकिन उनमें से कोई क्या यह कह सकता है कि वे मतभेद सैद्धान्तिक थे ? उन्होंने खुद को दूसरे दर्जे का ब्राह्मण मान लिया था . ब्राह्मणवाद को त्यागने की बजाए उसकी आत्मा को आदर्श मान कर वे उससे लिपटे हुए थे .ब्राह्मणवाद के प्रति उनका गुस्सा सिर्फ़ इतना था कि वे ( ब्राह्मण) उन्हें दोयम दर्जा देते हैं .
हार का दूसरा कारण पार्टी का संकीर्ण राजनैतिक कार्यक्रम था . अपने वर्ग के नौजवानों को कुछ नौकरियां दिलवा देना पार्टी का मुख्य मुद्दा बन गया था . मुद्दा पूरी तरह जायज है . परन्तु जिन नौजवानों को सरकारी नौकरियां दिलवाने के लिए पार्टी २० वर्षों तक लगी रही क्या वे वेतन पाने के बाद पार्टी को याद रखते हैं ?इन बीस वर्षों में जब पार्टी सत्ता में रही, उसने गांवों में रहने वाले ,गरीबी और सूदखोरों के चंगुल में फंसे ९० फ़ीसदी गैर-ब्राह्मणों को भुला दिया . “
- अफ़लातून
एक बार फिर, यह पढ़वाने के लिए धन्यवाद ।
घुघूती बासूती
ब्राह्मणों की ‘कंडीशनिंग’ जिस तरह की रही है और अब दलितों की कंडीशनिंग जैसी की गई है,वहां किसी भी किस्म की ‘रैशनल’ या युक्तिसंगत बहस मुश्किल दिखती है . दलितों का पूरा विमर्श दलित-ब्राह्मणों ने हथिया लिया है . समूचे दलित समाज के विकास के स्थान पर संकुचित निजी हित अधिक व्यापक हो गए लगते हैं .
यहां गीता या राम चरित मानस के प्रसंग ही बेमानी दिखते हैं . न ब्राह्मणों के लिए इनका कोई विशेष अर्थ है और न उन दलितों के लिए जो इनका नाम से ही बिदकने लगते हैं . गांधी जी वह ‘अगर’ कौन समझना चाहता है जिसे आप समझाना चाहते हैं ? १९४४ में जस्टिस पार्टी की हार के बाद दिये गये अम्बेडकर के उस भाषण को भी कौन याद रखना चाहता है ?