विश्व खाद्य संकट परवान पर है – लगातार बढ़ रही खाद्यान्न कीमतों ने जनता की टेंट से अरबों रुपए निचोड़ लिए हैं और यह माना जा रहा है कि १० करोड़ लोग भूख का सामना कर रहे हैं ।
इस परिस्थिति पर विचार करने के लिए संयुक्त राष्ट्र द्वारा दुनिया के नेताओं का एक सम्मेलन इसी हफ़्ते रोम में आहूत किया गया है । इस बात का पूरा खतरा है कि अमीर मुल्कों के नेता आधे-अधूरे कदमों की हिमायत करेंगे।जरूरत है कि दुनिया भर से - त्वरित , व्यापक , एकजुट कार्रवाई की माँग की जाए ।
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बैन की मून को बुधवार , सुबह ९.३० बजे एक प्रतिवेदन सुपुर्द किया जाएगा । दुनिया के रहनुमाओं तक जनमत की आवाज़ पहुँचाने का यह उचित अवसर है । नीचे दी गई कड़ी पर खटका मार कर कर प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर करें(युनीकोड देवनागरी में हस्ताक्षर किए जा सकते हैं) : -
http://www.avaaz.org/en/world_food_crisis/9.php?cl=95171134
खाद्यान संकट मौसम – संकट की तरह एक वैश्विक आपदा है । दुनिया कितनी परस्पर निर्भर है और परिस्थिति कितनी नाजुक है । सरहदों से ऊपर उठ कर हमें दुनिया को बचाने के लिए पहल करनी होगी।
खाद्यान संकट पर कुछ महत्वपूर्ण लेख :
संयुक्त राष्ट्र मानव विकास रपट के निदेशक गार्जियन के माध्यम से चेतावनी देते हैं कि रोम में होने वाली यह बैठक आँखों में धूल झोंकने वाली साबित हो सकती है ।
http://www.guardian.co.uk/commentisfree/2008/jun/02/food.globaleconomy
बीबीसी इस संकट को मौन-सुनामी की संज्ञा देती है :
http://news.bbc.co.uk/2/hi/in_depth/world/2008/costoffood/default.stm
खाद्यान की जगह जैविक ईंधन को बढ़ावा देने के लिए अमेरिका की आलोचना होगी। http://www.nytimes.com/2008/05/30/business/worldbusiness/30food.html?em&ex=1212379200 &en=7893996338e2f455&ei=5087%0A


पूंजीवाद का लाया है यह खाद्य संकट। जो आवश्यकतानुसार उत्पादन के स्थान पर मुनाफे के लिए उत्पादन की व्यवस्था देता है।
समाज नियंत्रित अर्थव्यवस्था ही इस का एक मात्र हल है।