अपनी जड़ें जमाने के बाद उपभोक्तावाद को नफ़ीस बनाने की माँग व्यापक होने लगती है । यूरोप और अमेरिका में सशक्त बन चुका उपभोक्ता आन्दोलन अक्सर सेहत और नैतिकता से जुड़े सवाल कारगार ढंग से उठाता है । पश्चिम के पर्यावरणवादी आन्दोलन में भी यूरोपवासियों की यह चिन्ता मुख्य है – ‘प्राकृतिक संसाधनों के सीमित भंडारों से हमारा दिन पर दिन बढ़ता उपभोग सीमित न होने पाए और अधिक दिन तक उपभोग के लिए हम बचे रहें ’। रासायनिक खाद के बिना पैदा किए गए अनाज और फलों की अच्छी खासी माँग इन अमीर देशों में पैदा हुई है – उपभोक्तावाद का परिष्कार ! उनकी उपभोक्तावाद और पर्यावरण की चिन्ताएं गरीब मुल्कों में बढ़ रही भूखमरी और गैरबराबरी का समाधान नहीं ढूंढती हैं ।
राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान गांधीजी सिर्फ संघर्ष के कार्यक्रम नहीं चलाते थे । इन संघर्षों के लिए आवश्यक ताकत पैदा करने वाले रचना के काम भी चलाते थे । यह रचनात्मक काम वैकल्पिक समाज के सपने का अक्स भी प्रस्तुत करते थे। निसर्गोपचार या प्राकृतिक चिकित्सा के उनके प्रयोगों के पीछे भी ऐसा विप्लवी ख्वाब रहा होगा।
मेरी पत्नी डॉ. स्वाति के इस वर्ष के ग्रीष्मावकाश के दौरान गांधी-विनोबा की धारा के एक वरिष्ट कार्यकर्ता जगदीश शाह द्वारा वडोदरा के निकट गोत्री में स्थापित ‘विनोबा आश्रम’ के निसर्गोपचार केन्द्र में बतौर ‘दर्दी’ (मरीज) आठ दिन रहने का मौका मिला ।
गोत्री गाँव की ग्राम सभा ने एक प्रस्ताव पास कर तीन रुपए में तीन एकड़ जमीन इस आश्रम के लिए दी थी । अब गोत्री वडोदरा नगर पालिका का हिस्सा है और पुराने गोत्री गाँव से जुड़ा सिर्फ़ एक परिवार( रमेश भाई का) आश्रम का हिस्सा है । निसर्गोपचार केन्द्र व्यावसायिक आधार पर चलाया जा रहा है । केन्द्र की एक वेबसाइट भी है । आर्थिक आधार पर दी जाने वाली रियायत के नाम पर सर्वोदयी कार्यकर्ता , नेता और उनके स्वजन मुफ़्त चिकित्सा पाते हैं । मेरे बाप , बहन और भान्जी इस छूट का लाभ उठा चुके थे और उनके अनुभव सुनने के बाद हमने ( मैं और स्वाति) वहाँ जाने का निर्णय लिया ।
जगदीश शाह बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में इस केन्द्र में उपचार के लिए एडवान्स बुकिंग हो जा रही है । अनिवासी गुजराती और उच्च मध्यम वर्गीय यहाँ इस चिकित्सा का लाभ ले रहे हैं । गुजरात विद्यापीठ द्वारा प्राकृतिक चिकित्सा के डिप्लोमा के छात्र/छात्राएं यहाँ महीना भर ‘इन्टर्नशिप’ करते हैं । मुख्य उपचार विधियों को संचालित करने में यह बच्चे काम आ जाते हैं ।
यह चिकित्सा विधि निश्चित ही मुख्यधारा से अलग है परन्तु जब तक आम आदमी इसे जीवन पद्धति के रूप में नहीं अपना पाता इसे वैकल्पिक चिकित्सा कहना उचित न होगा । ऐसे में यह प्रयोग ‘परिष्कृत उपभोक्तावाद’ को बढ़ावा देने वाला व्यवसाय ही होगा ।
इस केन्द्र में १२०० से ३००० रुपए प्रतिमा पाने वाले कर्मचारियों की फौज है जो रसोई , उपचार केन्द्र , मरीजों के रहने के स्थान और खेत बगीचे में काम करते हैं । उपचार का मुख्य आधार ‘आहार – सुधार’ है । सिर्फ़ पानी , सिर्फ़ रसाहार और सिर्फ़ फलाहार आहार के तीन प्रकार हैं । कटि स्नान ,वाष्प स्नान , मट्टी लेप , मालिश,एनिमा और योगासन के प्रशिक्षक और सहायक प्रशिक्षित और सेवा भाव से ओत प्रोत हैं । इनमें से कई कर्मचार कम दरमाह के कारण बाकी समय में ऑटो रिक्शा चलाना,ट्रैवेल एजेन्सी से जुड़ने जैसे काम करते हैं ।
आठ दिन यहाँ रहकर हमने योगासन से जुड़ी कुछ सूक्ष्म क्रियाएं और आसन सीखे , पाँच – पाँच किलो वजन घटाया और घर लौट कर आहार-परिवर्तन का मन बनाया । दो लोगों का खर्च करीब पाँच हजार रुपए आया। कुछ बीमारियाँ भी समाप्त हो गयी हों तो अचरज नहीं होगा।
ऐसे केन्द्र जब तक सरकारी नीति का हिस्सा नहीं बनते तब तक यह आम आदमी की पहुँच से बाहर रहेंगे तथा हमारे जैसे मध्य वर्गीय परिवारों के उपभोक्तावाद को ‘परिष्कृत’ करने की दुकान बने रहेंगे।

यह जानकर प्रसन्नता हुई कि स्वाति जी व आपने इस चिकित्सा का लाभ उठाया। मेरे विचार में हम ऐसे प्रयोग केवल शरीर जब लाल बत्ती जलाता, खतरे की घंटी बजाता चिल्लाता है तभी करते हैं। यदि यह सब स्वस्थ अवस्था में ही किया जाए तो शायद अस्वस्थ होने की नौबत ही ना आए। पूँजीवाद व पैसे की राजनीति को मैं नहीं समझती, सो उस पर कुछ नहीं कह सकती। यह ही क्या कम है कि ऐसे स्थान खुल रहे हैं ? शायद पैसे वाले कुछ अधिक शुल्क देकर गरीबों को कम खर्च में यह सुविधा दिलवा सकते हैं। वैसे भी कौन सा गरीब फल खा पाता होगा?
घुघूती बासूती
प्राकृतिक चिकित्सक होने के कारण जानती हूँ कि आप कितना आनन्द अनुभव कर रहे होंगे अभी.. हाँ अभी यह महँगा जरूर है पर हो सकता है आने वाले वक्त मे कुछ सस्ता हो जाये… कम से कम मै यह कोशिश करूँगी कि जब मै अपना ऐसा स्थान बनाऊँ तो उसके दर कुछ इस तरह से रखूँ ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसका फ़ायदा उठा सके।
[...] उपभोक्तावाद का परिष्कार या निसर्गोपच… [...]
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