सूर्य हमारा परम मित्र

[ अजित वडनेरकर और विनोबा नामक  पोस्ट में कई सुधी पाठकों ने रुचि ली। इससे प्रेरित होकर गुजराती पाक्षिक भूमिपुत्र से कांति शाह द्वारा संकलित , विनोबा रचित 'सूर्य-उपासना '  के अंश यहां दे रहा हूँ । अनुवाद मेरा है । अफ़लातून ]

सूर्य माने उत्तम प्रेरणा देने वाला । सु = ईर् । ‘ईर्’ अर्थात प्रेरणा देने वाला । सूर्य को ही सूक्ष्म रूप में सविता भी कहते हैं । गायत्री मंत्र में उसके ही वरणीय स्वरूप का ध्यान कर बुद्धि के लिए उससे उत्तम प्रेरणा की अपेक्षा की गई है ।

   सूर्य का  एक नाम ‘स्वराट’ है , जिससे स्वराज शब्द आया । स्वराट यानी स्वयंप्रकाशी । सूर्य स्वावलंबी है । चंद्र को अन्यराज कहा गया है । वह दूसरे के प्रकाश से विराजमान है। इस प्रकार ‘स्वराज’  शब्द बहुत सुन्दर अर्थ बताता है । ‘ भास्कर’ , ‘भानु’ वगैरह शब्द भी प्रकाश सूचक हैं ।

   सूर्य का संस्कृत में एक नाम है , ‘ शंस:’ उससे अंग्रेजी में ‘सन’ (sun) बना और फ्रेन्च में ‘सोलाई’ बना । युरोप की सभी भाषाओं में सूर्यवाचक शब्द संस्कृत से बने हैं ।

   सूर्य का अत्यंत सटीक  नाम है ‘मित्र’

    वेद में विश्वामित्र ऋषि का मंत्र है , जिसमें सूर्य को मित्र कहा गया है । सूर्य हमारा परम मित्र है । मित्र क्या कर रहा है ? ‘ मित्रो जनान् यातयति ब्रुवाण: ‘ -  यह मित्र लोगों को आवाहन दे रहा है , पुकार रहा है और उन्हें काम पर लगा रहा है । सूर्य आता है तब लोग अत्यंत उत्साह से घर के दरवाजे खोल देते हैं और उसकी किरणों

मित्र,देव,नवजीवनदायक

मित्र,देव,नवजीवनदायक

 को अपने घर में लाने के उत्सुक रहते हैं । अरे मित्र आया , मित्र आया ! ऐसा भी कहा गया है कि यह सूर्य क्या प्रजा का प्राण उग रहा है । ‘ प्राण: प्रजानां उदयत्येष: सूर्य: ‘ । सूर्य के लिए लोगों में कितना विश्वास , कितना प्रेम , कितनी भक्ति है ! और सभी उसके प्रति अपनापन महसूस करते हैं । सब को यह आभास होता है कि यह मेरा मित्र है । वेद में इसकी अजब महिमा गायी गई है । माम् प्रति माम् इति सर्वेण् समं – प्रत्येक को लग रहा है कि यह मेरे लिए आया , मेरे लिए आया । वह सबके लिए समान है ।क्या कोई कह सकता है कि सूर्य मेरे बाप की मिल्कियत है ? भगवान रामचन्द्र इतने बड़े थे , वे सूर्यवंशी भी थे । इसके बावजूद सूर्य जितना राम का था , उतना ही रावण का था ।और हम सब का भी है । सूर्य की यह खूबी है कि वह सब पर समान प्रेम करता है ।

    इस प्रकार सब से समान मैत्री रखने वाले सूर्यनारायण को आदर्श मित्र मान कर उसे अपने यहाँ ‘ मित्र’ कहा गया है । यूँ तो हिंदुस्तान ग़रम प्रदेश है , सूर्य का ताप बहुत तेज होता है । इसके बावजूद हम उससे घबड़ाए नहीं , उससे नाराज़ नहीं हुए । उलटे उसे ‘मित्र’ कहा । इसका कारण यह है कि हमने माना कि सूर्य की यह प्रखरता मनुष्य के लिए लाभदायक है , हानिकारक नहीं है ।  जारी

[ आगे : 'हमारी अग्रणी संस्कृति का सूचक' ]

6 Responses

  1. labhadayak post. kuch seekhane layak.

  2. बहुत ही ज्ञान्वर्धक पोस्ट, एक दम अलग ही अंदाज सूर्य को देखने का

  3. Aabhaar is behtarin post ke liye.

  4. मुझे खुशी है कि आप विनोबा जी रचनाओं के अंश हम पाठकों के लिए अनुवाद कर यहाँ ला रहे हैं। हल्का फुल्का तो हममें से अधिकतर लिख लेते हैं, परन्तु इतनी मेहनत कर विनोबा जी जैसी हस्ती का रचा कुछ हमारे बीच लाने का यह प्रयत्न प्रशंसनीय है।
    सूर्य को मित्र के रूप में मानने वाला हमारी संस्कृति का यह रूप आज ही समझा और जाना । यह अंश बढ़िया रहा। आशा है भविष्य में भी इस श्रृंखला को जारी रखेंगे।
    घुघूती बासूती

  5. बहुत सुंदर , आनदलोक में हूं अफ्लू भाई। विनोबा की मिठाई और ऊपर से आपके
    अनुवाद का चमकीला वरक़ !!
    ये तमाम वो संदर्भ हैं जो शब्दों का सफर के आगामी पड़ावों को समृद्ध करेंगे। बहुत बहुत आभार । बुजुर्गों की स्मृति को नमन् ….हम उनसे ही पा रहे हैं अब तक।

  6. [...] हमारी उन्नत संस्कृति का द्योतक पिछला भाग [...]

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