हमारी संस्कृति में सूर्य को पूरे जीवन के साथ गूँथ लिया गया है । सूर्य को परम मित्र कहा , सचराचर की आत्मा कहा, जीवन के सर्व रसों का दाता कहा । इसलिए हमारे यहाँ अनेक छोटे – बड़े सूर्य मन्दिर भी बने हैं । लोगों ने सोचा होगा कि उत्पत्ति , स्थिति और लय – सब सूर्यदेव ही करते हैं , इसलिए उनका मन्दिर बनाया जाए तथा उसमें जीवन की समस्त लीलाओं को चित्रित किया जाए । वैसे , सूर्य मन्दिरों की बाबत तरह तरह के विवाद चलते आए हैं तथा अनेक नासमझियाँ भी हैं । कई लोग कहते हैं कि क्या , मन्दिरों में इतना अधिक श्रृंगार दिखाया जाना चाहिए ? कइयों को इतना श्रृंगार देख कर इतनी घृणा उपजती है कि वे यहाँ तक कहते हैं कि ऐसे सभी शिल्पों को तोड़ डालना चाहिए ।
हाँलाकि मुझे यह लगता है कि आम तौर पर वहाँ जाने वाले भक्तिभाव से जाते हैं तथा ज्यादातर यह सब देख कर भगवान को देखते होंगे । मुझे यह भी लगता है कि पहले के साधकों ने इसे ही अपनी साधना माना होगा तथा इस सब को निर्विकार दृष्टि से देखना चाहिए ।
सच कहूँ तो कोणार्क का सूर्य मन्दिर देख कर मैं बहुत आकृष्ट हुआ । भगवान सूर्य का रथ के आकार जैसा यह मन्दिर सत घोड़ों और चौबीस पहियों वाला है । सूर्य यानी कालात्मा । सात दिनों के सात घोड़े तथा चौबीस पहिए यानी चौबीस पक्ष । समूची कल्पना सचमुच महान और भव्य है । उस मन्दिर की दीवारों पर दुनिया में चलने वाली समस्त कृतियाँ उकेरी हुई हैं , परन्तु यह सब बाहर है । यह सब जीवन की विविध प्रेरणा हैं । भीतर , इस सब से पूरी तरह अनासक्त भगवान सूर्य नारायण अंतर्यामी विराजमान हैं।
यह सब देख कर मुझ पर अच्छा ही असर हुआ । रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने ऐसे शिल्पों के बचाव में कहा है कि हमारे यहाँ ‘ मिथुनदर्शनं मंगलम् ‘- मिथुन का दर्शन मंगल व शुभ शगुन माना गया है । यह मंगल दर्शन है , अभद्र दर्शन नहीं । यह सब जीवन की विविध प्रेरणा हैं , जिनकी प्रेरक शक्ति भगवान सूर्य हैं । यह भगवान ही हमारे अन्दर अनासक्त रूप में विराजमान है ।
सूर्य शक्ति स्वरूप है तथा प्रजनन-क्रिया भी शक्ति का ही एक रूप है । सूर्य के अनेक शक्ति स्वरूपों को दिखाने के साथ साथ शक्ति का यह रूप भी दिखाना चाहिए – उस काल के लोगों को ऐसा लगा होगा ।
बात यूँ है कि कुछ लोगों का रुख़ Puritan – शुद्धतावादी होता है , अतिनैतिकतावादी। परन्तु यह शुद्धिवाद कई बार एकांगी बन जाता है । कुछ प्रक्रियाओं को खराब मान कर , उन्हें ऐसी जगहों पर नहीं दिखाना चाहिए ऐसा वे मानते हैं तथा ऐसा जहाँ वे देखते हैं भड़क उठते हैं ! परन्तु ऐसा एकांगी नहीं बनना चाहिए ।
प्रजनन की प्रक्रिया को कई बार बहुत जुगुप्सा से देखा जाता है । परन्तु मेरे दिल में प्रजनन की प्रक्रिया के बारे में ऐसी कोई जुगुप्सा नहीं है । जिससे मैं और आप पैदा हुए हैं , संत और महात्मा पैदा हुए ,उसे मैं एक पवित्र क्रिया मानता हूँ । उसके विषय में जुगुप्सा की दृष्टि मुझे उचित नहीं लगती । इस प्रकार कोणार्क और खजुराहो के सूर्य मन्दिरों की तरफ़ देखिएगा तब उनका रहस्य आपको समझ में आएगा। लब्बो लुआब समझने वाली बात यह है कि हमारे यहाँ सूर्य उपासना जीवन के विविध अंगों के साथ गूँथ दी गई थी । उसके पीछे जीवन की एक समग्र व सर्वांगी दृष्टि थी ।
[ गुजराती भूमिपुत्र में प्रकाशित कांति शाह द्वारा संकलित 'सूर्य-उपासना' से अनुदित । अनुवाद - अफ़लातून ]

विनोबा जी का यह जीवन दर्शन पढ़कर एक सुखद आश्चर्य(आश्चर्य शब्द शायद सही नहीं है, क्योंकि आश्चर्य लायक कुछ है ही नहीं ! एक इतनी महान हस्ती से यह अपेक्षा तो होनी ही चाहिए। सो सुखद एहसास अधिक सही रहेगा। ) हुआ। वैसे भी भारत की जिस सांस्कृतिक धरोहर का हम नाम लेते रहते हैं उसमें जीवन के सत्य कभी वर्जित नहीं थे, ऐसा मैं समझती हूँ। यह लेख पढ़वाने के लिए धन्यवाद।
घुघूती बासूती
विनोबा जी के ये विचार रुचिकर हैं
लेख के लिए धन्यवाद..
विनोबा जी सँत थे विद्वान भी और अव्वल दर्जे के देश भक्त भी -
मेरे पूजा घर मेँ उनकी भी छबि रखी हुई है -
उनके अत्यँत सुलखे विचार गुजराती से हिन्दी ब्लोग जगत तक लाने के लिये आपका शुक्रिया अजलातून जी -
सूर्योपासना पर समग्र दृष्टि
सार्थक…ज्ञानवर्धक और
संशय-निवारक भी है.
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आभार
डा.चन्द्रकुमार जैन
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