पिछला हिस्सा । परमाणु बिजली की कारखाने बनाने में आज कोयले से लगभग दुगुना तथा गैस से ढाई गुना खर्च होता है । परमाणु बिजली बनाने में प्रति मेगावाट आठ करोड़ खर्च आता है जबकि कोयले में ३.७५ करोड़ तथा गैस में ३ करोड़ । परमाणु बिजली घरों को बनाने में अन्य बिजली घर बनाने से ज्यादा समय लगता है – लगभग दुगुने से तीन गुना , कभी कभी ज्यादा भी । भारतीय बिजली घरों की एक विशेषता है । जब वे बनना शुरु होते हैं या जब उनके लिए पैसे की मंजूरी ली जाती है तब उनकी क्षमता ज्यादा बतायी जाती है ताकि प्रति मेगावाट खर्च कम दिखे । फिर बन जाने के बाद उन्हें कम क्षमता का घोषित कर दिया जाता है । जब मद्रास -१ और मद्रास-२ बने थे तब उन्हें २३५ मेगावाट क्षमता का बताया गया था । फिर जब नरोरा , काकरापार , कैगा तथा रावतभाटा ३ और ४ शुरु हुए थे तब उन्हें भी २३५ मेगावाट क्षमता का ही बताया गया था। मगर जब १९९१ में नरोरा की दूसरी इकाई शुरु हुई (critical) तब अखबारों को डॉ. पी.के. आयंगार ने कहा कि नरोरा २२० मे्गा वाट का रिएक्टर है । नरोरा – १ जो पनी पुरानी क्षमता २३५ मेगा वाट पर पहले चालू हो चुका था , उसको भी २२० मेगा वाट का बता दिया गया । जैसे इतना काफ़ी न हो , काकरापार , कैगा , रावतभाटा के जो बिजली घर निर्माणाधीन थे उनको भी अचानक २२० मेगा वाट का कर दिया गया । जनता को कीमत के बारे में बेवकूफ़ बनाने के सिवाय इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? हालाँकि राजस्थान-अ१ तथा मद्रास-१ की क्षमता तो तकनीकी कारणों से घटा दी गयी है ।
भारतीय परमाणु उर्जा कार्यक्रम में एक और अजीब व्यवस्था देखी जा सकती है । हाल के परमाणु घर PHWR भारी पानी इस्तेमाल करते हैं । भारी पानी के संयंत्र में जितनी लागत लगती है एन.पी.सी.एल उतना पैसा नहीं देता क्योंकि वे भारी पानी उधार या लीज पर लेते हैं इसलिए परमाणु बिजली में भारी पानी की असली कीमत न गिनकर भाड़ा गिना जाता है । यह एक तरह की सरकारी सब्सिडी है जो परमाणु बिजली को सस्ता रखने के लिए दी जाती है । यूरेनियम की कीमत तथा हैदराबाद के न्यूक्लियर फ़ुएल कॉ्म्पलेक्स में पूरी लागत से कीमत नहीं लगाई जाती और सरकारी सब्सिडी मिल जाती है । इस प्रकार परमाणु बिजली पर होने वाले खर्च को सरकारी सब्सिडी से नीचे रखा जाता है । अगर दुर्घटना हो तब कितना खर्च होगा , उसका तो अन्दाज भी नहीं लगाया जा सकता है। उस सम्भावित खर्च को भी कीमत में नहीं जोड़ा जाता । दुर्घटना के लिए बीमा भी नहीं है तथा उसका भी खर्च नहीं जोड़ा जाता । च्रेनोबिल की तरह अगर हजारों लोगों को हटाना पड़े तब क्या होगा ? परमाणु उर्जा केन्द्रों के आस पास रहने वाले लोगों , परमाणु उर्जा केन्द्रों में कार्यरत अस्थायी मजदूरों पर विकिरण का जो बुरा असर पड़ता है उसके इलाज का खर्च क्या बिजली के खर्च में गिना जाता है ?
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आपकी बातों में दम है। पर इसे इस तरह से देखा जाना चाहिए कि एक बार रिएक्टर जब लग जाएगा, तो फिर कच्चे माल की तुलना में जो बिजली बनेगी वह सस्ती ही होगी। इसके साथ ही साथ यहाँ पर यह सत्य भी ध्यान में रखना होगा कि कोयला या पानी का हम कितना उपयोग बिजली के लिए कर पाएंगे? और जहाँ तक रिस्क की बात है, तो जब हम लोग पैदल चलते थे, कितने कम रिस्क थे। लेकिन आज घर से बाहर निकलते ही मोटर, गाडी न जाने कितने तरह के रिस्क हैं। तो भई रिस्क तो जीवन का नाम है। हमें अगर आगे बढना है, तो रिस्क तो उठाना ही है। अगर रिस्क को सर्वोपरि बना दिया जाए, तो फिर आदमी की प्रगति रूक जाएगी, ठहर जाएगी।
हमारे देश मे घर का कुडा, गली का कुडा, शहर का कुडा टिकाने लगाने का तो कॊई सिस्टम नही, अब दुनिया भर का परमाणू कुडा केसे टिकाने लग पाये गा.
परमाणु बिजली के पैरिकारों के तमाम तर्कों के पेंच खोलकर रख दिए इस लेख ने . पर महाशक्तियों की कालबाह्य प्रौद्योगिकियों को विकास का आधार बताने वाली सरकार और उसके कारकूनों को कौन समझाए .