पिछले भाग : एक , दो । अब जब भारत सरकार और उससे ज्यादा परमाणु बिजली उद्योग जोर – शोर से कह रहे हैं कि सन २०५२ तक भारत की परमाणु बिजली क्षमता २७५००० MW होगी तब उन्हें यह भी पता है कि भारत के पास यूरेनियम नहीं है । तारापुर-१ और २ की ईंधन की समस्या तथा १९७४ ( पहला परीक्षण ) के बाद अमेरिका ने जो तंग किया उसे ध्यान में रखते हुए १,२,३ समझौता पिछले दो साल की बातचीत के बाद हुआ है । पिछले दो वर्षों में यूरेनियम की कीमत ७ डॉलर प्रत पाउन्ड से बढ़कर आज १५० डॉलर प्रति पाउन्ड हो गयी है । परमाणु बिजली का एक फायदा यह गिनाया जाता है कि ईंधन पर खर्चा नहीं होता मगर यूरेनियम ऐसी ऊँची कीमत पर खरीद कर भारत सरकार संग्रह करेगी तो गरीबों का मुँह का निवाला छीन कर ही परमाणु बिजली पैदा करेगी।
परमाणु कचरे का एक उलझा हुआ मामला तो है ही । इसे कहाँ रखा जाएगा ? कैसे रखा जाएगा ताकि पानी , खाद्य आदि को प्रभावित न करे ? परमाणुविदों को एक तरकीब सूझी है । इस्तेमाल किए हुए ईंधन को का पुनर्प्रसंस्करण । इस प्रक्रिया से रिएक्टर में इस्तेमाल किए गए ईंधन से प्लुटोनियम तथा यूरेनियम अलग किया जाता है । यह एक मंहगी तथा परमाणु शस्त्रों को बढ़ावा देने वाली पद्धति है । इस प्रक्रिया में बहुत सारे अम्ल इस्तेमाल किए जाते हैं जिसके कारण रेडियोधर्मी कचरे की मात्रा बढ़ जाती है । अमेरिका में एक हिसाब लगाया गया है जो दिखाता है कि इस्तेमाल किए गए ईंधन पर अगर पुन: प्रसंस्करण किया जाए तो बिजली प्रति इकाई ४० पैसे मंहगी पड़ेगी ।
परमाणु बिजली घरों में एक बड़ा खर्च और होता है जिसके बारे में अनुभव न होने के कारण कुछ भी नहीं कहा जा सकता । यह खर्च है परमाणु बिजलीघर की आयु समाप्त हो होने पर उसकी ‘कब्र’ बना कर दफ़नाने का । अभी तक अमेरिका में एक प्रोटो टाइप ( नमूने का ) छोता रिएक्टर ही डीकमीशन किया गया है । इसलिए बड़े रिएक्टर में ‘कब्र’ बनाने का कितना खर्च आयेगा यह कहना बड़ा मुश्किल है ।
जिस बिजली को इतना सस्ता माना गया था कि उसे मीटर से नापना भी नहीं पड़ेगा वही बिजली अगर सब खर्च गिने जांए तो सब से महंगी साबित हुई है । दुनिया के बड़े–बड़े देश बिजली की समस्या को हल करने के लिए बचत , अक्षय स्रोत तथा नवीकृत होने लायक उर्जा स्रोत तथा जीवन शैली में परिवर्तन करने की सोच रहे हैं तब हमारे देश में वही पुरानी नीति अपनाने की सोची जा रही है , यह दुर्भाग्यपूर्ण है ।
[ चेर्नोबिल पर विशेष सामग्री अतिशीघ्र दी जाएगी ]
Filed under: nuclear power | Tagged: परमाणु बिजली, decommissioning, nuclear power, nuclear power plants, uranium prices


RSS - Posts
जिन्होंने चर्नोबिल विभीषिका से कोई सबक नहीं सीखा ऐसे विकासप्रेमी (?) आज जनता को लॉलीपॉप दिखाकर कल के लिए मुसीबतों का पिटारा गले में डाल दे रहे हैं .
एक आधुनिक रिएक्टर तकरीबन १००० मेगावाट का होता है । रिएक्टर खडा़ करने में पांचेक साल लग जाते हैं । २७५००० मेगावाट के लिये २७५ रिएक्टरों की जरूरत होगी । यह संभव हो पायेगा क्या ? नहीं !
जिस विषय में ज्ञान नहीं है वहाँ चुप रहना ही बेहतर है। परन्तु जिन समस्याओं के बारे में आपने ध्यान आकृष्ट किया है वे ध्यान देने योग्य हैं। प्रधानमंत्री को इन विषयों पर अपनी सोच जनता को बतानी चाहिए।
घुघूती बासूती