(नेपाली) माओवादियोँ के समाजवाद की सीमायेँ / सुनील
यह एक इतिहास का चमत्कार माना जाएगा कि जब पूरी दुनिया मेँ साम्यवादी धारा का पराभव हो चुका है या हो रहा है , नेपाल मेँ एक माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी बड़ी ताकत के रूप में उभर कर आई है और सत्ता पर काबिज हुई है | नेपाल में राजशाही के अंत में इसकी प्रमुख भूमिका रही है | हथियारबन्द लड़ाई लड़ते लड़ते हथियार छो्ड़कर मतपेटी का रास्ता सत्ता में आने के लिये इसने अपनाया है , यह इतिहास का दूसरा चमत्कार है| हिमालय की तराई में बसे इस गरीब , पहाड़ी मुल्क में हो रहे परिवर्तनों पर दुनिया की नजर है| वामपंथी , प्रगतिशील ,परिवर्तनादी लोग तो इसे विशेष कौतूहल और आशा से देख रहे हैं |
संविधान सभा के जिस चुनाव में नेपाल की माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में जीत कर आई है , उसमें उसने एक ‘नया नेपाल’ बनाने का नारा दिया था | यह नया नेपाल कैसा होगा , नेपाली माओवादियों का साम्यवाद कैसा होगा , इसकी कुछ तस्वीर इसके दो प्रमुख नेताओं के पिछले दिनों प्रकाशित साक्षात्कारों से मिलती है| पार्टी के अध्यक्ष श्री प्रचन्ड का एक लम्बा साक्षात्कार ‘द हिन्दू’ अखबार में दि दिनों तक आया 28 एवं 29 अप्रैल 2008 को प्रकाशित हुआ है | पार्टी के दूसरे प्रमुख नेता और प्रमुख विचारक श्री बाबूराम भट्टराई का लम्बा साक्षात्कार ‘इकानामिक एण्ड पालिटिकल वीकली ‘ के 10 मई 2008 के अंक में प्रकाशित हुआ है | अन्यत्र प्रकाशित रपटों व समाचारों में भी उनके विचारों व रुझानों के झलक मिलती है |
एक महत्वपूर्ण बात बहुदलीय लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता की है | जो पार्टी कल तक सशस्त्र क्रांति की लाईन पर चल रही थी , उसके अध्यक्ष प्रचण्ड कहते हैं ,
” जब जनयुद्ध चल रहा था , तभी हम, इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि समाजवाद में भी बहुदलीय प्रतिस्पर्धा जरूरी होगी | न केवल लोकतांत्रिक क्रांति के दौर में ,बल्कि समाजवाद के दौर में भी,यदि बहुदलीय प्रतिस्पर्धा नहीं होगी , एक जीवंत समाज बनाना संभव नहीं होगा |”
प्रचंड यह भी कहते हैं कि ,
“हम जो कर रहे हैं ,उससे सिर्फ भारतीय माओवादियों को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में माओवादियों को एक सशक्त सन्देश जाएगा कि किसे नेपाली माओवादी बंदूक से वोट तक पहुंचे , कैसे उन्होंने नेपाली जनता के दिलों व दिमागों को प्रभावित किया व जीता ,कैसे वे सरकार का नेत्रुत्व करने और एक नया संविधान बनाने की स्थिति में आए |”
नेपाली माओवादियों के नेताओं के विचारों की सीमाओं का पता चलता है , जब वे आर्थिक सवालों पर बात करते हैं | वे बार- बार खते हैं कि हम पूंजीवाद के खिलाफ नहीं हैं , हमारी लडाई सामंतवाद एवं राजशाही से है | भट्टराई कहते हैं कि हम परजीवी एवं नौकरशाही पूंजीवाद के खिलाफ तो हैं , लेकिन उत्पादक एवं औद्योगिक पूंजीवाद के खिलाफ नहीं हैं |हम राष्ट्रीय पूंजीवाद को बढ़ावा देना चाहते हैं | फिलहाल इस अंतरिम दौर में हम ऐसे औद्योगिक पूंजीवाद को बढाना चाहेंगे , जिसका रुझान समाजवाद की तरफ हो | इसीसे हम रोजगार पैदा कर पाएंगे और उत्पादक शक्तियों का विकास कर पाएंगे |
संविधान सभा के चुनाव मेँ जीतने के बाद काठमाण्डू के एक होटल मेँ बडी तादाद में मौजूद उद्योगपतियों और व्यापारियों के साथ बैठक में प्रचण्ड एवं भट्टराई ने जो कहा , वह भी गौरतलब है |
भट्टराई ने कहा ,
” हमारी लड़ाई पूंजीवाद से नहीं है | यह सामंतवाद के खिलाफ है | हम सरकारी-निजी भागीदारी (पब्लिक-प्राईवेट पार्टनरशिप) में विश्वास करते हैं | सामूहिकीकरण ,समाजीकरण और राष्ट्रीयकरण हमारे वर्तमान एजेण्डे में नहीं है | हमें बडे पैमाने पर रोजगार पैदा करना है ,जिसके लिए पनबिजली , पर्यटन आदि में पूंजीनिवेश और क्षमताओं के अधिकतम उपयोग की जरूरत है |”
इस औद्योगिक पूंजीवाद में विदेशी पूंजी की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर भट्टराई उससे पूरी तरह इंकार नहीं करते हैं | वे कहते हैं कि हमारा मुख्य जोर आंतरिक संसाधनों को जुटाने पर होगा , लेकिन दीर्घकालीन विकास के लिये और आधारभूत ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) में निवेश के लिये हमें अंतर्राष्ट्रीय पूंजी की जरूरत होगी| हम उनके साथ सम्पर्क में हैं व चर्चा कर रहे हैं | इसका मतलब है कि भट्टराई आश्वस्त कर रहे हैं कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिये नेपाल के दरवाजे बन्द नहीं होंगे | पता चला है कि विश्व बैंक के प्रतिनिधियों के साथ भी माओवादी नेताओं की चर्चा हुई है | विश्व व्यापार संगठन की सदस्यता के बारे में पूछने पर भट्टराई कहते हैं कि विश्व व्यापार संगठन से पूरी तरह आना संभव नहीं है , इसके अन्दर रहना भी कठिन है | इस मामले में हम दुविधा में हैं और हमने इस बारे में औपचारिक रूप से कोई नीति तय नहीं की है |
[ जारी ]

इंतजार रहेगा अगली किश्त का।
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[...] 28, 2008 by अफ़लातून पिछले भाग : एक , दो । गाँधी के प्रति उन्हें एलर्जी [...]
The history will decide whether the Nepali Maoists are Maoists in form or content. After Lenin and Stalin the contributions of Mao to Marxism have taken it to new heights. There is no doubt that Stalin has no flaws in implementing socialism in USSR.He adopted the theory of advancement of the forces of production in mechanical way.Mao noted his shortcomings.
The communists don’t learn from the mistakes of their predecessors, the blame is baseless. I would like to present some excerpts from the book ” The Science of Revolution” by Lenny Wolff published by Rahul Foundation Lucknow,
” This error was linked in turn to Stalin’s espousal of what amounted to a form of the ‘theory of the productive forces.’ Stalin believed that once ownership had in the main been socialized, the key task in advancing to communism then lay in developing the productive forces under socialist ownership. As touched on earlier, however, development of the productive as an end in itself will reproduce bourgeois production and social relations, due to the soil right.
Here Stalin’s tendencies to mechanical materialism asserted themselves and led to his negation or serious misunderstanding and misestimation of the important roles of the other aspects of the economic base (specifically, the relation between people and the relations of distributions) and of the superstructure. He did not grasp the ways in which the socialist economic base could be undermined unless revolution was carried out in the superstructure ( or how the socialist ownership system could be undermined by largely unfettered bourgeois right in the other aspects of the base) and hence basically wrote off the importance of the struggle to transform these crucial spheres. This laid the basis for Stalin’s increasing tendency beginning in the mid- 30s to rely on material incentives and the authority and machenery of the bureaucracy, instead of raising the consciousness of and politically mobilizing the masses……
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