पिछले भाग : एक , दो । गाँधी के प्रति उन्हें एलर्जी हो सकती है । लेकिन माओवादियों को इस पर तो विचार करना पडेगा कि आखिर क्यों स्वयं माओ को चीन के लिए यूरोपीय और सोवियत औद्योगीकरण से अलग तकनालाजी एवं विकास का रास्ता चुनना पड़ा ? और उस राह को छोड़ कर वैश्वीकरण और औद्योगिक पूंजीवाद का रास्ता अपनाने वाले चीन में आज जबरदस्त जन असंतोष खदबदा रहा है ? क्यूबा जैसे साम्यवादी देश को रासायनिक मशीनी खेती छोड़कर जैविक खेती का रास्ता क्यों अपनाना पड़ा ? भारत की हरित क्रांति के क्या सबक हैं , भारतीय खेती आज क्यों संकट में आ गयी है और भारत का किसान क्यों आत्महत्या के कगार पर पहुंच गया है ? भट्टराई खेती के जिस मशीनीकरण और आधुनिकीकरण की बात कर रहे हैं , क्या वह नेपाल के गरीब छोटे किसानों को और ज्यादा वंचित करने , बेरोजगार करने तथा हाशिये पर डालने का काम नहीं करेगी ? अचरज इसलिए भी है कि बाबूराम भट्टराई तो काफी समय तक नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र रहे हैं जहाँ रूढ़िवादी मार्क्सवाद के साथ नए विचारों व प्रश्नों की लगातार टकराहट व बहस चलती रहती है ।
वैसे भारतीय मार्क्स्वादियों ने भी अभी तक इन सवालों पर नए ढंग से सोचा नहीं है । माकपा-भाकपा और उनके प्रवक्ता तो खुलकर समाजवाद के पहले पूंजीवाद के विकास , औद्योगीकरण और इसके लिए विदेशी पूंजी को आमंत्रित करने को जरूरी बता रहे हैं । उनके निहित स्वार्थ या सत्ता में रहने की मजबूरी को इसका कारण माना जा सकता है । किन्तु भारत की नक्सलवादी और माओवादी पार्टियाँ भी विकास एवं औद्योगीकरण के मुद्दे पर स्पष्ट नहीं हैं । नेपाली माओवादियों द्वारा विदेशी पूंजी आमंत्रित करने और पूंजीपतियों के साथ मित्रता करने के बारे में टिप्पणी करते हुए भारतीय माओवादियों के प्रवक्ता ने ‘द हिन्दू’ में १७ मई , २००८ को प्रकाशित एक अन्य साक्षात्कार में कहा ,
” जहाँ तक नेपाल के पूंजीवाद के विकास का सवाल है , जब तक यह राष्ट्रीय पूंजीवाद है , आम जनता की जरूरतों को पूरा करने के लिए निर्देशित होता है , साम्राज्यवादियों की सेवा करने के बजाय या निर्यात के बजाय आंतरिक अर्थव्यवस्था के विकास की दिशा में रहता है , तब तक क्रान्तिकारियों को इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए । “
दिक्कत यह है कि राष्ट्रीय पूंजीवाद नाम की चीज ज्यादा समय चलती नहीं है । पूंजीवाद अनिवार्य रूप से साम्राज्यवाद से कम या ज्यादा जुड़ा होता है और उसका सहोदर होता है । राष्ट्रीय पूंजीवाद के अन्तर्विरोध अंतत: उसे साम्राज्यवाद की गोद में ही जाने को मजबूर करते हैं , जैसा कि भारत में १९९१ में हुआ । यह एक विडम्बना है कि समाजवाद लाने का कोई गैर-पूंजीवादी रास्ता भी हो सकता है , इस पर मार्क्सवादी मस्तिष्क सोच भी नहीं पाता है और अंतत: पूंजीवाद की ही भूलभुलैया में भटक जाता है ।
इस सन्दर्भ में एक प्रसंग याद आता है । विश्व व्यापार संगठन बनने के कुछ समय बाद इसके विरोध में दिल्ली में कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में एक राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ , जिसमें सभी प्रमुख साम्यवादी दल , समाजवादी जनपरिषद एवं जनान्दोलनों के लोग एवं वामपंथी बुद्धिजीवियों ने शिरकत की थी । सम्मेलन के अन्त में बाहर लॉन में बैठकर इस विषय में आगे के संघर्ष के लिए योजना व रणनीति बन रही थी , तो भाकपा-माले के प्रतिनिधि ने विश्व व्यापार संगठन के संपूर्ण विरोध और इससे बाहर आने की मांग पर सहमति देने में असमर्थता जताई । उसने कहा कि हम नारा लगा सकते हैं , लेकिन लिखित प्रस्ताव में ऐसा नहीं कह सकते हैं । ठीक यही दुविधा आज नेपाल के माओवादियों में दिखाई देती है। यह दुविधा दरअसल विकास , औद्योगीकरण , तकनालाजी और इतिहास के बारे में दोषपूर्ण दृष्टि से पैदा होती है। यदि यह दृष्टिदोष दूर नहीं होगा तो जनता के बहादुर संघर्षों व कुर्बानी से युक्त एक और समाजवाद का उद्यम अंधेरे में भतक जाएगा और असफल होने के लिए अभिशप्त होगा ।
- सुनील , ( राष्ट्रीय अध्यक्ष , समाजवादी जनपरिषद )
ग्रा/पो. केसला , वाया – इटारसी , जिला होशंगाबाद , म.प्र. ४६११११
फोन – ०९४२५०४०४५२


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वामपंथी बुद्धिजीवियों ने शिरकत की थी । सम्मेलन के अन्त में बाहर लॉन में बैठकर इस विषय में आगे के संघर्ष के लिए योजना व रणनीति बन रही थी , तो भाकपा-माले के प्रतिनिधि ने विश्व व्यापार संगठन के संपूर्ण विरोध और इससे बाहर आने की मांग पर सहमति देने में असमर्थता जताई । उसने कहा कि हम नारा लगा सकते हैं , लेकिन लिखित प्रस्ताव में ऐसा नहीं कह सकते हैं । ठीक यही दुविधा आज नेपाल के माओवादियों में दिखाई देती है। यह दुविधा दरअसल विकास , औद्योगीकरण , तकनालाजी और इतिहास के बारे में दोषपूर्ण दृष्टि से पैदा होती है। यदि यह दृष्टिदोष दूर नहीं होगा तो जनता के बहादुर संघर्षों व कुर्बानी से युक्त