Feeds:
पोस्ट
टिप्पणियाँ

Archive for सितम्बर, 2008

किशन पटनायक

किशन पटनायक

 

परसों ( २७ सितम्बर ) मेरे दल के नेता साथी किशन पटनायक की मृत्यु तिथि थी । देश में जो कुहासा और कड़ुवाहट फैलाने की कोशिश हो रही है उससे व्यापक स्तर पर अवसाद फैले यह मुमकिन है । राजनीति करने वालों का एक बुनियादी दायित्व है कि वह लोगों में लोकतंत्र के प्रति बुनियादी यक़ीन को मजबूत करें – किशनजी ने यह सिखाया । देश को हिला देने वाली गत दिनों हुई घटनाओं के बारे में स्पष्टता बहुत जरूरी है ।

    यहाँ प्रस्तुत किशन पटनायक के दो छोटे बयान इस कोहरें , कड़ुवाहट और घुटन को काटने में मददगार होंगे , उम्मीद है । राँची में २९ अगस्त , २००४ को दिए गए व्याख्यान और दिसम्बर १९९२ में लिखा गया सामयिक वार्ता का सम्पादकीय- ‘राष्ट्र के हत्यारों के खिलाफ एक कार्यक्रम’ । राँची के कार्यक्रम में किशनजी ने मेरी किताब ‘कोक-पेप्सी की लूट और पानी की जंग’ का विमोचन भी किया था और ५ दिसम्बर , १९९२ को भी हम झारखण्ड के किसी कार्यक्रम से साथ में रेल से लौट रहे थे। राँची के कार्यक्रम की रपट उनकी मृत्यु के अगले दिन (२८ सितम्बर, २००४, पृष्ट ९ ) के ‘प्रभात खबर’ में भी छपी थी ।

[splashcast c DDRS2125IT]

Read Full Post »

    १९६७ -६९ की कुछ राजनैतिक घटनाओं की तस्वीरें मेरी याददाश्त का हिस्सा बन गयी है। मेरी उमर आठ – दस साल की । ‘६७ में गैर कांग्रेसवाद की कई सूबों में सफलता और १९६९ में गाँधी की जन्म शताब्दी । गांधी की जन्म शती के मौके पर दुनिया के कई हिस्सों के ‘गाँधी’ भारत आये थे । सरहदी गाँधी – बादशाह ख़ान , फ्रान्स के गांधी – लान्ज़ो देल्वास्तो , मेक्सिकी खेत मजदूरों के गांधी प्रभावित नेता सीज़र शावेज , इटली के दानिलो दोलची । दिल्ली के हरिजन सेवक संघ में बादशाह ख़ान का कार्यक्रम था तब उनसे मिलने देश की कई हस्तियाँ वहाँ मौजूद थीं – ‘भारत में अंग्रेजी राज’ अंग्रेजों द्वारा प्रतिबन्धित उस अमर किताब के लेखक पण्डित सुन्दरलाल – लम्बी झक दाढ़ी के साथ , अंग्रेजों की जेल में रहने के बाद नेहरू द्वारा बरसों गिरफ़्तार रखे गए शेर-ए- कश्मीर शेख़ अब्दुलाह – मेरी बा जब उनसे मिलाने ले गयी तो मैंने उनसे कहा ,’दहाड़िए’ और वे दहाड़े भी । और हिन्दी ,देवनागरी की सेवा करने वाले काका साहब कालेलकर जिन्होंने पहले पिछड़े वर्ग आयोग की सदारत की थी । इन शक्सियतों के दर्शन का यह एक लाभ तो है ही कि उनके द्वारा किए गए देश के लिए काम का स्मरण होता है ।

   १९६७ में गैर कांग्रसवाद का नारा देते वक्त लोहिया यह भी चाहते थे कि वैचारिक आधार पर एक विकल्प बने। उनकी एक बात गैर कांग्रेसी मोर्चे की बाबत बहुत महत्वपूर्ण थी।“जनसंघ की एक पहाड़ साम्प्रदायिकता से कांग्रेस की एक बूँद साम्प्रदायिकता ज्यादा खतरनाक है क्योंकि वह सत्ता में है । इसी प्रकार कम्युनिस्टों की एक पहाड़ गद्दारी से कांग्रेस की एक बूँद गद्दारी ज्यादा खतरनाक है”। लगातार २० वर्षों से केन्द्र में एक दल का शासन था। केन्द्र में पहली गैर कांग्रेसी सरकार बनने में और दस साल लग गए। जनसंघी पृष्टभूमि के राजबली तिवारी १९७७ में जब बनारस में विधान सभा चुनाव लड़े और जीते तब ‘रजब अली’ को जिताने में मुसलमान पीछे नहीं थे। जनसंघी सोचते थे कि ‘रजब अली’ कहने पर वोट मिलेगा । तानाशाही के खिलाफ़ जम्हूरियत को बचाए रखने के लिए केले के खम्भे को भी जनता वोट देने के लिए तैयार थी।

    याद कीजिए इन्दिरा गाँधी की हत्या के बाद का चुनाव ।  स्वर्ण मन्दिर में सैनिक कार्रवाई की आलोचना का माने आप गद्दार हैं । भूल जाइए कि अकालियों  और किसा्नों के आन्दोलन से पंजाब में हाशिए पर जा रही कांग्रेस ने भिंडरावाला को ‘सन्त’ का दरजा दिया था । एक छोटे अल्पसंख्यक समूह को ‘गद्दारी’ के साथ जोड़ कर चुनाव अभियान चलाया तो ‘संघ’ ने भी मान लिया कि हिन्दू हित कांग्रेस देखेगी , दो उसीका साथ । भाजपा आ गयी लोकसभा में दो सीटों पर । जम्मू क्षेत्र की जो सीटें आजादी के बाद से हमेशा जनसंघ जीतती थी वे भी पहली बार गईं कांग्रेस की झोली में । पहली बार रीडिफ़्यूज़न नामक बहुराष्ट्रीय कम्पनी से कांग्रेस ने प्रचार करवाया । अखबारों में पूरे-पूरे पन्ने के प्रभावशाली (भय पैदा करने में) विज्ञापन छपते थे – ‘क्या आप चाहते हैं कि देश की सीमा आपके घर की चौहद्दी तक आ जाए?’ कांग्रेस को उस बार मिली सीटें अब तक की सब से बड़ी सफलता और सबसे बड़ा बहुमत रही हैं ।

     बहरहाल , अब केन्द्र में भाजपा भी सत्ता में रह चुकी है । सत्ता में रहने पर निश्चित तौर पर उसकी फिरकापरस्ती खतरनाक हो जाया करती है। पूर्वोत्तर के राज्यों और कश्मीर की बाबत ‘संघ’ के कैडरों के दिमाग में जितनी सतही नासमझी भरी रहती है उससे जिम्मेदार रूप में सरकार में रहने पर भाजपा को रहना पड़ता है । राजग सरकार भी उन अलगाववादी समूहों से बात की कोशिश करती है । जम्मू कश्मीर विधान सभा में भाजपा के कितने विधायक हैं ? और अहोम के अलावा बाकी पूर्वोत्तर के सूबों की विधान सभाओं में ? सिफ़र !

  कई मित्र यह कह रहे हैं कि आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ाई राजनैतिक नहीं होनी चाहिए । मुख्यधारा की राजनीति की कमियों और कुछ नेताओं के अललटप्पू बयानों के कारण उनके दिमाग में यह ग़लतफ़हमी है । ‘दिल्ली के जामिया नगर में हुई पुलिस मुठभेड़ फर्जी थी ‘ कई मुस्लिम समूह और मानवाधिकार संगठन यह मान रहे हैं । इस सन्दर्भ में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा न्यायमूर्ति रामभूषण मल्होत्रा द्वारा दिया गया एक फैसला महत्वपूर्ण है। रामभूषणजी नहीं चाहते कि उनके नाम के आगे न्यायमूर्ति लगाया जाए । चूँकि यह उनके द्वारा दिए गए फैसले की बात है इसलिए ‘न्यायमूर्ति’ लगाना उचित है। अपने फैसले हिन्दी में देने के लिए भी उन्हें याद किया जाएगा। उक्त फैसले में कहा गया था कि जब भी पुलिस ‘मुठभेड़’ का दावा करती है उन मामलों में (१) मृतकों के परिवार को पुलिस द्वारा सूचना दी जाएगी तथा (२) ऐसे सभी मामलों की मजिस्टरी जाँच होगी । यदि यह घटना जामिया नगर की जगह नोएडा में होती तो इन दोनों बातों को खुद-ब-खुद लागू करना होता।घटना की जाँच की माँग एक अत्यन्त साधारण माँग है तथा पूरी पारदर्शिता के साथ इसे पूरा किया जाना चाहिए ।

    इन मानवाधिकार संगठनों और मुस्लिम समूहों से भी हम रू-ब-रू होना चाहते हैं । इतनी गम्भीर परिस्थिति में बस इतना संकुचित रह कर काम नहीं चलेगा । आतंकी घटनाओ और उसके तार देश के भीतर से जुड़े़ होने की बात पहली बार खुल के हो रही है। इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भारत के तमाम अमनपसंद मुसलमानों को भुगतना पड़ रहा है । इन घटनाओं के बाद संकीर्ण सोच वाले साम्प्रदायिक समूह हर मुसलमान को गद्दार बताने का अभियान शुरु कर चुके हैं, आगामी लोकसभा निर्वाचन में वोटों के ध्रुवीकरण की गलतफहमी भी वे पाले हुए हैं । आतंकवाद से मुकाबले की नाम पर क्लोज़ सर्किट टेवि जैसे करोड़ों के उपकरण खरीदें जायेंगे और इज़राइली गुप्त पुलिस ‘मसाद’ से तालीम दिलवाई जाएगी । कैनाडा और अमेरिका मे रहने वाले अनिवासी भारतीयों से पूछिए कि पैसे कि ताकत पर कैसे यहूदी लॉबी नीति निर्धारण में हस्तक्षेप करती है ?   इन सब से गम्भीर और नुकसानदेह  बात यह है कि मेधावी तरुण यदि ‘आतंक’ में ग्लैमर देखने लगें तो उन्हें उस दिशा से रोकने और अन्याय की तमाम घटनाओं के विरुद्ध राजनैतिक संघर्ष से जोड़ने का काम कौन करेगा ?  यह काम मुख्यधारा की राजनीति से जुड़ा कोई खेमा शायद नहीं करेगा।

     एक मुस्लिम महिला पत्रकार और कवयित्री ने अपने चिट्ठे पर लिखा , ‘कि दिल्ली का बम काण्ड करने वाले जरूर हिन्दू रहे होंगे’। अत्यन्त सिधाई से उन्होंने यह बात कह दी। मैंने यह देखा है कि शुद्ध असुरक्षा की भावना से ऐसी बातें दिमाग में आती हैं ।‘काम गलत है, इसलिए जरूर हमारे समूह का व्यक्ति न रहा होगा’ – यह मन में आता होगा ।  राष्ट्रीय एकता परिषद , सर्वोच्च न्यायालय और संसद के सामने बाबरी मस्जिद की सुरक्षा की कसमे खाने वाली जमात ने जब उस कसम को पैरों तले मसलने में अपना राष्ट्रवाद दिखाया तब किसी हिन्दू के दिमाग में क्या यह बात आई होगी कि जरूर यह काम हमारे समूह से अलग लोगों ने किया होगा ? जिन्हें लगता है कि “वह काम सही था और इसीलिए हमारे समूह ने किया” – उन राष्ट्रतोड़क राष्ट्रवादियों  से हमे कुछ नहीं कहना , उनके खतरनाक मंसूबों के खिलाफ़ लड़ना जरूर है ।

    मैंने आतिफ़ का ऑर्कुट का पन्ना पढ़ा है जिसमें वह फक्र के साथ एक फेहरिस्त देता है कि किन शक्सियतों के आजमगढ़ से वह ताल्लुक रख़ता है  – ……. राहुल सांकृत्यायन , कैफ़ी आज़मी । चार लोगों को जिन्दा जमीन में गाड़ देने वाले भाजपा नेता (पहले सपा और बसपा में रहा है) रमाकान्त यादव या भारत की सियासत के सबसे घृणित दलाल अमर सिंह का नाम नहीं लिखता ! ऐसा कोई तरुण घृणित , अक्षम्य आतंकी कार्रवाई से जुड़ता है , उन कार्रवाइयों की तस्वीरें उतारता है तो निश्चित तौर पर इसकी जिम्मेदारी मैं खुद पर भी लेता हूँ । अन्याय के खिलाफ़ लड़ने का तरीका आतंकवाद नहीं है । आजमगढ़ के शंकर तिराहे के आगे , मऊ वाली सड़क पर प्रसिद्ध पहलवान स्व. सुखदेव यादव के भान्जे के मकान में समाजवादी जनपरिषद के दफ़्तर के उद्घाटन के मौके पर आजमगढ़ के सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और फोटोग्राफर दता ने राहुलजी का लिखा गीत दहाड़ कर गाया था – ‘ भागो मत ,दुनिया को बदलो ! मत भागो , दुनिया को बदलो ‘ । आजमगढ़ के तरुणों से यही गुजारिश है ।

Read Full Post »

कुश के चिट्ठे पर हमारे मित्र संजय बेंगाणी ( जिनसे हमारी भी कोई व्यक्तिगत शिकायत नहीं है) ने कहा -

अफ्लातुनजी से व्यक्तिगत कोई शिकायत नहीं, हम में मित्रता है. उन्हे मैं बताना चाहुंगा की आतंकवादियों में और हिन्दु संगठनो में जो सबसे बड़ा फर्क है वह है भारत के प्रति निष्ठा. अगर आपको यह नजर नहीं आता तो क्या कहें! :)

हमें इन हिन्दू संगठनों की भारत के प्रति निष्ठा भी राष्ट्रतोड़क लगती है । देश में फैली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में भगवा झंडे को हिंदू राष्ट्र के ध्वज के रूप में सलाम करने की सीख दी जाती है और अबोध बच्चों को यह बताया जाता है कि सिर्फ हिंदू ही इस राष्ट्र के असली नागरिक हैं । दूसरे धर्म वालों के खिलाफ़ नफ़रत भरी जाती है । इक़बाल के गीत में कहा गया है कि , ‘ सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा,हम बुलबुलें हैं इसकी,यह गुलिस्तां हमारा’ । इन शाखाओं में प्रचलित इसी तर्ज के एक गाने में कहा गया है , ‘ उन बुलबुलों को कह दो कहीं और चमन ढूँढें ‘ । यह स्पष्ट रूप से गैर हिन्दुओं को देश छोड़ने को कहना है । अगर देश के करोड़ों बच्चों के मन में इस तरह का जहर भर दिया गया तो हमारा राष्ट्र क्या बनेगा ?

    कुछ ही दिन पहले संजय , जिनका पूर्वोत्तर से विशेष नाता है ने काश्मीर से तुलना करते हुए वहाँ अन्य प्रान्तों के नागरिकों को जमीन खरीदने पर रोक आदि का जिक्र किया था। हमने संजय  से गुजरात ( जहाँ वे रहते हैं ) में आदिवासी की जमीन खरीद सकते हैं ,क्या ? - यह सवाल किया था। गुजरात के इस प्रगतिशील भूमि सुधार कानून को यदि वे समझ लेते तब शायद पूर्वोत्तर की बात भी समझ पाते । परन्तु वे महटिया गए ।

Read Full Post »

गांधी की कलम से

*…… भारत को इंगलैण्ड और अमरीका के जैसा बनाने का मतलब है ऐसे नए देशों की तलाश करना जिनका शोषण किया जा सके । अभी तक तो लगता है कि पश्चिमी राष्ट्रों ने योरोप के बाहर के देशों का , शोषण के लिए , आपस में बंटवारा कर लिया है और तलाश किए जाने के लिए कोई देश नहीं बचे हैं । भारत द्वारा पश्चिम की अन्धी नकल करने के प्रयास का क्या हश्र हो सकता है ? निश्चय ही पश्चिम में औद्योगीकरण और शोषण का बाहुल्य रहा है । जब जो लोग इस रोग से ग्रसित हैं वही इसका निदान नहीं कर सके हैं तो हम जैसे अनाड़ी इनसे बच सकने की आशा कैसे कर सकते हैं ?

—– यंग इण्डिया , ७-१०-१९२७ पृष्ठ ३४८ (अंग्रेजी)

**    ईश्वर न करे कि भारत में भी कभी पश्चिम जैसा औद्योगीकरण हो । एक छोटे द्वीप राज्य ( इंग्लैण्ड ) की आर्थिक साम्राज्यशाही ने ही सारे विश्व को बेड़ियों में जकड़ दिया है । अगर तीस करोड़ की जनसंख्या वाला पूरा राष्ट्र इस प्रकार के आर्थिक शोषण की राह पर चले तो वह सारे विश्व को चूस कर सूखा कर देगा ।

( अंग्रेजी से ) यंग इण्डिया , २०-१२-१९२८ , पृष्ठ ४२२

***    पण्डित नेहरू चाहते हैं कि औद्योगीकरण हो , क्योंकि वह समझते हैं कि अगर इसका समाजीकरण कर दिया जाए तो यह पूंजीवादी विकारों से मुक्त हो सकता है । मेरा अपना ख्य़ाल है कि ये विकार औद्योगीकरण का ही हिस्सा हैं और किसी भी सीमा तक किया हुआ समाजीकरण इनको समाप्त नहीं कर सकता ।

हरिजन , २९-९-१९४० , पृष्ठ २९९ .

यह भी देखें : गांधी-नेहरू चिट्ठेबाजी

Read Full Post »

[ गत दिनों मशहूर गीतकार गुलज़ार बैंगलोर स्थित राष्ट्रीय महत्व के संस्थान इण्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ़ साइन्स गए थे । 'साहित्य के झरोखे से विज्ञान' विषयक प्रवचन तथा युवा वैज्ञानिकों से सवाल जवाब भी हुए । इसकी सुन्दर रिपोर्ट वहाँ के शोध छात्र श्रीराम यादव ने यहाँ दी है । इस पोस्ट से मुझे कुछ याद आया । १९८१ में समाजवादी अध्ययन केन्द्र, वाराणसी की पत्रिका संभावना का 'विज्ञान और प्रौद्योगिकी विशेषांक' में मैंने गांधीजी के मुख और कलम से प्रकट कुछ स्फुट विचारों को संकलित कर प्रस्तुत किया था । १२ जुलाई १९२७ को इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइन्स जिसे टाटा इन्स्टीट्यूट कहा जाता रहा है में दिए गए (अंग्रेजी में )प्रवचन से प्रमुख अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ । ]

   ”  मैं सोच रहा था कि यहाँ कहाँ आ गया ? मुझ जैसे देहाती का , जिसकी वाणी यह सब देख कर विस्मय और आश्चर्य से मूक हो जाए , यहाँ क्या काम हो सकता है ? मैं ज्यादा कुछ कहने की मन:स्थिति में नहीं हूँ । मैं सिर्फ इतना ही कह सकता हूँ कि आप यहाँ जो बड़ी बड़ी प्रयोगशालाएं और बिजली के वैज्ञानिक उपकरण देख रहे हैं , वह सब करोड़ों सामान्य जनों के इच्छा और अनिच्छा से दिये गये , श्रम का फल है । क्योंकि टाटा ने जो तीस लाख रुपये दिये वह कहीं बाहर से नहीं आये थे , और मैसूर द्वारा दिया गया सारा अनुदान भी कहीं और से नहीं बेगार से ही प्राप्त हुआ था । अगर हम ग्रामीणों के पास जाकर उन्हें समझायें कि हम लोग उनके पैसे का उपयोग किस तरह उन बड़ी बड़ी इमारतों और कारखानों को खड़ा करने में कर रहे हैं जिनसे उन्हें तो नहीं पर शायद उनकी भावी पीढ़ियोंको लाभ हो सकता है तो वे इस बात को नहीं समझेंगे । वे इस बात पर कोई ध्यान ही नहीं देंगे । लेकिन हम उन्हें यह सब समझाने की कोशिश भी नहीं करते , उन्हें कभी कोई महत्व ही नहीं देते और उनसे जो मिलता है उसे हक़ मान कर उनसे ले लेते हैं और यह भूल जाते हैं कि ” जिसका प्रतिनिधित्व नहीं है उस पर कर भी नहीं लगाया जा सकता ” यह सिद्धान्त उन पर भी लागू होता है । यदि आप सचमुच इस सिद्धान्त को उन पर लागू करें और यह महसूस करें कि उनके प्रति भी आपकी जवाबदेही है तो आपको इन तमाम उपकरणों का एक और पहलू भी नजर आयेगा । तब आपके हृदय में उनके लिये विशाल स्थान होगा , और वह उनके लिए सहानुभूति से भरा होगा और यदि आप उस भावना को स्वच्छ और विमल रखेंगे तो आप अपने ज्ञान का उपयोग उन करोड़ों लोगों के कल्याण के लिये करेंगे जिनके श्रम के बल पर आप शिक्षा प्राप्त करते हैं । ……………..

    ………… आप जो आविष्कार करें , उन सब का उद्देश्य अगर गरीबों की भलाई नहीं है तो आपके तमाम कल कारखाने और प्रयोगशालायें , जैसा कि राजगोपालचारी ने विनोद में कहा , वास्तव में शैतान के कारखानों से अधिक कुछ नहीं होंगे । अच्छा तो , अगर आप सोचना चाहते हों जैसा कि सभी अनुसन्धान-छात्रों को चाहिए तो आपके सोचने के लिए अब मैंने काफी मसाला दे दिया है । “…. बंगलोर १२ जुलाई १९२७ . 

Read Full Post »

राष्ट्र की हिटलरी कल्पना फासीवाद के नाम से कुख्यात है । हिटलर ने ‘नस्ल’ की कथित शुद्धता और यहूदी विद्वेष की विक्षिप्तता को फैलाकर जर्मनी को भीषण बर्बरता और रक्तपात में डुबो दिया और विश्व भर की लांछना का पात्र बना दिया । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का धर्म आधारित राष्ट्र भी उसी प्रकार का एक बर्बर उद्देश्य है । हिटलर से तुलना करके या हिटलर का उदाहरण देकर हम संघ-परिवार पर कोई काल्पनिक आरोप नहीं लगा रहे हैं । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गौरव-पुरुष गुरु गोलवलकर ने खुद १९३९ में लिखी अपनी पुस्तक ‘ वी ऑर आवर नेशनहुड डिफाइन्ड ‘ ( हम या हमारी राष्ट्रीयता परिभाषित ) ( अब उनके चेले अधिकृत रूप से कहने लगे हैं कि यह उनकी लिखी किताब नहीं है , उनका अनुवाद है ) में कहा था -

नस्ल और इसकी संस्कृति की पवित्रता को बनाए रखने के लिए जर्मनी ने यहूदियों से अपने देश को रिक्त कर दुनिया को स्तम्भित कर दिया । नस्ल का गर्व यहाँ अपनी उच्चतम अभिव्यक्ति पाता है। जर्मनी ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि संस्कृतियों और नस्लों के फर्क जो बुनियाद तक जाते हैं , एक संपूर्ण इकाई में जज़्ब नहीं किए जा सकते । हम भारतीयों के लिए यह एक अच्छा सबक है जिससे लाभ उठाना चाहिए । “

    यह सचमुच बड़े शर्म की बात है कि जिस विद्वेष और क्रूरता के लिए हिटलर का जर्मनी पूरी दुनिया में लांछित हुआ , गोलवलकर ने ने उसी की प्रशंसा की और भारत के लिए उसी हिटलरी रास्ते की सिफारिश की । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गुरु गोलवलकर के बताए हुए फासीवाद के रास्ते पर चल रहा है । वह जिस हिन्दू राष्ट्र की बात करता है , वह सिर्फ मुस्लिम विद्वेष तक सीमित नहीं है । स्त्रियों और शूद्र कही जाने वाली जातियों , जिन्हें सबसे अधिक धर्माचार्यों द्वारा अनुमोदित क्रूर प्रथाओं और परम्परागत ऊँच-नीच का शिकार होना पड़ा है , की दुर्दशा कम होने के बजाए , धर्म आधारित राष्ट्र में काफ़ी बढ़ जाएगी । सती प्रथा और बाल-विवाह पर रोक सम्बन्धी कानून हटाने और वर्ण व्यवस्था को स्थापित करने की मांग धर्म-संसद के प्रस्तावों में होने लगी थीं । स्त्रियों को सम्पत्ति में हक देने वाले हिन्दू कोड बिल का भी गोलवलकर ने विरोध किया था ।

   इसलिए यदि आप कूप मंडूकता , धर्मान्धता , स्त्री उत्पीड़न और दलितों तथा पिछड़ों की सामाजिक दुर्दशा को देश की नियति नहीं बनाना चाहते तो हिन्दू राष्ट्र के नारे से सतर्क रहे। हम किस प्रकार पूजा पाठ करें , त्योहार किस ढंग से मनाएं , धार्मिक प्रतीकों का क्या अर्थ ग्रहण करें और दूसरे धर्म के अनुयायियों के साथ क्या व्यवहार करें , इन बातों को संघ परिवार और महंत मठाधीश नियंत्रित करनी की कोशिश करते हैं । इनके चलते हमारे धार्मिक आचरण की स्वाधीनता सुरक्षित नहीं है । ऐसे तत्वों को धार्मिक मान्यता और राजनैतिक समर्थन देना बन्द करें नहीं तो ये हमें एक अन्धी सुरंग में पहुंचा देंगे ।

    दुनिया के कई धर्म आधारित राष्ट्रों में जनता का उत्पीड़न और रुदन हमसे छिपा नहीं है। धर्म आधारित राष्ट्र के रूप में हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के बारे में हम जानते हैं कि इस्लामियत के नाम पर कैसे कठमुल्लों , सामन्तों , फौजी अफसरों , भ्रष्ट नेताओं और असामाजिक तत्वों का वह चारागाह बन गया है । क्या हम भारत में भी उसी दुष्चक्र को स्थापित करना चाहता हैं ? धर्म आधारित राष्ट्र लोकतंत्र विरोधी अवधारणा है । किसी धर्म आधारित राष्ट्र में लोकतंत्र कभी पनप नहीं सकता । संविधान , न्यायपालिका , और प्रेस का हाल के वर्षों में बड़े पैमाने पर अपमान कट्टरपंथियों के लोकतंत्र विरोधी रुख की ही बानगी है । गोलवलकरपंथी राष्ट्रतोड़क ‘राष्ट्रवादियों’ के चंगुल में में देश चला गया तो यह उसके अस्तित्व के लिए घातक होगा । इसलिए समय रहते इनके हिटलरी मंसूबों को उजागर करें और इनके खिलाफ़ चौतरफ़ा ढंग से सक्रिय हों ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

[ दोनों चित्रों का स्रोत :  विकीपीडिया ]

Read Full Post »

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 2,815 other followers

%d bloggers like this: